Most popular trending quotes in Hindi, Gujarati , English

World's trending and most popular quotes by the most inspiring quote writers is here on BitesApp, you can become part of this millions of author community by writing your quotes here and reaching to the millions of the users across the world.

New bites

it's time for little nap. c u guys

kattupayas.101947

Hope all of you enjoyed your lunch.. little late for me

kattupayas.101947

तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं

तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं।
बस ख़ामोश सा सही हूँ मैं।

तेरी हर एक याद में अब भी,
धड़कन की तरह कहीं हूँ मैं।

तू सामने नहीं है तो क्या,
तेरे हर एहसास में ही हूँ मैं।

लोग समझे बिछड़ गया हूँ तुझसे,
सच ये है कि यहीं हूँ मैं।

तेरे जाने का ग़म नहीं रोता,
तेरे होने का यक़ीं हूँ मैं।

वक़्त ने ओढ़ा दी दूरी की चादर,
दिल के सबसे क़रीब वही हूँ मैं।

मुस्ताक़, ये दुनिया चाहे जो कह ले,
तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं।

mboss164240

ક્ષણો મિલનની સંઘરી હતી
જે હ્રદયમાં
આજ કામ આવી ગઈ સઘળી
વિરહમાં…
-કામિની

kamini6601

सपनों से हक़ीकत तक


सपनों की राह में चलता रहा,
हर मोड़ पर कुछ नया मिलता रहा।
कुछ नया मिलने से मैं सीखता रहा,
जिसमे तजुबी बड़ता रहा ।।

तजुर्बा जोड़ा तो हौसला बढ़ ‌गए,
सपने अब और भी चमकन लग गए।
चमकने लगे तो बेहतर बन गए,
जिंदगी में आनंद आ गए ।।

आनंद में रंग ऐसे घुलने लगे,
हर एक पल अब और प्यारे लगने लगे।
प्यार से लोग हमें अपना बनाने लगे,
सपनों की तलाश को हम हकीकत बनाने लगे ।।

राहों में अब कोई रुकावट नहीं,
सपनों के संग अब कोई भी जंग नहीं।
जिंदगी की इस किताब का हर पन्ना सजा,
हमने खुद को जीने का तरीका पा लिया ।।

deepkumar218118

Gulab Ka Sabak
Ek gulab ne mujhse kaha, tu kyun darti hai kaanton se,
Zindagi ki asli pehchan hoti hai, inhi imtihanon se.
Dekh mera surkh rang, ye junoon ki nishani hai,
Par in kaanton ke beech hi, meri har kahani hai.
Log kehte hain gulab ho toh kaante bhi jhelne honge,
Par main kehti hoon, kaante hi toh humein ladna sikhate hain.
Bina kaanton ke toh phool bhi murjha jaye jaldi,
Ye chubhan hi toh hai, jo jeene ka jazba jagate hain.
Maana ki raahon mein kaante bichhe hain hazaar,
Par tu dekh us khushbu ko, jo hai behisaab aur apaar.
Gulab tabhi banta hai, jab dhoop aur tufaan se ladta hai,
Insaan bhi wahi hai, jo mushkilon mein hi nikharta hai.
Tu ban ja wahi gulab, jo har haal mein muskuraye,
Chahe kismat kitne bhi kaante, teri raah mein bichhaye.
Kaante teri hifazat hain, teri kamzori nahi,
Teri jeet ki dastaan mein, ye rukawat koi nahi!

nidhimishra705356

Do You Know people praise and speak very highly of those who donate money? This public adoration is the donor's reward. The donor reaps the reward of his action in this very life, whereas the one who gives anonymously will reap his reward in his next life.

Read more on: https://dbf.adalaj.org/J8hBTnYs

#humanity #donation #charity #helpothers #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

हर रास्ता मंज़िल तक नहीं जाता,
कुछ रास्ते
सिर्फ़ यह सिखाने आते हैं
कि लौटना भी एक कला है।
हर सवाल जवाब नहीं माँगता,
कुछ सवाल
अंदर बैठकर
हमें चुप रहना सिखाते हैं।
जो बहुत साफ़ दिखता है
वही सबसे पहले
धोखा देता है,
और जो धुंधला है
वही अक्सर
सच की तरफ़ इशारा करता है।
हर जीत
ताली की आवाज़ नहीं होती,
कुछ जीतें
अकेले कमरे में
आँखें बंद कर
महसूस की जाती हैं।
समय
जब जवाब नहीं देता
तो समझ लो—
वह हमें
ख़ुद से मिलाने में
लगा हुआ है।

