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New bites

फिर तुम्हें शब्दों में उतारा है हमने
बिन लिखे तेरा नाम पुकारा है हमने...✍️
♥️

narayanmahajan.307843

म्हारी लाडो काव्या... 🌸
थारो खिलखिलावणो आज भी
म्हारै कानां में गूंजै है।
थारी यादां रै बीच
एक "अ..." रो नाम भी
दिल में चुपचाप धड़कै है।
थूं होती...
तो शायद आज म्हाने यूँ रोवणो कोनी पड़तो।

parmarsantok136152

"प्रेम रो मतलब पकड़णो कोनी होवै...
प्रेम रो मतलब उडीक करणी भी होवै।
जिको म्हारो है,
उण नै लौटबा खातर म्हैं दरवाजो खुल्लो राखूं सूं...
पर जोर कदई कोनी करूं।"

parmarsantok136152

I feel really bad

kattupayas.101947

அன்பு நண்பர்கள் அனைவருக்கும் வணக்கம். இரவை சுடும் வெளிச்சம் நாவல் இரண்டாம் பாகம் விரைவில் வெளியாக உள்ளது. உங்கள் அன்பு மற்றும் ஆதரவுக்கும் நன்றி.

kattupayas.101947

झाशीची राणी लक्ष्मीबाई: स्वातंत्र्याची अमर ज्योत

भारतीय इतिहासात अनेक वीरांनी आपल्या शौर्याने आणि बलिदानाने देशाचे नाव उज्ज्वल केले आहे. त्यापैकी एक महान नाव म्हणजे झाशीची राणी लक्ष्मीबाई. तिचे जीवन धैर्य, स्वाभिमान आणि देशप्रेमाचे प्रतीक आहे. आजही प्रत्येक भारतीयाच्या हृदयात तिचे नाव आदराने घेतले जाते.

राणी लक्ष्मीबाई यांचा जन्म १९ नोव्हेंबर १८२८ रोजी वाराणसी येथे झाला. त्यांचे बालपणीचे नाव मणिकर्णिका होते. प्रेमाने त्यांना "मनू" असे म्हटले जात असे. त्यांचे वडील मोरोपंत तांबे आणि आई भागीरथीबाई होत्या. लहानपणापासूनच मनू अत्यंत हुशार, धाडसी आणि स्वाभिमानी होत्या.

मनूला लहानपणापासूनच घोडेस्वारी, तलवारबाजी आणि युद्धकलेचे शिक्षण मिळाले. त्या काळात मुलींना अशा प्रकारचे शिक्षण मिळणे दुर्मिळ होते, परंतु मनूच्या वडिलांनी तिच्या धैर्याला प्रोत्साहन दिले. ती इतर मुलांप्रमाणे खेळत असे आणि प्रत्येक आव्हानाला धैर्याने सामोरे जात असे.

सन १८४२ मध्ये मनूचा विवाह झाशीचे महाराज गंगाधरराव नेवाळकर यांच्याशी झाला. विवाहानंतर त्यांचे नाव लक्ष्मीबाई ठेवण्यात आले. त्या झाशीच्या राणी बनल्या. राणी लक्ष्मीबाई यांनी आपल्या बुद्धिमत्तेने आणि प्रेमळ स्वभावाने प्रजेच्या मनात विशेष स्थान निर्माण केले.

काही वर्षांनी त्यांना पुत्ररत्न प्राप्त झाले, परंतु दुर्दैवाने तो मुलगा अल्पायुषी ठरला. नंतर महाराजांनी दामोदरराव यांना दत्तक घेतले. मात्र इंग्रजांनी दत्तक वारसाला मान्यता नाकारली आणि "दत्तक वारसा धोरणा"नुसार झाशी राज्य ताब्यात घेण्याचा प्रयत्न केला.

इंग्रजांच्या अन्यायाविरुद्ध राणी लक्ष्मीबाईंनी ठामपणे आवाज उठवला. त्यांनी स्पष्ट सांगितले, "मी माझी झाशी देणार नाही." हा शब्द त्यांच्या स्वाभिमानाचे आणि धैर्याचे प्रतीक बनला.

सन १८५७ मध्ये भारतात स्वातंत्र्याचा पहिला मोठा उठाव झाला. राणी लक्ष्मीबाई यांनी या संघर्षात महत्त्वाची भूमिका बजावली. त्यांनी आपल्या सैन्याचे नेतृत्व केले आणि इंग्रजांविरुद्ध शौर्याने लढा दिला.

राणी स्वतः रणांगणात उतरल्या. हातात तलवार, सोबत सैन्य आणि मनात मातृभूमीप्रती प्रेम घेऊन त्यांनी शत्रूचा सामना केला. त्यांच्या धैर्यामुळे त्यांच्या सैनिकांमध्ये नवीन ऊर्जा निर्माण झाली.

