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सुबह सात बजकर बीस मिनट हुए थे।
आज भी वही रूटीन।
बाथरूम का दरवाज़ा खुला।
दर्पण के सामने खड़ी हुई।
लाइट जलाई।
ट्यूबलाइट की ठंडी सफ़ेद रोशनी चेहरे पर पड़ी।

मैंने दाँत ब्रश किया।
मुँह धोया।
फिर हाथों से चेहरा पोंछा।
और फिर... वही काम।
जो पिछले तीन साल से हर सुबह करती हूँ।
मुस्कुराई।
दर्पण में देखकर।
बस एक बार।
हल्की-सी।
जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो।

आज भी मुस्कुराई।
पर कुछ अजीब लगा।
मुस्कान टिकी नहीं।
होंठ उठे तो थे, पर आँखों तक नहीं पहुँची।
जैसे होंठों ने धोखा दे दिया हो।
या शायद आँखों ने मना कर दिया हो।

मैंने फिर कोशिश की।
इस बार ज़ोर से।
दाँत दिखाकर।
वो मुस्कान जो ऑफिस में सबको दिखाती हूँ।
"गुड मॉर्निंग सर", "हाँ जी बिल्कुल", "नो प्रॉब्लम" वाली।
पर दर्पण ने कह दिया—नहीं।
ये भी झूठी लग रही है।

अब थोड़ा गुस्सा आया।
मैंने आईने से नज़रें मिलाईं।
और बोली—
"क्या प्रॉब्लम है तुझे?
बस एक मुस्कान ही तो चाहिए।
कितना मुश्किल है?"

आईना चुप रहा।
बस मेरी आँखें मुझे घूरती रहीं।
थकी हुई।
थोड़ी सूजी हुई।
और बहुत पुरानी।

मुझे याद आया—
पिछली बार कब सचमुच मुस्कुराई थी मैं?
नहीं, वो हँसी नहीं जो फ़ोन पर आती है।
नहीं, वो मुस्कान नहीं जो पड़ोसन को देखकर देनी पड़ती है।
वो मुस्कान जो अंदर से आती है।
जो छाती में गुदगुदी करती है।
वो कब आई थी आखिरी बार?

शायद उसी शाम जब राहुल ने कहा था—
"तू ऐसे ही मुस्कुराती रहे, बस।
बाकी सब मैं संभाल लूँगा।"

उसके बाद कभी नहीं आई।
न उसकी बात आई।
न वो शाम।
न वो मुस्कान।

मैंने हाथ बढ़ाया।
आईने पर उँगली रखी।
अपने होंठ छुए।
ठंडे थे।
जैसे किसी और के होंठ हों।

फिर धीरे से बोली—
"ठीक है।
न सही।
आज नहीं तो कल।
पर एक दिन फिर आएगी।
मुझे पता है।"

आईने ने जवाब नहीं दिया।
पर इस बार उसकी चुप्पी में कुछ अलग था।
जैसे वो कह रहा हो—
"मैं इंतज़ार कर रहा हूँ।
तू बस मत छोड़ना कोशिश।"

मैंने लाइट बंद की।
बाथरूम से निकली।
आज भी ऑफिस जाना था।
आज भी वही "गुड मॉर्निंग" वाली मुस्कान लगानी थी।

पर जाते हुए एक बार फिर मुड़ी।
अँधेरे में भी दर्पण पर हल्की-सी चमक थी।
शायद मेरी आँखों की।
या शायद उस मुस्कान की जो अभी आने वाली है।

बस इतना ही।
एक दिन।
एक कोशिश।
और थोड़ा सा भरोसा।

a9560

मकर संक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। 🌹🌹🙏🌹🌹

drbhattdamayntih1903

15 जनवरी— सेना-दिवस पर विशेष
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सैनिक! तुझको शत-शत प्रणाम।

संघर्ष कठिन सामने देख,
पग पीछे नहीं किये तुमने;
जनहित में, होकर महादेव-
विष के भी घूँट पिये तुमने।

बस, डटे रहे निज घाव लिये,
अनथक बिन विचलन, बिन विराम।

तेरी दृढ़ता के आगे नत,
जीवन के झंझावात रहे;
पथ से तू डिगा नहीं किंचित् ,
निष्प्रभ सारे आघात रहे।

हारे हैं तुझसे दण्ड-भेद,
हारे हैं तुझसे साम-दाम।

वीरता तुम्हारी रही बोल,
हैं वार तुम्हारे सीने पर;
माँ देख-देख व्रणहीन पृष्ठ,
गर्वित है तेरे जीने पर।

