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હે....મૃગજળ

હર એક ઘૂંટ સુકુન સે ભરી હૈ,
મેં કૈસે કહ દુ કી ચાય બૂરી હૈ…

johanjohan3745

પ્રસ્તુત પદ "વર્તમાને જિનેશ્વર સીમંધર સ્વામી" દ્વારા વર્તમાન જિનેશ્વર શ્રી સીમંધર સ્વામી કે જે કેવળજ્ઞાન સહિત છે અને આપણને મોક્ષ પ્રાપ્ત કરવા માટે માર્ગદર્શન પૂરું પાડે એ માટે પ્રાર્થના કરીએ.

Watch here: https://youtu.be/r99jMP9z1U0

#devotionalmusic #devotionalsongs #bhakti #bhaktisongs #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

*જે ક્ષુપ,છોડ,વૃક્ષ પર પર્ણ,ફૂલ,ફળ લાગે છે,તે હંમેશાઁ ઝૂકેલા જોવા મળશે.*
🌺
*તે છોડ,ક્ષુપ,છોડ પર કાંટા હોય તો તે સખત,વાંકા અને સીધા આકારે જોવા મળે છે.*
*છતાં પર્ણ,ફૂલ,ફળ સાવચેત રહી જીવે છે.*
- વાત્સલ્ય

savdanjimakwana3600

*જલસા કરો તેનો કોઇ વિરોધ નથી,પરંતુ આવકની મર્યાદામાં કરો,કોઈને બોજ ના બનો.કોઈના ઓશિયાળા બની ના જીવો.પૂર્વજની કે પપ્પાની પુંજી પર પાગલપણ એ સમય જતાં પોતાના પગ પર કુહાડી મારવા સમાન છે.પોતાની વીસ-બાવીસ વર્ષની ઉમર પછી સંતાને કોઈના પર બોજ ના બનતાં મનમાં માનેલાં સોણલાં સાકાર કરવાની ઉંમરે ઊંઘી રહેશો તો વૃદ્ધત્વ વહેલું નક્કી સમજો.શુભ સવાર.*
. - વાત્સલ્ય

savdanjimakwana3600

जिवन मे प्रेम कि सच्चाई

parthpatil927048gmail.com003294

शीर्षक -"विदाई"
फूलों की महक मिल रही, उम्र धीरे-धीरे गुजर रही,
वह पुराना समय अब कहाँ से आएगा?

​हम थे बागों की चहल-पहल, मगर वो पुराने बाग कहाँ से आएंगे?

चिड़ियों की आवाज़ में हम मगन थे, मगर वो चिड़िया अब कहाँ से आएगी?

​कुछ फूलों से मिले, कुछ फूलों से दूर हो गए,
मगर वह पुराना समय अब कहाँ पर आएगा?

​अब सुनो मेरी इन नन्हीं कलियों,
हम तो बागों में रहने वाले फूल थे,
अब हम खिल गए हैं, इसलिए बागों में जगह कहाँ?

​दस्तूर है हर बाग का, खिल कर महकना पड़ता बागों के आँगन में,
न महको तो फिर तुम फूल कहाँ?

​सुनिए मेरे बागों के माली,
हम आपको कोटि-कोटि करते हैं प्रणाम,
आपने ही सींचा है हमें अपनी ममता से,
अब महक कर दुनिया में रोशन करेंगे आपका नाम।

कुछ हसीन शब्दों से
कुछ सुनहरे रंगों से आपका
किताबों के हऱ पन्नों में लिख दूँगा नाम

कलम नहीं मेरी जादू है
मगर दिया हुआ तों आप लोगो वरदान हैं
-सत्येंद्र कुमार "एसटीडी "✍️
#stdmaurya #stdpoem

stdmaurya.392853

🙏🙏सुप्रभात 🙏🙏
🌹 आपका दिन मंगलमय हो 🌹

sonishakya18273gmail.com308865

મને કઈ નહિં આપતા,
આ શ્વાસ પર ઉધારના ચાલે છે,

તું આવ્યો ખાલી હાથે,
આ તન પર ભાર લાગે છે,

તારી સઘળી અનંત ઈચ્છાઓ,
આ મન પણ ભાગ માગે છે,

તું શુન્યવત બની જાય તો,
આ બધું નહીવત લાગે છે.

મનોજ નાવડીયા

manojnavadiya7402

क्या भारत में सैन्य विद्रोह द्वारा तख्तापलट हो सकता है ?