इंग्रजांनी झाशीवर मोठा हल्ला केला. परिस्थिती कठीण असतानाही राणीने हार मानली नाही. त्यांनी आपल्या लहान मुलाला पाठीशी बांधून घोड्यावर स्वार होऊन रणांगणात प्रवेश केला, अशी कथा आजही लोकांच्या स्मरणात आहे.

नंतर राणी लक्ष्मीबाई यांनी तात्या टोपे आणि इतर क्रांतिकारकांसोबत मिळून इंग्रजांविरुद्ध संघर्ष सुरू ठेवला. त्यांनी ग्वाल्हेरच्या युद्धातही अद्भुत पराक्रम दाखवला.

१८ जून १८५८ रोजी कोटा-की-सराय येथे लढताना राणी लक्ष्मीबाई वीरमरण पावल्या. त्यांचे शरीर शत्रूच्या हातात पडू नये म्हणून त्यांच्या सहकाऱ्यांनी अंत्यसंस्कार केले.

राणी लक्ष्मीबाई यांचे जीवन आपल्याला शिकवते की धैर्य, आत्मविश्वास आणि देशप्रेम असेल तर कोणतीही व्यक्ती मोठे परिवर्तन घडवू शकते. त्या केवळ झाशीच्या राणी नव्हत्या, तर भारताच्या स्वातंत्र्य संग्रामातील एक तेजस्वी ज्योत होत्या.

आजही त्यांचे नाव घेतले की मनात अभिमान आणि प्रेरणेची भावना निर्माण होते. त्यांचे बलिदान भारतीय इतिहासात सदैव अमर राहील.

शिक्षण (मोरल):
धैर्यवान व्यक्ती परिस्थितीसमोर कधीही झुकत नाही. आपल्या अधिकारांसाठी, सत्यासाठी आणि मातृभूमीसाठी केलेला संघर्ष नेहमी प्रेरणा देतो. राणी लक्ष्मीबाई यांनी दाखवून दिले की स्त्री ही शक्ती, साहस आणि नेतृत्वाचे महान उदाहरण असू शकते.Dear, ही Matrubharti साठी ऐतिहासिक कादंबरीसारख्या शैलीत आहे.

skptech

ऊँची -ऊँची इमारतों से ढका शहर।
चाँद छुपा रहता ,सूरज दिखे किधर।
न हवाएँ गुज़रती हैं ,न,धूप आती है,
झरोखे बंद है ,लोग हैं घरों के भीतर।
वाहनों की भीड़ , बेतहाशा शोर समेटे,
गुम हरियाली में बसी जीवन की डगर ।
अमृता शुक्ला

amritashukla

रूठबा रो हक थानै है...
उडीक करबा रो सबर म्हानै।
प्रेम बदल्यो कोनी है लड्डू...
बस वखत नै थोड़ो समझावणो बाकी है।

parmarsantok136152

तू मेरी जिद है ... या मुहब्बत ... जा छोड़ दी ... जा छोड़ दी ... जा छोड़ दी।

Tu Meri Zid Hai ... Ya Muhabbat

Ja Chodd Di ... Ja Chodd Di ... Ja Chodd Di.

anisroshan324329

Wait for the unexpected... இரவை சுடும் வெளிச்சம் 2 is on the way.. don't miss it

kattupayas.101947

प्रैमरस,,,,🌹🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹🌹😊😊😊

drbhattdamayntih1903

good night 🌃

nikitavinzuda6548

कविता: - नाम किसका ?
रचनाकार:-अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'

आलीशान एक कुर्सी पर बैठा,
धूप-सा आलस्य ओढ़े बिल्लीराज,
काला चश्मा, हाथ में शीतल पेय,
चेहरे पर संतोष का ताज।

मन ही मन मुस्काता कहता,
"वाह! ज़िन्दगी हो तो ऐसी,
आराम ही आराम मिले,
हर घड़ी लगे जैसे वैसी।"

सामने छोटा-सा चूहा लेकिन,
झाड़ू, पोछा, धूल, पसीना,
आँखों में थकान की नदियाँ,
हाथों में जीवन का नगीना।

वह भी सोच रहा है चुपके,
"काश! मेरा भी एक दिन होता,
जिस दिन साँसें छुट्टी पातीं,
और मन बोझ से मुक्त होता।"

दीवार पर टँगा हुआ वाक्य,
जैसे सच का उद्घोष करे,
"काम वो करें... नाम हम लें!"
कैसा विचित्र समाज धरे!

कितनी सदियों से यह क्रम है,
श्रम का चेहरा धूल सहे,
फल की थाली कोई और ले,
अभि मेहनत कोई और गहे।

कुर्सी केवल लकड़ी नहीं है,
ये अवसर की ऊँचाई है,
और झाड़ू केवल झाड़ू नहीं,
ये श्रम की सच्ची कमाई है।

जीवन की यह मौन कहानी,
चित्र नहीं, दर्पण बन जाती,
जहाँ पसीने की हर बूँद-बूँद,
किसी और की मुस्कान कहलाती।

आओ ऐसा समय रचें अभि,
जहाँ श्रम का सम्मान मिले,
जिसने खेतों में बीज उगाए,
उसको भी वरदान मिले।

नाम उसी का गूँजे जग में,
जिसने श्रम की लौ जलाई,
क्योंकि दुनिया चलती केवल,
मेहनतकश की सच्ची कमाई।
रचनाकार:-अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'

abhi006

उसी राह पर तेरा इंतजार करूँ... अब वैसी फ़ितरत नहीं रही, जा... अब मुझे तुझसे उतनी मुहब्बत नहीं रही...

