भाव-पुष्प
कुछ लोग प्रेम को परिभाषित करते हैं,
कुछ इस पर तर्क करते हैं।
प्रेम में तर्क नहीं होता,
इसमें कोई सवाल नहीं होता।
कुछ कहने के लिए जवाब नहीं होते,
मैं से हम तक, की राह का पता नहीं होता।
प्रेम जाना है तो करना होगा,
बिना प्रेम किए, क्या प्रेम समझाएंगे?
कहते हैं उसने हमें धोखा दिया,
हमने तो बड़ी शिद्दत से किया।
हमें पहले पता होता तो न करते,
न देते उनको अपना दिल।
आती है याद बाबा बुल्ले शाह,
इश्क शायरी में उन्होंने कहा है—
"ज़हर देख के पीता तो क्या पीता?
और इश्क देख के किया तो क्या किया?"
और इश्क कभी दुःख नहीं होता,
इश्क हार और जीत से फर्क नहीं पड़ता।
किसी शायर ने भी कहा है,
"इश्क में रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता,
क्योंकि महफिल में हमने दूध से ज़्यादा चाय के दीवाने देखे हैं।"
कहने को बहुत कुछ,
फिर कहेंगे क्या आपने,
कभी न इश्क किया,
या समझकर या पढ़कर लिखा।
इस पर कहूंगी, हाँ इश्क किया,
उस सांवरे से, उस मुरली वाले से।
ये दिखावा नहीं, बचपन से है,
जब शायद इश्क का मतलब नहीं पता था।
और कृष्ण कभी उनको प्रेम करने वाले,
को सेवक या नौकर नहीं समझते।
वो उन्हें चाहने वाले को सखा, सखी और गोपी कहते हैं।
— काजल