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AbhiNisha

AbhiNisha

@abhinisha
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कविता
तुम मिलो मुझसे



दिल के दर्द संभाल नहीं पा रही हूं
मिलो तुम आकर मुझसे
अभी की अभी

मैं जिंदगी से दूर मौत की बहुत ही करीब हूं
अगर तुम मुझे अभी मिलते हो तो
शायद मैं सोचूं फिर से जी उठने की




जिंदगी से कोई उम्मीद नहीं
मैं रुकी हुई घड़ी की सुई की तरह
कब तलक रुकूंगी पता नहीं
मिलो तुम मुझसे अभी की अभी


शायद तुम्हारे साथ चल परू टूट कर वही विखरने की जगह





यह दुनिया दुनिया मेरे किसी काम की नहीं
मेरा यहां कोई भी अपना नहीं है

बस उम्मीद है मोत मिले
और उम्मीद है मौत से पहले तुम मिलो मुझसे



कहानी हमारी कभी शुरू हुई ही नहीं
पर मैं चाहती हूं
तुम मिलो मुझसे
और इस कहानी को अंत दो


यह अजीब बात है
जो कहानी कभी शुरू हुई ही नहीं
उस कहानी को अंत देना




पर मेरी कल्पनाओं की दुनिया एक कहानी है
जिसमें तुम हो हकीकत की तरह
और मैं चाहती हूं
हकीकत बन तुम कर लौट
आओ तुम मेरे पास मेरे अंतिम समय में ही


मुझे डर नहीं कि मेरे साथ क्या होगा
पर अफसोस है कि कहीं मैं सारी कहानियां
अधूरा छोड़कर ना मर जाऊं




कौन कैसा है
किस लिए हर दिन मैं मर से जाती हूं
जीते जी शायद इस बात का पछतावा
मुझे अंतिम दिन ना हो
पर इस बात का पछतावा होगा
तुम और मेरी कहानी दोनों अधूरी रह गई

इस पल में
मैं सचमुच में मर जाना चाहती हूं
बिना कोई अफसोस के खुद की जान लेना चाहती हूं
पर उससे पहले मैं चाहती हूं
तुम आकर मिलो मुझसे

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कविता
बस देख रही हूं



मुझे किसी से शिकायत नहीं
बस मुझे रोना आ रहा है
मैं जानती हूं कि मेरी जुबान कर्वी है


मैं किसी की कोई काम की नहीं
मैं डायरेक्ट सुनती नहीं
मैं सुनने के साथ सवाल भी करती हूं

यही बात किसी को पसंद नहीं

लोगों को और पेरेंट्स को
वह लोग वह बच्चे पसंद आते हैं
जो बिना सवाल कि उनकी बातें बस सुनता रहें
जो वो कहे वही करता रहे


पर मैं वह नहीं हूं
इसलिए अनदेखा की जा रही हूं
इसीलिए प्यार से दूर हूं


यहां हर चीज में सौदावाजी है
आप अगर उनकी सुनते हैं
तभी आप प्यार की हकदार हैं
तभी आप स्नेह और देखभाल की हकदार हैं



मैं लोगों के लिए किसी काम की नहीं रही
इसीलिए मैं लोगों के दिलों में अपनेपन की हकदार नहीं रखती



क्योंकि मैं एक गुड़िया बिल्कुल नहीं


बड़ी दिलचस्प बात है
खुद को इंसान कहना ही भूल गई
लोगों की बदलती हुई व्यवहार को देखकर




मुझे शिकायत नहीं है
ना ही अफसोस है
लोगों के बदलने पर
या खुद को बचाने की कोशिश करने पर


बस तकलीफ हो रही है
सब कुछ जानकार भी
लगता है काश अनजान राहते


मैं औरों की तरह ही
एक कठपुतली बनी रहती

जो चाहे जैसे ना चाहता
थोड़ा स्नेह तो दिखता





बस मैं देख पा रही हूं
अपनों के बीच में बेगैरत खुद को
कुछ नहीं कहे रही
नहीं सवाल कर रही हूं
नहीं जवाब मांग रही हूं

मैं जानती हूं कोई फायदा नहीं
मेरे चिकने और चिल्लाने से

सब अपने कानों में रूई लगा ली है
मेरी आवाज सुनने से डरे हुए हैं


सब अपने-अपने काम में लगा हुआ है
उनके लिए उनके काम के लोग हैं
उनके अपने हैं
मैं भला बेगैरत मेरी बात कौन सुनता है
अच्छा है की इग्नोर करता फिरें
मेरे दर्द कौन समझता है