चाहूँ तो जान छिड़क दु तुझ पे.... मगर अब मुझ में मेरी जान भी नहीं रही...

लौट आना है तो बेशक आ जाना... मगर तेरे फिरसे सजदे हो, इतनी इबादत नहीं रही

anisroshan324329

क्या गलत है,,कौन गलत है,,
इस बीच में रिश्ता तो सही है।।
माफी मांग लेने से और
माफी देने से रिश्ते निभाये जाते है।।
🦋

nandiv

“कैसे”
ये दिल के अरमान तुम तक पहुँचें,
 राहों में बिखरे हैं, जुड़ें तो जुड़ें कैसे।
ये साँसें मेरी होकर भी तुम पर ही ठहरी हैं,
 अब लौटकर मुझ तक मुड़ें तो मुड़ें कैसे।
तुम इश्क़ हो, धोखा हो, या मेरी ही दुआ हो,
 हम तुमको बिना पढ़े समझें तो समझें कैसे।
हर रोज़ तुम्हारी याद का मौसम उतरता है,
 हम अपने ही घर में ठहरें तो ठहरें कैसे।
तुम किसी और की दुनिया के चराग़ों में बसे हो,
 हम अपने अँधेरों को भरें तो भरें कैसे।
हमने तो तुम्हें रूह की तरह अपने भीतर रखा,
 अब ख़ुद से तुम्हें अलग करें तो करें कैसे।
तुम्हारे शहर से हर रोज़ गुज़रता है ख़याल मेरा,
 मगर उन गलियों में उतरें तो उतरें कैसे।
तुम्हें पाने की दुआ भी अब लबों पर नहीं आती,
 मगर दिल को ये बात कहें तो कहें कैसे।
तुम्हारे बाद भी धड़कन ने तुम्हारा नाम छोड़ा नहीं,
 अब इन धड़कनों को बदलें तो बदलें कैसे।
लोग कहते हैं कि वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है,
 जिस ज़ख़्म में तुम बसे हो, भरें तो भरें कैसे।
तुम किसी और के होकर भी मेरे ख़्वाबों में रहते हो,
 हम इन ख़्वाबों से जागें तो जागें कैसे।
एक उम्र से हम तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़े हैं,
 अब लौटकर अपनी ही तरफ़ चलें तो चलें कैसे।
प्राची गुर्जर….

prachitanwar111

कविता: स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं

स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं
दुकानों से कमीशन खाने लगे हैं
किताब, कॉपी, जूते, जुराब, बैग
यहां तक की ड्रेस भी बिकवाने लगे हैं

बच्चे को पढ़ाना संघर्ष हो गया है
रोज स्कूल की फीस बढ़ाने लगे हैं
स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं

अनुशासन अब मिलता नहीं देखने को
बच्चे आज के गुरु को आंख
दिखाने लगे हैं

तरह-तरह के चार्ज लगाने लगे हैं
एडमिशन फीस, हर साल बढ़ाने लगे हैं
बिल्डिंग फीस, ट्रांसपोर्ट फीस
जाने क्या-क्या लगाने लगे हैं

सिलेबस पूरा बस कराने लगे हैं
बच्चे पढ़े ना पढ़े, फेल हो या पास
अपनी जेबें भराने लगे हैं
स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं

आजकल तो होमवर्क करते हैं पैरेंट्स
बच्चे तो नखरे दिखाने लगे हैं
बोलना भले ही न आए ठीक से
अब तो ढाई साल के बच्चे भी
स्कूल जाने लगे हैं।

वो गुरु-शिष्य परंपरा तो
जाने कहां खो गई
अब तो बच्चे गुरु को
डराने लगे हैं।

स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं।

---dr वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

कहानी नेट बनाम धड़कन

सोहन आज सुबह से परेशान था। बार-बार अपना मोबाइल चेक कर रहा था। शायद कुछ जरूरी मेल आने वाला था। दो दिन से हल्की बारिश हो रही थी। खराब सिग्नल आ रहे थे, नेट काम नहीं कर रहा था। ऑफिस में एक प्रोजेक्ट जमा किया था। उसका परिणाम मेल पर आना था। बार-बार अपना फोन चेक कर रहा था। पर कोई मेल नहीं दिखाई दिया। उसे झुंझलाहट होने लगी। वो सिर पकड़कर चिल्लाने लगा - "क्या हो गया इस नेट को, चल क्यों नहीं रहा। इतनी देर से बफरिंग हो रही है। सिम भी दोबारा निकालकर डाल दिया। इतना जरूरी मेल आना है। और ये फोन। मन करता है इसे उठाकर फेंक दूं।"

