मौत का छोटा रूप
— विजय शर्मा Erry
मैं एक दिन शोक-सभा को जा रहा था,
मन बोझिल था, कदम धीमे-धीमे बढ़ रहे थे।
रास्ते में देखा एक टेम्पो वाला,
अपने ही वाहन में गहरी नींद सो रहा था।
साँसें उसकी बहुत हौले-हौले चल रही थीं,
चेहरे पर अद्भुत शांति का डेरा था।
क्षण भर को लगा जैसे समय ठहर गया हो,
जैसे संसार से उसका कोई नाता न रहा हो।
आगे बढ़ा, जहाँ मृत्यु ने दस्तक दी थी,
वहाँ भी एक देह बिल्कुल वैसी ही पड़ी थी।
वही शांत चेहरा, वही बंद पलकें,
बस एक अंतर था—साँसों की डोर टूट चुकी थी।
तभी मन ने मुझसे धीरे से पूछा,
"क्या सचमुच मृत्यु इतनी अलग होती है?"
फिर भीतर से उत्तर आया—
"नहीं, यह तो नींद की अंतिम सीमा है।"
हर रात जब हम सो जाते हैं,
अपने अहंकार को कहीं खो जाते हैं।
न धन याद रहता, न पद का अभिमान,
न कोई अपना, न कोई पराया इंसान।
हर दिन एक छोटी मौत हम मरते हैं,
फिर सुबह नया जीवन लेकर उठते हैं।
कल की थकान, कल के सपने,
सब रात की चादर में कहीं छिप जाते हैं।
यदि हर सुबह नया जन्म है,
तो हर शाम मृत्यु का एक अभ्यास है।
फिर क्यों इतना अभिमान करें,
जब जीवन स्वयं एक प्रवास है?
जिस दिन अंतिम नींद आ जाएगी,
कोई अलार्म हमें जगा न पाएगा।
सिर्फ कर्मों की सुगंध साथ चलेगी,
बाकी सब यहीं रह जाएगा।
इसलिए जीना है तो ऐसा जीओ,
कि हर रात निश्चिंत होकर सो सको।
और जब अंतिम निद्रा आए,
तो मुस्कुराकर उसे भी गले लगा सको।
क्योंकि मृत्यु कोई दुश्मन नहीं,
वह जीवन का अंतिम विश्राम है।
जो हर रोज़ छोटी मौत को समझ गया,
उसी ने जीवन का सच्चा अर्थ जाना है।