सपनों की कीमत
एक लड़की की पहचान, उसके संघर्ष और समाज की तयशुदा परिधि की कहानी
बाहर से आती हल्की-सी ठंडी हवा और रात की चाँदनी से कमरा हल्का-हल्का रोशन हो रहा था। पर्दे हवा से टकराकर जैसे कोई धीमी-सी धुन बना रहे थे। चाँदनी की रोशनी कमरे में लगे उन नोट्स पर पड़ रही थी, जिन्हें कभी रोशनी ने बड़े उत्साह से बनाया था। कभी यही नोट्स उसकी मेहनत और उसके सपनों की गवाही देते थे। लेकिन आज उन्हें देखते हुए उसकी आँखें जैसे किसी और ही कहानी को बयान कर रही थीं। आँखों में आँसू नहीं थे, फिर भी लगता था जैसे कोई सैलाब भीतर आकर थम गया हो।
सामने टेबल पर रखी कुछ तस्वीरें उसके आने वाले जीवन की ओर एक नया रास्ता दिखा रही थीं। नया रास्ता.. या अपने सपनों को समेटकर किसी और के सपनों को सजाने की जिम्मेदारी?
रोशनी भारी मन से उठी और एक-एक कर अपनी किताबें समेटकर बॉक्स में रखने लगी। किताबें उठाते हुए उसकी उँगलियाँ कई बार ठहर जातीं। कभी किसी किताब के पन्ने पर उसकी नजर टिक जाती, कभी किसी नोट पर। इन किताबों के बीच बैठकर उसने न जाने कितनी रातें गुजारी थीं। कभी इन्हीं पन्नों में उसे अपना आने वाला कल दिखाई देता था। आज वही पन्ने उसके सामने थे, लेकिन उसका वह कल कहीं धुंधला पड़ चुका था। आँखों से गिरते आँसू उसके हाथों की रफ्तार को बार-बार रोक रहे थे। फिर भी वह चुपचाप किताबें समेटती रही।
उसी दौरान उसकी नजर सामने रखी एक पुरानी फोटो पर पड़ी। फोटो में वह मुस्कुरा रही थी। उस उम्र की मुस्कान, जिसमें भविष्य को लेकर डर कम और सपनों को लेकर भरोसा ज्यादा होता है। रोशनी कुछ पल उस तस्वीर को देखती रही। फिर उसने नजरें फेर लीं। जब आखिरी किताब बॉक्स में रखकर वह टेबल के पास पहुँची, तो सामने रखी तस्वीरों पर उसकी नजर ठहर गई। गले में कुछ अटक-सा गया। मन के किसी कोने से एक सवाल उठा—अगर एक लड़की सरकारी नौकरी हासिल न कर पाए, तो क्या उसके सारे सपने भी खत्म हो जाते हैं?
वह वापस बिस्तर पर आ बैठी और अपनी डायरी के पन्ने पलटने लगी। एक-एक पन्ने पर उसकी जिंदगी का कोई न कोई हिस्सा दर्ज था—कहीं खुशी, कहीं उदासी, कहीं ऐसे सपने जिन्हें उसने कभी किसी से कहने की हिम्मत तक नहीं की थी। एक पन्ने पर आकर उसका हाथ अचानक रुक गया। वह उसके उस बिजनेस आइडिया का पन्ना था, जो कभी उसकी आँखों की चमक हुआ करता था। उसने उँगलियों से उस पन्ने को धीरे से छुआ। और फिर उसे वह दिन याद आ गया।
वह डरी हुई थी, लेकिन उम्मीद उससे कहीं ज्यादा थी। उसने घरवालों के सामने बैठकर पहली बार अपने बिजनेस आइडिया के बारे में बताया था। उसे लगा था कि उसका परिवार उसे समझेगा। आखिर वह पढ़ी-लिखी फैमिली से थी। शायद उसे अपने सपने के लिए बहुत ज्यादा समझाना नहीं पड़ेगा। लेकिन पापा और भाई की आवाज़ ने उसकी उम्मीद वहीं रोक दी थी।
"सीधी-साधी पढ़ाई तो हो नहीं रही और बिजनेस करोगी?" भाई हँस पड़ा था।
रोशनी भी उस वक्त हल्का-सा मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। लेकिन वह मुस्कान ज्यादा देर नहीं टिक सकी। वह बात मज़ाक में कही गई थी या ताने में, रोशनी आज तक तय नहीं कर पाई थी। लेकिन इतना जरूर जानती थी कि वह सीधे उसके दिल पर लगी थी।
वह पढ़ाई में अपने भाई-बहनों जितनी अच्छी नहीं थी। शायद उसे पढ़ाई उतनी पसंद भी नहीं थी। लेकिन क्या इसका मतलब यह था कि उसके भीतर कोई सपना नहीं हो सकता था? कुछ दिन उसने रोया। कभी डायरी खोलती, कभी बंद कर देती। कभी अपने बिजनेस आइडिया को देखती और सोचती कि शायद किसी दिन घरवाले मान जाएँगे। फिर धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि बिजनेस के लिए परिवार को मनाना आसान नहीं होगा।
