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Gajendra Kudmate

Gajendra Kudmate

@kudmate.gaju78gmail.com202313
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कभी किसी पेड़ की छाँव हीं
उसकी दुश्मन बन जाती हैं।
कभी अनजाने में हीं उसके
क़ातिल को पनाह दे जाती हैं।

गजेंद्र

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दस्तूर जहाँ का सभी को
निभाना पड़ता हैं
ग़म दबाकर सीनें में
मुकुराना पड़ता हैं

गजेंद्र

मैं भीं बन जाऊँगा कभी
औरों के लिए एक किस्सा
वो भी दोहराएँगे मुझको जो
न रहें कभी मेरे कल का हिस्सा

गजेंद्र

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दामन था हमनें थाम लिया
नशा-ए-बेख़ुदी का
देखा था हमनें हात जब
उसके हाथ में ओर किसी का

गजेंद्र

हमनें देखा हैं अपनीं आँखों से
इक दिल के टूटने का मंज़र
जब अपनें हीं उतार देते हैं
अपनों के हीं सीनें में खंजर

गजेंद्र

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क़त्ल तो होता हैं क़त्ल
चाहे नज़रों से हो या कटार से
बंदा हो जाता हैं फ़ना
सटीक इसके एक वार से

गजेंद्र

आईना भी अब मुझसे
बेवफ़ाई करने लगा हैं।
झूठ भी इंसानों की तरह
सफ़ाई से कहने लगा हैं।

गजेंद्र

पलभर जरा मुस्कुराकर उसनें
सबकुछ था मेरा छीन लिया
दिल की कोरी क़िताब का
हर पन्ना था उसनें गिन लिया

गजेंद्र

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जहाँ में हर बंदे को सबसे
पहले इंसान होना चाहिए
उसके पास कुछ हो ना हो
मगर ईमान होना चाहिए

गजेंद्र

फटी ज़ेब को देखकर
मैं परेशान हो गया था
चंद रुपयों की बात न थी
मेरा ईमान खो गया था

गजेंद्र