आर्यमौलिक

deepakbundela7179

काही बदल स्वतःसाठी चांगले असतात…😇

lifeisallabout

Filter coffee for..

kattupayas.101947

Enjoy the Tea

kattupayas.101947

Time for some good breakfast..

kattupayas.101947

मीलते हैं लोंग राहों में
किसी मुसाफ़िर की तरह
दे जाते हैं तौफ़ा उम्रभर का
किसी बेनज़ीर की तरह

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

Good morning friends.. have a great day

kattupayas.101947

उलझनों में फँसा मुसाफ़िर था, रास्ता न मिला...
चीख़ता रहा दुनिया से, पर अपना ही साया न मिला....
खुद को साबित करता रहा हर एक मोड़ पे, हर जगह....
लोग मिले बहुत से मगर दिल का हमसाया न मिला....
दर्द की आग में जलता रहा मैं हर एक रोज़....
तकलीफ़ों से लड़ते-लड़ते कोई सहारा न मिला....
भीतर ही भीतर बिखरता रहा ख़ामोशी के साथ....
हँसता रहा चेहरों में, पर मन का साया न मिला....
फिर धैर्य का हाथ थामा, मन को ठहरने दिया....
चुप रहना सीखा जब शोर में कुछ फायदा न मिला...
ना हर किसी को जवाब दिया, ना खुद को साबित किया....
जो सुकून चारों ओर ढूँढा, वो बाहर न मिला....
आख़िर झुककर देखा जब अपने ही अंदर “ये मुसाफ़िर”...
जिसे उम्र भर खोजता रह दर बदर, वही खुद में ही मिला.....

–संकेत गावंडे .