एक दिन बातों-बातों में उससे यह भी कह दिया गया—"हम तुम्हारी शादी करें या बिजनेस करवाएँ? इतने पैसे नहीं हैं कि तुम पर फालतू में खर्च करें। हाँ, अगर सरकारी नौकरी की तैयारी करनी है तो कोई दिक्कत नहीं।"
उस दिन रोशनी कुछ नहीं बोली। बस अपने कमरे में आकर देर तक चुप बैठी रही। उसने डायरी खोली। बिजनेस वाले पन्ने को देखा। फिर धीरे से उसे बंद कर दिया। उस दिन उसे पहली बार लगा कि उसके सपने के लिए भी जैसे कोई कीमत तय कर दी गई थी—सरकारी नौकरी हो तो सपना सही है नहीं तो सपना ही ठीक नहीं।
उसके सामने अब अपने सपने तक पहुँचने का जैसे एक ही रास्ता बचा था—सरकारी नौकरी। अगले ही दिन उसने अपने कमरे को किताबों के कमरे में बदल दिया। टेबल पर किताबें थीं। दीवारों पर नोट्स। और आँखों के सामने एक ही मंज़िल—सरकारी नौकरी। वह अपने सपने को बचाने की आखिरी कोशिश करना चाहती थीं। उसने खुद को पूरी तरह पढ़ाई में झोंक दिया। दिन किताबों के बीच गुजरते और रातें आने वाले कल की चिंता में।
उसने कई परीक्षाएँ दीं। कुछ में सफल भी हुई, लेकिन मंज़िल हर बार जैसे एक कदम आगे खिसक जाती। कभी परीक्षा समय पर नहीं हुई। कभी कुछ अंकों से बात रह गई। कभी परिणाम ने उसका साथ नहीं दिया। और कभी उसे खुद समझ नहीं आता था कि आखिर कमी कहाँ रह गई। दो-तीन साल कब बीत गए, उसे पता ही नहीं चला। हर बार रिजल्ट के दिन वह उम्मीद लेकर स्क्रीन के सामने बैठती। नाम खोजती। कुछ सेकंड के लिए साँस रोक लेती। फिर स्क्रीन पर अपना नाम न देखकर धीरे से फोन नीचे रख देती।
धीरे-धीरे उसे असफलता से ज्यादा डर इस बात का लगने लगा कि अगली बार घरवालों के सामने क्या कहेगी। वह अंदर ही अंदर टूट रही थी। लेकिन घरवालों के लिए तस्वीर कुछ और थी। एक शाम पापा ने किसी रिश्तेदार से फोन पर कहा—"मेहनत तो बहुत कर रही है। बस नौकरी लग जाए तो सब ठीक हो जाएगा।"
रोशनी पास ही बैठी थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस अपने हाथ में पकड़ी किताब को और कसकर पकड़ लिया। उसे अचानक लगा, जैसे उसकी सारी मेहनत का मतलब सिर्फ एक परिणाम तक सिमट गया हो। लेकिन उसने फिर किताब खोल ली। क्योंकि उसके पास और रास्ता था ही कहाँ?
कुछ ही दिनों बाद रोशनी के लिए जैसे एक और इम्तिहान की तैयारी होने लगी—उसकी शादी। जब उसने परिवार से कहा कि वह अभी और पढ़ना चाहती है, तो उसे उम्मीद थी कि कम से कम इस बार उसकी बात सुनी जाएगी। आखिर उसने पिछले दो-तीन साल अपनी पूरी मेहनत लगा दी थी। लेकिन जवाब वही नहीं था जिसकी उसे उम्मीद थी।
"इतनी बड़ी उम्र तक कौन पढ़ता है? हमने पढ़ाया, तुम्हारी नौकरी नहीं लगी तो क्या शादी नहीं करोगी? नौकरी तो होती रहेगी, शादी जरूरी है। आखिर समाज में भी तो जवाब हमें देना होता है। तुम्हें क्या?"
रोशनी चुप रही। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले, लेकिन आवाज़ बाहर नहीं आई। उसे अचानक याद आया—कुछ साल पहले जब उसने बिजनेस की बात की थी, तब भी उसे यही समझाया गया था कि पहले सरकारी नौकरी। उसने वह रास्ता भी चुना था। अपनी पसंद छोड़कर पूरी मेहनत भी की थी। लेकिन अब जब उस रास्ते पर मंज़िल नहीं मिली, तो उसके लिए एक नया रास्ता चुन लिया गया था। इस बार उसकी पसंद पूछे बिना।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। "रोशनी..."
