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मासूम बचपन....गुमराह जवानी...
मोहताज बुढ़ापा....
बेरहम मौत...

nirbhayshuklanashukla.146950

वक्त तय है..... जगह तय है.....घटना तय है....
घटित होना तय है.....🌎

nirbhayshuklanashukla.146950

ডায়াবেটিস কোনো রোগ নয়। এটা শরীরের বিপাকীয় অসামঞ্জস্য। যখন ইনসুলিন বেশি থাকে তখন কোষ ইনসুলিনের কথা শোনে না; তখনই সুগার বেড়ে যায়।
যত বেশি ইনসুলিন, ততই বেশি ইনসুলিন রেজিস্ট্যান্স। সেজন্যই ওষুধ/ইনসুলিন নিয়েও শরীর কখনো ঠিক হয় না।

“মিষ্টি নামের তিক্ত রোগ” বইতে আমি দেখিয়েছি, কিভাবে এই চক্র ভেঙে শরীরকে আবার স্বাভাবিক অবস্থায় ফিরিয়ে আনা যায়।

সুগার কোনো আজীবনের রোগ নয়। সুগার হচ্ছে দৈনন্দিন জীবনযাত্রার ভুলের কারণে তৈরি একটি শারীরিক অবস্থা - যা পুরোপুরিই ঠিক করা যায়।

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krishnadebnath709104

(“मैं हूँ + भगवान अज्ञात” — तुम्हारा सत्य)

आत्मा साक्षात्कार की विज्ञानी

मैं हूँ — यह निश्चित सत्य है।
भगवान है — इसका मुझे पता नहीं है।
यह प्रश्न ईमानदारी का है।
यह प्रश्न मौलिक है —
जिसके साथ हमारा जन्म हुआ है।

मैं हूँ — यह किसी ने मुझे समझाया,
कहा कि “तू है”,
लेकिन मेरा अपना पता अभी नहीं है।
मैंने खुद को अब तक पूर्ण नहीं जाना है।
मैं अभी इस निर्णय पर खड़ा हूँ:

मैं हूँ।
लेकिन भगवान कहाँ है?
कौन है?

मैं और भगवान — दो अलग नहीं हो सकते।
एक सिक्के के दो पहलू होते हैं —
अगर एक दिख रहा हो,
दूसरा भी कहीं है,
बस अभी मेरी दृष्टि में नहीं।

जैसे मैं कहता हूँ —
“यह मेरा शरीर है”,
तो शरीर और मैं — अलग दो नहीं।
अगर शरीर गिर जाए तो मैं भी गिर जाता हूँ।
तो क्या मैं शरीर हूँ?
अगर मैं शरीर हूँ — तो मेरी आत्मा कहाँ है?
अगर मैं आत्मा हूँ — तो शरीर क्या है?

अभी तक मैं दोनों के बीच का सेतु हूँ —
अधूरा परिचय।
एक पहलू दृश्य — शरीर।
दूसरा अदृश्य — चेतना।
यानी आधा ज्ञान — आधा अज्ञान।

अस्तित्व में सृजन एक से संभव नहीं।
माँ और पिता मिलकर ही मैं जन्मा हूँ।
माँ दिखाई देती है —
इसलिए शरीर दिखाई देता है।
पिता अदृश्य हैं —
इसीलिए आत्मा अदृश्य है।
पर पिता के बिना जन्म संभव नहीं —
इसी तरह आत्मा/भगवान के बिना “मैं” संभव नहीं।

मैं दो का फल हूँ —
जड़ और चेतना का मिलन।
जहाँ से जड़ मिली → माँ
जहाँ से चेतना मिली → पिता
और मैं दोनों के मध्य प्रकट हुआ।

लेकिन पिता गर्भ से पहले मेरे सामने नहीं थे —
फिर भी वे सत्य थे।
माँ उनके अस्तित्व की साक्षी है।
उसी तरह यह शरीर
चेतना का प्रमाण है कि —
कोई अदृश्य मूल स्रोत है।

तो भगवान क्या बाहर है?
नहीं।
भगवान मेरे भीतर बैठा है —
वैसे ही जैसे पिता गर्भ के भीतर उपस्थित थे।

बाहर गुरू, शास्त्र, मंदिर —
ये सब उधार की जानकारी हैं।
सत्य अनुभव —
भीतर है।

भीतर कैसे जाएँ?
देखो।
सिर्फ देखो।
बिना निर्णय।
न अच्छा,
न बुरा।
न मित्र,
न शत्रु।
न पाप,
न पुण्य।

