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New bites

IN GUJARATMITRA NEWSPAPER..

niraliipatel.127808

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी
ख्वाबों में मिले
जिस तरह सूखे हुए फूल
किताबों में मिले...!! 🍁🍂

narayanmahajan.307843

ડોક્ટરની ડાયરી..
ડૉ. શરદ ઠાકર..

ઘણા બધા પોતાના અને બીજા ડૉક્ટરના...
જીવનમાં બનેલા ઘટનાના અનુભવો
રજૂ કરતી ખૂબ જ સુંદર બુક છે...
જો કે ઘણી બુકો મે આ લેખકની વાચી છે.
એમ મને માણસો કરતા બુકો સાથે વધુ લગાવ છે...
સારા માણસો મને મળ્યા નહીં...
તો સારી બુકો સાથે મારી દોસ્તી છે..
મારે ધણી બધી વાર કોઈની જરૂર હોય ..ને...
ત્યારે કોઈ વ્યક્તિ કરતા બુક મારી નજીક હોય છે..
તે પણ ઘણા વર્ષોથી..
મને બુક સમજાવે છે..
ધણી બધી વાતો..☺️

chiragvora055249

🫵

shivrajbhokare342239

"Sirf tum aapne"

arnagvanshi051673

📚 Vedanta Life – Agyat Agyani (@bhutaji)
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"ऋग्वेद, उपनिषद और गीता ज्ञान के ग्रंथ नहीं, चेतना के दर्पण हैं; उनमें व्यक्ति शास्त्र को नहीं, स्वयं को पढ़ता है।"
वेदांत, आत्मबोध, चेतना, जीवन-दर्शन और Vedanta 2.0 से जुड़ने के लिए पढ़ें:
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— अज्ञात अज्ञानी (Agyat Agyani)
Vedanta Life

bhutaji

Happy Father's Day!

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dadabhagwan1150

"प्रेम: पाना या तपना?"

मैं सोचती हूँ... प्रेम क्या है?
पा लेना?
या उसकी चाह में खुद को जला देना?

सूरज से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
रोशनी से, जो उसी की है...
या अँधेरे से,
जिसकी एक झलक पाने को
वो पूरा दिन आसमान में तपता है?

चाँद से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
अँधेरे से, जो उसका घर है...
या रोशनी से,
जिसे चुरा कर लाने को
वो पूरी रात दर्द में चमकता है?

नदी से पूछो
उसे प्रेम किस से है?
अपनी लहर से, जो उसी का नाच है...
या समुंदर से,
जिसमें मिलने की आस में
वो हर रोज़ पत्थर से टकराती है,
रास्ता भटकती है,
पर रुकती नहीं?

शायद प्रेम पा लेना नहीं...
शायद प्रेम है
किसी एक झलक के लिए,
किसी एक मिलन के लिए,
उम्र भर तपते रहना,
चमकते रहना,
बहते रहना।

और अगर मिल भी जाए...
तो क्या सूरज अँधेरे में बसा रहता है?
क्या चाँद रोशनी को क़ैद कर लेता है?
क्या नदी समुंदर होकर बहना भूल जाती है?

नहीं।
प्रेम पाने का नाम नहीं।
प्रेम उस आग का नाम है
जो बुझती नहीं... मिल जाने पर भी।
प्राची गुर्जर ……

prachitanwar111

लसूणी पालक बटाटा काचऱ्या..

साधी सोपी आणि अत्यंत पौष्टिक...
एक छोटी कोवळ्या पालकाची गड्डी
बारीक कापलेला लसूण
मिरी पावडर
चवीनुसार मीठ
गरम मसाला पावडर
प्रथम बटाट्याचे पातळ काप करुन घ्यावेत
पॅन मधे तूप घालून
लालसर होस्तोवर परतून घ्यावे
वर मीठ आणि मिरपूड घालून प्लेट मधे काढावे
आता पालक पेंडी थोडे देठ ठेवून निवडावी
पॅन मधे तुप घालून त्यावर थोडे जिरे घालावे
चिरलेला लसूण घालून
खमंग होई पर्यन्त परतून घ्यावा
लगेच पालकाची पाने टाकावी
थोडे परतावे
झाकण ठेवण्याची गरज नाही
पाच मिनिटात पालक शिजतो
थोडे मीठ व गरम मसाला पावडर घालून प्लेट मध्ये काढावे
लोह व्हिटॅमिन आणि मिनरल
ही डिश जीवनसत्वांचा मोठाच खजिना 💗

jayvrishaligmailcom

*"बदलते वक़्त का चेहरा"*

जो कहता था, "वक़्त आए तो भी कभी न बदलूंगा मैं"
वक़्त के करवट लेते ही, सबसे पहले बदलते उसे देखा मैंने...

