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Kajal Soam

Kajal Soam

@vanshsingh118873
(316)

उलझन: हर जगह कमी
सुनने में छोटा है, पर इसका कद बहुत बड़ा है,
'कमी' का ये साया, हर किसी की दहलीज पर खड़ा है।
इंसान में कमी, धरती में कमी, ये संसार ही अधूरा है,
यहाँ जो भी देखो, बस एक अनकहा सा अधूरापन पूरा है।
सब उलझे हैं इसी उधेड़बुन में, कि हर तरफ खालीपन है,
कहीं रिश्तों की दरारें हैं, तो कहीं अधूरा ये मन है।
पर शायद ये 'कमी' ही है, जो हमें हारने नहीं देती,
कुछ नया रचने की चाह में, कभी चैन से बैठने नहीं देती।
गर सब कुछ पूरा होता, तो फिर कलम कौन उठाता?
इस 'कमी' के बिना भला, कोई कलाकार बन पाता?
writer Kajal soam

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मोड़ और मंज़िल
आज उस मोड़ पर खड़ी,
रास्ते दो, पर मंज़िल वही।
समझ नहीं आता क्या करना है,
पर आखिर मुझे चुनना तो है।
एक रास्ता और बंद पिंजरा,
एक रास्ता खुला आसमान।
कुछ पल मिले, अपने लिए,
क्योंकि पंछी का भी हार जाना है।
अब कहाँ हूँ मैं, पता नहीं,
खो गई, या सो गई, या मान ली हार है?
पर इतनी कमज़ोर नहीं मैं,
ना हार मानूँ, ना रुकूँ,
ना अपने और ना उस आसमान में।

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अहसास अपने हैं

माना हाथ और ताल साथ नहीं देते,
पर जो मन में चल रहे, वो विचार अपने हैं।
माना हमें अभी शब्द लिखने नहीं आते,
पर जो दिल में दबे हैं, वो अहसास अपने हैं।
पिंजरा छोटा है तो क्या हुआ,
इसे छूने वाली वो उड़ान अपनी है।
कितना अजीब है ना...
जब सवाल और जवाब दोनों साथ खड़े हैं,
पर समझ नहीं आता कि क्या गलत, क्या सही है।
कलम शायद थोड़ी कच्ची है अभी,
पर पन्ने पर उतरी ये हर बात अपनी है।
शब्द पराए हो सकते हैं दुनिया के लिए,
पर इन खयालों की पूरी कायनात अपनी है।

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