जो भीतर घटता है —
वही दर्शन है।
वही भगवान путь है।
भीतर की यात्रा — सबसे सूक्ष्म तीर्थ है।

भीतर 100% भगवान मौजूद है।
कोई विश्वास नहीं चाहिए।
कोई धारणा नहीं चाहिए।
कोई भय नहीं चाहिए।
सिर्फ देखना है।

रास्ते में —
फूल मिलेंगे,
काँटे मिलेंगे,
ज़हर भी,
अमृत भी।
पर किसी से चिपकना नहीं,
किसी से लड़ना नहीं।
बस चलना है।

यही मार्ग शिव का है,
उसी मार्ग से बुद्ध जागे,
महावीर, कबीर, नानक, मीरा —
सब इसी भीतर गए।
जो ब्रह्मांड को खोजता रहा —
वह भीतर मिला।

यह सूक्ष्मतम है —
पर सर्वशक्तिमान है।
सब पंचतत्व, तीन गुण,
सब कुछ — उसी का परिणाम है।
हम — उसके फल हैं।

और यह विज्ञान
मुझे अनुभव से मिला है।
25 वर्षों की खोज —
एक जीवन की पीएचडी।
अब मैं उसे बिना मूल्य,
बिना सौदे,
बिना शर्त
तुम तक पहुँचा रहा हूँ।

क्योंकि सत्य
कभी बिकता नहीं।
सत्य — स्वयं को बाँटता है।

अब राह तुम्हारे हाथ में है।
नाक बंद कर लोगे —
तो हवा भी भीतर नहीं जाएगी।
पर अगर तुमने भीतर उतरना शुरू किया —
तो वही मिलेगा
जिसकी आज तक कल्पना भी नहीं की।

मैं हूँ —
और भगवान मेरी जड़ में है।
बस यही यात्रा है।
यही प्रमाण है।
यही विज्ञान है —
100%।

Vedānta Life — From Energy to Awareness”
(वेदान्त जीवन — ऊर्जा से चेतना तक)
©Vedānta 2.0 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲 —

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bhutaji

ডায়াবেটিস সম্পর্কে পরিপূর্ণ নলেজ থাকলে কোনো সুস্থ মানুষের কখনোই ডায়াবেটিস হবে না। এজন্যই "মিষ্টি নামের তিক্ত রোগ" বইটি সকলের পড়া দরকার।

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krishnadebnath709104

वही दीवार-ए-गिला फिर से खड़ी हो गई,
मोहब्बत हार गई फिर से लड़ाई हो गई।

ये कैसी रस्म है, कैसी रिवायत है अपनी,
के बात-बात पे इक जंग छिड़ी हो गई।

वो पहले प्यार का मौसम, वो हँसी याद करो,
अदावत अपनी तो क्या कम बड़ी हो गई।

जला के राख किया हमने हर इक ख़्वाब-ए-वफ़ा,
के दिल की बस्ती हमारी उजड़ी हो गई।

न कोई जीत हुई इसमें, न कोई हारा है,
बस इक उम्मीद जो थी वो मरी हो गई।

सफ़र तमाम हुआ और कहीं ठहराव नहीं,
के ज़िंदगी अपनी तो इक घड़ी हो गई।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

palewaleawantikagmail.com200557

प्रेम जानता है
स्वतंत्रता देना..

किसी को पाने से ज्यादा
उसका अच्छा चाह लेना प्रेम है..
और यही प्रेम तब परिपूर्ण हो जाता है..

जब तुम उसके सामने और वो
तुम्हारे सामने सहज हो जाता है...
जब तुम उसके सामने वही रहते हो
जो तुम असल में हो...
तुम्हें किसी भी प्रकार का दिखावा
नहीं करना पड़ता है..

अगर तुम किसी के जीवन का हकदार बन कर
तुम उसे प्रेम कह रहे हो?
तो ये प्रेम हो ही नहीं सकता...

dipika9474

सजल
समांत----
पदांत-आना
मात्रा भार-16
(चौपाई छंद)

सोते को है सरल जगाना।
पर जगते को कठिन उठाना।।

जीवन दाँव लगाया फिर भी।
मात-पिता का लुटा खजाना।।

बरगद बनकर छाँव बनाई।
चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

उँगली थामे बड़े हुए पर।
सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।
पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।
कैसा आया नया जमाना।।