जन-जन आशीष रहा सन्मन,
ज्योतिर्मय युग-युग रहे नाम।

-- घनश्याम अवस्थी
गोंडा, उत्तरप्रदेश
सम्पर्क-- 9451607772

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ghanshyamawasthi.678074

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
ज़माने की बैसाखियों की ज़रूरत
                नहीं मुझे,

मेरे  इरादों  में  अभी  वो  उड़ान
                  बाकी है,

लोग ढूँढते होंगे मंज़िलें, दूसरों के
          नक्श-ए-कदम पर,

मुझे तो खुद अपने पैरों से नयी
          राह बनानी है…🫰
╭─❀💔༻ 
╨─────────━❥
♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
 #LoVeAaShiQ_SinGh
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loveguruaashiq.661810

🙏🏻😊🙏🏻

falgunidostgmailcom

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
उसे हुनर आता है, दरिया के बीच
           कश्ती डुबोने का,

तुम किनारे की उम्मीद में अपनी
          हस्ती मत खो देना,

वो तो औरत है उसे रुख बदलने
         में वक़्त नहीं लगता,

तुम अपनी  साख बचाए  रखना
  उसे तमाशा मत बना देना..🔥
╭─❀💔༻ 
╨─────────━❥
♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
 #LoVeAaShiQ_SinGh
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loveguruaashiq.661810

आध्यात्मिक जीवन: सरल बोध और मुक्ति का मार्ग ✧
आध्यात्मिकता का अर्थ
धन, साधन, धर्म या पद से ऊपर उठकर
जीवन को उसके स्वभाव में जीना है।
कई लोग
धन पाते हैं, साधन पाते हैं, शिक्षा पाते हैं—
पर जीवन नहीं जी पाते।
और जो जीवन नहीं जी पाया,
वह चाहे सब पा ले—भीतर से खाली ही रहता है।
जीवन को यदि सच में जी लिया,
तो मुक्ति अपने आप घटती है।
जैसे—
दीपक जला दिया जाए
तो प्रकाश पैदा करने की कोशिश नहीं करनी पड़ती।
प्रकाश अपने आप फैलता है,
अंधेरा अपने आप हट जाता है।
वैसे ही—
जीवन को उसके स्वभाव में जीने दो।
प्रकाश आएगा, अंधेरा जाएगा—
बिना प्रयास, बिना संघर्ष।
दीपक और जीवन-बोध
दीपक जलाना एक छोटा-सा कर्म है,
पर उसका परिणाम बड़ा होता है।
जीवन-बोध भी ऐसा ही है।
जिस ऊर्जा से धन, सुविधा, पहचान मिली—
यदि उसी ऊर्जा से
शांति और आनंद नहीं मिला,
तो समझो दिशा चूक गई।
तब आध्यात्मिक होना कोई विकल्प नहीं,
अनिवार्यता बन जाता है।
आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है—
धन, साधन, प्रसिद्धि से मुक्त होकर
भीतर के एकांत में जीना।
इसके लिए
न शास्त्र चाहिए,
न भारी ज्ञान,
न कोई विशेष योग्यता।
ऊर्जा का प्राकृतिक बहाव: आनंद का मूल
ऊर्जा का स्वभाव है—
बहना, चलना, फैलना।
जैसे नदी
रुकने पर सड़ जाती है,
वैसे ही ऊर्जा
यदि केवल धन, धर्म, विज्ञान, प्रसिद्धि में खर्च हो
तो भीतर का आनंद सूख जाता है।
आनंद और शांति भी ऊर्जा से ही आते हैं—
पर भीतर बहने वाली ऊर्जा से।
आध्यात्मिकता का अर्थ है—
ऊर्जा को उसके प्राकृतिक बहाव में छोड़ देना।
कोई नियम नहीं,
कोई दबाव नहीं,
कोई संघर्ष नहीं।
अस्तित्व के साथ बहो।
प्रकृति के हवाले खुद को छोड़ दो।
भीतर प्रसन्न रहो—
यही बोध है।
इसे स्कूल, संस्था, पाठ्यक्रम बनाना
मूर्खता है।
यहीं से छल, व्यापार और नाटक शुरू होता है।
आध्यात्म की परिभाषा बहुत छोटी है—
मौन, आनंद, प्रेम और शांति में जीना।
जो-जो इसमें जोड़ा जाता है,
वही अशांति का कारण बनता है।
ऋषि जीवन: आदेश-मुक्त स्वभाव
हमारे ऋषि, मुनि, संत
इसी तरह जिए।
कोई आदेश नहीं,
कोई नियम नहीं,
कोई सामाजिक दबाव नहीं।
अपने स्वभाव में जीना—
यही उनका धर्म था।
यह कोई बड़ा ज्ञान नहीं,
बस एक सरल अवस्था है।
यदि धर्म, गुरु, व्यवस्था जरूरी होती,
तो यह जीवन
अनपढ़ और साधारण लोग नहीं जी पाते।
यही योग है,
यही आध्यात्म है,
यही ईश्वर-जीवन है।
ईश्वर कौन है?
कोई अलग बैठा ईश्वर नहीं।
एक सत्ता है
जिसमें सब घट रहा है—
पाप भी, पुण्य भी।
ईश्वर को मान लेने से
जीवन बेहतर नहीं हो जाता।
बेहतर होता है
जब जीवन में
आनंद, प्रेम और शांति उतरते हैं।
यही ईश्वर-शक्ति के शिखर हैं।
कोई गुरु
इन्हें दे नहीं सकता।
इन्हें जीना पड़ता है।
जीवन जैसा है,
उसे वैसा ही स्वीकार करना—
यही आध्यात्म है।
कोई दिखावा नहीं,
कोई तुलना नहीं,
कोई प्रतिस्पर्धा नहीं।
जी रहे हो—
तो दुखी मत बनो।
आज तुम सहभागी बनो,
कल कोई और बनेगा—
यही धर्म है।
जहाँ दुख दिखे—
वहाँ प्रेम दो,
हिम्मत दो,
भोजन दो,
सहारा दो।
धन जरूरी नहीं—
अंधे को सड़क पार करा देना भी धर्म है।
सच्ची सेवा: व्यक्तिगत बनाम संस्थागत
संस्था से शुद्ध सेवा मुश्किल है।
अक्सर
100 में से
75 भीतर ही खप जाते हैं,
25 सेवा बनते हैं—
वह भी प्रचार के साथ।
व्यक्ति
100% सेवा दे सकता है।
श्रेष्ठ वही संस्था है
जो दान न ले,
खुद साधन पैदा करे
और बिना शोर सेवा करे।
जो सेवा
ईश्वर, पुण्य, प्रचार से जुड़ जाती है,
वह दूषित हो जाती है।
पेड़ लगाओ—
बिना बैनर।
भूखे को खिलाओ—
इस तरह कि उसे पता भी न चले
किसने खिलाया।
यही असली सेवा है।
यही धर्म है।
यही शिक्षा है।
यही प्रेम है।
यही शांति है।
यही मुक्ति है

