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rajukumarchaudhary502010

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kattupayas.101947

दूरी का धोखा — भीतर छिपा भगवान ✧

आध्यात्मिक विषयों को अक्सर इतने कठिन, कठोर और दूरस्थ बताया जाता है कि साधारण मनुष्य के लिए वे असंभव प्रतीत होने लगते हैं। यह भ्रम फैलाया गया है कि आत्मा की साधना केवल विशेष तपस्या या अत्यधिक कठोर अनुशासन से ही संभव है।

इसी कारण सामान्य जनता इस मार्ग को इतना कठिन मान बैठती है कि वे केवल पूजा-अर्चना, जय-जयकार और आरती तक सीमित रह जाती है। वास्तविक आत्म-बोध या समाधि की ओर दृष्टि डालने की हिम्मत ही नहीं कर पाती।

परन्तु सच्चाई यह है कि हर महान साधक, हर ज्ञानी आत्मा साधारण परिस्थितियों से ही जन्मा है। न कोई विशेष धन, न सुविधाएँ, न ऊँची शिक्षा — फिर भी उन्होंने अपने भीतर की संभावना को पहचानकर जीवन का उच्चतम लक्ष्य प्राप्त किया।

इसका संदेश साफ़ है: हर मनुष्य के भीतर वही संभावना मौजूद है। “असंभव” कहना ही आत्मा के विकास का पहला और सबसे बड़ा अवरोध है। जब हमें कहा जाता है कि यह मार्ग केवल विशिष्टों के लिए है, तो हम अपने ही भीतर की हकीकत से विमुख हो जाते हैं।

यही कारण है कि आत्मा, समाधि और परमात्मा को सातवें आसमान पर बिठा दिया गया है, जबकि उनका संबंध हमारे साधारण जीवन से ही है।

वास्तव में आत्मा बीज के समान है, जो पहले से हमारे भीतर है। उसके अंकुरण के लिए दूर-दराज़ की यात्रा या असाधारण तपस्या की ज़रूरत नहीं है। प्रकृति स्वयं उस बीज को सहारा देती है। हमें बस अपने भीतरी स्वभाव को समझना और जागरूक होना है।

लेकिन जब मन में यह कर्ता-भाव बैठा दिया जाता है — “मुझे यह करना होगा, यह तपस्या करनी होगी, ये कठिनाइयाँ झेलनी होंगी” — तब हम खुद को असहाय मानने लगते हैं। यही भ्रम असली बाधा बनता है।

सत्य यह है कि आत्मा का विकास हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। यह केवल उन लोगों का विशेषाधिकार नहीं है जो कठोर तपस्या करते हैं। जब हम “असंभव” के भ्रम को त्याग देंगे और अपने भीतर की संभावना को स्वीकार करेंगे, तभी वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति संभव हो सकेगी।

अध्याय : दूरी का धोखा — भीतर छिपा भगवान ✧

सूत्र 1.
धर्म ने आत्मा की तस्वीरें इतनी कठोर और असंभव बनाई कि आम आदमी को लगा — “यह हमारे बस का नहीं।”
➝ कठिन तपस्या और कठोर चित्र साधारण आदमी को शुरुआत में ही हरा देते हैं।

सूत्र 2.
जनता से कहा गया — बस देखो, नमन करो, जय-जयकार और आरती करो।
➝ मार्ग को असंभव बताकर पूजा ही धर्म बना दी गई।

सूत्र 3.
पर सच यह है कि कोई भी असाधारण पैदा नहीं होता। हर महान व्यक्ति साधारण, गरीब, अनपढ़ घर में जन्मा।
➝ असाधारण बनने की शुरुआत साधारणता से ही होती है।

सूत्र 4.
न धन, न सुख, न पद, न शिक्षा — साधारण मिट्टी से ही असाधारण खिले।
➝ सुविधा या संपत्ति नहीं, संघर्ष ही संभावना जगाता है।

सूत्र 5.
हर इंसान समान संभावना लेकर जन्म लेता है।
➝ किसी के भीतर कमी नहीं; फर्क बस जागरण का है।

सूत्र 6.
“असंभव” कहना ही आत्मा-विकास का पहला अवरोध है।
➝ जब शुरुआत में ही हार मान ली, तो बीज अंकुरित कैसे होगा?