बिलकुल हो सकता है। पुलिस के अलावा भारत के किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संगठन के पास या नागरिको के पास सेना को रोकने के लिए हथियार नहीं है !!

वास्तविक अर्थो में भारत में सबसे ताकतवर संस्था सेना है। सेना के पास हथियार है, हथियार चलाने का प्रशिक्षण है, आदेशो का पालन करवाने और आदेश देने के लिए पद सोपान प्रक्रिया है और वांछित अनुशासन है। दुसरे नंबर पर सबसे शक्तिशाली संस्था पुलिस है। किन्तु भारत की पुलिस के पास सेना की तुलना में नगण्य हथियार है, अतः यदि सेना टेक ओवर करती है, और पुलिस सेना का विरोध करती है तो पुलिस सेना के सामने कुछ घंटें भी नहीं टिकेगी।

भारत की सेना जनरल के कंट्रोल में है, और जनरल पीएम से आदेश लेता है। यदि सेना के कनिष्ठ अधिकारी यह मानने लगते है कि भारत का प्रधानमन्त्री भ्रष्ट या निकम्मा है और देश को गड्ढे में धकेल रहा है. या फिर उन्हें यह लगने लगता है कि पीएम को हटा दिया जाना चाहिए, और यदि ऐसे में जनरल अपने कुछ बरिष्ठ अधिकारियो के साथ मिलकर तख्ता पलट की योजना बनाता है तो जनरल भारत में तख्ता पलट करने में सफल हो सकता है। या मान लो कि जनरल का मूड बन जाता है और यदि जनरल अपने अधीनस्थ अधिकारियो के साथ तख्ता पलट की कोशिश करता है तो उसे रोकने वाला कोई नहीं है है !!

ऐसी स्थिति में सेना को सिर्फ भारत के नागरिक ही रोक सकते है, किन्तु भारत के नागरिक हथियार विहीन है, अतः यदि भारत की सेना विद्रोह कर देती है, तो भारत के नागरिको को फौजी शासन स्वीकार करना होगा। यदि नागरिक सेना के खिलाफ छुट पुट प्रदर्शन करते है तो सेना फायरिंग खोल कर उन्हें आसानी से दबा सकती है। 100-200 नागरिको के गोलियां लगने के बाद नागरिक समझ लेंगे कि प्रदर्शन करने से कोई फायदा नहीं है। और तब सेना खुद को राष्ट्रवादी और प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र विरोधी बता कर मामला रफा दफा कर सकता है।

भारत में निरंतर चुनाव होने, जनता का लोकतंत्र में विश्वास होने और सैनिको का सरकार पर भरोसा होने के कारण अब तक कभी तख्ता पलट नहीं हुआ है। क्योंकि जनरल को यह संदेह रहता है कि तख्ता पलट में कनिष्ठ अधिकारी एवं सैनिक जनरल का साथ देंगे या नहीं। किन्तु यदि कोई विदेशी ताकत जैसे अमेरिका आदि भारत में तख्ता पलट करवाना चाहते है तो वे कुछ ही महीनो में गृह युद्ध छिडवाकर, बड़े पैमाने पर आतंकवादी हमले करवाकर, असुरक्षा का भाव उत्पन्न करके एवं राजनैतिक विकल्प हीनता दर्शा कर ऐसे हालात पैदा कर सकते है कि जनरल आसानी से तख्ता पलट कर सकेगा।

जिस देश में राजनेता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको के नियंत्रण से बाहर होने लगते है और वे नेताओं को काबू नहीं कर पाते तो ऐसे हालात में विदेशी ताकतें (विशेष तौर पर अमेरिका) देश को कंट्रोल में लेने के लिए सेना का इस्तेमाल करती है। भारत में फिलहाल ऐसा कोई खतरा मौजूद नहीं है क्योंकि भारत की सभी राजनैतिक पार्टियों के सभी नेता पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथो बिके हुए है अतः उन्हें अपना एजेंडा भारत में लागू करने के लिए सेना की जरूरत नहीं है।

हालांकि भारत में दो बार ऐसे हालात बने थे जब सेना द्वारा तख्ता पलट की कमजोर सम्भावना होने के संकेत मिलते है।

1) जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने बड़े पैमाने पर हथियारों का उत्पादन शुरू किया, बैंको का राष्ट्रीयकरण कर दिया, पाकिस्तान के दो टुकड़े किये और अमेरिका के आगे झुकने से इनकार कर दिया तो अमेरिका ने पहले उन्हें भ्रष्ट जजों (इलाहाबाद का हाई कोर्ट जज जगमोहन लाल सिन्हा) के माध्यम से गिराने की कोशिश की। जब इंदिरा जी ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पर ताले लगवा दिए तो उन्होंने इंदिरा जी का तख्ता पलटने के लिए सेना को एप्रोच करना शुरू किया था। तब जेपी ने दो बार सार्वजनिक रूप से ऐसी अपील की थी कि यदि इंदिरा गांधी सेना को कोई गलत आदेश देती है तो सेना को उसका पालन करने से मना कर देना चाहिए। और जब पानी सर से ऊपर निकल गया तो इंदिरा जी ने आपातकाल लगाकर पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया था।

2) जब देश मनमोहन सिंह से उकताया हुआ था तब. 2012 में जनरल वी के सिंह के कार्यकाल के दौरान हिसार में तैनात "33 आई रेजिमेंट" एवं आगरा की "50 पैरा ब्रिगेड" ने दिल्ली की और कूच किया था। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे रिपोर्ट किया था. घटना उस दिन से एक दिन पहले की है जब वी के सिंह को अपने जन्म प्रमाण पत्र से सम्बन्धित मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेश होना था। सरकार को, रक्षा मंत्रालय को और गृह मंत्री को इस मोबिलाईजेशन की कोई जानकारी नहीं थी। लगभग 18 घंटे तक सरकार असमंजस में बनी रही। प्रोटोकोल के अनुसार बिना रक्षा मंत्री की अनुमति के सेना की कोई भी टुकड़ी दिल्ली की और नहीं बढ़ सकती। बाद में सेना ने स्पष्टीकरण दिया कि यह एक रूटीन एवं औचक प्रोसीजर था। सरकार ने यह बात मानी कि उन्हें नोटिफाईड नहीं किया गया था. किन्तु सरकार ने किसी भी प्रकार के कू (coup) की सम्भावना को सिरे से नकारा।

https://zeenews.india.com/news/nation/army-moved-two-units-towards-delhi-report 768126.html

लोकतंत्र की जननी हथियारबंद नागरिक समाज है। जिस देश के नागरिको की शक्ति उस देश की सेना से अधिक बढ़ जाती है. वहां किसी भी स्थिति में लोकतंत्र का निलम्बन नहीं किया जा सकता। भारत के नागरिक हथियार विहीन है, और यदि सेना विद्रोह कर देती है तो नागरिको के पास उन्हें रोकने के लिए चाकू और नेल क़टर ही है। ब्रिटिश ने सिर्फ । लाख बन्दुक धारियों के माध्यम से भारत के 40 करोड़ नागरिको को 200 सालो तक अपने कंट्रोल में रखा। भारत में 17 लाख की सेना है और सभी हथियारों से लेस है। तो मुकाबले की बात तो भूल ही जाइए। अतः भारत में यदि सेना तख्ता पलट नहीं कर रही है, तो यह केवल चांस की बात है। यदि सेना तख्ता पलट कर देती है तो हम नागरिक "लोकतंत्र वापिस लाओ" के नारे लगाने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

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#वोट_वापसी_पासबुक

sonukumai

​"कल का गौरव आज रद्दी की ढेरी है... हम उस पीढ़ी के अवशेष हैं जिसकी किस्मत अंधेरी है।"

nitikarao115595

मिलने पर अब वो नजरेे तो चुराने लगा है..
कैसे कह दें मोहन कि वो हमें भूल गया है..

momosh99

वो मुझे कभी नहीं मिलेगी ये जानकार भी मुझे सिर्फ उसी से प्यार है।

anisroshan324329

वो एक अजनबी नजदीक आया ही था मोहन..
वापस अजनबी होकर बहुत दूर जाने के लिए..

momosh99

खूबसूरती का तो मोहन तूने क्या खूब भण्डार पाया..
मगर तू दिल ये अपना क्यों खूबसूरत लेकर नहीं आया ..

momosh99

અતીતની સ્મૃતિઓ આજ
યાદોને ઝૂલે
રમતાં હતાં બાણપણમાં
દોરડાને ઝૂલે…
-કામિની

kamini6601

कविता

parthpatil927048gmail.com003294

ये जो समंदर-सा अहसास है,
इन नदियों के पास कहाँ।

ये तो घूमती है,
भटकती है,
गूंजती है,
फिर हवाओं को अपने में समाती है।

मुड़कर देखती भी नहीं,
टहलती जाती है एक ओर।

जो बसावटे हैं, उन्हें छोड़,
जो वनस्पति है, उन्हें छोड़,
आगे की ओर—जैसे कोई भागा जा रहा हो।