उसकी पत्नी मीना इतनी देर से उसकी हरकतें दूर से देख रही थी। मीना रसोई में कॉफी बना रही थी लेकिन नजर सोहन पर ही थी।
उसकी ऐसी बेचैनी देख मीना उसके पास आई। एक कप कॉफी पकड़ाते हुए बोली - "शांत रहो सोहन। शांत हो जाओ। गहरी सांस लो। अब इतने चिल्लाने से समस्या तो ठीक नहीं होगी। कुछ तकनीकी खराबी होगी, कई दिन से मौसम भी खराब है। सोचो यदि किसी ने समुद्र में नेट की वायर काट दी। या कोई व्हेल मछली आ जाए और तार काट दे। या कोई दुश्मन ही नेट की सप्लाई बंद कर दे। सोचो सोहन, सोचो तुम्हारा क्या होगा।"

अब तुम्हारी तो धड़कन ही रुक जाएगी। बिना फोन के तुम कैसे रहोगे ।जो सारे दिन फोन में आंखें गड़ाए रहते हो फिर अगर नेट ही नहीं होगा तो तुम्हारा फोन तो डिब्बा है डिब्बा।

सोहन चिल्लाते हुए कहता है - "क्या बकवास कर रही हो मीना। तुम्हें पता है क्या बोल रही हो। अगर नेट बंद हो गया न एक दिन के लिए भी तो करोड़ों का नुकसान हो जाएगा। सारा व्यापार रुक जाएगा। ओह गॉड ऐसा कभी न हो।"

सोहन की पत्नी मीना कहती है "ये स्मार्ट फोन तो अभी आए हैं कोई दस साल पहले। इससे पहले भी तो लोग जिंदा थे। व्यापार होता था। सब काम होते थे। आज इंसान फोन पर निर्भर पर हो गया है इतना कि बिना नेट के बिना फोन के पागल हो जाता है। लाइफ रुक जाती है। देखो सोहन किसी भी चीज की अति बुरी होती है। और तकनीकी डिवाइस पर इतना निर्भर नहीं होना चाहिए। कुछ दिमाग चलाओ। नेट ही तो नहीं चल रहा। कॉल तो हो सकती है। अरे कॉल करके पूछ लो। कौन सी बड़ी बात है। गुस्से में इंसान छोटी-छोटी बातें भी सोचना भूल जाता है।"

सोहन सिर खुजाते हुए कहता है - "हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं। कॉल भी तो कर सकता हूं।"
मीना कहती है - "सोहन समस्या इतनी बड़ी नहीं होती, जितना हम उसे बना देते हैं। बिना फोन के कुछ दिन गुजार कर देखो, जिंदगी बहुत सुंदर है।"

--- समाप्त
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

कहानी नेट बनाम धड़कन

सोहन आज सुबह से परेशान था। बार-बार अपना मोबाइल चेक कर रहा था। शायद कुछ जरूरी मेल आने वाला था। दो दिन से हल्की बारिश हो रही थी। खराब सिग्नल आ रहे थे, नेट काम नहीं कर रहा था। ऑफिस में एक प्रोजेक्ट जमा किया था। उसका परिणाम मेल पर आना था। बार-बार अपना फोन चेक कर रहा था। पर कोई मेल नहीं दिखाई दिया। उसे झुंझलाहट होने लगी। वो सिर पकड़कर चिल्लाने लगा - "क्या हो गया इस नेट को, चल क्यों नहीं रहा। इतनी देर से बफरिंग हो रही है। सिम भी दोबारा निकालकर डाल दिया। इतना जरूरी मेल आना है। और ये फोन। मन करता है इसे उठाकर फेंक दूं।"

उसकी पत्नी मीना इतनी देर से उसकी हरकतें दूर से देख रही थी। मीना रसोई में कॉफी बना रही थी लेकिन नजर सोहन पर ही थी।
उसकी ऐसी बेचैनी देख मीना उसके पास आई। एक कप कॉफी पकड़ाते हुए बोली - "शांत रहो सोहन। शांत हो जाओ। गहरी सांस लो। अब इतने चिल्लाने से समस्या तो ठीक नहीं होगी। कुछ तकनीकी खराबी होगी, कई दिन से मौसम भी खराब है। सोचो यदि किसी ने समुद्र में नेट की वायर काट दी। या कोई व्हेल मछली आ जाए और तार काट दे। या कोई दुश्मन ही नेट की सप्लाई बंद कर दे। सोचो सोहन, सोचो तुम्हारा क्या होगा।"

अब तुम्हारी तो धड़कन ही रुक जाएगी। बिना फोन के तुम कैसे रहोगे ।जो सारे दिन फोन में आंखें गड़ाए रहते हो फिर अगर नेट ही नहीं होगा तो तुम्हारा फोन तो डिब्बा है डिब्बा।