वह जल्दी से अपनी आँखें पोंछकर उठी और दरवाज़ा खोलने चली गई। सामने माँ खड़ी थीं। उनके हाथ में वही तस्वीरें थीं, जिन्हें रोशनी कुछ देर पहले टेबल पर देख रही थी। माँ ने कमरे में आते हुए सहजता से पूछा—"बेटा, कोई पसंद है या नहीं? वैसे दो-तीन दिन में कुछ लोग तुम्हें देखने आने वाले हैं।"
रोशनी कुछ पल माँ को देखती रही। उसके मन में आया—पूछूँ, तो फिर मेरी पसंद क्यों पूछ रही हो, जब सब पहले से तय हो चुका है? लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हें पूछने की हिम्मत इंसान के अंदर धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। उसने तस्वीर की तरफ देखा। फिर माँ की तरफ। और बस हल्का-सा सिर हिला दिया। "हाँ.."
माँ मुस्कुराईं। तस्वीर टेबल पर रखकर वह कमरे से बाहर चली गईं। दरवाज़ा बंद हुआ। कमरे में फिर वही ठंडी हवा भरने लगी।
रोशनी कुछ देर दरवाज़े को देखती रही। फिर धीरे से वापस बिस्तर पर आकर लेट गई। छत को देखते हुए उसके मन में एक और सवाल उठने लगा—अगर उसका भाई नौकरी नहीं करता, तो क्या उसके सपने खत्म हो जाते? नहीं। शायद उसके पास और रास्ते होते। वह बिजनेस करना चाहता तो परिवार उसके बारे में सोचता। कोई काम शुरू करना चाहता तो उसे थोड़ा समय दिया जाता। असफल होता तो शायद उसे फिर कोशिश करने का मौका मिलता।
लेकिन रोशनी? उसके लिए हर रास्ते के बीच एक ही शब्द जैसे खड़ा था—नौकरी। पहले नौकरी। फिर अपने फैसले। फिर अपने सपने। फिर शायद यह तय करने का अधिकार कि शादी कब करनी है, क्या करना है और किस तरह की जिंदगी जीनी है।
रोशनी ने करवट बदली। उसे यह बात गलत नहीं लगती थी कि अपने पैरों पर खड़ा होना जरूरी है। गलत बस यह लगता था कि उसके अपने फैसलों की कीमत उसकी नौकरी से क्यों तय की जा रही थी। कुछ देर बाद वह उठकर टेबल के पास गई। वही पुरानी तस्वीर अब भी वहीं रखी थी। और उसके पास उसकी डायरी।
रोशनी ने डायरी खोली। वही पुराना पन्ना सामने था। बिजनेस आइडिया। उसने कुछ देर उस पन्ने को देखा। फिर धीरे से डायरी बंद कर दी। कुछ पल वह वैसे ही खड़ी रही। फिर उसकी नजर उस बॉक्स पर गई जिसमें उसने अपनी सारी किताबें रख दी थीं। वह नीचे बैठी। बॉक्स खोला। सबसे ऊपर रखी किताब बाहर निकाली। उसने किताब को देखा। इस बार वापस नहीं रखा।
वह किताब लेकर टेबल पर आ बैठी। डायरी खोली। बिजनेस वाले पन्ने के बाद एक खाली पन्ना था। रोशनी ने पेन उठाया। कुछ देर तक खाली पन्ने को देखती रही। फिर उसने पहली बार उस पन्ने पर किसी परीक्षा, नौकरी या शादी के बारे में नहीं लिखा। उसने सिर्फ इतना लिखा—"मुझे अपनी जिंदगी के बारे में क्या चाहिए?"
पेन कुछ पल रुका। फिर उसके नीचे उसने एक और शब्द लिखा—“मैं”।
खिड़की से आती ठंडी हवा ने डायरी के पन्ने को हिला दिया। रोशनी ने हाथ रखकर उसे थाम लिया। सामने रखी पुरानी तस्वीर में वह लड़की अब भी मुस्कुरा रही थी। वही लड़की, जिसके सपने कभी बहुत बड़े नहीं थे। बस अपने थे। शायद जिंदगी ने उसके बहुत से रास्ते बदल दिए थे। शायद कुछ सपने पीछे छूट गए थे। लेकिन पहली बार उसे लगा—हर सपना पूरा करना जरूरी नहीं।
उसने डायरी बंद नहीं की। पेन हाथ में ही रखा। और उस रात रोशनी ने पहली बार किसी नौकरी के परिणाम का इंतज़ार नहीं किया। उसने अपने अगले पन्ने का इंतज़ार किया।
एक एहसास
कभी-कभी अपनों के लिए रास्ते चुनते-चुनते हम यह भूल जाते हैं कि शायद उन्हें किसी तय रास्ते की नहीं, अपने रास्ते को चुनने की आज़ादी चाहिए।
☆ अनामकारा