कर्ण का आत्मसमर्पण
शब्दों में लिखी कहानी नही,
माधव मैत्री का संदेशा लाए,
उसको भी ठुकरा दिया,
जब चले वहाँ से माधव,
मिले सूत पुत्र कर्ण से,
उसको प्रलोभन देने चले,
देखो माधव बतला रहे,
कैसे कर्ण को विचला रहे,
क्या-क्या प्रलोभन दिखला रहे,
मिल जा पांडव से जाकर,
तू राजा बन जाए,
कुंती का है ज्येष्ठ पुत्र,
सब तुझे मिल जाएगा।
छोड़ दुर्योधन का चक्कर,
आ जा मेरे अंदर,
पांडव भी सर झुकाएंगे।
क्षमा करे माधव मुझे,
ये ना मैं अपना सका,
वो कुंती जिसने मेरा त्याग किया,
एक नवजात शिशु को गंगा में समाए दिया,
जब सबके ताने सुनकर, मैं बड़ा हुआ,
एक बार ना पूछा उसने, उसका ये लाल था,
कैसे मैं अपना मानूँ,
जो प्रलोभन देते हो, उसको मैं त्यागूँ।
जब सूत पुत्र कहकर,
जग ने बदनाम किया,
कहाँ थी पांडव जननी,
मिला श्राप ऋषि से,
जब सबने बहिष्कार किया।
वही था दुर्योधन,
जिसने सम्मान किया,
मित्र बनाया अपना उसने,
ऐसा काम किया,
कैसे उसका ऋण उतारूं,
जिस वृक्ष ने छाँव दी,
उसका ही तना काटूं,
ये ना मैं कर सकती,
मुझे क्षमा करे माधव।
क्या लेना मुझे इस माया से,
कौन साथ ले जाएगा,
किसका राजपाठ,
उससे मैं क्या काम करूँ,
मुझे दूर रहने दे माया से,
इतना सम्मान करूँ,
जो होता परिणाम,
मैं दुर्योधन के साथ लडूं,
मर जाऊं उसके लिए,
तो मैं ऋण से आजाद हो पाऊं।
क्षमा करे माधव,
माधव मन में हरषाये,
वचन सुन कर्ण के,
वे कुछ संतुष्टि पाए।
एक कृपया करना, केशव,
ये बात किसी को ना बतलाना,
पता चला दुर्योधन को,
वो राजपाठ देगा मुझको,
कुछ नही मिले पांडवों को,
ये बात वही रह जाए।
अभी मुझे ऋण चुकाने है,
मित्र का ऋण युद्ध भूमि में,
श्राप का ऋण युद्ध भूमि में,
जननी का ऋण युद्ध भूमि में।
अब होने दे माधव जो घटा,
अब अंत में प्रणाम स्वीकार करो,
हे केशव.....