सोहन चिल्लाते हुए कहता है - "क्या बकवास कर रही हो मीना। तुम्हें पता है क्या बोल रही हो। अगर नेट बंद हो गया न एक दिन के लिए भी तो करोड़ों का नुकसान हो जाएगा। सारा व्यापार रुक जाएगा। ओह गॉड ऐसा कभी न हो।"

सोहन की पत्नी मीना कहती है "ये स्मार्ट फोन तो अभी आए हैं कोई दस साल पहले। इससे पहले भी तो लोग जिंदा थे। व्यापार होता था। सब काम होते थे। आज इंसान फोन पर निर्भर पर हो गया है इतना कि बिना नेट के बिना फोन के पागल हो जाता है। लाइफ रुक जाती है। देखो सोहन किसी भी चीज की अति बुरी होती है। और तकनीकी डिवाइस पर इतना निर्भर नहीं होना चाहिए। कुछ दिमाग चलाओ। नेट ही तो नहीं चल रहा। कॉल तो हो सकती है। अरे कॉल करके पूछ लो। कौन सी बड़ी बात है। गुस्से में इंसान छोटी-छोटी बातें भी सोचना भूल जाता है।"

सोहन सिर खुजाते हुए कहता है - "हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं। कॉल भी तो कर सकता हूं।"
मीना कहती है - "सोहन समस्या इतनी बड़ी नहीं होती, जितना हम उसे बना देते हैं। बिना फोन के कुछ दिन गुजार कर देखो, जिंदगी बहुत सुंदर है।"

--- समाप्त
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

"প্রতিশোধ নাকি পরিনয় "
পর্ব : ১

~• নিজের চোখের সামনে নিজের প্রিয় বাবা মার রক্তাক্ত মৃতদেহ দেখে থমকে গেল পৃথা। তার হাত পা দ্বিগুণ বেগে কাপতে লাগলো।
তার গোটা পৃথিবি যেনো উল্টে পাল্টে গেল। তার হৃৎস্পন্দন বেড়ে যেতে লাগলো কয়েকগুণ। চোখের কোটর বেয়ে অঝোরে জল গড়িয়ে পড়ছে। সেদিকে নজর নেই তার..! কিয়ৎক্ষণ পর তার হুশ ফিরতেই হু হুকরে কাদতে লাগলো।
হাঁটুমুড়ে দরজার কাছেই বসে পড়লো। পাশেই দাঁড়ানো তার ৮ বছরের ভাই কিছুই বুঝতে পারলো না। ওইটুকু বাচ্চা কি বা বুঝবে.! সেইরকম বোঝার বয়স তো হয়নি তার.! সে বুঝতে পারছে না তার বাবা মা দরজার কাছে শুয়ে আছে কেনো ? আর তার দিদিভাই বা এত কাদঁছে কেনো.?
তার দিদিভাই তো সহজে কাদার মেয়ে নয়.!

~• তাদের পরনে ব্লু হুইট স্কুল ড্রেস।
সবে মাত্র স্কুল থেকে বাড়ি ফিরলো তারা। আজ তাদের স্কুল থেকে পিকনিক করতে নিয়ে গেছিলো। বেশ আনন্দ করেছে তারা। স্কুল থেকে তার বাবারই আনতে যাবার কথা ছিল। কিন্তু বাবা আসছে না দেখে তারা স্কুল বাসেই করে এসেছে।  মেন গেটের কাছে যেখানে সবসময় বেশ কয়েকজন গার্ড নিয়মিত পাহারা দেন তাদের টিকি টুকুও দেখতে পাইনি তারা.!
তাইতো ছুটতে ছুটতে বাড়ি আসছিল ওরা.! পিকনিকে কত মজা করেছে সব কিছু তার বাবা মাকে তো বলতে হবে নাকি!
কিন্তু তাদের সবকিছুই ধুলোয় মিশে গেছে।

( রায় গ্রুপ অফ ইন্ডাস্ট্রী মালিক প্রদীপ রায় চৌধুরী।
প্রদীপ রায় চৌধুরী স্ত্রী কামিনী চৌধুরী তার বড়ো মেয়ে পৃথা রায় চৌধুরী বয়স ১২এবং একমাত্র ছেলে প্রনয় রায় চৌধুরী বয়স ৮ )

প্রনয় তার ক্ষুদে ছোট ছোট হাত দিয়ে দিদিভাইয়ের চোখ মুছে দিতে দিতে বলল....

" দিদিভাই তুই কাঁদছিস কেনো.? কাঁদিস না প্লিজ ?
আচ্ছা আমার সব চকলেট তোকে দিয়ে দেবো! তবুও কাঁদিস না দিদিভাই.! "

~• প্রনয় বুঝবে কি করে তার দিদিভাইয়ের সব হারিয়ে গেছে। বাঁচার উৎস তার আর নেই। প্রনয় ও তো জানে না সে কি হারিয়েছে। বুঝলে কি সে এ প্রশ্ন করত !
সে পাগলের মতো বাবাকে জড়িয়ে ধরে ব্যাকুল কন্ঠে বলতে লাগলো....

