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prachi Gurjar

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@prachitanwar111
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"शुरुवात"

कुछ ख़त्म करने के लिए,
पहले एक शुरुआत ज़रूरी है।

और अगर शुरुआत ही न हो,
तो क्या कोई अंत...
दर्दनाक हो पाएगा?
सुखद हो पाएगा?
या ख़ूबसूरत भी हो पाएगा?

पूछो उस बारिश की बूंद से,
जो आज समंदर बनकर बह रही है।

कैसे बादलों की कोख में छटपटाई होगी,
गिरने से पहले कितनी बार डरी होगी।
कैसे कतरा-कतरा,
ज़मीन की ठोकरें खाकर,
धूल में लोटकर,
फिर भी बहती रही होगी।

और एक दिन,
खुद को खोकर ही,
उसने समंदर में नई शुरुआत पाई होगी।

हम भी वही बूंद हैं।
जब तक बादल में हैं, सुरक्षित हैं।
जब तक रास्ते का पत्थर हैं, इस्तेमाल हो रहे हैं।

पर असली चमक,
असली मुकाम,
असली अंत...
तभी आता है
जब हम गिरने की हिम्मत करते हैं।

इसलिए डरो मत।
शुरुआत करो।
क्योंकि हर ख़ूबसूरत अंत की,
पहली सीढ़ी...
एक डरती हुई शुरुआत ही होती है।
प्राची गुर्जर……

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“पत्थर की यात्रा”

एक दिन  
रास्ते पर मेरा पाँव एक पत्थर से टकराया।  
मैंने देखा नहीं।  
बस ठोकर मार दी।  
एक बार, फिर बार-बार।  

और वह मेरे साथ चलता रहा।  
मुझे लगा मैं खेल रही हूँ।  
शायद उसे भी यही लगा।  

जब मेरी मंज़िल आ गई,  
मैं भीतर चली गई।  
वह वहीं छूट गया  
धूल में, खरोंचों से भरा।  
उस पर मेरे पैरों के निशान थे।  
और दुनिया की मिट्टी।  

फिर कोई और आया।  
फिर कोई और ठोकर।  
फिर कोई और सफ़र।  

शायद कुछ पत्थरों की तक़दीर में  
चलना नहीं लिखा होता।  
सिर्फ घिसटना लिखा होता है।  

पर हर रास्ता एक-सा नहीं होता।  

एक दिन एक ज़ोर की ठोकर ने  
उसे सड़क से उठाकर नदी में फेंक दिया।  
वह डर गया।  
वह तो रास्ते का था, पानी का नहीं।  

नदी ने कुछ नहीं पूछा।  
बस बहती रही।  
और उसकी देह से धूल धोती रही।  
सालों की खरोंचों में  
ठंडा पानी भरती रही।  

वहाँ उसे अपने जैसे और पत्थर मिले।  
कोई पहाड़ से टूटा था,  
कोई मंदिर से।  
सबके पास अपनी टूटन थी।  
इसलिए किसी ने किसी का दर्द नहीं पूछा।  

वक़्त बहता रहा।  
नदी बहती रही।  
वह भी बहता रहा।  

और एक दिन  
जब उसने पहली बार समुद्र देखा,  
तो भूल गया कि कभी वह  
किसी की ठोकर था।  

अब वह धूल से खाली था।  
खरोंचों से मुक्त था।  
शांत था।  
चमकता हुआ।  
अपनी ख़ामोशी में पूरा।  

तब समझ आया  
हम भी पत्थरों जैसे होते हैं।  

कुछ लोग हमें रास्ते में  
ठोकर समझकर साथ रखते हैं।  
और मंज़िल आते ही छोड़ जाते हैं।  

उस वक़्त लगता है यही अंत है।  

पर अक्सर…  
वहीं से नदी शुरू होती है।  

जो रास्तों पर छूट जाते हैं,  
वही एक दिन  
समुद्र तक पहुँचकर  
मोती नहीं बनते,  
पर अपनी चमक ज़रूर पा लेते हैं।
प्राची गुर्जर…..