सूत्र 7.
जब धर्म कहे — “वे पहुँच गए, पर तुम्हारे लिए असंभव है,” तो जनता पूजा में ही धर्म मान लेती है।
➝ पूजा आसान है, खोज कठिन लगती है।

सूत्र 8.
इसलिए समाधि, आत्मा, ईश्वर की बात सोचना भी असंभव-सा लगने लगता है।
➝ विषय को सातवें आसमान पर टाँग देने से इच्छा भी मर जाती है।

सूत्र 9.
आध्यात्मिक विषयों को सातवें आसमान पर टाँग दिया गया है।
➝ दूरी पैदा करना ही धर्म-सत्ता की चाल है।

सूत्र 10.
पर सच यह है कि इच्छा ही बीज है, और बीज भीतर है।
➝ कोई यात्रा बाहर नहीं, शुरुआत भीतर के बीज से है।

सूत्र 11.
बीज के लिए कोई अलग यात्रा नहीं करनी पड़ती; प्रकृति सब सहयोग देती है।
➝ जैसे बीज को अंकुरित होने के लिए मिट्टी, जल, सूर्य स्वाभाविक रूप से मिलते हैं।

सूत्र 12.
धर्म ने दृष्टि में कर्ता-भाव भर दिया — “इतना करना होगा, तपस्या करनी होगी, दुख उठाने होंगे।”
➝ कर्ता-भाव वही दीवार है जो सहज जागरण को रोक देता है।

सूत्र 13.
यही दृष्टि आदमी को असहाय बना देती है।
➝ जब भीतर भरोसा नहीं, तो बाहर सहारे ढूँढने ही पड़ते हैं।

सूत्र 14.
असहाय होकर वह पाखंड की शरण में चला जाता है और आगे सोच नहीं पाता।
➝ असली यात्रा रुकी रहती है, और जीवन पूजा में खो जाता है।
Agyat Agyan

bhutaji

टूटकर भी आदमी जी लेता है

टूटकर भी आदमी जी लेता है,
जैसे आधी रात के सन्नाटे में
टूटा हुआ चाँद
फिर भी उजाला बाँट देता है,
जैसे सूखे वृक्ष पर
कहीं दूर टहनी में
एक हरा पत्ता
अब भी सांस लेता है।

वह टूटता है भीतर ही भीतर,
उसके सपने बिखरते हैं
कांच की तरह ज़मीन पर,
पर बाहर से वह मुस्कुराता है—
क्योंकि घर की चौखट पर
रोते हुए चेहरे का कोई मूल्य नहीं होता।

आदमी टूटा तो बहुत बार है,
बेवफ़ा रिश्तों की चोट से,
समाज की कटु निगाहों से,
रोज़ी-रोटी की भागदौड़ में
कुचले हुए अरमानों से।
फिर भी हर सुबह
वह आँखें खोलता है,
अपने बच्चों की हँसी के लिए,
अपने माँ-बाप की दवा के लिए,
अपने जीवन की जिम्मेदारियों के लिए।

टूटकर भी आदमी जी लेता है—
क्योंकि उसे जीना पड़ता है।
उसके आँसू किसी को दिखाई नहीं देते,
वह उन्हें तकिए के नीचे दबा देता है,
रातें करवटों में काट देता है,
और सुबह वही चेहरा पहन लेता है
जो दुनिया देखना चाहती है।

उसकी आत्मा जब-जब चूर होती है,
तब-तब वह भीतर से
और कठोर बनता जाता है,
जैसे आग में तपकर
लोहे की धार और तेज़ हो जाए।

