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Abhishek Chaturvedi

Abhishek Chaturvedi Matrubharti Verified

@abhi006
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ख़ामोशी की ताक़त ( ग़ज़ल:-१ )
कवि / शायर :- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'


शोर-ओ-गुल में कहाँ मिलती है सदा सच्चाई की,
मैंने सीखी है हुकूमत इसी तन्हाई की।

वो जो कहते हैं कि लफ़्ज़ों में है ताक़त सारी,
उनको क्या इल्म कि क्या ज़द है इस दानाई की।

लब कुशा होने से अक्सर ही बिगड़ती है बात,
चुप ने रखी है हमेशा ही भरम गहराई की।

ज़ुल्म सहकर जो न बोले वो बुज़दिली है मग़र,
सब्र की चुप ही इबादत है मसीहाई की।

शोर से टूट के गिर जाते हैं महलों के ग़ुरूर,
ख़ामोशी नींव हुआ करती है परछाई की।

ज़िन्दगी! तूने सिखाया है सलीका 'अभि' को,
गुफ्तगू अब तो ज़रूरत नहीं रहनुमाई की।


जो न समझे वो इबारत ही अधूरी जानो,
चुप ही व्याख्या है मेरे दिल की पज़ीराई की।

तंज की धार से घायल नहीं होता है अभि,
मार है सबसे कड़ी चुप की और रुसवाई की।

बातों-बातों में छलक जाते हैं खाली बर्तन यहॉं
गंभीरता ही निशानी है ज़र्फ़-ओ-इलाही की।

जिसने सन्नाटे के मफ़हूम को समझ लिया,
जीत पक्की है उसी शख़्स की, उसी राही की।

वक़्त बोलेगा गवाही में तुम्हारी 'अभि',
तुम बस आदत न छोड़ना अपनी शकीबाई की।

कवि / शायर :- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'

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हम कभी ख़ास थे ,
अभि ये उनके अल्फ़ाज़ थे....💔
- Abhishek Chaturvedi

तुम्हें अगर सुकून से रहना है तो......

मेरी नफ़रत.......💔🌹💔

💔

कितनी मुश्किल के बाद टूटा है,
वो एक रिश्ता....
जो कभी था ही नहीं......💔
- Abhishek Chaturvedi

कितनी मुश्किल के बाद टूटा है,
वो एक रिश्ता....
जो कभी था ही नहीं......💔

*रिटायर पापा* (कविता)। © अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'


कितने ज्यादा बदल गए हैं,
जब से हुए रिटायर पापा
भीतर-भीतर बिख़र गए हैं,
सधे हुए हैं बाहर पापा।

कड़कदार आवाज़ रही जो,
अब धीमी हो गयी अचानक
अभि समझौतों की लाचारी ,
जीवन का लिख रही कथानक
घर के न्यायाधीश कभी थे,
न्याय माँगते कातर पापा।

बेटे - बहुएँ आँख परखते
थे, लेकिन अब आँख दिखाते
चले पकड़ कर जो उँगली को,
वे उँगली पर आज नचाते।
बच्चों की रफ़्तार तेज़ है,
घिसे हुए से टायर पापा।

माँ अब पहले से भी ज्यादा
देख-रेख पापा की करतीं
नहीं किसी से कभी डरी माँ,
लेकिन अब बच्चों से डरती।
घर में रहकर भी लगते हैं
जैसे हों यायावर पापा।

पापा को आनन्दित करतीं
नाती - पोतों की मुस्कानें
मन मयूर भी लगें थिरकने,
मिल जाते जब मित्र पुराने।
कहाँ गया परिवार, प्रेम अब,
जिस पर रहे निछावर पापा।

कितने ज्यादा बदल गए हैं,
जब से हुए रिटायर पापा।
भीतर-भीतर बिखर गए हैं,
सधे हुए हैं बाहर पापा
© अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'

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कमी और ग़लती हर रिश्ते में होती है,
कमी और ग़लती ठीक बस वही करता है,
जो उन रिश्तो को खोने की क़ीमत जानता है।
- Abhishek Chaturvedi

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