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“पेड़  “

मुझे हमेशा से पेड़ अच्छे लगे हैं।

फूलों की तरह उन्हें किसी की नज़र में रहने की जल्दी नहीं होती।  
वे बस… खड़े रहते हैं।

धूप अपने हिस्से की सहते हैं,  
और छाँव दूसरों के हिस्से में लिख देते हैं।

मैंने कभी किसी पेड़ को अपने फल खाते नहीं देखा।  
वह सारी उम्र भरता किसी और के लिए है।

शायद प्रेम भी कुछ ऐसा ही होता होगा।  
जिसमें अपना होना कम, किसी और का बच जाना ज़्यादा ज़रूरी हो।

बचपन में मैं पेड़ों से बातें किया करती थी।  
उनकी छाल पर अपनी उँगलियाँ फिराकर पूछती, “दर्द होता है?”

वे कभी जवाब नहीं देते थे।  
अब समझती हूँ… जो सच में मज़बूत होते हैं, वे अपने घावों की आवाज़ नहीं करते।

कई लोग पेड़ों को लकड़ी समझते हैं।  
मैंने हमेशा उन्हें बुज़ुर्गों की तरह देखा।  
जो कम बोलते हैं, मगर पूरी उम्र सबका बोझ उठाते हैं।

एक दिन मैंने देखा,  
आँधी में सबसे पहले पेड़ की टहनियाँ टूटी थीं।

तब पहली बार समझ आया,  
जो सबसे ज़्यादा दूसरों को संभालता है,  
उसे ही सबसे पहले हवाओं से लड़ना पड़ता है।

अगर कभी मैं अगला जन्म माँगूँ,  
तो फूल नहीं बनना चाहूँगी।  
नदी भी नहीं।

मैं… एक पेड़ बनना चाहूँगी।

ताकि जिसे दुनिया थका हुआ कहकर गुज़र जाए,  
वह कुछ पल मेरी छाँव में बैठकर अपने आँसू रख सके।

क्योंकि जीवन की सबसे सुंदर उपलब्धि ऊँचा होना नहीं,  
किसी के लिए ठहरने की जगह बन जाना है।

प्राची गुर्जर…..

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“आसमान  “

लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं,  
तुम्हारी हर दूसरी कविता में आसमान क्यों उतर आता है?

मैं हर बार बस मुस्कुरा देती हूँ।

कैसे बताऊँ,  
ज़मीन ने मुझे चलना तो सिखाया,  
मगर हर कदम पर रुकने की वजह भी दी।

कभी रिश्तों के नाम पर,  
कभी मर्यादा के नाम पर,  
कभी इस डर से कि लोग क्या कहेंगे।

मैंने देखा है…  
ज़मीन हमेशा पाँव पकड़ती है।  
और आसमान… वह कभी हाथ नहीं पकड़ता, बस पुकारता है।

शायद इसलिए मुझे उससे मोहब्बत हो गई।

मैंने बचपन से बादलों में अपने चेहरे ढूँढे हैं।  
चिड़ियों की उड़ानों में अपनी अधूरी इच्छाएँ रखी हैं।

पतंग कटती थी, तो दुख मुझे होता था।  
क्योंकि धागा उसका नहीं, मेरा टूटता था।

मैंने कभी आसमान को छूने की ज़िद नहीं की।  
मैं तो बस इतना चाहती थी कि कोई मेरी उड़ान से डरे नहीं।

लोग कहते हैं, “तुम बहुत ऊँचा सोचती हो।”  
उन्हें कौन समझाए, ऊँचाई मेरी मंज़िल नहीं, मेरी साँस है।

जिस दिन मेरे हिस्से का आसमान मुझसे छिन जाएगा,  
उस दिन मैं ज़िंदा तो रहूँगी,  
मगर वैसी ही… जैसे पिंजरे में बैठी चिड़िया,  
जिसके पंख सलामत हैं, पर उड़ान नहीं।

इसलिए मेरी हर कविता में थोड़ा-सा आसमान रहता है।

क्योंकि धरती ने मुझे जन्म दिया है,  
पर… जीना मैंने हमेशा आसमान से सीखा है।

प्राची गुर्जर….