" বাবা! বাবা চোখ খোলো বাবা! আমি আর দুষ্টুমি করবনা.! আর তোমাকে বাইরে ঘুরতে নিয়ে যাবার জন্য বায়না করবো না! আর বলবো না আমাকে এটা কিনে দাও ওটা কিনে দাও!
দেখো আমি এবার গুড গার্ল হয়ে যাবো। আমি না তোমার প্রিন্সেস! তোমার প্রিন্সেস এর জন্য অন্তত ওঠো বাবা!
প্লিজ বাবা চোখ খোলো।
আমি কিন্তু রেগে যাচ্ছি বাবা.! খুব ভালোবাসি তোমায়.! ও বাবা প্লিজ চোখ খোলো প্লিজ "

~• পৃথাকে দেখতে বিধ্বস্ত লাগছে। সাদা স্কার্ট এ রক্তের দাগ লেগে গেছে। প্রনয় চুপটি করে দাঁড়িয়ে আছে। সে কি বলবে ভেবে পাচ্ছে না। সে ভাবছে বাবা হয়তো ঘুমোচ্ছে।
হ্যাঁ তার বাবা তো ঘুমোছেই একেবারের জন্য!
পৃথা এবার তার মায়ের কাছে গেলো। কত দুষ্টুমি খুনসুঁটি করেছে তার মায়ের সাথে। তাদের পরিবার আনন্দে ভরা ছিল। বিশাল বড়ো বাড়ি তাদের।

পৃথা এবার মায়ের কাছে গেলো। মায়ের মাথাটা ফাটিয়ে দিয়েছে কেউ। মাথা রক্তে ভিজে গেছে শরীরের শাড়িটা। মায়ের মাথাটা সাবধানে নিজের কোলের ওপর নিলো।
বিষন্ন কন্ঠে বলে উঠলো...

" মা ! তুমিও কি আমার ওপর অভিমান করেছো। দেখো মা আর জালাবনা তোমায়.! আর বায়না ধরবো না এটা খাবো ওটা খাবো বল.! প্লিজ মা তুমি অন্তত চোখ খোলো। আমরা কত মজা করেছি জিজ্ঞাসা করবে না আমায়.! ও মা ওঠো না.! দেখো.....

~• বাকি কথাটা বলতে পারলো না যেহেতু ওরা ডাইনিং রুমে দরজার কাছেই বসা ছিল দেখতে পেলো ওপর দোতলা থেকে দু/ তিনটে লোক ওদের দিকেই তেড়ে আসছে। হয়তো এতখন ওদেরই খুঁজছিল। তাদের হাতে বন্দুক। এটা দিয়েই মেরেছে তার বাবা মাকে।

" এই মেয়ে দাড়া ওখানে! দাড়া বলছি.! সালার বাড়ি বানিয়েছে হেব্বি বড়। খুঁজতে খুঁজতে শালার দম ফেটে গেলো। শালী দাড়া তুই ! রায় চৌধুরী বংশ নিরবংশ করবো আমি ! আমার পথের কাটা এই প্রদীপ রায় চৌধুরী। শেষ করে দেবো সব "

~• বলতে বলতে লোকগুলো নিচেই নেমে আসছে দ্রুত বেগে। পৃথা মায়ের কপালে আর বাবার কপালে একটা করে চুমু খেলো। তার যেতে ইচ্ছে করছে না। কিন্তু এটুকু বুঝতে পেরেছে এখান থেকে না পালালে সে নিজে এবং তার আদরের ভাই কে বাঁচাতে পারবে না।
এমন সময় প্রনয় বললো...

" দিদিভাই এই দুষ্টু লোক গুলো কারা.? কিসব বলছে এই বাজে লোকগুলো.? "

" আমাদের পালাতে হবে সোনু  ( প্রনয় ) ! এখান থেকে পালাতে হবে.! নাহলে তোকেও হারিয়ে ফেলবো আমি ! "

