सुकून छीन कर इस मोहब्बत ने जीना सिखाया,
हर टूटी साँस में नया हौसला जगाया।
जो ख्वाब आँखों में दीप बन कर जले थे,
उन्हें आँसुओं की बारिश ने राख बनाया।
कभी सोचा न था दर्द भी कोई भाषा होगी,
जो चुप्पियों में दिल से दिल तक जाएगी।
मुस्कान जो लबों की मेहमान थी कभी,
वो अब यादों के शहर में धुंध बन जाएगी।
तुम जो चले गए तो ये दुनिया बदल गई,
रातों ने दोस्ती की, नींद दुश्मन हो गई।
हर सुबह आई तो बोझिल नज़र लेकर,
हर शाम मेरे जिस्म पर स्याही बन गई।
मैंने मोहब्बत में खुद को यूँ खो दिया,
कि आईने भी मुझसे सवाल करने लगे।
तेरी तस्वीरें तक नम आँखों से कहती रहीं,
“हम थे जो तेरे हर दर्द के गवाह बने।”
कभी तुम्हारी हँसी में खुद को खोजा,
कभी तुम्हारी ख़ामोशी में अपना नाम पढ़ा।
तुम्हारी हर एक बेवफाई की इबारत ने,
मेरे सब्र के पन्नों पर सबक लिख डाला।
हाँ, टूटा हूँ पर बिखरा नहीं हूँ अभी,
दर्द ने मुझे पत्थर नहीं, फौलाद किया है।
जो आग थी तेरी जुदाई के सीने में,
उसी आग ने मेरे ख्वाबों को आबाद किया है।
अब सुकून की आदत नहीं रही मुझे,
मैंने अश्कों को ही अपना तकिया बनाया।
जो तन्हाई थी कभी सबसे बड़ी सज़ा,
उसी तन्हाई ने मेरा घर सजाया।
सीख लिया है मैंने अंधेरों में चलना,
परछाइयों से रोशनी उधार लेना।
तेरे जाने के बाद जो खालीपन था,
उसे खुद से भरना, खुद को सहलाना।
मोहब्बत ने छीन लिया मेरा बेफ़िक्र बचपन,
पर मुझे जिम्मेदार दिल का हुनर दे दिया।
जो टूटकर भी धड़कता रहा सीने में,
ऐसा दिल इसने मुझे अमर कर दिया।
अब तुम नहीं, पर तुम्हारी यादें हैं,
कभी ज़हर, कभी मरहम बन जाती हैं।
और मैं हर रात एक नई कविता बनकर,
अपने ही दर्द से दोस्ती निभा जाता हूँ।
सुकून छीन कर इस मोहब्बत ने जीना सिखाया,
ये बात अब शिकवा नहीं, सच बन गई है।
जो दर्द था कभी मेरी हार का पैग़ाम,
आज वही मेरी सबसे बड़ी पहचान बन गई है।
आर्यमौलिक