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इश्क़ मेरी आदत नहीं, इबादत है इश्क़ मेरी आदत नहीं, इबादत है जहाँ माँग नहीं होती, बस मन का समर्पण होता है। जहाँ पाने की कोई जल्दी नहीं, खोने का कोई भय नहीं, जहाँ प्रेम अपने होने का कोई प्रमाण नहीं माँगता। दो दिल मिलें तो प्रेम कहें, दो रूहें मिलें तो प्रार्थना हो जाए, एक मौन दूसरे मौन को समझ ले, तो जैसे कोई अधूरी साधना पूरी हो जाए। यह प्रेम देह से आगे की कोई बात है, जहाँ स्पर्श भी भीतर उतरता है, जहाँ आँखें बंद हों तो भी एक उपस्थिति महसूस होती है। न कोई वचन चाहिए, न कोई अधिकार, न साथ रहने की शर्त, न लौट आने की प्रतीक्षा। बस प्रेम रहे निर्मल, निस्वार्थ, अनंत, जैसे नदी को समुद्र से मिलने के लिए अपना नाम छोड़ना पड़ता है। शायद प्रेम वही है जहाँ दो अपनेपन में खोकर एक हो जाने की चाह भी नहीं रखते, बस एक-दूसरे में अपने होने का अर्थ पा लेते हैं। और तब प्रेमी प्रेमी नहीं रह जाते, वे उस मौन के दो किनारे बन जाते हैं जिसके बीच बहती है एक ऐसी धारा जिसका कोई नाम नहीं। इश्क़ मेरी आदत नहीं, इबादत है क्योंकि इसमें किसी को पाना नहीं, बस प्रेम में अपने आपको खो देना है। प्राची गुर्जर …..
यदि सीता इस युग में होतीं कभी सोचती हूँ यदि सीता इस युग में होतीं तो क्या करतीं क्या फिर गौरी की वंदना करतीं राम जैसा वर पाने को या प्रेम को समझने से पहले पूछतीं क्या मिलेगा इसे निभाने को क्या फिर राजमहल छोड़कर वन की धूल अपनातीं काँटों को पथ का साथी करतीं और प्रेम को जीवन से ऊपर रख पातीं क्या फिर अग्नि के सम्मुख अपने सत्य की परीक्षा देतीं या इस बार अपनी मौन पीड़ा को शब्दों में कह देतीं कभी सोचती हूँ प्रेम का अर्थ कितना बदल गया है कभी प्रेम था तो वन भी घर था कभी साथ था तो दुःख भी सुंदर था सीता ने प्रेम में सुख नहीं माँगा था उन्होंने तो साथ माँगा था और शायद यही प्रेम की सबसे कठिन परिभाषा है किसी को पा लेना प्रेम नहीं उसके कठिन समय में उसके साथ खड़े रहना प्रेम है महल मिल जाए तो साथ चलना सरल है प्रेम तो तब है जब काँटों भरे पथ पर भी मन कहे यही मेरा घर है यही मेरा अपना है। प्राची गुर्जर…..
“जो उम्र बची है” एक उम्र ढलने को है और एक लम्हा है जिसे अब तक जिया नहीं। बचपन रेत-सा था, हथेलियों में ठहरा भी नहीं और पलकों से फिसल गया। जवानी आई तो ख़्वाब साथ लाई, मगर ज़रूरतों ने एक-एक करके उनकी आवाज़ धीमी कर दी। हम हर रोज़ कहते रहे आज नहीं… कल जिएँगे। और पता ही नहीं चला कब वो कल हमारी पूरी उम्र ले गया। अब बचपन से क्या माँगूँ, वो तो मुझे बड़ा कर चुका। जवानी से क्या माँगूँ, उसने मुझे थकना सिखा दिया। और बुढ़ापे से बस इतना चाहूँगी जब वह आए तो मेरे पास कोई बड़ा सपना नहीं, बस एक शांत मन बचा हो। एक शाम जिसमें कोई जल्दी न हो। एक रात जिसमें कोई पछतावा न हो। और एक साँस… जिसे लेते हुए मुझे पहली बार लगे मैंने ज़िंदगी को कल के लिए नहीं, आज के लिए जिया था। प्राची गुर्जर …..