सच्चाई मेरी जुबान से भी ज्यादा कर्वी है
और इस सच्चाई को स्वीकार करना दर्दनाक है

और सच्चाई के साथ जीना
घायल दिल पर पत्थर रख देना जैसा है

और अंजान बनने की कोशिश करना
इस पत्थर नुमाऐ भार को और भी बढ़ा देना है






सच्चाई सचमुच में बहुत ही कड़वी होती है
जिसे हम कभी-कभी स्वीकार तो कर लेते हैं
पर
उसके साथ जीना बहुत ही भारी है

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वे गमों के दोनों
कविता गीत


हु। ,

खोई नहीं मैं इस रंग रलियों में
फसा नहीं मैं इश्क की तंग गलियों में

हवा जैसी बेहती ईत्र जैसे महकी
गुलाब जैसे मशहूर थी


फिर भी उम्र कटी तनहा है मैंने
अकेलेपन में खोया रहा
अपनी ही दर्द में सोया रहा

वक्ति ही नहीं निकाल पाया हमने चाहत की



खुद की गमों में मशगुल थी इस तरह की
थी किसकी नजर पाखी
देखा ही नहीं कभी



सोई नहीं मैं महबूब के पल्को तले
जागी भी नहीं मैं किसी के इन आंखों में ख्वाबों को लेकर


धड़कता दिल खुद थम सा गया
मेरे इन आंखों में मेरे लिए ही है दया


खोई नहीं मैं इस रंग रलियों मे
फसा नहीं मैं इश्क की तंग गलियों मे



मेरे इन आंखों में मेरी यादें हैं
चंचल मन खुद को खुद में संभाले
खुशियां आधे हैं


वे गमों के दिनों
वे रास्ते बिन आसरे की
यादें मेरी थके ख्वाबों की



बस सोच है बिना लालसे की
घड़ीया बिती उम्र बिता इश्क के दिनों की
बस रह गई मैं मेरे दर्द के साथ
बिते यादों के लिए
बिना आसरे की खुद को संभालते हुए

मैं यहां मेरे गम मेरे दर्द के साथ
मेरे बेचैन धड़कन अब है शांत





गजल

धड़कन अब भी है सीने में
और वह धड़कता भी है
पहले की तरह वह अब भी अपने ही दर्दों की सोर से भरा हुआ है

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मैं हुं यहां
कविता


मैं हूं यहां
अगर रोना चाहते हो तो मेरे पास आओ
बैठो रोओ
आओ मेरे साथ रोओ


रोना कमजोरी की निशानी नहीं
रोना भावनाओं को बयां करना है

तुम्हें मैं गले से लगा कर रखना चाहती हूं


तेरे साथ रोना चाहती हूं
तेरे साथ ही हंसना चाहती हूं
तेरे साथ जीना चाहती हूं
तेरे ही साथ मरना चाहती हूं
एक तुम ही हो
जिसे मैं अपना कहना चाहती हूं
जिंदगी की पूरे सफर में तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं

जिंदगी की कोई घड़ी ऐसी नहीं है जो
मैं तेरे साथ नहीं चाहती

फिर आंसू आंखों में रोकें क्यों रखा है तूने
आओ मेरे साथ रोले


खुद को बयां कर
और आओ खुद से मैं तुम हम हो ले

खुशी हो या गम
मेरे साथ बैठो मैं हूं ना
तेरे साथ जिंदगी भर के लिए
तुम्हारे गम सुनाने के लिए
तुम्हारे दर्द जाने के लिए

तुम्हारी खुशी को महसूस करने के लिए
मैं हूं ना
तुम्हारे साथ जिंदगी भर के लिए



आओ मेरी बाहों में सो लो
मैं नहीं कहती की दर्द हो रहा है तकलीफ हो रहा है
उसे भूल जाओ

मैं बस ऐ कहती हूं
तुम्हारी दर्द तुम्हारी तकलीफ में
तुम्हारी तन्हाई में
तुम मुझे भी शामिल करो


हमेशा हरदम सांसों की तरह
अपने दर्द को मुझसे साझा करो


मैं उम्मीद की कोई किनारा नहीं हुं
जो कहूं
तुम्हारी जिंदगी में
तुम्हें खुशी दूंगी
तुम्हारी टूटी हुई सांस हूं


मैं बस हूं तुम्हारी साथी
तुम्हारे हर दर्द गमों में तुम्हारे साथ
तुम्हारी खुशी तुम्हारी टूटी हुई सांसों में
जीने की नई उम्मीद लेते हुए