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“कैसे”
ये दिल के अरमान तुम तक पहुँचें,
 राहों में बिखरे हैं, जुड़ें तो जुड़ें कैसे।
ये साँसें मेरी होकर भी तुम पर ही ठहरी हैं,
 अब लौटकर मुझ तक मुड़ें तो मुड़ें कैसे।
तुम इश्क़ हो, धोखा हो, या मेरी ही दुआ हो,
 हम तुमको बिना पढ़े समझें तो समझें कैसे।
हर रोज़ तुम्हारी याद का मौसम उतरता है,
 हम अपने ही घर में ठहरें तो ठहरें कैसे।
तुम किसी और की दुनिया के चराग़ों में बसे हो,
 हम अपने अँधेरों को भरें तो भरें कैसे।
हमने तो तुम्हें रूह की तरह अपने भीतर रखा,
 अब ख़ुद से तुम्हें अलग करें तो करें कैसे।
तुम्हारे शहर से हर रोज़ गुज़रता है ख़याल मेरा,
 मगर उन गलियों में उतरें तो उतरें कैसे।
तुम्हें पाने की दुआ भी अब लबों पर नहीं आती,
 मगर दिल को ये बात कहें तो कहें कैसे।
तुम्हारे बाद भी धड़कन ने तुम्हारा नाम छोड़ा नहीं,
 अब इन धड़कनों को बदलें तो बदलें कैसे।
लोग कहते हैं कि वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है,
 जिस ज़ख़्म में तुम बसे हो, भरें तो भरें कैसे।
तुम किसी और के होकर भी मेरे ख़्वाबों में रहते हो,
 हम इन ख़्वाबों से जागें तो जागें कैसे।
एक उम्र से हम तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़े हैं,
 अब लौटकर अपनी ही तरफ़ चलें तो चलें कैसे।
प्राची गुर्जर….

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“समुंदर ….”

समुंदर की गहराई सबने देखी,  
किसी ने नहीं देखा समुंदर को।  
समुंदर का खुद को छुपाना,  
दुनिया से अपना सच छुपाना।

सबने देखा लहराता पानी,  
किसी ने नहीं सुनी उसकी अनकही कहानी।  
सबने गिनी उसकी लहरें,  
किसी ने नहीं गिने उसके ज़ख्म।

कभी सोचा है,  
समुंदर ने खुद को खाली क्यों नहीं रखा?  
हमेशा क्यों ओढ़े रखा पानी की चादर को ?

क्योंकि समुंदर नहीं चाहता था  
सरल भाव से दिखना सबको।  
वो चाहता था कुछ सिखाना।

कि वो अकेला नहीं है,  
उससे कई नदियाँ जुड़ी हैं।  
वो सबको अपने में समा लेता है,  
पर खुद कहीं नहीं समाता।  
अगर नदी उसकी गहराई देख ले,  
तो सहम जाएगी मासूम बच्चे सी।  
फिर कभी नहीं मुड़ेगी समुंदर की तरफ।

बेशक समुंदर अपने भीतर  
कई तूफान लिए फिरता है।  
शोर बाहर करता है,  
ताकि अंदर का सन्नाटा कोई न सुन ले।

अगर नन्हे बादलों ने तूफान देख लिए होते,  
तो कभी न आते वो समुंदर से उसके आँसू लेने।  
न गिरती फिर कोई बूंद जमीन पर,  
न खिलता फिर कोई पौधा कहीं पर।  
न बहती कोई नदी,  
न जीता कोई इंसान।

इसीलिए समुंदर चुप है,  
इसीलिए दुनिया ज़िंदा है।  
क्योंकि कुछ गहराइयाँ दिखाई नहीं जातीं,  
जि जाती हैं।
प्राची गुर्जर …..