बंजर ज़मीन और समुद्र बंजर ज़मीन को चाहत है पानी की, तो क्या हो अगर समुद्र अपना थोड़ा-सा हिस्सा उसके नाम कर दे? बस एक मुट्ठी जल… इतना-सा कि सूखी मिट्टी पहली बार अपनी देह में किसी संभावना को महसूस करे। मैं सोचती हूँ शायद उम्मीद भी ऐसे ही जन्म लेती है। पहले एक बूँद उतरती है बिना किसी वचन के। फिर मिट्टी उस बूँद को अपनी स्मृति बना लेती है। वहीं से एक कल्पना जन्म लेती है कि शायद यह भूमि भी हरी हो सकती है, शायद यहाँ भी किसी बीज को घर मिल सकता है। कल्पना धीरे-धीरे एक स्वप्न बनती है। और स्वप्न… कितना विचित्र है न जितना सुंदर होता है, उतना ही भय देता है। डर लगता है कि कहीं वर्षा रुक गई तो? कहीं बीज अंकुरित होने से पहले मर गया तो? कहीं समुद्र ने अपना जल वापस माँग लिया तो? मगर फिर… एक नन्ही-सी हरियाली मिट्टी का सीना चीरकर बाहर आती है। और उस क्षण भय पीछे छूट जाता है। स्वप्न यथार्थ का पहला अक्षर लिखता है। जो कल तक केवल सोचा था, वह आज आँखों के सामने होता है। एक अंकुर फिर पौधा बनता है, पौधा वृक्ष बनने का साहस करता है। और तब समझ आता है उम्मीद कमज़ोरों का सहारा नहीं, वह तो टूटी हुई धरती के भीतर छिपी हुई शक्ति है। एक बूँद से हरियाली तक पहुँचना चमत्कार नहीं होता यह उस मिट्टी की निरंतर साधना होती है जो सूखकर भी जीना नहीं भूलती। और फिर… जिस भूमि को कभी समुद्र की एक बूँद की चाहत थी, वहीं से एक दिन नदी जन्म लेती है। वह बहती है… अपनी प्यास पीछे छोड़कर। और शायद यही जीवन का सबसे सुंदर रहस्य है जिसे कभी एक बूँद की आवश्यकता थी, वही एक दिन किसी और की प्यास बुझाने लगता है। यही है उम्मीद का चक्र एक बूँद से एक कल्पना, कल्पना से एक स्वप्न, स्वप्न से एक भय, भय से एक साहस, साहस से एक यथार्थ, और यथार्थ से… एक नया जन्म। प्राची गुर्जर…..
“लोग” गले लगाकर गला काटते हैं लोग, दुआएँ भी अब फायदा देख कर बाँटते हैं लोग… रोने वालों को यहाँ रुलाया जाता है, और हँसने वालों को खुशियाँ बाँटते हैं लोग… फकीरों के लिए कौड़ी भी नहीं बची, रईसों को तोहफे बाँटते हैं लोग… गिराकर दूसरों को खुद बढ़ने के लिए, मंदिरों में मन्नतें माँगते हैं लोग… सच्चाई का दिखाना यहाँ जुर्म बन गया है, झूठ बोल कर इज्जत कमाते हैं लोग… अपना मतलब निकल जाए जहाँ से, वही रिश्ते पल में भूल जाते हैं लोग… प्राची गुर्जर….
"शुरुवात" कुछ ख़त्म करने के लिए, पहले एक शुरुआत ज़रूरी है। और अगर शुरुआत ही न हो, तो क्या कोई अंत... दर्दनाक हो पाएगा? सुखद हो पाएगा? या ख़ूबसूरत भी हो पाएगा? पूछो उस बारिश की बूंद से, जो आज समंदर बनकर बह रही है। कैसे बादलों की कोख में छटपटाई होगी, गिरने से पहले कितनी बार डरी होगी। कैसे कतरा-कतरा, ज़मीन की ठोकरें खाकर, धूल में लोटकर, फिर भी बहती रही होगी। और एक दिन, खुद को खोकर ही, उसने समंदर में नई शुरुआत पाई होगी। हम भी वही बूंद हैं। जब तक बादल में हैं, सुरक्षित हैं। जब तक रास्ते का पत्थर हैं, इस्तेमाल हो रहे हैं। पर असली चमक, असली मुकाम, असली अंत... तभी आता है जब हम गिरने की हिम्मत करते हैं। इसलिए डरो मत। शुरुआत करो। क्योंकि हर ख़ूबसूरत अंत की, पहली सीढ़ी... एक डरती हुई शुरुआत ही होती है। प्राची गुर्जर……