जो लम्हा भी जुदाई न सहता था कभी,
वही दूरी के बहाने ढूँढते देखा उसे मैंने...

उसे मालूम था, उसके बिना ख़ाक हो जाऊँगी मैं,
फिर भी मेरे जज़्बातों का सौदा करते देखा उसे मैंने...

मैं तो टूट कर बिखरी उसकी जुदाई में,
और महफ़िल में यारों के, जाम-ए-जश्न पीते देखा उसे मैंने...
प्राची गुर्जर ……

prachitanwar111

मैंने देखा तो वो मेरे ख़िलाफ़ खड़ा था,
फिर पता चला वो मेरी तरफ़ से लड़ के गया।

लगा कि उसने मुझे बीच राह छोड़ दिया,
वो मुझको मेरे ही पैरों पे खड़ा कर के गया।

मैंने सोचा था कि वो जीत कर खुश होगा बहुत,
वो मेरी हार पे चुपचाप रो के गया।

nihalsinghsingh.134307

उसनें अनजाने में मुझसे अपनें
प्यार का इज़हार किया था
मुझको रखकर पेशोपेश में
दिल किसी और को दिया था

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

एक नई रचना ,
दिल से दिल तक

vanshsingh118873

बस एक और गहरी बात......💔

abhi006

19/06/2026
मेरी आज एक चप्पल कार से गिर गयी उसके लिए

brokenboy190253

दृश्य
मुरझाए हुए फूल

एक बड़ा सा बगीचा
और सूखी धरती पर कुछ छोटे-छोटे फूल खड़े हैं
उनकी पंखुड़ियाँ कमजोर हैं
और वह पूरी तरह से निराशा में डूब चुकी है
उन फूलों की खुशबू लगभग खत्म हो चुकी है
वे आसमान की ओर देख रहे हैं
बारिश के इंतजार करते हुए
और कुछ फूल बगीचे के गेट की तरह देख रहे हैं
माली की कदमों की आहट सुनने के लिए
उन्हें नहीं पता कि माली लौटेगा भी या नहीं
फिर भी वे जड़ों को छोड़े बिना खड़े हैं

उन्हें नहीं पता की बारिश होंगे या नहीं फिर भी
वह बारिश के इंतजार करते हुए
जिंदा रहने की उम्मीद बना रहे हैं

पर हैरानी के बात यह है कि
उसके साथ-साथ पूरा दुनिया सुख कर रहे हैं

ना हवा ना पानी ना कोई देख भाल
फिर भी पलके खोल कर
आसमान की तरफ देखते हुए एक लंबा इंतजार





कविता
फूल तो खिले हैं


बगीचों से खुशबू उड़ता जा रहा है
फूल तो खिल रहे हैं
पर वह फूल खिलते ही मुरझा जा रहा है


अब पहले की तरह बगिया में सुगंध नहीं
अब पहले की तरह बगिया की धरती हरी भरी नहीं
अब पहले की तरह फूल खिल रहे नहीं


ना अब भवर आता है
फूलों की महक से
बगिया में


ना अब फूल भवरा को रिझाता है
खुशबू बिखोर कर



हरी भरी धरती सुख गए


अब ना माली अपने बगिया निहारने तक आता है
अब ना माली उन पौधों में पानी दे दिया आता है
अब ना माली उन फूलों के पौधों को पोषण देने आता है


अब ना माली दूर खड़े रह कर
फूल को खेलते देखा मुस्कुराता है
अब ना माली फूलों के सुंग को महसूस करते हुए
आनंद से भर जाता है


अब कुछ भी नहीं पहले की तरह
सब बदल गया है


हवा पानी के बिना धरती बंजर हो गई
और माली के देखभाल के बिना सारे फूल मुरझा गऐ


जो बचा खुचा फूल है उसकी आयु कम हो गया है

वह बस किसी तरह
अपने जरो से धरती को जकड़ रख कर
उगाने की कोशिश करते हैं
वह बस किसी तरह थोड़ी सी खेलने की कोशिश करते हैं