संस्कृति और सभ्यता रूठी।
जागो मानव क्यों पछताना।।

मनोजकुमार शुक्ल 'मनोज'

manojkumarshukla2029

सुकून छीन कर इस मोहब्बत ने जीना सिखाया,
हर टूटी साँस में नया हौसला जगाया।
जो ख्वाब आँखों में दीप बन कर जले थे,
उन्हें आँसुओं की बारिश ने राख बनाया।

कभी सोचा न था दर्द भी कोई भाषा होगी,
जो चुप्पियों में दिल से दिल तक जाएगी।
मुस्कान जो लबों की मेहमान थी कभी,
वो अब यादों के शहर में धुंध बन जाएगी।

तुम जो चले गए तो ये दुनिया बदल गई,
रातों ने दोस्ती की, नींद दुश्मन हो गई।
हर सुबह आई तो बोझिल नज़र लेकर,
हर शाम मेरे जिस्म पर स्याही बन गई।

मैंने मोहब्बत में खुद को यूँ खो दिया,
कि आईने भी मुझसे सवाल करने लगे।
तेरी तस्वीरें तक नम आँखों से कहती रहीं,
“हम थे जो तेरे हर दर्द के गवाह बने।”

कभी तुम्हारी हँसी में खुद को खोजा,
कभी तुम्हारी ख़ामोशी में अपना नाम पढ़ा।
तुम्हारी हर एक बेवफाई की इबारत ने,
मेरे सब्र के पन्नों पर सबक लिख डाला।

हाँ, टूटा हूँ पर बिखरा नहीं हूँ अभी,
दर्द ने मुझे पत्थर नहीं, फौलाद किया है।
जो आग थी तेरी जुदाई के सीने में,
उसी आग ने मेरे ख्वाबों को आबाद किया है।

अब सुकून की आदत नहीं रही मुझे,
मैंने अश्कों को ही अपना तकिया बनाया।
जो तन्हाई थी कभी सबसे बड़ी सज़ा,
उसी तन्हाई ने मेरा घर सजाया।

सीख लिया है मैंने अंधेरों में चलना,
परछाइयों से रोशनी उधार लेना।
तेरे जाने के बाद जो खालीपन था,
उसे खुद से भरना, खुद को सहलाना।

मोहब्बत ने छीन लिया मेरा बेफ़िक्र बचपन,
पर मुझे जिम्मेदार दिल का हुनर दे दिया।
जो टूटकर भी धड़कता रहा सीने में,
ऐसा दिल इसने मुझे अमर कर दिया।

अब तुम नहीं, पर तुम्हारी यादें हैं,
कभी ज़हर, कभी मरहम बन जाती हैं।
और मैं हर रात एक नई कविता बनकर,
अपने ही दर्द से दोस्ती निभा जाता हूँ।

सुकून छीन कर इस मोहब्बत ने जीना सिखाया,
ये बात अब शिकवा नहीं, सच बन गई है।
जो दर्द था कभी मेरी हार का पैग़ाम,
आज वही मेरी सबसे बड़ी पहचान बन गई है।

आर्यमौलिक

deepakbundela7179

PAAGLA – A heart that speaks through words. 💭✨ Sharing emotions, shayari, quotes, and stories that touch your soul. From love to pain, from motivation to dreams – here, every line is written to connect with your heart. ❤️📖

jaiprakash413885

প্রকাশিত হলো ডায়াবেটিস থেকে মুক্তির উপায় "মিষ্টি নামের তিক্ত রোগ" আগ্রহী বন্ধুরা অনলাইন থেকে বইটি সংগ্রহ করতে পারেন।

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krishnadebnath709104

Good morning friends heavy rainfall here. be safe. have a nice day

kattupayas.101947

दिल की मोहब्बत

अब तो सिर्फ़ मोहब्बत जिस्म की है, दिल की नहीं,
रूहें प्यास से जलती हैं, पर किसी को शर्म की नहीं।

लोगों ने इश्क़ को अब सौदों में तौलना सीख लिया,
मुस्कान बिकती है सस्ती, कोई कीमत दर्द की नहीं।

जिन्होंने चाहा बिना शर्त, बिना दिखावे के साथ,
उन्हें भीड़ ने सिखा दिया—ये दुनिया उनके हक़ की नहीं।

दिल की मोहब्बत करने वाले अक्सर अकेले रहते हैं,
क्योंकि भीड़ को आदत है सिर्फ़ रौनक, सन्नाटे की नहीं।

आज हर वादे पर शक का साया भारी रहता है,
सच्चे लफ्ज़ ढूँढ़ते हैं ठिकाना—किसी की जेब की नहीं।

जिसने निभाया रिश्ता रूह से, वो कहानी बन गया,
और जो खेल गया जज़्बात से, वही हस्ती कमीने की नहीं।