ये मिलना चाहती हो किसी जिम्मेदार से,
जैसे इनका कोई अपना बनाता हो।
इन्हें हवा में उड़कर मिलो दूर से,

जैसे कि समंदर तपकर उड़ता है
इन नदियों के लिए,
उन पहाड़ों पर जो बसे हुए हैं।
नदियों के ऊपर,

ये मंडराती हुई
मिलती है समंदर से—
जो खड़ा हो
जैसे सिर्फ इनसे मिलने पर।

समंदर तो खुद एक देवता है,
जिसमें खोज अभी बाकी है,
जिसकी पहुँच अभी बाकी है।

जिसकी लहरों में खुद संसार बसा है,
जिसकी ज़मीनें दुनिया को जोड़ती हैं,
और नदियाँ इसको पूजती हैं।


ये तो खारा है।
नदियाँ घूमती हैं।
नदियाँ मीठी हैं।

gautamverma801543

क़त्ल करती तो दुनिया की नज़र में आ जाती
समझदार मेहबूबा थी इश्क कर के छोड़ गई

anisroshan324329

बदला नही था वक्त हम ही बदल गये
औरो के फासलो से हम तो सम्भल गये
तू इंतेकाम लेने आया है किस बात का
हम तो पहले ही कितना कुछ भुगत गये.

mashaallhakhan600196

‘હે દાદા ભગવાન! તમે તો મોક્ષ લઈને બેઠા છો. અમને તમે મોક્ષ આપો. નહીં તો અમને નિમિત્ત ભેગું કરી આપો!’ આ પ્રાર્થનાથી આપણું કામ થઈ જાય! - દાદા ભગવાન

