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मैं तेरा मुखड़ा पढ़ना हूॅं...(मेरी वृहद कविता 180 पंक्तियों की उसमें से 6 पंक्तियॉं आपके सामने प्रस्तुत की...)
ग़ज़ल: एक आत्मा की अधूरी आवाज़ कवि / शायर:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि' भटकती फिर रही है रूह, अभि कोई तो सदा दे दे, जो इस तन्हाई से रोके, मुझे ऐसी कोई दवा दे दे।-१ ये कैसा हश्र है मेरा, न ज़िंदा हूँ न मुर्दा हूँ, कोई आए क़रीब मुझको जीने की दुआ दे दे।-२ हवाएँ सनसनाती हैं तो दिल धड़कता है मेरा, कोई इस थरथराहट को ज़रा-सा आसरा दे दे।-३ चले थे जिस तरफ़, उस राह का कोई सिरा ही नहीं, मुसाफ़िर थक गया है, अब तो कोई रास्ता दे दे। -४ सुलगती आग है भीतर, धुआँ बाहर नहीं आता, ये कैसा दर्द है जिसका कोई भी वास्ता दे दे। -५ मैं सदियों से अकेलेपन के इस साए में ज़िंदा हूँ, मुझे इस क़ैद से कोई मसीहा अब तो रिहा दे दे। -६ ज़माने भर के मेले में अकेले ही रहे हम तो, जो मेरा दर्द समझ सके, मुझे वो आश्ना दे दे। -७ पुकारा था जिसे मैंने, वो मुड़कर देख भी न पाया, मेरी आवाज़ खोई है, अभि कोई तो इब्तिदा दे दे। -८ ये सन्नाटा मुझे अंदर ही अंदर खाए जाता है, कोई आकर मेरे घर का दीया फ़िर से जला दे दे। -९ मैं उस चौखट पे बैठा हूँ जहाँ कोई नहीं आता, जो मेरे नाम की तख्ती वहाँ आकर लगा दे दे। -१० बिछड़कर आपसे हम इस तरह बर्बाद बैठे हैं अभि, कि जैसे कोई लहर कश्ती को साहिल पे डुबा दे दे। -११ अधूरी आस है मेरी, अधूरी हर कहानी है, जो इस अधूरेपन को एक मुकम्मल दास्ताँ दे दे। -१२ लिखा था नाम जिसका दिल पे, वो भी मिट गया आख़िर, कोई इस कोरे कागज़ को नया एक आशिया दे दे। -१३ गले में घुट रही है चीख़, पर आवाज़ मद्धम है, मेरी इस बेबसी को कोई चीख़ने की वफ़ा दे दे। -१४ कवि / शायर:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
त्यागना सीखो...
कुछ सुना है.....
जब किसी का पतन नज़दीक होता है तो, प्रकृति और समय उसे भरपूर मौका देतें हैं अत्याचार करने का...... और वह भी जी भरकर अत्याचार करता है, फिर प्रकृति उस समय की प्रतीक्षा करती है और वही प्रकृति समय के साथ मिलकर उसका सर्वनाश कर देती है। - Abhishek Chaturvedi
लड़खड़ाते कम और दिल की जुबां.....
एक वाक्य बस _ ( मॉं )
बैसाखी की धूप में, अभि सोना झरे खेत, मेहनत रंग लायी यहाँ, खिल उठे हर चेत। ढोल नगाड़े गूँजते, यहॉं नाचे गाँव-समाज, हँसी-खुशी के रंग में, भींगा हर एक आज। धरती माँ के आँचल में, अन्न भरा अपार, किसान के मुख पर सजे, संतोषी श्रृंगार। पसीने की हर एक बूंद, बनती मीठा फल, मेहनत से ही जग में, मिलता सच्चा बल। आशा की हर किरण से, जीवन हो उजियार, बैसाखी का ये पर्व है, खुशियों का त्योहार।
आदमी कर्मों से बनाता है.....
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