bhutaji

आसमान में उड़ रही पतंग को,
आसमां में है, इसका अभिमान आया।

बस फिर क्या?
खूब जोर करने लगी।

छोड़ दी हाथों में पकड़ रखीं दौर को,
सीधी जमीं पर आकर गिर पड़ी।

parmarmayur6557

સપના તો હોય છે સપનાઓ
અને તે હોય છે ફક્ત તુટવા માટે.
તમારી નશીલી આંખો જ કાફી છે
ફક્ત અમારા હોંશ લુંટવા માટે.

amiralidaredia175421

Astrology is Real or Fake?

Astrology is a wisdom that connects Astronomy with Individual’s Life through Birth chart prepared According to Birth place Longitude and Latitude,Birth Time and Birth Date.

Astronomy is Real and Scientific… but That Astronomy is Connected with Individual ‘s life through Imagination of Traits of Zodiac signs, Nakshatras and Planets. Eg: the shape of Leo sign is like lion.. and it governs the Traits of Authority. This is an imagination.

So Astrology is a Combination of Science as well as Imagination. The Astronomical Effects can be proven through Logic, Reason and Evidences but Astrological effects are Subjective, personalised and Based on Individual’s Own beliefs or thinking.

So, Science+ Art = Wisdom

Various Other Subjects are also connected with Astrology like Mathematics, Phycology and Panchangam .. which makes the subject Comprehensive and detail oriented. There are many Parts and Systems of Astrology, like Madical Astrology,Career Astrology, Relationship Astrology,Mundane Astrology.. And Systems like Traditional parashar Astrology,Brighu Nadi System, Lal Kitab,Kp System,Asthakvarga..

The core purpose of Astrology is to Spread Awareness and guidance about Individual’s Life.. and Predict Future Aspects of Individual’s Life.