आदमी टूटकर भी जी लेता है,
क्योंकि उसके भीतर कहीं
उम्मीद की एक छोटी लौ
अब भी झिलमिलाती रहती है,
क्योंकि वह जानता है—
अंधेरा चाहे कितना भी घना हो,
भोर का उजाला
कभी बुझता नहीं।

आर्यमौलिक

deepakbundela7179

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A H☠️RROR ST👺RY....💀💀💀

hardik89

✧ भोग और बोध का रहस्य ✧

✍🏻 — 🙏🌸 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲


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प्रस्तावना

धर्म हमेशा या तो भोग के खिलाफ खड़ा दिखता है, या बोध को भविष्य में टाल देता है।
गुरु और शास्त्र मार्ग बेचते हैं—लंबी यात्रा, तपस्या, नियम, पाप–पुण्य की गिनती।
पर जीवन की सच्चाई सरल है:
भोग और बोध दो विरोधी नहीं, एक ही धारा के दो पहलू हैं।

भोग अगर अंधा है, तो बंधन है।
भोग अगर जागरूक है, तो वही प्रसाद है।
बोध अगर जीवन से भागा हुआ है, तो सूखा है।
बोध अगर जीवन को जीकर खिला है, तो वही मोक्ष है।

यह ग्रंथ इसी रहस्य को खोलता है।


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✧ अध्याय 1: ईश्वर पाने का प्रश्न ही क्यों गलत है?

लोग पूछते हैं: “ईश्वर कैसे मिलेगा?”
पर यह प्रश्न ही पहली भूल है।
क्योंकि पाने का मतलब है—ईश्वर कोई बाहर की वस्तु है।

सत्य यह है:
ईश्वर कोई वस्तु नहीं, कोई उपाधि नहीं।
ईश्वर = जीवन।
और जीवन पहले से भीतर है।

तो सही प्रश्न है: क्या मैं सचमुच जी रहा हूँ?

शास्त्र-संकेत:

“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः…” (कठोपनिषद् 1.2.23)

कबीर: “मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।”



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✧ अध्याय 2: जीना ही मोक्ष है

जो जीवन को नहीं जीता, उसे लगता है: “मोक्ष शेष है, ईश्वर अभी पाना है।”
पर जिसने जीवन को गहराई से जिया, वह जानता है: जीवन ही मोक्ष है।

मोक्ष कोई भविष्य नहीं, यह वर्तमान का स्वाद है।
हर अनुभव में उतरकर, हर सुख–दुःख को बोध से जीकर—
यही मुक्ति है।

शास्त्र-संकेत:

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” (गीता 2.47)

बुद्ध: “अप्प दीपो भव।”



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✧ अध्याय 3: पाप–पुण्य की भ्रांति

धर्म कहता है: “यह पाप है, यह पुण्य।”
पर असली कसौटी सिर्फ एक है—बोध।

गलती = पाप नहीं।
बिना बोध के जीना = पाप।
अनुभव से जागना = पुण्य।

शास्त्र-संकेत:

रैदास: “मन चंगा तो कठौती में गंगा।”

कबीर: “जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।”



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✧ अध्याय 4: भोग से बोध तक

भोग का असली अर्थ है: हिस्सा, अंश, प्रसाद।
जब भोग अज्ञान में है, तो वह नशा और बंधन है।
जब भोग बोध के साथ है, तो वह प्रसाद और मुक्ति है।

भोग + अज्ञान = गिरावट।
भोग + बोध = उत्थान।

शास्त्र-संकेत:

“यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।” (गीता 2.52)

संत वाणी: “भोग भोग में बोध हो, तो भोग न बंधन होय।”



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✧ अध्याय 5: त्याग का असली अर्थ

धर्म त्याग को आयोजन बना देता है—
नियम, व्रत, घोषणा।
पर त्याग कोई आयोजन नहीं, त्याग = परिणाम है।

जब बोध आता है, इच्छाएँ अपने आप झर जाती हैं।
जैसे पका फल पेड़ से गिरता है।
विकास का संकेत त्याग है, ज़बरदस्ती नहीं।

