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Nihal singh

Nihal singh

@nihalsinghsingh.134307


मैंने देखा तो वो मेरे ख़िलाफ़ खड़ा था,
फिर पता चला वो मेरी तरफ़ से लड़ के गया।

लगा कि उसने मुझे बीच राह छोड़ दिया,
वो मुझको मेरे ही पैरों पे खड़ा कर के गया।

मैंने सोचा था कि वो जीत कर खुश होगा बहुत,
वो मेरी हार पे चुपचाप रो के गया।

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तर्जुमा-ए-दर्द



किस भी ख़बर में कोई मर्सिया नहीं मिलता,
हमें तो इस शहर में अपना पता नहीं मिलता।

सफ़्हों पे दर्ज हैं तामीर के हज़ारों बयाँ,
मगर मकानों में अब आसरा नहीं मिलता।

अजब निज़ाम है, अहल-ए-सुख़न भी ख़ामोश हैं,
किसी सवाल का खुलकर जवाब नहीं मिलता।

तमाम उम्र जिसे ढूँढ़ते रहे हम लोग,
वो एक सच है जो दस्तावेज़ में नहीं मिलता।

फ़क़त नज़र का नहीं, ज़ेहन का भी है मसअला,
हर एक शख़्स को यहाँ आईना नहीं मिलता।

'निहाल' किससे करें अह्द-ए-वक़्त का शिकवा,
यहाँ तो दर्द का भी तर्जुमा नहीं मिलता।
✍🏻 — Nihal Singh

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