तुमसे बस मैं यह कहूंगी
मुझे तुमसे हिम्मत मिलती है

और मैं चाहती हूं
तुम मिलो मुझसे हर उस वक्त में
जब तुम्हें तकलीफ हो
तुम मिलो मुझसे हर उस वक्त में
जब तुम्हें लगे की दर्द ज्यादा है
पर उसे बयां नहीं कर सकते


क्यों कि उससे भी ज्यादा मर्द होना है
तो मिलो मुझसे
और छोड़ दो मर्दानगी
जो यह कहते हैं की
मर्द रोते नहीं
बस मेरे सामने तुम रो लो
तुम्हारे साथ तुम्हारे गमों में मैं भी रो लूंगी





मैं आपकी प्रिय लेखक अभीनिशा ❤️🦋💯

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कविता
सांसे चल रही है थम थम कर



सांस थम रही है जिंदगी कट रही है
मंजिल अभी बहुत दूर है

कभी-कभी लगता है सांस रोक लु
और आखिरी वक्त को महसूस करु
और उस वक्त मैं सोचूं कि मैं कहां हूं

ऐसा लगता है कि
मैं इस वक्त में भी यही हूं
कहीं-कभी पहुंचा ही नहीं
अभी तन्हा अकेला टूटी हुई
अपनी कमजोरी पैरों पर रोती हुई




तो
कभी-कभी लगता है
मैं आंखें बंद कर लूं
और सो जाओ
और किसी सुनहरी सपनों में खो जाऊं
यही मेरी मंजिल होगी

जिस चीज की मुझे शौक है
वह कहानी है
मेरे सपने भी तो हर एक नियंत्र दिन
एक नई कहानी मेरे सामने लाता है
तो क्यों ना मैं उसे ही देखती रहुं
उसकी ही किरदार बनाकर जीते हुए जिंदगी बिता दु

बिना कोई जोखीम लिए
बस उम्र ही तो बितानी है
बिना कोई खुद की जिम्मेदारी उठाएं
वहां जीते रहो जहां मैं खुश रह सकूं


तो
कभी-कभी लगता है
हां मुझे कहानियों का शौक है
बस देखने की नहीं लिखने की भी

हां मैं जानती हूं कि
मैं अपने सपनों में रचयिता नायक दर्शन दर्शक सब हुं


पर यह क्या काफी है
इस बेकार जिंदगी को बिता देने के लिए
बस सपने हैं
जहां मैं अपने सब कुछ हूं


बहुत सारे सवाल है
खुद को बेकार समझते हुए


कभी-कभी लगता है कि
मैं आलसी हूं
मैं करना ही नहीं चाहती कुछ भी


तो कभी-कभी लगता है
कि मुझसे होता ही नहीं
मैं आलसी नहीं हूं बस थक गई हूं

इस जिंदगी से
हर दिन एक जैसे दिन गुजर से
मैं थक गई हूं

खुद ही से



तो कभी-कभी सोचता हूं कि
मैं कब तक थकी ही रहूंगी
यह थकावट कभी खत्म होगी भी या नहीं
सालों बीत गए हैं इसी हाल में
और एक ही सवाल में



मैं क्या कर रही हूं
क्यों कर रही हूं
मुझे सोते रहना क्यों है

मैं खुद को इस थकावट से
आजाद क्यों नहीं कर पा रही

हालांकि मुझे बहुत सारे सवालों की जवाब भी पता है
फिर भी दर्द हो रहा है
मैं निकल नहीं पा रही दर्दनाक जंजीर से


मुझे बोरिया फिल हो रही है
मुझ में धैर्य नहीं है
फिर भी रोज-रोज एक ही काम कर रही हूं
सो कर उठना
और फिर छोटे-मोटे काम करना
और फिर बेकार जिंदगी गुजारने के बाद
फिर से सो जाना


यह वक्त की बर्बादी और खुद की भी है
मैं दोनों बर्बाद कर रही


कभी-कभी खुद पे गुस्सा आता है
कभी-कभी दया



मैं क्या करूं
मैं चाह कर भी खुद को मेंटेन नहीं कर पा रही
मैं खुद को और अपनी जिंदगी को बेकार जाने से नहीं रोक पा रही



सांसे चल रही है थम थम कर
जी भी रही हूं घुट घुट का
अभी यह आलम है कि
जिंदा होकर भी लाश की तरह महसूस हो रही है

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कविता
काश उन लोगों में मेरे अपने ना होती



मैं लोगों को जानती हूं
इसलिए सवाल नहीं करती कि लोग इतने बुरे क्यों होते हैं
पर कभी-कभी सोचती हूं
काश उन लोगों में मेरे अपने ना होती