शास्त्र-संकेत:

“त्यागो हि परमो धर्मः।” (गीता 18.66 भाव)

“यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा…” (कठोपनिषद् 2.3.14)



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✧ अध्याय 6: जीवन = भोग और संन्यास का खेल

भोग और संन्यास विरोधी नहीं।
जीवन एक धारा है—हर पल भोग, हर पल संन्यास।
पूरा जिया हुआ भोग अपने आप संन्यास बन जाता है।
और संन्यास में नया भोग जन्म लेता है।

जीवन = नृत्य।
भोग और संन्यास दोनों इस नृत्य के कदम हैं।

शास्त्र-संकेत:

“क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति…” (योगवाशिष्ठ)

बुद्ध: “अनित्य”—हर क्षण नया जीवन।



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समापन

भोग और बोध दो विरोधी नहीं।
भोग में बोध हो तो वही प्रसाद है, वही संन्यास है।
त्याग तब होता है जब आत्मा खिलती है, जब जीवन सच में जिया जाता है।

ईश्वर कोई पाने की चीज़ नहीं,
वह तो जीने की कला है—अभी, यहीं।

जीवन ही मोक्ष है।
भोग ही मार्ग है।
और बोध ही उसका रहस्य

bhutaji

आज अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस है। यह दिवस वृद्धजनों की उचित देखभाल और उनके सम्मान के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस दुनिया भर के बुजुर्ग नागरिकों के लिए एक खास दिन है। 14 दिसंबर, 1990 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस घोषित किया था। पहला अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस 1 अक्टूबर, 1991 को मनाया गया था। तभी से यह दिवस पूरे विश्व में मनाया जाता है।

सभी वृद्धजनों को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए प्रस्तुत है मेरी एक रचना 🙏🙏

बुजुर्ग
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घर की शान बढ़ाते हैं
ये वृद्ध ,बूढ़े और बुजुर्ग
हमसाया बन जाते हैं
यह वृद्ध ,बूढ़े और बुजुर्ग
बचपन कभी सवारां था
इन झुर्रियों भरे हाथों ने
प्रेम से पाला था कभी देकर
दुलार का प्याला ।

अपना सर्वस्व न्यौछावर करके
गमों में भी मुस्कुराते रहे
बच्चों की खातिर अपना जीवन
लुटाते रहे
उनकी खुशी में मुस्कुराते रहे
उनके गमों में आँसू बहाते रहे।
वक्त ने छीन लिया अब इनका यौवन
ये बुजुर्ग अब वृद्ध नजर आने लगे
कुछ को मिला घर में सम्मान
और कुछ वृद्धाश्रम जाने लगे।

तकदीर का खेल है निराला
बच्चे इनसे नजर चुराने लगे
ये अपने बुढ़ापे से लाचार
खुद से समझौता कर
जीवन अपना बिताने लगे।
बस इन्हें थोड़ा सा मान- सम्मान चाहिए
नाती -पोतों का प्यार चाहिए
अपने जीवन के अनुभवों की झोली
विरासत में दे जाएँ ऐसा अपनो का साथ चाहिए
कुछ नही इन्हे बस थोड़ा सा प्यार चाहिए ।

आभा दवे
मुंबई

daveabha6

Good evening friends

kattupayas.101947

तन्हा है तन्हाई से प्यार करते है
हमे सुकु मिलता है खुद को यू सजा देकर
ये तो रात जो हमे सब भुलवा देती है
मगर दिन है जो जलता है हमे यू देखकर .

mashaallhakhan600196

“मार्ग नहीं, अवरोध है सत्य का रहस्य”
मार्ग का मतलब है: लंबी यात्रा, तपस्या, कठिनाई, भटकने की संभावना।
तो जनता को लगता है — “हाँ, अगर मार्ग है तो शायद पहुँचा जा सकता है।”
पर सच्चाई यह है — ईश्वर तक कोई मार्ग है ही नहीं।

