जूठ क्या है?
मैं सोचती हूँ, जूठ क्या है...
कब, क्यों, कौन बोलता है ये जूठ?
सब हक़ीक़त के आँचल में जीना चाहते हैं,
फिर भी होंठों पर क्यों पलता है ये जूठ?
शायद ये वो बच्चा है,
जिसे हर बात पर डाँटा गया,
सुना कभी गया ही नहीं
तो चुप रहने के डर से उसने बोल दिया जूठ।
शायद ये वो लड़की है,
जिसके सपनों पर ज़माने ने पहरे बिठा दिए,
रिवाज़ों की बेड़ियों से डरकर,
उसने मुस्कुराकर कह दिया जूठ।
या शायद ये वो लड़का है,
जिसके कंधे ज़िम्मेदारियों से झुक गए,
"मैं ठीक हूँ" का बोझ उठाते-उठाते,
उसने थक कर बोल दिया जूठ।
तो क्या जूठ सच में जूठ है?
या बस एक ज़ख़्म है,
जो सच बोलने से डरता है...
या एक ख़्वाब है,
जिसे दुनिया की नज़र लग जाती है?
शायद जूठ, जूठ नहीं है
वो बस एक पर्दा है,
जिसके पीछे कोई सच साँसें गिन रहा है।
वो एक मजबूरी है,
जो सच्चाई की क़ीमत चुका नहीं पाती।
वो एक दुआ है,
जो होंठों से उतरकर दिल में ही रह जाती है।
तो अगली बार कोई जूठ बोले,
उसे परखने से पहले,
उसकी ख़ामोशी को सुन लेना...
क्योंकि हर जूठ के पीछे,
एक अधूरा सच बैठा रोता है।
प्राची तंवर …..