वह खुशबू बिखोना चाहते हैं
किस लिए की
फिर से माली का ध्यान उस पर जाए
और वह मंत्र मुक्त हो जाए


फूलों की सुगंध महसूस करके भबरा भी आ जाऐ
और उसके प्यार में पड़ जाए

और हरी भरी धरती देखकर
और सभी पंछी आए
जो उसे थोड़ी और पोषण देने में मदद करें


पर ऐसा अब नहीं होता
अब बंजर जमीन हो चुकी है
अब फुल बस रो रही है
खुद को बचाने के लिए
बारिशों से उम्मीद कर रही है

वह बारिश जिसे अब भरोसा नहीं

abhinisha

“यदि प्रेम को देखना हो…”

यदि कभी जानना हो कि प्रेम वास्तव में क्या होता है,
तो किसी वृद्ध, विवाहिता दंपत्ति को देख लेना
जिन्होंने साथ-साथ
60–65 वर्षों की लंबी उम्र गुज़ारी हो।

प्रेम देखना हो,
तो देखना वह वृद्ध पत्नी
जो शांति से कुर्सी पर बैठी है,
जिसके न स्वरूप में वही चमक बची है,
न शरीर में वही जवानी की शक्ति।

और फिर देखना उसके पति को
जिसका तन बुढ़ापे से झुक चुका है,
जिसके हाथ काँपते हैं,
पर फिर भी वह पूरे स्नेह से
अपनी पत्नी के बिखरे बालों को सँवारता है…
मानो उसकी हर उँगली से
अब भी वही पुराना प्यार टपक रहा हो।

यह रिश्ता सिखाता है
कि हर लड़ाई, हर दूरी,
हर शिक़ायत
आखिरकार थक कर
इनके प्रेम के आगे हार मान लेती है।

यह बताता है कि प्रेम
कभी युवावस्था का जुनून नहीं होता,
प्रेम तो बुढ़ापे का सहारा होता है…
जब रूप मिट जाता है,
पर साथ जीवनभर बना रहता है।
प्राची गुर्जर …

prachitanwar111

“विरह मीरा सी” ………

पूजूँ मैं राम को…
या पूजूँ मैं श्याम को…
पर सच कहूँ
मेरे दिल में
एक मूरत तेरी भी बसती है।
मीरा ने जिस दर्द में कृष्ण को पुकारा,
राधा ने जिस विरह में साँस ली
वैसी ही एक अधूरी सी प्रीत
मेरे भीतर
तेरे नाम से धड़कती है।
तू माने या न माने,
ये कोई दिखावा नहीं है
मेरी हर साँस
अनजाने में
तेरा ही जप करती है।
मैं जोगन हूँ तेरी प्रीत में,
कोई चोला नहीं पहना,
पर दिल ने सब छोड़ दिया है।
और तू…
तू चाहे मुझे अपना माने या नहीं,
पर मेरे मन को मंदिर बनने के लिए
तेरी ही ज़रूरत है।
प्राची गुर्जर …..

prachitanwar111

Article: कुदरत का आईना
यह धरती हमारा साझा घर है, जहाँ इंसान मालिक नहीं बल्कि कुदरत का एक छोटा सा हिस्सा है। जब हम स्वार्थ में आकर जंगलों को काटते हैं, नदियों को ज़हरीला बनाते हैं या मूक जीवों पर अत्याचार करते हैं, तो वह नुकसान कहीं गायब नहीं होता। वह अंततः सूद समेत हमारे पास ही वापस आता है। चींटी से लेकर जंगलों तक, हमारा हर एक कदम आज हमारे खुद के और आने वाली पीढ़ी के भविष्य को कैसे तय कर रहा है? यह जानने के लिए, समय रहते आँखें खोलने वाले इस लेख को पूरा पढ़ें और बच्चों को भी पढ़ाएं।👇
https://www.matrubharti.com/book/19994370/mirror-of-nature

praveenkumrawat012852

बुराई की अंधी चेन

“दुनिया बहुत ख़राब हो गई है...”
यह लाइन आपने भी किसी न किसी से ज़रूर सुनी होगी, या शायद खुद कही होगी। लेकिन कभी शीशे के सामने खड़े होकर खुद से पूछा है कि इस दुनिया को बुरा बनाने में हमारा अपना कितना हाथ है?