sanket_0_6

🤫

payaldevang08gmail.com936925

न्याय की प्रतीक्षा में निर्मला
“माँ, होमवर्क करके जल्दी लौट आऊँगी।”
निर्मला ने अपने दोस्तों के लिए छोटे से प्लास्टिक में कुछ अमरूद बाँधे, अपनी पुरानी साइकिल निकाली और मुस्कुराते हुए घर के आँगन से निकल गई।
दिन ढल गया।
शाम हो गई।
लेकिन निर्मला नहीं लौटी।
बम दीदी-बहन के घर से दोपहर 2 बजे ही निकल चुकी निर्मला, शाम 8 बजे तक भी घर नहीं पहुँची। घबराए हुए माता-पिता पुलिस चौकी पहुँचे। वहीं उन्हें राज्य से पहला धोखा मिला।
“किसी लड़के के साथ चली गई होगी, घूम रही होगी।”
अपनी बेटी के लापता होने की पीड़ा से तड़पते माता-पिता पर वर्दीधारी रक्षकों की यह असंवेदनशील टिप्पणी थी। अगर उसी रात तुरंत खोज अभियान शुरू हो जाता, तो शायद इस कहानी का अंत कुछ और होता।
अगली सुबह— 11 साउन।
घर से कुछ ही दूरी पर गन्ने के खेत में निर्मला का निर्जीव शरीर मिला। उस दृश्य ने सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि मानवता को भी झकझोर दिया। लेकिन उस भयावह घटना से भी ज़्यादा डरावना दृश्य इसके बाद देखने को मिला।
अपराध जांच में घटनास्थल को ‘मंदिर’ माना जाता है, लेकिन यहाँ रक्षक ही भक्षक के साथी बन गए। एक मासूम बच्ची के शव के पास मिली सलवार— जो बलात्कार का सबसे अहम सबूत हो सकती थी— पुलिस ने खुद पानी में धो दी।
क्या यह सिर्फ अज्ञानता थी?
या किसी के गुनाह धोने की सुनियोजित साज़िश?
भीड़ इकट्ठा हुई। निर्मला की साइकिल, कॉपी-किताबें शव से कुछ दूरी पर बिखरी पड़ी थीं। लेकिन संघर्ष का कोई निशान नहीं था। मानो हत्या कहीं और करके शव यहाँ सजा दिया गया हो।
सबूत मिटाने की जल्दबाज़ी में फॉरेंसिक टीम के पहुँचने से पहले ही शव हटा दिया गया। सच्चाई हमेशा के लिए उसी गन्ने के खेत की मिट्टी में दबा दी गई।
जन आक्रोश बढ़ता गया।
राज्य ने एक ‘पात्र’ खड़ा किया— दिलीप सिंह बिष्ट। 41 वर्षीय मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति।
पुलिस ने तैयार की हुई पटकथा सुनाई—
“इसी ने निर्मला की हत्या की है।”
सबूत के नाम पर उसकी फटी हुई कमीज़ दिखाई गई।
बाद में बंद कमरे के भीतर की सच्चाई सामने आई—
“इस अपराध को स्वीकार कर ले, हम तुझे मांस और शराब देंगे, नहीं तो मार देंगे।”
एक मानसिक रोगी पर किया गया यह अत्याचार न्याय प्रणाली के चेहरे पर लगा काला धब्बा था।
लेकिन झूठ की उम्र लंबी नहीं होती।
निर्मला के शरीर से लिए गए (चाहे जितने भी विवादित क्यों न हों) डीएनए नमूने दिलीप के डीएनए से नहीं मिले।
विज्ञान ने राज्य के झूठ को मानने से इनकार कर दिया।
एक निर्दोष बच गया, लेकिन असली अपराधी आज भी पर्दे के पीछे मुस्कुराता रहा।
निर्मला के लिए न्याय माँगते ही सड़कें आग बन गईं।
पूरा देश रो पड़ा। कंचनपुर की सड़कों पर नारे गूँजे—
“सरकार, निर्मला को न्याय दो!”
लेकिन सरकार ने न्याय की जगह गोलियाँ चलाईं।
8 भदौ।
17 वर्षीय सन्नी— निर्मला के लिए न्याय माँगने सड़क पर उतरा एक किशोर— पुलिस की गोली से गिर पड़ा।
एक हत्या की जाँच करनी थी, राज्य ने जवाब में एक और हत्या कर दी।
आज वर्षों बीत चुके हैं।
घटनास्थल के पास की सेना की बैरक, बम दीदी-बहन का घर, बार-बार बदले गए बयान, घटना के तुरंत बाद रंगे गए कमरे, सलवार धोने वाले पुलिसकर्मी और शक के घेरे में खड़े ‘वीआईपी’ चेहरे— सब आज भी रहस्य के गर्भ में हैं।
निर्मला के पिता यज्ञराज पंत— न्याय माँगते-माँगते मानसिक रूप से टूट चुके हैं।
माँ दुर्गा देवी— राज्य से लड़ते-लड़ते अंततः हार मानने को मजबूर हो गईं।
इस कहानी का अंत अभी लिखा जाना बाकी है।
निर्मला का हत्यारा आज भी आज़ाद घूम रहा है।
उसके नाम पर कार्यक्रम चलाने वाले मंत्री बने, प्रधानमंत्री बदले, कानून मंत्री, आईजीपी, डीआईजी— सब बदल गए।
लेकिन एक सच्चाई आज भी नहीं बदली—
“निर्मला की आत्मा को अब तक शांति नहीं मिली है।”
निर्मला पंत को हार्दिक श्रद्धांजलिउखुबारीले देखेको सत्य
“आमा, म छिट्टै फर्किन्छु”
भन्दै निस्किएकी
एउटी छोरी
घर फर्किन पाइन।
साँझ ढल्दै गयो,
आकाश रातो भयो,
आमाको मन
रातभन्दा गहिरो अन्धकार बन्यो।
चौकीको ढोकामा
आँसु लिएर उभिँदा
राज्यले भन्यो—
“केटासँग होली।”
त्यही रात
न्याय निदायो,
र अर्को बिहान
उखुबारी रोयो।
सानो साइकल,
कापी–कलम,
र च्यातिएको सपना
माटोमा छरपस्ट।
प्रमाण पखालियो पानीले,
पाप पखालियो कि
सत्य डुबाइयो?
उखुबारी जान्दछ।
एउटा निर्दोष बालिका,
अर्को मानसिक रोगी,
र बीचमा
राज्यको झूट।
विज्ञान चिच्यायो—
“ऊ अपराधी होइन!”
तर हत्यारा
भीआईपी मुस्कानमा हरायो।
न्याय माग्दा
सडक आगो बन्यो,
र न्यायकै नाममा
गोली चल्यो।
सन्नी ढल्यो,
१७ वर्षको सपना
रगतमा मिसियो,
राज्य फेरि मौन भयो।
बुबाको आवाज
सडकमा गल्दै गयो,
आमाको आँसु
थाकेर रोकियो।
मन्त्री फेरिए,
कुर्सी सरे,
तर एउटी छोरीको
न्याय अड्कियो।
आज पनि उखुबारी
माटोमुनि सत्य बोकेर
चुपचाप उभिएको छ।
र देशले सुन्न नसकेको
एउटा आवाज अझै गुञ्जिन्छ—
“म निर्मला हुँ,
मलाई न्याय चाहिन्छ।https://youtube.com/@rajufilmyjunction?si=cCmXX87Yn7XPtlu

