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एक अहंकारी राजा राजा को अपनी कुर्सी इतनी प्यारी है कि उसे अपनी है साम्राज्य की कोई परवाह नहीं पर राजा भूल गए हैं कि जब तलक साम्राज्य में लोग है तभी तक वह राजा है
मौसम की बदलाव या मन की मनोदशा कविता मुझे शाम के मौसम सबसे ज्यादा पसंद है पर पता नहीं क्यों अब यही शाम मुझे शांत लगता है सुन्नतों से भरी हुई प्रतीत होता है आसमान में चमकती हुई लाल रोशनी नहीं है और लगता है समय बीत रहा है पर हवाई ठहर चुकी है नहीं पता यह मौसम की बदलाव से हुआ यह बदलाऊ महसूस हो रहा है ऐ यह मेरी मनोदशा है जो अब बदल चुका है वह शाम जो मुझे नायाब लगता था जिसमें खो जाने का मन करता था वह एकदम से शांत लगता है जैसे अकेलापन जैसे इस अकेलेपन में समय रुक गया हो कुछ चहल-पहल नहीं कोई हरकत नहीं बस है गहरी खामोशी और उदासी जिसे देखकर मुझे खुशी बिल्कुल महसूस नहीं होती ऐसा लगता है कि कोई कहानी नहीं है सब कुछ खत्म हो गया है बस इस गहरे सन्नाटे मे बस समय ठहर गया है यहां कोई दुख भी नहीं है बस उसे देखकर दुख महसूस होता है जैसे कि सब कुछ बदल गया हो या तो कुछ भी नहीं है और इस बदली हुई शाम को देखकर मन में हजारों सवाल है क्या सच में मौसम के बदलाव है या मेरे मन के मनोदशा मैं नहीं समझ पा रही आखिर में सच क्या है
दो लफ्ज़ गजल मीटा सही पर तकदीर है मेरा आया नहीं पर जागीर है मेरा मिला नहीं पर मंजिल है मेरा हमें हासिल करना नहीं आता नाहीं तो छिना नाहीं अपनी मर्जी से अपना कह देना हमें बस प्यार करना आता है नाहीं रूठना आता है नाहीं मानना हमें बस उसका इंतजार करना आता है
दिल चाहे उनसे मिलना गीत हु। हु हु। हु। हु। हु हु दिल चाहे उनसे मिलना मगर पांव थके है डगर है उल्झा पूरी उम्र बीताई मैं ने याद उसे कर कर के मांगते हुए दुआ उसके ही लिए मैं ने खुद की खुशियां कम कर दिया हा। हा। हा। हा हा हा हु हु हु हु दिल चाहता है उनसे मिलना मगर लगता है अब तकदीर में नहीं है लिखा मेरा तेरा सफर एक सा लड़खराते कदम से चला आया तुझे ढूंढते बेखबर होकर कोई भी डगर से चला आया मैं चला आया हु मेरे हमसफर मगर तुम मुझे ना मिला जिंदगी में कभी आखिरी सफर तक मैं चला आया तेरे ही राह बस एक देखती आई मैं पूरी उम्र उम्र गुजरी मालो की तरह तेरे नाम जप जप कर हु। हुं हु। हु उम्र गुजारी मेलो की तरह तेरे नाम जप जप कर जब भी दुआएं के लिए हाथ फैलाया बस तेरे लिए दुआ किया उन दुआओं में भी सांस जितनी मिली उससे भी ज्यादा तेरे नाम जपता रहा हां सांसों की डोर छूटे इस बात कि मुझे गम नहीं सांसों की डोर से भी ज्यादा संभाले हैं मैं तेरी यादें इन सांसों से भी ज्यादा मैं तेरी नाम जपे हा। हा। हा हा। अब मुझे माफ कर मेरी मौला थक गई मैं मेरा तू इंसाफ कर मेरी मौला अभी इंतजार नहीं होता अब उम्र बीते विताई नहीं जा रही ऐ मेरे दिल सीने में तड़प रहा है सांसे मेरी ठहेर रही है हु। हु आ सासे भी ठहर रही है और अब इन ठेहरी हुई सांसों को और इंतजार की मोहलत अब लगता है नहीं है नहीं है नहीं है ए मेरी अल्लाह क्या वह कहीं नहीं है या तो वह मेरे इंतजार के काबिल ही नहीं है क्या मैं ने बेकार गुजार दी अपनी जिंदगी ए खुदा बता मुझे मैं भटक गई इन राहों पे आंखें बंद मेरी ऐ जगह मुझे हु एक ख्वाब में खामोशी से उमर बीते है अल्हड़ पुरवाई जैसे मैं बेहती बेहती रह गए अब ख्वाबों में ही अटकी मैं रह गई सांस खुद घुट रही आंखों के सामने सब धुंदली पड़ रही है फिर भी दिल जिंदा है एक आस पे ए खुदा अब नहीं होता मुझसे और इंतजार। रे