क्यों?
क्योंकि मार्ग हमेशा कहीं और ले जाता है।
मार्ग = भविष्य।
मार्ग = अभी से इनकार, कल की प्रतीक्षा।
और ईश्वर कभी “भविष्य” में नहीं, बस “अभी” में है।

इसीलिए जो भी सच्चे लोग आए — कबीर, रैदास, बुद्ध, नानक, कृष्णमूर्ति, ओशो — उन्होंने रास्ते से ज़्यादा अवरोध की बात की।
रैदास अंधे थे, उन्होंने कोई मार्ग नहीं देखा, बस भीतर का अंधापन गिरा।
कबीर कहते रहे, ढोंग-धारणाएँ हटाओ।
बुद्ध ने कहा, वासनाएँ और अज्ञान छोड़ो।
कृष्णमूर्ति ने साफ़ कह दिया — “मार्ग है ही नहीं।”

पर धर्म?
धर्म कभी अवरोध की बात नहीं करता।
क्योंकि अगर अवरोध हटा दिए जाएँ, तो गुरु और धर्म दोनों बेकार हो जाएँ।
इसलिए वे “मार्ग” और “साधन” बेचते हैं।
और जनता खुश — मार्ग है, साधन है, हमें बस पालन करना है।
पर असल में यह बस व्यापार है।

मार्ग नहीं, अवरोध असली मुद्दा है।
मार्ग खुद नहीं बनता, जब अवरोध हटता है तो रास्ता अपने आप खुला दिखने लगता है।
अवरोध = धारणा, मानसिकता, अंधविश्वास, ढोंग।
जो भी इन्हें उजागर करता है, उसे धर्म-विरोधी, नास्तिक, मानवीय-विरोधी कहकर हटा दिया जाता है।

असल सच्चाई बड़ी सरल है:
साधारण जीवन को प्रेम, आनंद, संतोष से जियो।
यही जीवन बिना अवरोध पैदा किए अपने आप उस परम गव्य तक पहुँचा देता है।

“मार्ग” और “साधना” का व्यापार असल में “अवरोध” का व्यापार है।
जब तक मार्ग की कल्पना बेचोगे, अवरोध भी बेचने पड़ेंगे।

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अगर इस हिस्से को एक अध्याय बनाना हो, तो उसका नाम मुझे लगता है:
“मार्ग नहीं, अवरोध है — सत्य का रहस्य”

१. कठोपनिषद (१.२.२३)
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥”

➝ आत्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धि से, न शास्त्र-पठन से मिलता है।
वह तभी प्रकट होता है जब भीतर की तत्परता से वह स्वयं खिलता है।
यानी आत्मा = अचानक फूटी कोपल।

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२. बृहदारण्यक उपनिषद (२.३.६)
“नेति नेति”
➝ सत्य को किसी अंतिम शब्द, रूप या मार्ग में बाँधा नहीं जा सकता।
हर बार जब कोई कहता है “यही है”, तो उपनिषद जवाब देता है — “नहीं, यह भी नहीं।”
यानी ज्ञान कभी अंतिम नहीं, हमेशा खुला हुआ, ताज़ा।

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३. मुण्डक उपनिषद (१.१.४–५)
“द्वे विद्ये वेदितव्ये, परा चैवापरा च।”
➝ ज्ञान दो हैं — अपरा (बाहरी, शास्त्र, साधन) और परा (जीवित, प्रत्यक्ष अनुभव)।
अपरा हमेशा सीमित है; परा वही है जो अभी, यहीं प्रकट होता है।