rajukumarchaudhary502010

न्याय की प्रतीक्षा में निर्मला
“माँ, होमवर्क करके जल्दी लौट आऊँगी।”
निर्मला ने अपने दोस्तों के लिए छोटे से प्लास्टिक में कुछ अमरूद बाँधे, अपनी पुरानी साइकिल निकाली और मुस्कुराते हुए घर के आँगन से निकल गई।
दिन ढल गया।
शाम हो गई।
लेकिन निर्मला नहीं लौटी।
बम दीदी-बहन के घर से दोपहर 2 बजे ही निकल चुकी निर्मला, शाम 8 बजे तक भी घर नहीं पहुँची। घबराए हुए माता-पिता पुलिस चौकी पहुँचे। वहीं उन्हें राज्य से पहला धोखा मिला।
“किसी लड़के के साथ चली गई होगी, घूम रही होगी।”
अपनी बेटी के लापता होने की पीड़ा से तड़पते माता-पिता पर वर्दीधारी रक्षकों की यह असंवेदनशील टिप्पणी थी। अगर उसी रात तुरंत खोज अभियान शुरू हो जाता, तो शायद इस कहानी का अंत कुछ और होता।
अगली सुबह— 11 साउन।
घर से कुछ ही दूरी पर गन्ने के खेत में निर्मला का निर्जीव शरीर मिला। उस दृश्य ने सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि मानवता को भी झकझोर दिया। लेकिन उस भयावह घटना से भी ज़्यादा डरावना दृश्य इसके बाद देखने को मिला।
अपराध जांच में घटनास्थल को ‘मंदिर’ माना जाता है, लेकिन यहाँ रक्षक ही भक्षक के साथी बन गए। एक मासूम बच्ची के शव के पास मिली सलवार— जो बलात्कार का सबसे अहम सबूत हो सकती थी— पुलिस ने खुद पानी में धो दी।
क्या यह सिर्फ अज्ञानता थी?
या किसी के गुनाह धोने की सुनियोजित साज़िश?
भीड़ इकट्ठा हुई। निर्मला की साइकिल, कॉपी-किताबें शव से कुछ दूरी पर बिखरी पड़ी थीं। लेकिन संघर्ष का कोई निशान नहीं था। मानो हत्या कहीं और करके शव यहाँ सजा दिया गया हो।
सबूत मिटाने की जल्दबाज़ी में फॉरेंसिक टीम के पहुँचने से पहले ही शव हटा दिया गया। सच्चाई हमेशा के लिए उसी गन्ने के खेत की मिट्टी में दबा दी गई।
जन आक्रोश बढ़ता गया।
राज्य ने एक ‘पात्र’ खड़ा किया— दिलीप सिंह बिष्ट। 41 वर्षीय मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति।
पुलिस ने तैयार की हुई पटकथा सुनाई—
“इसी ने निर्मला की हत्या की है।”
सबूत के नाम पर उसकी फटी हुई कमीज़ दिखाई गई।
बाद में बंद कमरे के भीतर की सच्चाई सामने आई—
“इस अपराध को स्वीकार कर ले, हम तुझे मांस और शराब देंगे, नहीं तो मार देंगे।”
एक मानसिक रोगी पर किया गया यह अत्याचार न्याय प्रणाली के चेहरे पर लगा काला धब्बा था।
लेकिन झूठ की उम्र लंबी नहीं होती।
निर्मला के शरीर से लिए गए (चाहे जितने भी विवादित क्यों न हों) डीएनए नमूने दिलीप के डीएनए से नहीं मिले।
विज्ञान ने राज्य के झूठ को मानने से इनकार कर दिया।
एक निर्दोष बच गया, लेकिन असली अपराधी आज भी पर्दे के पीछे मुस्कुराता रहा।
निर्मला के लिए न्याय माँगते ही सड़कें आग बन गईं।
पूरा देश रो पड़ा। कंचनपुर की सड़कों पर नारे गूँजे—
“सरकार, निर्मला को न्याय दो!”
लेकिन सरकार ने न्याय की जगह गोलियाँ चलाईं।
8 भदौ।
17 वर्षीय सन्नी— निर्मला के लिए न्याय माँगने सड़क पर उतरा एक किशोर— पुलिस की गोली से गिर पड़ा।
एक हत्या की जाँच करनी थी, राज्य ने जवाब में एक और हत्या कर दी।
आज वर्षों बीत चुके हैं।
घटनास्थल के पास की सेना की बैरक, बम दीदी-बहन का घर, बार-बार बदले गए बयान, घटना के तुरंत बाद रंगे गए कमरे, सलवार धोने वाले पुलिसकर्मी और शक के घेरे में खड़े ‘वीआईपी’ चेहरे— सब आज भी रहस्य के गर्भ में हैं।
निर्मला के पिता यज्ञराज पंत— न्याय माँगते-माँगते मानसिक रूप से टूट चुके हैं।
माँ दुर्गा देवी— राज्य से लड़ते-लड़ते अंततः हार मानने को मजबूर हो गईं।
इस कहानी का अंत अभी लिखा जाना बाकी है।
निर्मला का हत्यारा आज भी आज़ाद घूम रहा है।
उसके नाम पर कार्यक्रम चलाने वाले मंत्री बने, प्रधानमंत्री बदले, कानून मंत्री, आईजीपी, डीआईजी— सब बदल गए।
लेकिन एक सच्चाई आज भी नहीं बदली—
“निर्मला की आत्मा को अब तक शांति नहीं मिली है।”
निर्मला पंत को हार्दिक श्रद्धांजलि

