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કોઈનાય ચારિત્ર સંબંધી શંકા ના કરાય, બહુ મોટી જોખમદારી છે. મોટા મોટા તીર્થંકરો જે માને પેટે જન્મ્યા, તેમાં સ્ત્રીને કેમ દોષિત ગણાય? શંકા શાને માટે કરવાની? જે કરે છે તે તેની જોખમદારી છે. - દાદા ભગવાન

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dadabhagwan1150

नाश्ता टाईम
🌴कोळाचे पोहे 🌴

🌴कोळाचे पोहे ही पारंपारिक कोकणी रेसिपी आहे. हे प्रामुख्याने दक्षिण कोकणात बनवले जाते.
🌴ही एक अतिशय सोपी पाककृती आहे ज्याची चव खूपच छान लागते

🌴कोळाचे पोहे दक्षिण कोकणात नियमितपणे नाश्ता म्हणून प्रत्येक घरात बनवले जातात. नारळाचे दूध तेथे सहज उपलब्ध असल्याने ही तिकडे नेहेमी बनवली जाते

🌴या पाककृती मधील नारळाचे दूध आणि चिंचेचा कोळ यामुळे या पोह्याना आंबट गोड अशी चव लागते

🌴साहित्य
जाडे पोहे दोन वाट्या
दोन वाटया नारळाचं दूध
चिंचेचा कोळ
गू़ळ
चवीनुसार मीठ
फोडणीसाठी मोहरी हिंग कढीलिंब
भाजलेले शेंगदाणे
दोन मिरच्या बारीक चिरून
बारीक चिरलेली कोथिंबीर

🌴कृती
प्रथम जाडे पोहे धुवून निथळून
नारळाच्या दुधात भिजवून ठेवायचे
तासाभराने ते नारळाचे दूध पिऊन फुलून दुप्पट होतात
हलक्या हाताने एकसारखे करून घ्यायचे
🌴चिंचेचा जाडसर कोळ काढून गूळ घालुन बाजुला तयार ठेवायचा
🌴मोहरी ,हिंग ,कढीलिंब ,बारीक चिरलेली मिरची याची फोडणी करून त्यात भाजकें शेंगदाणे परतून घ्यायचे
🌴फोडणी गार झाल्यावर
पोह्यांवर घालायची व चवीप्रमाणे मीठ घालून पोहे एकत्र करून घ्यायचे
🌴खायला देताना ऐन वेळी त्यात चिंचेचा कोळ मिसळून व भरपूर कोथिंबीर घालून द्यायचे
🌴 जोडीला एखादा तळणीतला प्रकार चांगला लागतो
🌴मी सोबत मस्त तळुन फुललेली कुरडई घेतली आहे

jayvrishaligmailcom

स्त्री और पुरुष : अस्तित्व के दो आयाम

© वेदांत 2.0 — अज्ञात अज्ञानी

मानवता के इतिहास में स्त्री और पुरुष को प्रायः सामाजिक, धार्मिक और जैविक दृष्टि से देखा गया है। किन्तु यदि हम अस्तित्व और चेतना के स्तर पर दृष्टि डालें, तो यह भिन्नता केवल देह या भूमिका की नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था की भी है। स्त्री और पुरुष दो ऊर्जा-ध्रुव हैं, दो अस्तित्व-रूप हैं, जिनके संयोग से सम्पूर्ण सृष्टि संभव होती है।

स्त्री केवल शरीर या लिंग नहीं है; वह प्रकृति की विराटता है। उसी में संपूर्ण अस्तित्व की जीवनीशक्ति बहती है। पुरुष उसमें केंद्र, सूत्र या बिंदु के समान है — जो उस विराटता में प्रवेश करता है, उसे अनुभव करता है और उसका साक्षात्कार करता है। यदि अस्तित्व को 99% स्त्री माना जाए, तो पुरुष उसमें 1% केंद्र-बिंदु है, जो उसे अर्थ और चेतना प्रदान करता है।

समाज, धर्म और विज्ञान समानता पर बल देते हैं — वे कहते हैं कि स्त्री और पुरुष को समान होना चाहिए। परंतु अस्तित्व का नियम समानता नहीं, पूरकता है। समानता बाहरी न्याय देती है, परंतु सृजन नहीं। सृजन तभी संभव होता है जब दो भिन्न तत्व एक दूसरे में समाहित होकर एक नई संपूर्णता का निर्माण करें। यह भिन्नता किसी संघर्ष की नहीं, बल्कि रचनात्मक व्यत्यास की है।

जब पुरुष अपने भीतर के विराट को पहचानता है और स्त्री अपने भीतर के केंद्र-बिंदु को जानती है, तब दोनों अस्तित्व के एक ही वृत्त में स्थित हो जाते हैं — एक परिधि बनता है, दूसरा केंद्र। इसी सामंजस्य से जीवन का प्रवाह, प्रेम की धारा और सृजन का नाद उत्पन्न होता है।<

अस्तित्व का विधान समानता नहीं, आनन्द है; और आनन्द केवल तब संभव है जब सूक्ष्म विराट में और विराट सूक्ष्म में प्रवेश करे। यही सृजन का रहस्य है, यही जीवन की निरंतरता है।

© वेदांत 2.0 — अज्ञात अज्ञानी

bhutaji

આજે મારો જન્મદિવસ છે.
1/11/1991.
સુપ્રભાત 🙏🏼જય સીયારામ 🙏🏼

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