~• পৃথা প্রনয় কে সোনু বলেই ডাকে। পৃথা প্রণয়ের হাত শক্ত করে ধরলো বেশি সময় না নিয়েই খালি পায়েই দরজা থেকে বেরিয়ে প্রাণপণে ছুটতে লাগলো। যেদিকে দুচোখ যায় সেদিকে। লোকগুলোও পেছনে আসছে।
কি ওদের ভবিষ্যৎ? আদেও বাঁচবে কি দুজন ?

~~~~~~~~~||||~~~~~~~~~~||||~~~~~

~• দরজার ঠকঠক আওয়াজে নিজের জঘন্য অতীতের ভাবনা থেকে বেরিয়ে এলো পৃথা ওরফে অদ্রি। হ্যাঁ তার পরিচয় এখন অদ্রি নামেই।
তার মাঝে মাঝেই তার অতীতের কথা মনে পড়ে। মনে পড়ে তার ছোট ভাইটার কথা। কিন্তু চোখের নিমিষে সব ওলট পালট হয়ে গেছিল সেদিন। না সে আর এসব নিয়ে ভাবতে চাই না। এখন তো তার প্রতিশোধ নেবার পালা। এতদিন নিজেকে কঠোর ভাবে তৈরি করেছে সে। নিজেকে উপযুক্ত করেছে সে। এবার তো শুরু আসল খেলা।

আদৃত: মে আই কামিং মেম !

অগ্নি: ইয়েস কামিং !

~• আদৃত দরজা খুলে ভেতরে প্রবেশ করলো। দেখতে পেলো অদ্রি বাইরের থাইগ্লাসের দিকে তাকিয়ে আছে। আদৃত বুঝতে পারলো না এই অদ্রি মেম সবসময় এত কি নিয়ে চিন্তা করে। গোটা সিআইডি ডিপারমেন্ট এর কাছে উনি অদ্রি নামেই পরিচিত। পাশাপাশি তিনি এসিপি নিলয় সেনগুপ্তের মেয়ে হিসেবে পরিচিত। তার একমাত্র...।
মেম তার একটু রেগে থাকে সবসময় কিন্তু মেম তার বড্ডো ভালো!

অদ্রি : তুমি কি এখানে সং এর মত দাঁড়িয়ে থাকতে এসেছো। কি বলার আছে বলো নয়তো যে পথ দিয়ে এসেছো সেই পথ দিয়েই ফিরে যাও। ফালতু সময় নষ্ট করার কোনো মানে হয় না।

~• আদৃত কিছুটা তথমত খেয়ে গেলো। মেম তার যে ভালই রেগে আছে তা গলার স্বর শুনে বোঝা যাচ্ছে। না বেশি কথা বাড়ালে হবে না। কোথায় এখুনি বন্দুক বার করে ঠাস ঠাস চালিয়ে দিল তখন আমার মত একটা ভালো অফিসার এই দুনিয়া ছেড়ে চলে যাবে। এই দেশের কি হবে তখন। না না বিশ্বাস নেয় গুলি চালিয়েও দিতে পারে।

আদৃত : সরি দিদি থুক্কু মেম! আমি আসলে!

অদ্রি : আসলে নকলে না করে যেটা বলতে এসেছো বলো !

আদৃত : মেম এই নিন ফাইল এখানে মৃন্ময় সেন এর সমস্ত ডিটেলস দেওয়া আছে। আর উনি বেশ কিছু অস্ত্র পাঁচার , নারী পাঁচার এছাড়াও বিভিন্ন আন্ডারগ্রাউন্ড কাজের সাথে যুক্ত আছে। এক কথায় আন্ডারগ্রাউন্ড এর সব কাজই ওনার কথায় চলে। আর তার কাজের পথে কেও দাঁড়ালে তাকে মেরে ফেলতেও দু বার ভাবেন না! আর ওনার এক মাত্র ছেলে রনি সেও সারাক্ষণ প্যাবে পড়ে থাকে। এছাড়াও খবর আছে অনেক মেয়েই ওনার হাতে নির্যাতনের শিকার হয়েছে! কিন্তু কেউই কোনো প্রতিবাদ করতে পারে নি। যে এসেছে তাকেই মেরে ফেলেছে। পুলিশ ডিপারমেন্ট ও এ ব্যাপারে কোনো কিছুই করতে পারে নি। সবারই প্রাণের ভয় আছে। সাথে পরিবার ও। তাই কেউ আর এই কেস টা নিয়ে এগোতে চাই নি!

অদ্রি : আচ্ছা ঠিক আছে! ফাইল টা টেবিল এর ওপর রেখে চলে যাও!

আদৃত : মেম একটা কথা বলবো! যদি কিছু মনে না করেন!

অদ্রি : হ্যাঁ বলো!

আদৃত ;: মেম এই কেস টা তো কেউই নিতে চাইছিল না কিন্তু আপনি নিজে যেচে কেস টা নিতে চাইছেন! সি আইডি ডিপারমেন্ট এর বেশির ভাগ অফিসার কেস টা রিজেক্ট করে দিয়েছে।


~• আদৃত বহু সংকোচে কথা গুলো বললো।
আদৃত এর কথা শুনে অদ্রি বাকা হাসলো। ঠোঁটে লেগে আছে শয়তানি হাসি।