पर अफसोस यह सच है
हद से ज्यादा दुख दर्द अपने ही देते हैं



जिसे हम अपना कहते हैं
कभी-कभी वही सबसे ज्यादा कुड़ और निर्णय होते हैं
इतना की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता



चोट लगने के बाद थकने के बाद
हम हमेशा अपनों के छाया ढूंढते रहते हैं
उम्मीद करते रहते हैं
अपनों के सहारे की

पर कभी-कभी वह छाया देने वाले जगह ही
किल और नोकीलि पत्थर से बनी होती है


वह उम्मीद सहारे की मेहेश हमारे मन की कल्पना होते हैं सच्चाई बिल्कुल नहीं

सहारा तो मिलता है
पर उन में
इतनी नफरत इतनी ईर्शा होती है
की
कोई कभी सोच भी नहीं सकता
कि
सचमुच में वह अपने हैं


जिसके पास हम
हमेशा दिल टूटने के बाद दर्द होने के बाद लौटाना चाहते हैं
जैसे हम अपने कहते रहते हैं
क्या वह अपने हैं
जो इतना बुरा भी हो सकता है
और इतनी मतलबी भी


हंसते हुए चेहरे मीठी बातें
चेहरे देखकर बातें सुनकर
लगता नहीं की वह हमारे अपने हैं जिसके अंदर
हमारे लिए इतनी नफरत भरी हुई है



मैं आपकी प्रिय लेखक अभिनिशा❤️🦋💯

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मैं बैराग सही
गीत




लड़का

तू जो कहेगी सच वो ही तो होगा
तूने कहा तो मैं बैराग सही

हु। हु। हु हु 3
हु

भटका मैं यहां वहां
कहीं ना रहे सका
तेरी आंखों में रहकर गुजार दी जिंदगी



तू जो कहेगी सच वो ही तो सीही
तूने दिया दर्द दिल को सहारा



लड़की

मिल गया भटकी नाऊ को किनारे


हु। हु। हू हु। 3

हु


लड़का

पंखुड़ी जैसे होठों को चुम कर
गया में पिघल
तेरे ही बातों में
तेरे ही जज्बातों में गया ना डल




लड़की

हु। हु। । हु हु
ओ हो हो हो हो
। ओ


और आओ पास देखूं जी भर तुमे
बना लो तुम्हें अपनी खास


हु। हु। हु। हु। 2
। हु
हा

मेरी उलझी लटो को सवार दो
मेरे कंधों को छूओ और मुझे प्यार दो


तूने जो कहा वही है सही
तेरे बिन सांसों में है नमी




लड़का

हु। हु। हु हु। 3
हु
तूने कहा मैं बैराग सही



लड़की

पर तेरी साथ मिलकर
मैं तेरी राग बना गई



लड़का।

तेरे साथ मिलकर



लड़की

तेरी आंखों में खिलकर मैं तेरी राग बन गई
तेरी चांदनी रात बन गई

हा

बात बन गई जज्बात बन गई
और आई सुबह नई
तेरे दिल में समा कर
तेरी हालात बन गई

हु। हु। हु। हु



लड़का
हु। हु। हु हु।
हु

तू जो कहेगी सच वही तो होगी
तूने कहा मैं बैराग सही


दोनों ‌‌,

तेरे दिल में था तेरा कल भी
तेरे दिल में मैं तेरी आज सही


हा। हा। हा। हा

तुम्हारी हम्हारी ख्वाइशे पास रहने की जनुन



लड़की

सांसों से तुम हो मेरी जरूरत से



लड़का

हु। हु। हु हु2
हु
एक तेरा ही नाम रुह को जगाता है
तुममें खोकर दिल जिंदगी बिताना चाहता है


लड़की

हा
तेरा ही नाम रुह को जगाती है
तुममें खोकर दिल जिंदगी बिताना चाहती है




हां
तू जो कहा वो एहसासे सही
तेरे नाम की सौ साल बाद भी
मैं हो गई दीवानी तेरे



लड़का

हु। हु। हु। हु2
हु
तू जो कहेगी सच वो ही सही


दोनों
। हु। हु। हु। हु 2
। हु


हा तू जो। कहें




अगर यह गीत अच्छी लगी तो आगे बढ़ते रहिए
मैं आपकी प्रिय लेखक अभीनिशा ❤️🦋💯

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राजा उसके मंत्री और उसके भक्त
कविता


1
नफरत इतनी गहरी है उन्हें आम लोगों से कि
वह आम लोगों को देखना भी नहीं चाहते हैं
आम जनता अपने गरीबी भुखमरी बीमारी महंगाई से मर जाएं
उन्हें फर्क नहीं पड़ता



