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रणनी रेती ओढी बेठी, जळनुं नकली रूप, तरस्यूं हरणुं दोडतुं रहेतुं, तडकानो छे धूप। मृगजळनी ए मरीचिका, कोईने क्यां मारे छे? ए तो बस आशा आपीने, रणमां रझळावे छे। हाथथी छूटेला हरणांने, हइये अनेक धारणा, खोटा भ्रमनी जाळ बनी छे, जीवतरनी वरणा। धारणाओ ज्यारे तूटे, त्यारे आपत्ति लागे छे, झांझवाना आ खेलमां, मन क्यां साचुं जागे छे? नथी एमं कईं झेर, नथी एमं कोई प्यास, बस, हैयाने भटकवावा, रचे छे मीठो भास। DHAMAK
નાના હતા તો પહેલા એકબીજાને ચિઠ્ઠી લખતા અને તહેવારો માં કલર નાની નાની પડીકી માંપણ મોકલી દેતા . પોસ્ટ ઓફિસ ના લાલ ડબ્બામાં ચિઠ્ઠી દોડતા નાખવા જાતા અને અઠવાડિયા 10 દિવસ સુધી પાછી ચિઠ્ઠી ની વાટ જોતા હતા અને તે કલરને અમે લગાડ્યો છે તે પણ ચિઠ્ઠીમાં પાછા લખી અને મોકલતા 😊 પણ હવે તેવું ક્યાં રહ્યુ છે. હવે મોબાઈલ આવી ગયા પછી ચિઠ્ઠી નો વ્યવહાર બંધ થઈ ગયો છે અને મોબાઈલ ની હિસાબે કોઈ પાસે સમય રહ્યો નથી એક કલર નો ફોટો પણ મોકલ તા નથી એકબીજાને એટલે દૂર થઈ ગયા છે. Dhamak
ધુળેટીના રંગોની જેમ તમારું જીવન પણ ખુશીઓથી રંગીન બની જાય તેવી શુભેચ્છાઓ! DHAMAK
ફાગુન કા યે રંગ હૈ, મન મેં પ્રેમ કા ઉજાસ, બૈર-ઝહેર કો હોમ કર, મનાઓ સ્નેહ કા આભાસ; કેસૂડે કે કૈફ મેં, ભીગે હૈં સબ ખુશહાલ, હોલી કે ઇસ પર્વ મેં, ઉડ રહા પ્રેમ કા ગુલાલ." ઢમક
तुम हो तो लगता है, ज़िंदा हूँ मैं मुझमें कहीं तुम हो तो लगता है, हाँ प्यार के लायक हूँ मैं तुम हो तो लगता है, मेरा घर भी अब 'घर' है वरना इन चार दीवारों में, क्या रखा है मेरी जाँ... तुम हो तो जीने की इक नई उम्मीद है, जब भी मैं तुम्हें देखती हूँ, लगता है थोड़ा और जियूँ, बस सिर्फ तुम्हारे लिए! जब से तुम मेरी ज़िंदगी में आई हो, लगता है जैसे दो परियाँ मेरा ख्याल रखने, उस ऊपर वाले ने ज़मीन पर भेज दी हैं... (बेटियां बहुत प्यारी होती है जितना हो सके उतना उन्हें प्यार दे) DHAMAK
प्रभु… मेरा निस्वार्थ प्रेम था, फिर भी मुझमें खामियाँ ही देखी गईं। बिना वजह जो ईर्ष्या और नफरत करते रहे, मेरी सच्चाई उन्हें कभी दिखी नहीं। हे प्रभु… ऐसे लोग मुझे किसी भी जन्म में, अनंतकाल तक न मिलें। बस यही मेरी प्रार्थना है… बस यही… मेरी प्रार्थना है… (लेखिका का पता नहीं कहीं दो लाइन पड़ी थी उसमें से यह बना दिया यह दो पंक्तियों के वेदना मेरा दिल छू गई) ढमक
साथ चले इतना ही जिंदगी के लिए काफी है। लेखक: धमक (हां… हां… हम्… हम्…) न तुम पर हक जताना है न मुझको कुछ मनवाना है बस यूँ ही उम्र भर साथ चलते जाना है ना बड़ी सी ख्वाहिश है ना कोई फरमाइश है तेरा हाथ मेरे हाथ में बस इतनी सी गुज़ारिश है (हां… हां…) दिन अपने अपने होंगे रास्ते भी अलग होंगे पर शाम ढले जब मिलें तो चेहरे पे सुकून होंगे ना कहना “तुम मेरे हो” ना सुनना “मैं तुम्हारी” बस साथ बैठी चुप्पी भी लगती है कितनी प्यारी साथ चले बस इतना ही ज़िंदगी के लिए काफी है तू पास रहे मुस्काता हुआ यही मेरी ख़ुशी साफ़ी है (हम्… हम्… हां… हां…
क्या इतना मुश्किल है? कोई जो मुझसे पूछे, मेरी खुशी का राज क्या है? तो कहूंगी, मैंने अपना 'वजूद' संभाल रखा है, इसलिए खुश हूं। क्योंकि मैं हूं... और मैं ही रहूंगी... क्यों किसी और के जैसा बनना है तुम्हें? क्यों दूसरों के सांचे में ढलना है तुम्हें? तुम जैसे हो, वैसे ही रहो, यही तुम्हारी पहचान है, तुम्हारा अपना होना ही, सबसे बड़ा सम्मान है। बस एक बार खुद से प्यार करना सीख लो, फिर ये सारा जहां तुम्हें हसीन लगेगा। एक बार खुद से मोहब्बत तो करके देखो, बस एक बार... खुद से प्यार करके देखो। ढमक कहती है क्या वाकई इतना मुश्किल है... खुद से प्यार करना? अब वक्त है, खुद पर थोड़ा वक्त खर्च करो... DHAMAK
બંનેની વેદનાઓને ન્યાય આપવાની કોશિશ કરી છે હું સ્ત્રી છું એટલે પુરુષની વેદના અને એટલી ન સમજી શકુ પણ છોકરાઓ મોટા થઈ ગયા છે તેમને જોઈ અને ઘણું સમજાય છે. તમારો અભિપ્રાય જરૂરી છે જો ઠીક લાગે તો કોમેન્ટ કરો તો આ વિષય પર થોડીક વધારે જાણકારી મળે देखो, स्त्री की वेदना पुरुष की वेदना से कुछ अलग नहीं है... [स्त्री की वेदना] जाने क्यों... हर बार हम ही गलत हो जाते हैं, कुछ कहें... तब भी, चुप रहें... तब भी। रिश्तों की लाज में खुद को मिटाते हैं, संभल कर चलें... तब भी, ठोकर लगे... तब भी। [पुरुष की वेदना] हर बार... हम ही मजबूत माने जाते हैं, दर्द हो... तब भी, दिल टूटे... तब भी। ज़िम्मेदारियों के बोझ तले खुद को दबाते हैं, थक जाएँ... तब भी, हार जाएँ... तब भी। [दोनों की समान पीड़ा] दुनिया की नज़रों में बस कसूरवार ठहरते हैं, हँसें... तब भी, रोएँ... तब भी। अपनी ही खुशियों का गला घोंट देते हैं, जियें... तब भी, दम तोड़ें... तब भी। DHAMAK
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