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“पक्की मिट्टी….”

मैं सोचती हूँ
समाज को इतनी जल्दी क्यों रहती है
कच्ची उम्रों को ब्याह देने की

शायद इसलिए
क्योंकि कच्ची मिट्टी को आकार देना आसान होता है
उसे जिस साँचे में रखो
वह वैसी ही ढल जाती है
जिधर मोड़ो
उधर मुड़ जाती है

जिसे अपना आकाश भी नहीं मालूम
वह पिंजरे को ही दुनिया समझ लेती है

मैं सोचती हूँ
समाज को लड़कियों के बड़े होने से नहीं
उनके पक जाने से डर लगता है
क्योंकि धूप में पकी हुई मिट्टी
हर हाथ का कहा नहीं मानती

वह जानती है
कि उसे घड़ा बनना है
दीया बनना है
या फिर यूँ ही मिट्टी बने रहना है

कच्ची मिट्टी को
जल्दी जल्दी सौंप दिया जाता है
किसी और के हाथों में
ताकि वह पूछ न सके
मैं कौन हूँ
मुझे क्या बनना है
और मैं किस दिशा में बहना चाहती हूँ

क्योंकि सवाल करती हुई लड़कियाँ
समाज को कभी पसंद नहीं आईं
उसे तो हमेशा
वैसी मिट्टी चाहिए थी
जो चाक पर चढ़ते ही
अपनी इच्छा भूल जाए

लेकिन मैंने देखा है
कुछ मिट्टियाँ देर तक धूप में पड़ी रहती हैं
बारिशें सहती हैं
आँधियाँ सहती हैं
टूटती हैं
बिखरती हैं
फिर भी पकी रहती हैं

और फिर एक दिन
कोई कुम्हार उन्हें छूकर देखता है
तो समझ जाता है
अब यह मिट्टी
किसी साँचे में नहीं ढलेगी
अब इसका आकार
यह खुद चुनेगी

शायद इसी बात से
समाज सबसे ज्यादा डरता है
उसे देर से होने वाले विवाह से नहीं
अपने बारे में सोचने लगी स्त्री से डर लगता है

क्योंकि जिस दिन एक स्त्री
अपनी धूप में पक जाती है
उस दिन वह किसी की बनाई हुई मूर्ति नहीं रहती
वह अपनी ही रचना बन जाती है

प्राची गुर्जर….

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“माँ का बचपन ……”

एक दिन मैंने माँ से पूछा,  
"माँ... मैं कब बड़ी होऊंगी?"

माँ ने ऐसे देखा,  
जैसे मैंने उनकी सबसे प्यारी चीज़ माँग ली हो।

वो बोलीं,  
"काश मैं तेरी उम्र की घड़ी रोक देती।  
तू बस गिरती, रोती, और फिर हँस देती।"

मैंने कहा,  
"मैं बड़ी होकर तुम्हारी जैसी बनूंगी।"

माँ की उँगलियाँ रुक गईं।  
वो धीरे से बोलीं,  
"मेरी जैसी बनने की दुआ मत माँगना।  
मुझे बड़ा नहीं किया गया...  
बड़ा कर दिया गया।"

वो बोलीं,  
"लड़की का बचपन शोर नहीं करता।  
पहले गुड़िया छूटती है,  
फिर ज़िद,  
फिर हँसी।  
और एक दिन खुद को भी याद नहीं रहता  
कि आखिरी बार बिना वजह कब हँसी थी।"

मैंने पूछा,  
"क्या बड़ा होना इतना दुख देता है?"