অদ্রি : আদৃত অন্যান্য অফিসার দের পিছুটান আছে ফ্যামিলি আছে তাই তাদের প্রাণের মায়া বেশি! কিন্তু আমার কেউ নেই আমি সম্পূর্ণ একা! তাই আমি আমার প্রাণের মায়া করি না! দেশের জন্য আমি প্রাণ দিতে প্রস্তুত তবে বিপক্ষ দল কে ধ্বংস করে! আর এমনিতেও মৃন্ময় সেন কে আমি বাঁচতে দিই কি করে! ওর সঙ্গে তো আমার বহু বছরের সম্পর্ক! ওকে শেষ করতে না পারলে আমার নিজেকে প্রস্তুত করাই বৃথা হয়ে যাবে !

~• শেষের কথা গুলো অদ্রি বিড়বিড় করে বলতে থাকলো।

আদৃত : কি বলছিস! থুক্কু মেম কিছু বলছেন! শুনতে পাচ্ছি না!

অদ্রি : শুনতে পাবে কি করে! বাইক এ মেয়ে নিয়ে ঘুরলে কি আমার কথা শুনতে পাবে!

~• আদৃত অদ্রির কথা শুনে চমকে উঠলো। মেম এটাও দেখে ফেলেছে। কি করে দেখলো। মেম এর নিশ্চয়ই চারটে চোখ ঠিক সবকিছু দেখে নেই। না এখন মানে মানে এখান থেকে কেটে পড়তে হবে! না হলে ভাগ্যে অশেষ দুর্গতি আছে! ভগবান একটা মোটা দড়ি ফালাও আমাকে উঠায় নও ! মেম তার শাকচুন্নি কি না!
আদৃত অদ্রির দিকে তাকিয়ে একটা কেবলা মার্কা হাসি দিলো।

আদৃত : আর মেম কি যে বলছেন! আসলে আমি রাস্তা দিয়ে যাচ্ছিলাম দেখি না মেয়েটা দাড়িয়ে আছে বাসের জন্য! আমি তো দেশের জন্য কাজ করি বলুন! ভাবলাম মেয়েটাকে একটু নাহয় সাহায্য করি!
নাহলে ধরুন মেয়েটা ওখানেই বাসের জন্য অপেক্ষা করতে করতে অজ্ঞান হয়ে গেলো। তখন এম্বুলেন্স আসবে! হাসপাতালে নিয়ে যাবে! টাকা খরচা হবে! ওর চিকিৎসার জায়গায় তখন আরেকজনের চিকিৎসা হয়ে যাবে! শুধু শুধু দেশে কি করে ঝেমেলা বাড়তে দিই বলুন তো! আমারও তো কিছু কর্তব্য আছে নাকি! আর...

অদ্রি : থাক ! আমি আর শুনতে চাচ্ছি না ! আমার মুম্বাই এর ফ্লাইট কবে ?

আদৃত : মেম আপনার এসিপি সাহেব ফ্লাইট এর টিকিট কাটতে বারণ করেছে! সে নাকি আপনাকে একা ছারতে পারবে না!

অদ্রি : উফফ! তোমার এসিপি সাহেব কে নিয়ে আমি আর পারি না! আচ্ছা কোথায় এখন তোমাদের এসিপি সাহেব!

আদৃত : মেম বাবা থুক্কু স্যার ওনার ডেস্ক এ আছে!

অদ্রি : আচ্ছা ! তুমি এবার আসতে পারো!

আদৃত : ওকে মেম আসি তাহলে!

`~• আদৃত দরজা খুলে বেরিয়ে গেলো। অদ্রি এদিক ওদিক তাকাতে চোখ পড়লো ফাইল টার দিকে! এগিয়ে এসে ফাইল টা তুলে নিলো সে! ফাইল টা খুলতেই সামনের ব্যক্তির ছবি টা দেখার সাথে সাথে ওর চোখ রক্তিম বর্ণ ধারণ করলো! এই চোখ  কাউকে ভস্ম করে দিতে সক্ষম! চোখের সামনে আবারো ভেসে উঠছে কিছু ভয়ংকর অতীত!

অদ্রি : আমি ফিরে আসছি! মিস্টার মৃন্ময় সেন! তোমার মৃত্যু আমারই হাতে লেখা ! যারা যারা আমার বাবা মাকে মেরেছে আমার আদুরে ভাইকে আমার থেকে কেড়ে নিয়েছে তাদের আমি এই অদ্রি এমন মৃত্যু দেবো যা কল্পনারও বাইরে! তোমাদের মৃত্যু ঘনিয়ে আসছে ক্রমশ! মেরে ফেলবো সবকটা কে সবকিছু শেষ করে দেবো! সব কিছু! হা হাহা!


~• অদ্রি উদ্মতের মতো হাসতে লাগলো! তাকে দেখতে কোনো হিংস্র পশুর থেকে কম কিছু লাগছে না!
কোথায় গেলো তার ভাই ? সেদিন কি বা হয়েছিল? তার সেই জঘন্য অতীতের কেমন ছিল? পৃথা থেকে অদ্রি হওয়ার ঘটনায় বা কেমন ছিল? তার ভবিষ্যত ই বা কি? তার ভাই এখন কোথায়?


চলবে....
কেমন হয়েছে জানাবেন প্লিজ ? । ভালো লাগলে অনুসরণ করে পাশে থাকবেন। ধন্যবাদ!

hradhanhardhan834348

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