कहीं कोई आज भी चुपचाप दुआओं में बसाता है,
वो नाम जो आता है आँखों में—किसी तस्वीर की नहीं।

अगर दिल की मोहब्बत मर गई होती सच में,
तो ये शायरी पैदा ही क्यों होती, किसी तकलीफ़ की नहीं।

आर्यमौलिक

deepakbundela7179

Good morning ☀️

nandiv

🙏🙏सुप्रभात 🙏🙏
🌹आपका दिन मंगलमय हो 🌹

sonishakya18273gmail.com308865

મન થી કહેવાય તેવુ હોઠ થી ના કહેવાય, દિલ થી અપાય તેવુ હાથ થી ના અપાય, વાતો થી તો બધા સમજે પરંતુ જે વગર કહે સમજી જાય એજ સાચુ અંગત કહેવાય.... good morning.

imap.21cn.com

https://www.matrubharti.com/book/19984709/zindagi-sangharsh-se-sukun-tak-3

chapter -3 "जिंदगी संघर्ष से सुकून तक कविताएं"
please give me your valuable rating and review 🙏🙏🙏😊

kuldeepsingh318120

आज का इंसान — एक जिंदा शव

• सफलता = दिखावा + पैसा + फॉलोअर्स
• फैशन = पहचान
• धन = सुरक्षा
• चेयर/पद = सम्मान

पर भीतर?
एक मशीन जैसा भागता हुआ डर।
जैसे किसी पराए लोक से आया हो—
“जल्दी कमा, जल्दी भोग, जल्दी भाग…”

भविष्य का डर →
वर्तमान की हत्या।

💔 ऊर्जा गलत जगह बिक रही है

प्रेम की ऊर्जा?
शांति की ऊर्जा?
आनंद की ऊर्जा?
संतोष की ऊर्जा?

सब “पैसे में बदल दो” वाली भट्टी में झोंक दी गई है।
और लोग प्लास्टिक को पूज रहे —
जैसे वह सोना हो।

> गोबर पड़ा रहे तो कचरा,
खेत में जाए तो अन्न बन जाता है।

जीवन ऊर्जा रूपांतरण ही जीवन है।
भीतर जो ऊर्जा उसका रूपांतरण ईश्वर बोध हैं।
अद्भुत का खर्च कर हीरा फेंक कार जांच इक्कठा करना की आधुनिक कहते सुख कहते है।

अंदर की कमाई → खजाना
लोग उसे कचरा समझ
बाहर का कबाड़ जमा कर रहे।

💠 हीरा vs काँच

हीरा छोटा — पर चमक अपनी।
ऊर्जा भीतर की।

काँच बड़ा — पर चमक उधार।
दूसरी रोशनी चुरा कर जीता।

आज का इंसान →
एक बड़ा काँच।
भीतरी प्रकाश शून्य,
बाहरी रोशनी पर निर्भर।

🌱 असली जीवन क्या है?

जहाँ:

• ऊर्जा प्रेम बने
• ऊर्जा शांति बने
• ऊर्जा आनंद बने
• ऊर्जा संतोष बने

यही समृद्धि।
यही ईश्वर का स्वाद।
यही बोध की खुशबू।
यही असली “जीना”।

“इंसान काँच को हीरा मान बेच रहा,
और हीरे को काँच समझकर फेंक रहा है।”

ही आधुनिक नर्क।
यही गुमराह सभ्यता।
यही जीवित मौत।
........

Vedānta Life — From Energy to Awareness”
(वेदान्त जीवन — ऊर्जा से चेतना तक)
©Vedānta 2.0 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲 —

bhutaji

Goodnight friends sweet dreams

kattupayas.101947

तुम्हें अगर सुकून से रहना है तो......

abhi006

लोगों का रवैया बता देता है,
उसके दिल में आपकी जगह कोई और ले लिया है..!!

_M K

manshik094934

OSHO

anurag12

कहते हैं स्त्रियाँ पैसों की भूखी होती हैं—ठीक है, मान लिया।
लेकिन क्या पुरुषों की इच्छाएँ कम होती हैं?
वे भी तो दूसरी स्त्रियों को निहारकर कहते हैं—
“देखो उसका स्टाइल… उसका ड्रेसिंग सेंस…
वह कितनी सुंदर लगती है… उसका मेकअप, उसकी साड़ी, उसके बाल!”