माँ बोलीं,  
"नहीं।  
दुख उस दिन है  
जब तुम अपने अंदर की बच्ची की आवाज़ सुनना बंद कर दो।  
जब झूला बच्चों की चीज़ लगे,  
बारिश बीमारी लगे।"

आखिर में उन्होंने मुझे गले लगाया और कहा,  
"औरत बन जाना...  
पर इतनी मत बदलना  
कि तेरे भीतर की बच्ची  
तुझे पहचानना छोड़ दे।"
प्राची गुर्जर…….

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"अनुभव"

अनुभव क्या होता है?  
पता नहीं।  
बस इतना जानती हूँ  
कि एक दिन के बाद  
दूसरा दिन पहले जैसा नहीं लगता।

चाँद से पूछो तो कहेगा  
"तारे रोज़ टूटते हैं  
मैं आदतन देखता रहता हूँ।"
पर कभी कुछ कहता नही। 

सूरज कहेगा  
"जलता हूँ  
ताकि किसी को अंधेरा न लगे।  
शाम को थक कर डूब जाता हूँ।  
लेकिन मुझे कोई पूछता भी नहीं।"

संगीत वाले से पूछो  
वो सुरों के बीच की खाली जगह दिखाएगा  
और कहेगा  
"यही सबसे ज़रूरी है।"

रंग कहेंगे  
"हम काले में भी हैं।  
बस तुम देखना नहीं चाहते।"

अनुभव कोई किताब नहीं  
जो पढ़ ली और समझ आ गई।  
अनुभव वो रात है  
जब तुम जागते रहो  
और सुबह पता चले  
कि तुम बदल गए हो।

अनुभव ये नहीं कि तुम गिरे और उठ गए  
अनुभव ये है कि गिरकर  
तुमने धूल झाड़ी  
और फिर से चल दिए  
बिना ये सोचे  
कि कोई देख रहा है या नहीं।

अनुभव के बाद आदमी  
ना समझदार होता है  
ना बेवकूफ।  
बस थोड़ा खाली हो जाता है।  
और उसी खालीपन में  
पहली बार उसे  
अपनी आवाज़ सुनाई देती है।
प्राची गुर्जर…..

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"कलकोठरी"

मेरे भीतर एक बच्चा रहता है  
मेरी उम्र से सदियों छोटा  
उसे दुनिया के दस्तूर नहीं आते  
उसे बस उड़ना आता है ।

वो हर बार कहता है ….."मुझे खुला आसमान दो"  
और मैं हर बार कहती हूँ ….."यहाँ आसमान नीलाम हो चुके हैं"

वो रूठ जाता है  
मैं उसे गोद में उठा लेती हूँ  
माथा चूमती हूँ  
और झूठी लोरी सुनाकर सुला देती हूँ

एक रात मैंने उसे कहानी सुनाई  
त्याग की, समझदारी की, "बड़े होने" की  
वो कहानी सुनते-सुनते सो गया  
सुबह उठा तो पहले से ज़्यादा जिद्दी था

बोला…. "तुमने मुझे डरना सिखा दिया  
पर जीना नहीं सिखाया"

उस दिन मैं थक गई  
अपनी उम्र का बोझ,  
लोगों की बातों का बोझ,  
"क्या कहेंगे" का बोझ  
सब उठाकर उसके नन्हे कंधों पर रख दिया

फिर अपने ही हाथों से  
उसे उठाकर अपने भीतर की कलकोठरी में बंद कर दिया

अब रोज़ रात को आवाज़ आती है  
दीवारों से टकराती हुई  
सिसकियों की, सवालों की

"मुझे बाहर निकालो...  
मेरी साँस घुट रही है"

और मैं ……मैं ,
दरवाज़े पर पहरा देती  हूँ  
बड़ी बनकर….
समझदार बनकर….
मजबूत बनकर….

लोग तारीफ करते हैं 
"कितनी सुलझी हुई हो तुम"

उन्हें क्या पता
इस सुलझाव के पीछे  
एक बच्चा रोज़ मेरे भीतर मरता है…..
प्राची गुर्जर …..

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