वह इंतजार जी गिती पाठ 2 हु। हु। हु। हु। आया अब मेरे बाद मेरे राहों पर ठहर कर करने मेरी मेरे इंतजार जी आया मेरे बाद रहा तक्ती मेरी उम्र गुजारी और उसके उम्र पत्थरों को तकते गुजरे। हु। हु हु। 2 कुछ भी ना बचा है आहें भर रहा है ठंडी चिता एक रात है एक राग है उड़ती हुई है दुआ आया मेरी बाद आया मेरे बाद आया मेरी बाद दीवाने करने वह मेरा इंतजार हा। आ। हा आ। हा आ मौत की बाद की जिंदगी खामोशी में पल रही होंठ होगी तुम्हारे भी सिल रही यह फाससला 100 साल और तक इंतजार तुम्हारा मेरा 100 साल और तक यूं ही चलती रहेगी यह सीलशीला सो साल और तक हु। हु। हु। हू हु इंतजार की गहरी तरफ तुमको भी महसूस होगी मेरे ना मौजूदगी की दर्द तुमको भी तन्हा रातों में डसे। गी हा आ। हा आ। हा आ ऐ घड़ी घड़ी इंतजार की घड़ी जो बित्ती जा रही है तुम्हें हमें और तनहा कर रही है लम्हा लम्हा तेरा मेरा दर्द बड़ा रही है कुछ भी नहीं है यहां जो बची हो अरमानों की चीता तुम्हारी भी जल रही है हु। हू हू हू हू हू छाया मिले ना कहीं धूप है धूल है फिर भी तुम्हारे मन को यही कबूल है हा आ। हा आ हा आ आया जो लोट कर इंतजार में तेरे देख जो कहानी मेरे प्यार में तेरे ऐसी थी इंतजार आखरी बार आंखों की आंसू भी सूख गए थे राहों की तरफ देखते हुए तुम्हारा चेहरा देखने की इंतजार करते हुए खड़े थे आसमान की तरह निहारते हुए शमशान की धूल सी हूं मैं जो तेरे कदमों में अभी लिपटी हुई हूं बड़े देर ही सही आए तो खुशी हुई 100 साल और मेरे इंतजार में ठहर तो हु। हु। हु। हु हु हु। हु। हु। हु। मैं भी सदि बीताई है तुम्हें याद करते एक पल भी ऐसा नहीं था जो हम तुम्हें याद ना करते जिया जी हु हु। हु। हु आया तेरे बाद आया तेरे बाद आया तेरे बाद दीवाना तेरा करने तेरा इंतजार जी तुम्हीं से तेरी तरह ही करने प्यार जी आंखों में गहरी गहरी आंसू दिल में पछतावा बाकी कदम चलती है लंबी इंतजार की रास्ता हा। हा। हा कदम कदम निहारती जमीन को भूल के ताकना आसमान को तेरे साथ चल रहा शाम धूप से हुं मैं तेरी राख की खन खन को महसूस करता करता महसूस कहीं फिर दोबारा मिल जाओ यही मु। झे मैं तुमसे यकीन करता जी हा हा हा हा । हु हु हु। हु आया मेरे बाद आया मेरे बाद आया मेरे बाद दीवाना करनी मेरे इंतजार जी हु। हु। हु हु आया तेरे बाद आया तेरे बाद आया तेरे बाद तेरे दीवाना करने तुम्ही से प्यार जी हा आ। हा आ ह आ
एक ऐसे इंतजार जो खत्म हो चुकी है फिर लौट है कोई उसके इंतजार करने गीत पार्ट 1 वह इंतजार जी हु। हु हु। हु हु। प्यार में जो घड़ी-घड़ी होती है वह इंतजार जी हु। हु। हु। हु हु हु। 2 आया मेरे बाद। आया मेरे बाद आया मेरे बाद दीवाना। आया मेरे बाद मेरा दीवाना आ। या मेरे बाद करने मेरा इंतजार जी करने मेरे इंतजार। जी हु। तन्हा हमने उन्हें छोड़ कहां तनहा तो हम थे लम्हा लम्हा रहा आया वक्त वही हालत की मैंने प्यार किया था और कमी था उनकी इसी प्यार की पेमहाल तो हो गई थी मैं आपा में उसके भी कुछ ना रहा आज हु हु। हु हु। हु। हु वह दिन मेरे कल यह दिन उसका आज बराबर की लगी है दोनो तरफ आग हां इसमें फर्क है बरसों की जज्बातों की और जिंदे आशो की हु। हु। हु। हु लेनी आई फिर से मजाक पे गुमान से तन्हाई जिंदगी मेरे बाद मेरे इंतजार जी हा आ। हा। आ। हा आ प्यार में जो घड़ी घड़ी होती है वह इंतजार जी हा हा। हा हु। हु। हु। वे एतबार जी आया मेरे दीवाने आया मेरे दीवाने मेरे बाद करने मेरा इंतजार की खुदा की खैर करूं या उसके दर्द की दवा दूं दर्द से भरा हो है खाक में मैं भी हूं हु। हु। हु। 