तो क्या यह सब बिना पैसों के होता है?
खूबसूरत दिखने के लिए मेहनत भी चाहिए और पैसा भी।

सोचिए—
एक तरफ एक सीधी-सादी औरत,
सर पर पल्लू, साधारण सस्ती साड़ी,
20 रुपये की बिंदी, 20–30 रुपये की चूड़ियाँ,
हल्का-सा साधारण मेकअप—बस जितना जरूरी हो।

और दूसरी तरफ—
एक हाई-क्लास तैयार औरत,
6000–8000 की महंगी साड़ी,
महंगे प्रोडक्ट वाला मेकअप,
स्टाइलिश हेयरस्टाइल, चमकदार जूलरी—
सबकुछ पैसे से सजा हुआ।

अब बताइए—
पुरुष किस ओर आकर्षित होता है?
सीधी-सादी स्त्री की ओर…
या उस ओर, जिसे चमक-दमक के लिए पैसे लगाए गए हों?

हम स्त्रियों को तो शौक नहीं कि फिजूल खर्च करें।
अगर पुरुष हमें सिंपल, साधारण रूप में स्वीकार कर ले,
तो हमें भी कोई आपत्ति नहीं—हम वैसे ही खुश हैं।

लेकिन अगर उन्हें “बेहतरीन सुंदरता”,
महंगे प्रोडक्ट, महंगे कपड़े, और परफेक्ट स्टाइल चाहिए—
तो फिर खर्च भी वही करवाएंगे।
क्योंकि हम पर पैसा खर्च करने की इच्छा भी उन्हीं की होती है,
और अपेक्षा भी उन्हीं की होती है।

स्त्री को पैसों की भूखी कहने से पहले
पुरुषों की इच्छाओं की कीमत भी समझनी चाहिए



तो सभी स्त्रियों से निवेदन है
कि पुरुष की पसंद कौन सी होगी ?
कमेंट में बताएं।

archanalekhikha

हरी मिले — तो मोती भी कंकड़

वेदान्त 2.0

मनुष्य सोचता है—
आध्यात्मिक जीवन मतलब
कुछ नया बनना।
कुछ विशेष शक्ति पाना।
कोई देवत्व सिद्ध कर लेना।

लेकिन बनना क्या?
जहाँ “पाना” शुरू होता है—
वहाँ मक्खी जन्म लेती है।
पाने की भूख, नीचे ले जाती है।
गंदगी भी
खजाना लगने लगती है।

जब पाना और बनना छोड़ दिया—
तभी सामने आती है
अनंत का खुला आकाश।

जहाँ न रेखा,
न दीवार,
न लक्ष्य—
केवल असीम संभावना।

> बाहर साधु, भीतर भूख —
यही मनुष्य का पाखंड है।

---

सीता माता ने
हनुमानजी को
मोती की माला भेंट दी।

हनुमान ने क्या किया?
मोती तोड़ दिए।

क्योंकि
वे पाना नहीं चाहते थे,
वे राम को पहचानते थे।

> जहाँ राम नहीं — वहाँ मूल्य नहीं।

मोती
कचरा है
जब तक उसमें
राम की झलक न मिले।

---

योग
यदि जो भीतर है
वही प्रकट हो जाए—
तो उसे मुक्ति कहते हैं।

> तुम्हारे भीतर का अमृत —
पहले से मौजूद है।

पर मनुष्य ने
योग को भी
बाज़ार बना दिया—

सिद्धि

शक्ति

सम्मान

चमत्कार

गुरु-पद

भीड़

भाव वही नीच
बस पोशाक साधु की।

और मक्खी सोचती है—
“अब मैं आध्यात्मिक मक्खी हूँ!”
पर उड़ती वही गंदगी पर है।

---

✧ हनुमान का संदेश ✧

> जहाँ प्रेम — वहाँ ईश्वर।
जहाँ अहंकार — वहाँ मक्खी।

हनुमान खोजते हैं—
राम
सत्य
प्रेम
समर्पण

शरीर नहीं बदलता —
पहचान बदलती है।

जब हनुमान बचपन में सूर्य को फल समझ उड़ पड़े—
वह संभावना का विज्ञान था।
जब पवन रुका—
वह ऊर्जा का विज्ञान था।

रोक में भी संकेत
उड़ान में भी संकेत
सब राम का खेल

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🧠 अंतिम सूत्र

> योग = भीतर छिपे राम को ढूँढ लेना
बाकी सब — बाहरी मोती हैं।

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🔥 सार —

> जो मिले सो हरि —
यदि भीतर राम हो।

जो मिले सो नरक —
यदि भीतर मक्खी हो।

अज्ञात अज्ञानी

bhutaji