In total

Astrology can Guide both the Aspects of human Life Reality and Human Luck.

yashibc123gmail.com135615

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
उधार के परों से’ अब आस
           कौन रखे,

ज़मीं की  बंदिशों का’ पास
             कौन रखे,

वो नीले आसमां तक’ रास्ता
           मेरा ही होगा,

किसी के  नक़्श-ए-पा की’
        प्यास कौन रखे,

मिलेगी मंज़िलें मुझको मेर
          ही हौसले से,

ग़ैरों के  वादों पर’  विश्वास
           कौन रखे,

सफ़र  अपना  है’ तो  फिर
   मुश्किलें भी अपनी हैं,

भला रफ़्तार में’ अब  कोई
       कयास कौन रखे,

लिखूंगा मुक़द्दर मैं अपनी ही
   परवाज़ से अब, ज़ख्मी’

पुराने क़िस्सों को’ दिल के
   पास कौन रखे…🔥🫰
╭─❀💔༻ 
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♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
 #LoVeAaShiQ_SinGh
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loveguruaashiq.661810

ममता गिरीश त्रिवेदी की कविताएं
कविता का शीर्षक है 🌹 खुशी का द्वार
https://youtu.be/OhRr-95y6og?si=3t289bDkV7GXRjlr

mamtatrivedi444291

આ ઉતરાયણ પર કુંવારાઓના પેચ લડી જાય.🤩🤩
અને
પરણેલેઓને થોડી ઢીલ મળી જાય એવી ઈશ્વરને પ્રાર્થના 😜😜

🪁🪁HAPPY UTTRAYAN To ALL 🪁🪁 🤩પરણેલાઓને ખાસ સૂચના:🤩
બીજાની ફરકી પર નજર નાખવાના ચક્કરમા તમારો પતંગ ગોથુ ના ખાઈ જાય એનુ ખાસ ધ્યાન રાખજો ....
😜😜😜😂😂😂

jighnasasolanki210025

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ...

मकर संक्रांति के अवसर पर मोबाईल और डेस्कटॉप वोलपेपर डाऊनलोड करने के लिए यहाँ विज़िट करे: https://dbf.adalaj.org/uv6Sd1s2

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dadabhagwan1150

Let your vision rise as high as your dreams this Makar Sankranti 🪁👁️

On this auspicious occasion, Netram Eye Foundation wishes you and your loved ones prosperity, happiness, and positive energy. May this festival of kites bring new hope, good health, and clarity in every aspect of life.

Celebrate the joy of togetherness, bright beginnings, and a future filled with clear vision and positivity. ✨

Happy Makar Sankranti!
#MakarSankranti #NetramEyeFoundation #FestivalOfKites #ClearVision #GoodHealth #PositiveBeginnings #IndianFestivals #Besteyehospital #Dranchalgupta

netrameyecentre

ઉતરાયણ
આનંદ ઉમંગનો તહેવાર આવ્યો
ઉતરાયણનો તહેવાર આવ્યો!....
              આનંદ ઉમંગનો.........
શિંગ,તલની ચિક્કી સાથે મમરાના લાડું ખવાય
બોર,શેરડી સાથે જલેબીને ઊંધિયું ખવાય!.....
                આનંદ ઉમંગનો.....................
નાના મોટા સૌ સંગાથે 
આનંદને ઉત્સાહથી આ તહેવાર ઉજવાય!....
                  આનંદ ઉમંગનો.....................
એ..કાપ્યો...એ..લપેટની બૂમ સાથે
ભૉપુ કેરો કેવો શોર સંભળાય!.........
                   આનંદ ઉમંગનો....................
                  
દાન,પુણ્યનો મહિમા આજે અનેરો
આનંદ ઉમંગથી ઝૂમી ઊઠે સૌ કેવો 
         ઉત્સાહ છે અનેરો!.............
          આનંદ ઉમંગનો...........................
જય શ્રી કૃષ્ણ:પુષ્પા.એસ.ઠાકોર 
ઉતરાયણ પર્વની હાર્દિક શુભકામના

thakorpushpabensorabji9973

किसी की पतंग 'कटे या खुद की कट' जाए,
दोनों तरफ़ तैयारी 'खुशी से पतंगबाजी'की हो,

बस फिर क्या?

पतंगबाजी में वो पतंग,
उत्साह, उमंग और एकता में निर्मित बनता है।

parmarmayur6557

तुम मुझको भुल जाओ
यह हरगिज़ मुमकीन नहीं हैं।
तेरी यादों की क़िताब के
हर पन्ने पर दर्ज हैं मेरा नाम।

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

सफलता माचिस की तिली की तरह है, सही दिशा में रखकर रगड़ने से ही मिलती है।

jaiprakash413885

Good morning friends..have a great day

kattupayas.101947

एक जैसी होती है डोर से बंदी पतंग
और रिश्तों में बंदी औरत ,

बेशक कितनी ही ऊंचाई पर चली जाए ..

लेकिन डोर छूटते ही पतंग टूट जाती हैं
और रिश्ते छूटते ही औरत ....
- Bitu....

bita