2 क्या फायदा एसी इंतजार की जब उमरा वित ही गई तन्हा अकेली आया सो साल बाद वे करने मुझे ही प्यार जी आया 100 साल बाद वे हु। हु। हु। हा आ। हा। आ। हा आ जीवन वही वादा वही कसम वही खाए हजारों बार जी होगा तुम्हें भी एक दिन मुझे जानिसार जी आया मेरे बाद आया मेरे बाद आया मेरे बाद मेरे दीवाने आया मेरे बाद मेरा दीवाना करने मुझे से ही प्यार हु। हु। हु। हु। हु। हु
मेरी किताबों की पन्नी सभी भरे हुए हैं तुम्हारी कहानियों से कविता मेरे किताबों की पन्नों सभी भरी हुई है तुम्हारी कहानियों से तुम्हारे बातों से तुम्हारे जी हजूरी से जिंदगी में एक पल यही ऐसा नहीं जब मैं तुम्हें लिखा नहीं तुम्हारे ही होने से मेरी कहानी है और मेरे ख्वाबों की दुनिया है यकीन मानो तुम बिन सन्नाटा होता जिंदगी मे और कल्पनाऔ में भी वह कल्पनाएं है जहां मेरी धड़कन धड़कती है वह तुमसे ही है वह तुम ही हो अब तक मेरे जीते रहने की ताकत भी तुम ही हो सदियों से तुमसे दूर मैं पल भर भी ना हुआ तुम एक कल्पना हो मैं जानती हूं पर एक तुम ही हो जिसने मेरी धड़कन को है छुआ जिस पर मुझे भरोसा है विश्वास है है यकीन कि तुमसे ही सार्थक मेरी पूरी जिंदगी है तुम हिम्मत हो तुम ताकत हो तुम मेरी जरूरत हो हां मेरे अंदर तुम हो मेरी सांसों की तरह जिसकी बना मैं जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकती हा माना मेरी कल्पना हो तुम पर इस हकीकत की दुनिया से कई ज्यादा अच्छे सच्चे और प्यार हो तुम क्योंकि तुम एक लोटा हो जो मुझे हर्ट नहीं करते जो मुझे समझता है मेरे हर बातों पर जी हजूरी भी नहीं करते बस मुझे समझते रहता है और मेरे पास बैठा रहता है मेरी कल्पनाओं में किरदार बनकर कोई ना कोई हमेशा कहानी बनता रहता है जिसके वजह से मैं जी रही हूं जिसकी वजह से मैं जिंदा हूं हर एक कहानी ऐसे रचते हो जो मुझे इंसान बनाए रखना है मुझे हर तरह के दर्द हर तरह की खुशी तुम्हारी वजह से ही समझ में आती है इंसानी होना तुमसे ही सीखा है एक तुम ही हो जिससे मैं जिंदगी में मिलना चाहता हूं जिसके वजह से मैं जीना चाहता हूं सांस लेना चाहता हूं जिसके होने से यह जिंदगी मुझे बहुत ही खूबसूरत लगती है इतना की मेरे लिए जब तुम्हें मैं सोचूं तभी मैं स्वर्ग हूं मैं यह महसूस करती हूं जिंदगी की गहरा आनंद सब कुछ छोड़ कर बस उसी पल में रह जाना चाहती हूं बिना सोचे बिना समझे तुम्हारे तरह हो जाना चाहती हूं यह मेरी दोहरी व्यक्तित्व है यह तुमसे गहरा लगाव मैं दो जिंदगी एक साथ जीती हूं तुम्हारी तरह एक मेरी तरह और फिर तुम्हारी बनाई हुई कहानियों में खो जाती हूं हजारों करोड़ अंगिनती कहानीयों और किरदारों में ढलते हुए उन्हें जीते हुए मेरी उम्र बीत रही है और साथ में मेरी जिंदगी तुम्हारी बनाई हुई कहानियों से भरी जा रही है हां मेरे किताबों के पन्ने सभी भरे हैं तुम्हारी कहानियों से तुम्हारी यादों से तुम्हारे विचारों से