उन्हें डर इतना गहरा है
उन्हें पढ़े लिखे आवाम से
वह उन से बात करना भी नहीं चाहता
नहीं उनकी बातें सुनना चाहता है

बस चाहता है किसी तरह से
इन्हें दबाकर गायब कर दिया जाए
क्या मार दिया जाए
उनके लिए चुनौती खत्म हो जाएंगे
सत्ता पर बैठे रहने की


और अहंकार इतना गहरा है की
अपनी ही गलतियां मनाना नहीं चाहता
नही तो कोई जवाब दे ही है
अपने गुनाहों की



उसका सर ऊंचा है आसमान से भी ज्यादाहै
उसका सीन 56 इंच की
और उसका अहंकार देश और आराम से भी बड़ा है



इस नगरी में एक ऐसा राजा है
जो बस अपने ही मौज में रहता है
उसे अपनी प्रजा की परवाह नहीं
उसकी करनी ऐसा है
जो हमेशा आम आबाम से भगत फिरता है
छुप फिरता है


भगवान दर्शन नहीं देता
बस भगवान की चर्चा होते हैं
वो राजा खुद को सच में भगवान बताता है
अपनी आलोचना साहनी की उसकी ताकत नहीं
ना ही आबाम के सामने आकर अपनी गलतियां सुनने की हिम्मत है




कोई उसके खिलाफ बोले तो
उसे राजा की बनाई बनाई जेल में डाल दिया जाता है
स्वतंत्र होना विद्रोह है
उसे देशदोरही बताया जाता है


और आतंकवादी बताकर गायब कर दिया जाता है या मौत के घाट उतार दिया जाता है




इस नगरी की राजा की कुछ मंत्रिमंडल भी कोई काम नहीं है
वह भी राजा की पाप में कंधों से कंधे मिला कर चलता है
बिना प्रवाह की अंजाम का
वह अपने ही नगरी को बर्बाद करने की ठीका ले रखा है



2


और अभी है कुछ लोग ऐसे इस नगरी में
जो उस राजा की गुण गाता है
अपने आंखें बंद करके बैठा है
सच को सुकारना नहीं चाहता

अपने ही मंग्रट कहानियों में अपने राजा को नायक बताता है
और खुद को उनका प्रिय सेवक

वह अनदेखा करता है
अपने राजा के हर गुनाह हर गलतियों को
वह चाहता ही नहीं की
हकीकत उनके हिसाब से अलग हो

वह मानना चाहता ही नहीं कि
उसका राजा यह एक ऐसा सूअर है
जो पूरा राज्य को गंदा कर रहा है


और इस सूअर की गंदगी में भागीदरी
वह कुछ अंधे प्रजा भी है
जो देखकर अभी अनदेखा करता है




3

शायद इसलिए उनके घर में आप तलाक रोशनी है
अंधेरा तो किसी और का घर हुआ है

उनके दिए अभी तलक बुझे नहीं
उसके घर अंधेरा हुआ नहीं
शायद उसे शगुन मिल रहा है
दूसरों को बर्बाद देकर तो और लाचारी देखकर

पर शायद वह जानते नहीं
वह दिया जिस घर के बुझ चुके हैं
हवा की झोंके से


वो घर तुम्हारे घर के बीच में कुछ ही दूरी है
आंधी आई है तू
सहरें गी तुम्हारे दीवारे भी

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निराश दिल


निरास दिल उलझा हुआ है
उम्मीद नहीं है
दर्द से भरा हुआ है
भावनाएं सुन्य है
मर जाने का मन करता है
फिर भी न जाने क्यों
मरने के बाद उठने का मन करता है
मरने के बाद की जिंदगी देखने के लिए

क्यों नहीं समझ में आता

क्या अब भी जिंदगी से कोई उम्मीद है
जिंदा लाश की कि तरह बस एक जगह पडी हुई हुं
क्या इस लास में हलचल हो रहा है
इतनी हार इतनी ठोकर इतनी थकावट के बाद भी

निराश दिल उलझा हुआ है
उम्मीद नहीं
फिर भी आंखें बात करने के बाद भी
जिंदगी जीते रहना चाहता है
न जाने क्यों

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एक अहंकारी राजा


राजा को अपनी कुर्सी इतनी प्यारी है कि
उसे अपनी है साम्राज्य की कोई परवाह नहीं

पर राजा भूल गए हैं कि
जब तलक साम्राज्य में लोग है
तभी तक वह राजा है

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