rajukumarchaudhary502010

न्यायको पर्खाइमा निर्मला
“आमा, होमवर्क सकेर छिट्टै फर्किन्छु है।”
निर्मलाले सानो प्लास्टिकमा आफ्ना साथीहरूका लागि केही अम्बा पोको पारिन्, पुरानो साइकल निकालिन् र मुस्कुराउँदै घरको आँगनबाट निस्किइन्।
दिन ढल्यो। साँझ पर्यो।
तर निर्मला फर्किनन्।
बम दिदीबहिनीको घरबाट दिउँसो २ बजे नै निस्किसकेको भनिएकी निर्मला साँझ ८ बजेसम्म पनि घर पुगिनन्। आत्तिएका आमा–बुबा प्रहरी चौकी पुगे। त्यहीँ उनीहरूले राज्यबाट पहिलो धोका पाए।
“पोइला गइहोली, केटासँग घुम्दै होली।”
छोरी हराएको पीडामा छटपटाइरहेका आमाबुवामाथि बर्दीधारी रक्षकहरूको यो असंवेदनशील टिप्पणी थियो। यदि त्यो रात तत्काल खोजी अभियान सुरु भएको भए, सायद यो कथाको अन्त्य अर्कै हुन सक्थ्यो।
भोलिपल्ट बिहान— साउन ११ गते।
घरभन्दा केही परको उखुबारीमा निर्मलाको निर्जीव शरीर भेटियो। त्यो दृश्यले मान्छेको मात्र होइन, मानवताकै सातो उडायो। तर त्यो विभत्स घटनाभन्दा पनि डर लाग्दो दृश्य त त्यसपछि देखियो।
अपराध अनुसन्धानमा घटनास्थललाई ‘मन्दिर’ मानिन्छ। तर यहाँ रक्षकहरू नै भक्षकको मतियार बने। एउटा अबोध बालिकाको शव नजिक भेटिएको सुरुवाल— जुन बलात्कारको सबैभन्दा महत्वपूर्ण प्रमाण हुन सक्थ्यो— प्रहरीकै हातले पानीमा चोबलेर पखालियो।
के त्यो अज्ञानता मात्र थियो? कि कसैको पाप पखाल्ने नियोजित षड्यन्त्र?
भीड जम्मा भयो। निर्मलाको साइकल, कापी–किताबहरू शवभन्दा केही पर असरल्ल थिए। तर संघर्षको कुनै चिन्ह थिएन। मानौँ, हत्या अन्तै कतै गरेर शव यहाँ सजाइएको थियो।
तर प्रमाण नष्ट गर्ने हतारोमा फरेन्सिक टोली नपुग्दै शव उठाइयो। सत्य त्यही उखुबारीको माटोमुनि सधैँका लागि दबाइयो।
जनआक्रोश बढ्दै गयो।
राज्यले एउटा ‘पात्र’ खडा गर्‍यो— दिलिप सिंह विष्ट। ४१ वर्षीय मानसिक सन्तुलन गुमाएका व्यक्ति।
प्रहरीले तयारी पटकथा सुनायो— “यसैले निर्मलालाई मारेको हो।”
प्रमाणको नाममा च्यातिएको कमिज देखाइयो।
पछि मात्र बन्द कोठाभित्रको सत्य बाहिर आयो।
“यो अपराध स्वीकार गर, हामी तँलाई मासु र रक्सी दिन्छौं, नत्र मारिदिन्छौं।”
एक मानसिक रोगीमाथि गरिएको यो यातना न्याय प्रणालीको अनुहारमा लागेको कालो धब्बा थियो।
तर झूटको आयु छोटो हुन्छ।
निर्मलाको शरीरबाट संकलित (जतिसुकै विवादित भए पनि) DNA र दिलिपको DNA मिलेन।