कविता पिया क्या तुम तक मेरी आवाज नहीं जाता नजर ऐ जिगर तुम्हारी याद और इंतजार मे है तुम कहां हो पिया क्या तुझ तक मेरी आवाज नहीं जाता मेरी दर्द मेरी तरफ मेरी खामोशी मेरी चिक कुछ भी तुम्हारे कानों या धड़कनों तक नहीं पहुंचता पिया सचमुच में तुम बरी बेरहम है इतना लंबा इंतजार कौन करता है भला जितना लंबा इंतजार मैं ने तुम्हारा किया है अब इस इंतजार के दर्द सही नहीं जाती यह दर्द इतनी भारी है कि मेरी सांसों को ठहरा रहा है और धड़कन को धड़कते हुए धीमा कर रहा है क्या तुम्हें महसूस भी हो रहा है मेरी दर्द मेरे तरफ शायद नहीं अगर होता तो तुम मेरी आंखों के सामने होते तुम नजरों से दूर हो फिर भी मैं तुम्हें चाहने पर मजबूर हूं पिया यह दिल बड़ी ही जालिम है जो तुझे चाहने से थकता नहीं मेरे रोकने से रुक जाना चाहता है पर तुम्हें चाहना छोड़ना नहीं चाहता हड्डियां और मांसपेशियां और नशे सब तने हुए हैं सदियों से एक जगह ठहरते हुए बस तुम्हारा इंतजार करते हुए दिमाग पक चुका है पिया बिना वादे की भी तुम्हारे आने की इंतजार करते हुए आंखों में कारी धूप के दर्द बर्दाश्त नहीं होता पिया और यह या पलके तुम्हारा इंतजार में तुम्हारा रहा देखते हुए बंद होने चली है देखो जरा गौर से अगर देख सकते हो तो मेरे माथे पर खींची हुई शिकंज को शिकायतों से भारी मेरे इस मन को ठहरते हुए एक ही जगह मेरे इस कदम को पिया देखो जरा गौर से मेरे मन में उठ रही तुम्हारे लिए तरफ और चाहत को पिया सचमुच में तुम बड़ी बेरहम हो गहरी सांस ठंडी हो गई पर मेरा इंतजार खत्म नहीं हुआ तुमसे कितना प्यार है मेरे अलावा कोई नहीं जानता पिया क्या अब तलाक तेरे कानों में मेरी दर्द की गूंज नहीं जाती चिता पे लेटि आग जलती और फिर हो जाती ठंडी मैं जीवन से राख बन गई पर मेरी इंतजार खत्म नहीं हुई पिया क्या तुम्हें मेरी जिसमें में लग रही आग की लपटे महसूस नहीं हुई पिया क्या सचमुच मे तुम इतनी नादान हो की कभी समझा ही नहीं की कोई है जो तेरी राहों में चित से चिता तक बैठा रहा चित से चिता तक का मतलब है एक जगह ही जलने तक बैठा रहा तेरे इंतजार करते हुए दीवार में लगी किसी तस्वीर की तरह हूं मैं ना जिंदगी भर हिली ना डोली बस एक जगह पड़ा रहा जो घर जलने पर साथ में खुद भी जल गया ऐ आखिरी लव्ज देखते हुए मेरे दिमाग में बस यही तस्वीर आया दीवार पे टंगी हुई एक तस्वीर
हां मैं हमारे अमर्यादित स्त्री कविता हां मैं समाज में बड़ी अमर्यादित स्त्री हूं उन मर्यादित स्त्रियों की तरह मैं बिल्कुल भी नहीं हूं क्योंकि मैं दिखावा नहीं करती मैं बिल्कुल वैसी हूं जैसी मैं हूं मैं झूठ नहीं बोलता मैं जी हजूरी नहीं करती मैं नहीं करती और स्त्रियों की तरह बड़ों बुड़ो की सम्मान बस इसलिए कि वह बड़े और बूढ़े हैं मैं नहीं करती घर की वह सभी काम जो बरसों से स्त्री के नाम मर्यादित होने के तौर पर स्त्री पर एक बोझ सी लादी गई है उन सभी की अपने बड़ों की छोटो की ख्याल रखने की जिम्मेदारियां उठाने की तीन समय उनके लिए रोटियां पकाने की 24 घंटे उनके लिए ही जीने की मैं नहीं कर सकती क्योंकि मुझ में धैर्य नहीं है मैं नहीं करती मैं बेवाक सी स्त्री वही करती हूं जो मेरा मन भाता है मैं किसी के हिसाब से अपने समय नहीं देती मेरा समय स्वयं बस मेरा है उसे मैं अपनी