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dadabhagwan1150

बिहार: अतीत की गौरवशाली गाथा और भविष्य की अनकही कहानीबिहार:
अतीत की गौरवशाली गाथा और भविष्य की अनकही कहानी
बिहार—एक ऐसा प्रदेश, जिसका नाम आते ही लोगों के मन में अलग-अलग तस्वीरें उभरती हैं। किसी को यह इतिहास की भूमि लगता है, तो किसी को संघर्ष का प्रतीक। लेकिन सच्चाई यह है कि बिहार इन दोनों से कहीं अधिक है। यह वह धरती है, जिसने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को ज्ञान, संस्कृति, सभ्यता और लोकतंत्र का पहला पाठ पढ़ाया। बिहार सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक जीवित एहसास है—जो दर्द से गुज़रकर भी उम्मीद करना जानता है।
इतिहास की गोद में पला बिहार
बिहार का इतिहास इतना समृद्ध है कि उसके बिना भारत की कहानी अधूरी लगती है। यही वह भूमि है जहाँ भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया और पूरी दुनिया को अहिंसा व शांति का मार्ग दिखाया। यही वह जगह है जहाँ महावीर स्वामी ने जैन धर्म का प्रचार किया। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने उस दौर में शिक्षा का दीप जलाया, जब दुनिया का बड़ा हिस्सा अज्ञानता में डूबा हुआ था।
यहाँ की धरती ने चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक जैसे महान शासक दिए, जिनकी नीतियाँ आज भी अध्ययन का विषय हैं। लोकतंत्र की जड़ें भी यहीं से जुड़ी मानी जाती हैं। यह इतिहास बिहार को सिर्फ गौरव नहीं देता, बल्कि जिम्मेदारी भी देता है—कि वह फिर से अपनी पहचान को मजबूत करे।
संस्कृति जो आत्मा से जुड़ी है
बिहार की संस्कृति उसकी आत्मा है। यहाँ की परंपराएँ सादगी और गहराई से भरी हुई हैं। छठ पूजा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ इंसान प्रकृति के सामने नतमस्तक होकर सूर्य को धन्यवाद देता है। यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि अनुशासन, शुद्धता और सामूहिकता का प्रतीक है।
भोजपुरी, मैथिली, मगही और अंगिका जैसी भाषाएँ यहाँ की संस्कृति को और समृद्ध बनाती हैं। लोकगीत, सोहर, कजरी, विवाह गीत—इनमें बिहार की खुशियाँ, दर्द और रिश्तों की मिठास झलकती है। गाँव की चौपाल, खेतों में काम करते किसान, और शाम को ढलते सूरज के साथ लौटते मजदूर—ये दृश्य बिहार की असली पहचान हैं।
संघर्ष: जो मजबूरी बना, लेकिन हार नहीं
बिहार का नाम अक्सर संघर्ष से जोड़ दिया जाता है। बेरोज़गारी, बाढ़, सूखा और पलायन—ये समस्याएँ वर्षों से यहाँ की सच्चाई रही हैं। लाखों बिहारी रोज़गार और बेहतर भविष्य की तलाश में अपने घर-परिवार से दूर चले जाते हैं। कोई दिल्ली जाता है, कोई मुंबई, तो कोई पंजाब या खाड़ी देशों तक।
लेकिन यह पलायन कमजोरी नहीं, बल्कि साहस का प्रमाण है। एक बिहारी जब अपना गाँव छोड़ता है, तो वह सिर्फ अपना सामान नहीं उठाता, बल्कि माँ-बाप की उम्मीदें, गाँव की दुआएँ और अपने प्रदेश का नाम भी साथ लेकर चलता है। यही कारण है कि देश के हर कोने में बिहारी अपनी मेहनत और ईमानदारी से पहचान बनाते हैं।
शिक्षा और मेहनत: बिहार की असली ताकत
अगर बिहार को सही मायनों में समझना है, तो उसकी शिक्षा के प्रति दीवानगी को समझना होगा। यहाँ एक साधारण परिवार का बच्चा भी बड़े सपने देखता है। वह कठिन हालात में भी पढ़ाई नहीं छोड़ता। प्रतियोगी परीक्षाओं में बिहार के युवाओं की सफलता इस बात का प्रमाण है कि यहाँ प्रतिभा की कमी कभी नहीं रही।
IAS, IPS, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक—हर क्षेत्र में बिहार के लोग अपनी छाप छोड़ रहे हैं। यह साबित करता है कि समस्या प्रतिभा की नहीं, अवसरों की रही है। अगर बिहार को सही दिशा और संसाधन मिलें, तो यह राज्य फिर से देश का नेतृत्व कर सकता है।
ग्रामीण बिहार: जहाँ सादगी बसती है
बिहार का असली चेहरा उसके गाँवों में बसता है। आज भी यहाँ रिश्तों में अपनापन है। पड़ोसी सुख-दुख में साथ खड़े होते हैं। सीमित साधनों के बावजूद, लोग दिल से अमीर हैं। गाँव की सुबह मुर्गे की बाँग से शुरू होती है और रात लालटेन की रोशनी में कहानियों के साथ खत्म होती है।
खेती आज भी यहाँ की रीढ़ है। किसान मौसम की मार झेलते हैं, फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ते। हर नई फसल के साथ वे एक नए सपने को बोते हैं—कि आने वाला कल बेहतर होगा।
बदलता बिहार: उम्मीद की नई किरण
आज बिहार बदलाव के दौर से गुजर रहा है। सड़कों, पुलों और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में धीरे-धीरे सकारात्मक परिवर्तन दिख रहा है। युवा अब सिर्फ सरकारी नौकरी के सपने तक सीमित नहीं, बल्कि स्टार्टअप, स्वरोज़गार और नए विचारों की ओर भी बढ़ रहे हैं।
डिजिटल दुनिया ने बिहार के युवाओं को एक नया मंच दिया है। अब छोटे शहरों और कस्बों से भी प्रतिभा सामने आ रही है। यह बदलाव भले ही धीमा हो, लेकिन स्थायी है।
बिहार की सबसे बड़ी पूँजी: उसका युवा
बिहार का युवा आज सवाल करता है, सोचता है और बदलाव चाहता है। वह अपने राज्य को पिछड़ा कहलाते नहीं देखना चाहता। उसके भीतर गुस्सा भी है और जुनून भी। अगर इस ऊर्जा को सही दिशा मिले, तो बिहार की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
निष्कर्ष
बिहार को सिर्फ उसकी समस्याओं से नहीं, उसकी संभावनाओं से पहचाना जाना चाहिए। यह वह धरती है जिसने अतीत में दुनिया को रास्ता दिखाया और भविष्य में भी दिखा सकती है। बिहार दर्द से गुज़रा है, लेकिन टूटा नहीं है। उसकी मिट्टी में आज भी संघर्ष से जन्मी उम्मीदें सांस लेती हैं।
बिहार सिर्फ एक राज्य नहीं—यह एक भावना है, एक पहचान है, और एक सपना है, जो आज भी बेहतर कल की तलाश में ह

jhakajal

तेरी यादें तुझसे मिलने को मजबूर करती हैं... I
मेरी हसरते देहलीज पर तेरी रोज मरती हैं... II

deepakbundela7179