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bhutaji

✨ Hello October ✨
Numbers may pass, they come and go,
But 1 reminds — it’s first to glow. 🌟
October arrives, a month so dear,
Of family, love, and Diwali cheer. ❤️🏡✨

nensivithalani.210365

​अदृश्य क़त्ल (अदृश्य हत्या)
​दो तरह की होती है हत्या,
एक तन की, एक मन की।
तन की हत्या, सबको दिखती,
मन की हत्या, गुमशुम रहती।
​कोई आहट नहीं, न कोई गवाह,
बस भीतर ही होता है एक अनजाना तबाह।
पहला क़त्ल जिस्म को ख़त्म कर जाए,
दूजा क़त्ल जीते जी आत्मा को मार जाए।
​आमतौर पर क़त्ल के गवाह नहीं होते,
खासकर जब क़त्ल ये मन का होता है।
दुनिया देखती है, जब तन का अंत हो,
पर मन का क़त्ल कोई देखता नहीं।
​ये घाव है गहरा, ये सिलसिला है कड़वा,
ये बार-बार होता है, जैसे हो ये रस्म।
इस दर्द को कोई रोकने वाला नहीं,
बस सिसकियाँ चलती हैं, जैसे हो मौसम।

DHAMAk (એક ત્રણ લીટી ના વાક્ય પરથી
પ્રેરિત થઈને)

heenagopiyani.493689

जब सुबह तेरी याद आती हैं तो ,सिर पर रज़ाई रख कर छिप जाती हूं।
रातों को तेरे ख्वाब आते है तो, रात भर जाग जाती हूं
अब बस......
तुझे भूलने की कोशिश ही कर लेती हूं
-Anjali jha

anjalijha981030gmail.com119902

"Shubh Maha Navami! 🌸
May the divine power of Maa Durga bring love, light & spiritual growth in your life, and keep your eyes radiant forever.
— Netram Eye Centre"

netrameyecentre

तेरे सिवा कोई भाता ही नहीं तुम बिन दिन गुजरता ही नहीं आंखों को आदत लगवाई है तूने अपनी तू ना दिखे तो शिकायत है इन्हें नज़रे मिले तो अश्क भर आते हैं आंखों आंखों में इज़हार इश्क का कर जाते हैं कैसा यह दिल का हाल है लफ्ज़ बाय ही नहीं कर पाते हैं अल्फाज़ दिल के दरमियान ही ठहर जाते हैं तेरी परवाह इतनी करते हैं कि खुद की परवाह करना भूल जाते हैं सब कुछ खोकर सबको भूल कर बस तुझको याद रख पाते हैं यह जिद्दी नादान बेचैन दिल और क्या क्या करवाएगा हमसे लाख कोशिशें के बाद भी दिल की बात ना का पता है तुमसे राज़ तो इतना ही है कि यह चाहता है तुम्हें कसम से....

anjalijha981030gmail.com119902

A Hindi Gujarati Fusion Romance, listen on YouTube click on the below link

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vrajkan

அதிகாரத் திமிருடன் ஒரு பெண்ணை மிகக் கொடூரமாகக் கற்பழித்துக் கொன்ற குற்றவாளிகளைத் தீர்த்துக் கட்ட, ஒரு மர்ம நபரால் எழுதப்பட்ட மரண சாசனமே இந்த மீரா கதை. இதுவரை வெளிவந்துள்ள இரண்டு பாகங்களையும் படித்துவிட்டு, உங்கள் கருத்துகளை எனக்குத் தெரியப்படுத்துங்கள்.

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surya1991

Let's take a look at the divine moments from Navratri 2025 photo gallery: https://dbf.adalaj.org/08ky8y78

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dadabhagwan1150

एक ही ज्ञान — अनेक रूप ✧
ज्ञान का इतिहास कोई नया आविष्कार नहीं है।
जिस क्षण शिव ने मौन से वाणी को जन्म दिया, उसी क्षण पहला बीज बो दिया गया। उसके बाद से जो कुछ भी कहा गया—वह उसी बीज का फैलाव है।

नया धर्म, नया दर्शन, नया शास्त्र—ये शब्द भर हैं। भीतर से सब एक ही तरंग के अलग-अलग रूप हैं। समय और परिस्थिति के अनुसार शब्द बदलते हैं, पर सत्य का स्रोत नहीं बदलता। जैसे बीज से पेड़ निकलता है, पेड़ फल देता है, फल फिर बीज बनाता है—जीवन चलता रहता है। ज्ञान भी इसी चक्र में है।