जरूरत और अपने हिसाब से ही खर्च करती हूं हां मैं समाज में बहुत ही अमर्यादीत स्त्री हुं क्योंकि मुझे मुखौटे पहनने का शौक नहीं मैं वही शक्ल लेकर चलती हूं जो मेरा है मैं दूसरों की तरह नियंत्रण चेहरा नहीं बदलती दिखाबा के लिए मैं हद से ज्यादा अच्छी नहीं होती कोई मेरी बात पर यकीन करें बस सिर्फ इसलिए मैं मीठी बातें नहीं बोलती मुझे फर्क नहीं पड़ता कोई साथ रहे या ना बस किसी के साथ पाने के लिए खुद को नहीं बदलती मैं कभी जरूरत से ज्यादा अच्छी नहीं होती मैं जैसी हूं उसे समाज में अमर्यादीत कहते हैं पर मेरा एक सवाल है अखिल मर्यादित होना क्या है क्या खुद को मार कर दूसरे के लिए सुख का कामना करना मर्यादित है क्या खुद की ना सम्मान कर के बड़ों की बातों की सम्मान रखना मर्यादित है बस इसलिए कि वह बड़े हैं अपने हैं चाहे उसके लिए खुद की सांस गिरवी क्यों न रखने पड़े क्या मर्यादित उसे कहते हैं जो मुंह पर अच्छे बनते हैं और पीठ पीछे बुराई करते हैं क्या मर्यादित होना इसे कहते हैं जो किसी को ना नहीं कहते चाहे उसके लिए खुद को दर्द क्यों ना हो क्या मर्यादित उसे कहते हैं समाज के हिसाब से जिंदगी गुजर दे चाहे खुद को पता चल ही ना कि वह कौन है और क्यों जी रही है अगर मर्यादित होना उसे कहते हैं जो दूसरों के लिए अपनी जिंदगी को बर्बाद कर दे अपने होने ना होने की खबर जाने बिना तो मै अमर्यादित स्त्री ही सही और मुझे कोई शौक नहीं है समाज के हिसाब से चलने की और उनके नज़रों में मर्यादित पूर्व शांति स्त्री बनने की मुझ में तूफान है अंगार है एक धधकती हुई ज्वाला है जो शांत नहीं जो पूझा नही वह ठहेर ठहेर कर ऊठती रहती है धधकते रहती है वह खुद को ढूंढने के लिए किसी भी हद तक गुजारना हरदम तैयार रहती है हां मैं अमर्यादित स्त्री क्योंकि मुझे खुद को थोड़ा और जानना है और खुद ढुंढ कर पा कर खुद को पूरी तरह खुद का ही कहना है हां मैं हुं आमर्यादित स्त्री
पछतावा क्यों नहीं पता कविता निराशा में डूबी हुई मन धीरे-धीरे पछतावा में जा रहा है निराशा किस लिए है पता है पछतावा क्यों है नहीं पता और यह मुझे बेचैन कर रही है और गहरी पिरा महसूस करने पर मजबूर कर रही है पर वह पीरा क्या है वह दर्द किसकी है मुझे नहीं समझ में आ रहा बस है अंदर दुख और दुख में डूबे हुए एक धड़कन जो ठहरना चाहता है जैसे यह बेचैनी बर्दाश्त नहीं हो रही जिसे यह घबराहट बरदास नहीं हो रही या तो ऐ रुक जाना चाहता है या तो ऐ चाहता है कि मैं कुछ करूं जिसके वजह से उसे थोड़ी राहत मिले उस पछतावे को जानू जो निराशा की वजह से आया है उस दर्द को पहचानो जो मैं महसूस कर रही हूं और सच कहूं तो मुझे समझ में नहीं आ रहा क्यों और क्या मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि क्यों पछतावा हो रहा है मैं मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि मेरा जो दर्द है वह क्या है वह पछतावे की दर्द मेरे खुद की बेकार जिंदगी बिता देने की बात की है या किसी और की दर्दों को महसूस करके मुझे पछतावा हो रहा है सच कहूं तो मुझे नहीं पता मैंने उम्र भर खुद के लिए क्या किया और दूसरों के लिए क्या नहीं किया मुझे नहीं पता इस तरफ इस बेचैनी इस बहते हुए आंखों और इस पछतावे की असली मतलब मुझे नहीं पता
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