असल में हम सब एक अजीब मानसिक चक्रव्यूह में जी रहे हैं। जब हमसे कोई ग़लती होती है, तो हमारे पास मजबूरियों, हालातों और पारिवारिक तनाव के बहानों की पूरी लिस्ट तैयार होती है। हम खुद को तुरंत ‘निर्दोष’ मान लेते हैं। लेकिन जब वही ग़लती कोई दूसरा करता है, तो हम उसकी परिस्थितियों को जाने बिना, पल भर में उसे ‘गुनहगार’ घोषित कर देते हैं।

इसी दोहरे रवैये से जनमती है ‘बुराई की अंधी चेन।’ जहाँ समाज का हर इंसान खुद को एक ‘बेचारा पीड़ित’ समझ रहा है और सामने वाले को ‘विलेन।’ हर कोई किसी न किसी से बदला ले रहा है, कोई किसी पर ग़ुस्सा निकाल रहा है, और नफ़रत का यह अंतहीन सिलसिला चलता जा रहा है।

इस चेन को तोड़ने का सिर्फ एक ही तरीक़ा है— दूसरों को जज करना बंद कीजिए। किसी पर उंगली उठाने से पहले, एक पल के लिए खुद को उसकी जगह पर रखकर देखिए। जब आप हर बात पर तुरंत रिएक्ट करना छोड़ देते हैं और अपनी ग़लतियों की ज़िम्मेदारी खुद लेते हैं, तो आप अनजाने में नफ़रत की इस अंधी चेन को तोड़ देते हैं। याद रखिए, दुनिया को बदलने की शुरुआत हमेशा खुद को बदलने से होती है।
पूरा लेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:
https://www.matrubharti.com/book/19994635/blind-chains-of-evil

praveenkumrawat012852

coming soon

sonambrijwasi549078

World Music Day

Music gives voice to devotion. 

On World Music Day, let us subscribe to the Dada Bhagwan Foundation Music Channel: https://dbf.adalaj.org/rze6cL8S

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dadabhagwan1150

"मैं से मैं तक"

मैं सोचती हूँ...
आज जो मेरा हिस्सा है
ये धड़कन, ये ज़िद, ये नाम
जिसे लोग मेरा कहकर बुलाते हैं
कल को अगर वो मेरा न रहा,
तो क्या बचूँगी मैं?

क्या मैं बदल जाऊँगी
किसी ऐसी औरत में,
जिसकी आँखों में मेरा अक्स न हो?
या रह जाऊँगी एक खाली खोल,
जिसमें समंदर की आवाज़ तो है,
पर समंदर नहीं?

अगर ढूँढते-ढूँढते,
मैं रास्तों में ही बँट गई,
और हर मोड़ पर
ख़ुद का एक टुकड़ा छोड़ आई...
तो क्या होगा?

क्या मिलूँगी ख़ुद से,
आधी रात को,
जब सारी दुनिया सो जाती है
और सिर्फ़ साँसें जागती हैं?
या पाऊँगी ख़ुद को
उन सवालों के ढेर पर,
जिनके जवाब कभी दिये ही नहीं गए?

डर लगता है...
कि कहीं टूटी हुई मैं,
ख़ुद को जोड़ने की कोशिश में
और ज़्यादा न बिखर जाऊँ।
कि कहीं आईने में देखूँ,
और पूछ बैठूँ
"तुम कौन हो?"

पर फिर कोई कहता है भीतर से
टूटना भी तो बनना है।
बीज अगर टूटे न,
तो पेड़ कैसे बने?

तो अगर मैं खो भी गई,
तो क्या?
मैं अपनी ही राख से,
फिर से जन्म लूँगी।
क्योंकि मैं नदी नहीं,
जो समंदर में मिट जाए
मैं समंदर हूँ,
जो हर लहर में
ख़ुद को नया नाम दे देता है।

और जो मेरा है,
वो मिटता नहीं
बस मौन हो जाता है,
जब तक मैं उसे
फिर से सुनना न सीख लूँ।
प्राची गुर्जर …..

prachitanwar111