मनुष्य बदलता है, समाज बदलता है, भाषा और प्रतीक बदलते हैं। पर भीतर का जो सत्य है, वह सब जगह एक सा है। अमेरिका हो या ऑस्ट्रेलिया, भारत हो या चीन—मनुष्य हर जगह एक ही है। किसी जगह पाँच हाथों वाला, किसी जगह तीन सिर वाला मनुष्य नहीं पैदा होता। चेहरों का फर्क मामूली है, हृदय का स्वरूप एक है।

धर्म भी ऐसा ही है। हिंदू, इस्लाम, बौद्ध, ईसाई—ऊपर से भिन्न परतें हैं। भीतर का रस एक ही है। सनातन इसी का केंद्र है, क्योंकि इसमें सभी मत, सभी ऋषि, सभी खोजें किसी न किसी रूप में समाहित हैं।

जैसे विज्ञान आज पश्चिम में विकसित दिखता है, पर उसका बीज भी भारत से निकला था। उसी तरह आज धर्म के तमाम रूप फैले हैं, लेकिन उनकी जड़ भी यहाँ, इसी भूमि से उठी थी। भारत ज्ञान का जन्मस्थल रहा है—सोने की चिड़िया सिर्फ धन के कारण नहीं, बल्कि इस अमर बीज के कारण थी।

लेकिन जब मैं आज का भारत देखता हूँ—
आज के धर्मगुरुओं को, आज की आध्यात्मिकता को, और उसकी तुलना उन ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों से करता हूँ—तो दूरी असह्य लगती है।

हमने उस गहराई को खो दिया है,
हमने उस जीवित प्रवाह को खो दिया है।

जो कभी शिव की वाणी थी, जो कभी ऋषियों के मौन से बहती थी—वह अब अनुष्ठान और व्यापार में बंध गई है।

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✧ समापन ✧

ज्ञान कभी नया नहीं होता—
नया होता है सिर्फ उसका आवरण।

आज का संकट यही है कि हमने आवरण को धर्म मान लिया, और बीज को भुला दिया।
हमने स्मारक बचा लिया, पर आत्मा खो दी।

अब प्रश्न सामने खड़ा है—
क्या हम उस बीज को फिर से पहचानेंगे?
या इतिहास हमें सिर्फ यह याद दिलाएगा कि हमने कभी सोने की चिड़िया को खो दिया था?।

✍🏻 — 🙏🌸 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲

इतिहास :

1. उपनिषदों की धारा
– मुण्डकोपनिषद् कहता है:
“सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म।”
(सत्य और ज्ञान अनन्त हैं, कभी समाप्त नहीं होते।)
यह वही बात है कि नया नहीं जन्मता, बस अनन्त से अनन्त तक बहता है।

2. गीता का सन्दर्भ
– श्रीकृष्ण कहते हैं (गीता 4.1–2):
“इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्…”
(मैंने यह सनातन योग सूर्य को कहा था, वही आगे-पीछे परंपरा से चलता रहा।)
मतलब: ज्ञान नया नहीं, वही पुराना सत्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी रूपांतरित होता है।

3. शिव परंपरा
– कश्मीर शैव दर्शन और तंत्र मानता है कि आदि गुरु शिव ने प्रथम बार मौन से वाणी और ज्ञान का प्रादुर्भाव किया।
यही स्रोत-ज्ञान है, बाकी सब उसी की व्याख्या है।

4. पश्चिमी दार्शनिक दृष्टि
– हेराक्लाइटस (Heraclitus) कहता है: “You cannot step into the same river twice.”
(नदी वही रहती है, पर पानी हर पल बदलता है।)
यह तुम्हारे कथन से मेल खाता है—सत्य वही है, रूप और परिस्थिति बदलते रहते हैं।

bhutaji

good morning ❣️

mrsfaridadesar

સુપ્રભાત 🙏🏼

aryvardhanshihbchauhan.477925