विज्ञानले राज्यको झूट स्वीकार गरेन। एउटा निर्दोष बच्यो, तर असली अपराधी अझै पर्दा पछाडि मुस्कुराइरह्यो।
निर्मलाको न्याय माग्दा सडक आगो बन्यो।
सिङ्गो देश रोयो। कञ्चनपुरमा नारा लाग्यो—
“सरकार, निर्मलालाई न्याय दे!”
तर सरकारले न्यायको साटो गोली चलायो।
भदौ ८ गते।
१७ वर्षीय सन्नी— निर्मलाका लागि न्याय माग्दै सडकमा उत्रिएका एक किशोर— प्रहरीको गोली लागेर ढले। एउटा हत्याको छानबिन गर्नुपर्ने राज्यले अर्को हत्या गरेर जवाफ दियो।
आज वर्षौं बितिसके।
घटनास्थल नजिकको सेनाको ब्यारेक, बम दिदीबहिनीको घर, पटक–पटक फेरिएका बयानहरू, घटना लगत्तै रंगरोगन गरिएका कोठाहरू, सुरुवाल पखाल्ने प्रहरीहरू र शंकाको घेरामा रहेका ‘भीआईपी’ अनुहारहरू— सबै रहस्यकै गर्भमा छन्।
निर्मलाका बुबा यज्ञराज पन्त— न्याय माग्दामाग्दै मानसिक रूपमा थाकिसके।
आमा दुर्गा देवी— राज्यसँग लड्दालड्दै अन्ततः हार मान्न बाध्य भइन्।
यो कथाको अन्त्य अझै लेखिएको छैन।
निर्मलाको हत्यारा आज पनि स्वतन्त्र हिँडिरहेको छ।
उनको नाममा कार्यक्रम चलाउनेहरू मन्त्री बने, प्रधानमन्त्री फेरिए, कानुनमन्त्री, आईजीपी, डीआईजी सबै बदलिए।
तर नफेरिएको एउटा मात्रै सत्य छ—
“निर्मलाको आत्माले अझै शान्ति पाएको छैन।”
निर्मला पन्तप्रति हार्दिक श्रद्धाञ्जली।उखुबारीले देखेको सत्य
“आमा, म छिट्टै फर्किन्छु”
भन्दै निस्किएकी
एउटी छोरी
घर फर्किन पाइन।
साँझ ढल्दै गयो,
आकाश रातो भयो,
आमाको मन
रातभन्दा गहिरो अन्धकार बन्यो।
चौकीको ढोकामा
आँसु लिएर उभिँदा
राज्यले भन्यो—
“केटासँग होली।”
त्यही रात
न्याय निदायो,
र अर्को बिहान
उखुबारी रोयो।
सानो साइकल,
कापी–कलम,
र च्यातिएको सपना
माटोमा छरपस्ट।
प्रमाण पखालियो पानीले,
पाप पखालियो कि
सत्य डुबाइयो?
उखुबारी जान्दछ।
एउटा निर्दोष बालिका,
अर्को मानसिक रोगी,
र बीचमा
राज्यको झूट।
विज्ञान चिच्यायो—
“ऊ अपराधी होइन!”
तर हत्यारा
भीआईपी मुस्कानमा हरायो।
न्याय माग्दा
सडक आगो बन्यो,
र न्यायकै नाममा
गोली चल्यो।
सन्नी ढल्यो,
१७ वर्षको सपना
रगतमा मिसियो,
राज्य फेरि मौन भयो।
बुबाको आवाज
सडकमा गल्दै गयो,
आमाको आँसु
थाकेर रोकियो।
मन्त्री फेरिए,
कुर्सी सरे,
तर एउटी छोरीको
न्याय अड्कियो।
आज पनि उखुबारी
माटोमुनि सत्य बोकेर
चुपचाप उभिएको छ।
र देशले सुन्न नसकेको
एउटा आवाज अझै गुञ्जिन्छ—
“म निर्मला हुँ,
मलाई न्याय चाहिन्छ।

rajukumarchaudhary502010

दिखावे की प्यास (आशीष की दृष्टि से)
मूर्ख बहुत है दुनिया यहाँ, बस ज्ञान बाँटना पेशा है,
स्वयं सीखने की बारी आए, तो लगता घोर अंदेशा है।
झुककर ग्रहण करे जो विद्या, वह छोटा मान लिया जाता, आशीष, अहंकार की चोटी पर, बोध कहाँ टिक पाता है?

थाली सजी-सजाई मिल जाए, सब उस पर टूट पड़ते हैं, मेहनत की आँच पर पकने से, अक्सर लोग मुकरते हैं। पका-पकाया सत्य चाहिए, खोज की राह से डरते हैं, बिना चले ही मंज़िल पाने की, झूठी कोशिश करते हैं।

खोज रहे सब शांति यहाँ, पर शोर भीतर का भारी है, मौन को सुनने की हिम्मत, क्या हमने कभी विचारी है? शांति का मार्ग कठिन है, पर सब सुख की चाहत रखते हैं, अशांति के कड़वे घूँटों को, अमृत कहकर चखते हैं।

मोक्ष-मोक्ष की रट लगी है, पर मोह का बंधन प्यारा है, निकलना कोई चाहता नहीं, जिसे जंजाल ने घेरा है। आशीष, मुक्त वही है जिसने खुद को, सत्य के साँचे में ढाला है, वरना इस दुनिया ने तो, बस भ्रम का जाल पाला है।

ज्ञान वही जो आचरण में हो, बाकी सब वाचालता है, बिना साधना के सिद्ध हो जाना, बस एक कोरी कल्पना है।

आशीष जैन (श्रीचंद)
7055301422

jainashish0014

दुनिया को बताऊँ तो तमाशा बन जाएगा,
अपनों को कहूँ तो घर उजड़ जाएगा…
इसलिए दर्द को स्याही बना लिया मैंने,
और काग़ज़ को अपना सबसे करीबी बना लिया।

रो कर लिख देती हूँ अपने मन की हर बात,
क्योंकि सुनने वाला कोई होता तो कलम चुप रहती…
मन हल्का हो जाता है काग़ज़ से बात करके,
इतनी-सी तसल्ली भी आजकल बहुत होती है जीने के लिए।

archanalekhikha

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
मैं पागल हूँ, तो फिर ये कैसी शराफ़त
                 पाल बैठा हूँ,

कि ज़िल्लत सह रहा हूँ, और तुझको
                 टाल बैठा हूँ,

मेरा  दिल  साफ़ है, शायद  इसीलिए
               कमज़ोर हूँ मैं,

कि आस्तीन में अपनी, मैं अपना ही
                काल बैठा हूँ,

मेरा बस चलता तो, अब  तक उसे
          मिट्टी में मिला देता,

मगर वो  शख्स अच्छा  है, ये  कैसे
              ढाल बैठा हूँ.?

हवस  होती  तो  शायद  कब  का
         तुझको छीन लेता मैं,

मगर  इस  पाकीज़ा  उल्फ़त  का
         लेकर जाल बैठा हूँ,

वो  मेरे  सामने  तेरा  हाथ  थामे
             घूमता है अब,

और मैं कम्बख़्त उसकी नेकी का
            मलाल बैठा हूँ,

बड़ी रुसवाई है इसमें बड़ी ज़िल्लत
               की ये हद है,

कि एक शरीफ़ की खातिर अपना
       कफ़न डाल बैठा हूँ…🔥
╭─❀💔༻ 
╨──────────━❥
♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
#LoVeAaShiQ_SinGh
╨──────────━❥

loveguruaashiq.661810

people want to look down others. but I am not going to afford them to do it.

kattupayas.101947