“पत्थर की यात्रा” एक दिन रास्ते पर मेरा पाँव एक पत्थर से टकराया। मैंने देखा नहीं। बस ठोकर मार दी। एक बार, फिर बार-बार। और वह मेरे साथ चलता रहा। मुझे लगा मैं खेल रही हूँ। शायद उसे भी यही लगा। जब मेरी मंज़िल आ गई, मैं भीतर चली गई। वह वहीं छूट गया धूल में, खरोंचों से भरा। उस पर मेरे पैरों के निशान थे। और दुनिया की मिट्टी। फिर कोई और आया। फिर कोई और ठोकर। फिर कोई और सफ़र। शायद कुछ पत्थरों की तक़दीर में चलना नहीं लिखा होता। सिर्फ घिसटना लिखा होता है। पर हर रास्ता एक-सा नहीं होता। एक दिन एक ज़ोर की ठोकर ने उसे सड़क से उठाकर नदी में फेंक दिया। वह डर गया। वह तो रास्ते का था, पानी का नहीं। नदी ने कुछ नहीं पूछा। बस बहती रही। और उसकी देह से धूल धोती रही। सालों की खरोंचों में ठंडा पानी भरती रही। वहाँ उसे अपने जैसे और पत्थर मिले। कोई पहाड़ से टूटा था, कोई मंदिर से। सबके पास अपनी टूटन थी। इसलिए किसी ने किसी का दर्द नहीं पूछा। वक़्त बहता रहा। नदी बहती रही। वह भी बहता रहा। और एक दिन जब उसने पहली बार समुद्र देखा, तो भूल गया कि कभी वह किसी की ठोकर था। अब वह धूल से खाली था। खरोंचों से मुक्त था। शांत था। चमकता हुआ। अपनी ख़ामोशी में पूरा। तब समझ आया हम भी पत्थरों जैसे होते हैं। कुछ लोग हमें रास्ते में ठोकर समझकर साथ रखते हैं। और मंज़िल आते ही छोड़ जाते हैं। उस वक़्त लगता है यही अंत है। पर अक्सर… वहीं से नदी शुरू होती है। जो रास्तों पर छूट जाते हैं, वही एक दिन समुद्र तक पहुँचकर मोती नहीं बनते, पर अपनी चमक ज़रूर पा लेते हैं। प्राची गुर्जर…..
“पेड़ “ मुझे हमेशा से पेड़ अच्छे लगे हैं। फूलों की तरह उन्हें किसी की नज़र में रहने की जल्दी नहीं होती। वे बस… खड़े रहते हैं। धूप अपने हिस्से की सहते हैं, और छाँव दूसरों के हिस्से में लिख देते हैं। मैंने कभी किसी पेड़ को अपने फल खाते नहीं देखा। वह सारी उम्र भरता किसी और के लिए है। शायद प्रेम भी कुछ ऐसा ही होता होगा। जिसमें अपना होना कम, किसी और का बच जाना ज़्यादा ज़रूरी हो। बचपन में मैं पेड़ों से बातें किया करती थी। उनकी छाल पर अपनी उँगलियाँ फिराकर पूछती, “दर्द होता है?” वे कभी जवाब नहीं देते थे। अब समझती हूँ… जो सच में मज़बूत होते हैं, वे अपने घावों की आवाज़ नहीं करते। कई लोग पेड़ों को लकड़ी समझते हैं। मैंने हमेशा उन्हें बुज़ुर्गों की तरह देखा। जो कम बोलते हैं, मगर पूरी उम्र सबका बोझ उठाते हैं। एक दिन मैंने देखा, आँधी में सबसे पहले पेड़ की टहनियाँ टूटी थीं। तब पहली बार समझ आया, जो सबसे ज़्यादा दूसरों को संभालता है, उसे ही सबसे पहले हवाओं से लड़ना पड़ता है। अगर कभी मैं अगला जन्म माँगूँ, तो फूल नहीं बनना चाहूँगी। नदी भी नहीं। मैं… एक पेड़ बनना चाहूँगी। ताकि जिसे दुनिया थका हुआ कहकर गुज़र जाए, वह कुछ पल मेरी छाँव में बैठकर अपने आँसू रख सके। क्योंकि जीवन की सबसे सुंदर उपलब्धि ऊँचा होना नहीं, किसी के लिए ठहरने की जगह बन जाना है। प्राची गुर्जर…..
“आसमान “ लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, तुम्हारी हर दूसरी कविता में आसमान क्यों उतर आता है? मैं हर बार बस मुस्कुरा देती हूँ। कैसे बताऊँ, ज़मीन ने मुझे चलना तो सिखाया, मगर हर कदम पर रुकने की वजह भी दी। कभी रिश्तों के नाम पर, कभी मर्यादा के नाम पर, कभी इस डर से कि लोग क्या कहेंगे। मैंने देखा है… ज़मीन हमेशा पाँव पकड़ती है। और आसमान… वह कभी हाथ नहीं पकड़ता, बस पुकारता है। शायद इसलिए मुझे उससे मोहब्बत हो गई। मैंने बचपन से बादलों में अपने चेहरे ढूँढे हैं। चिड़ियों की उड़ानों में अपनी अधूरी इच्छाएँ रखी हैं। पतंग कटती थी, तो दुख मुझे होता था। क्योंकि धागा उसका नहीं, मेरा टूटता था। मैंने कभी आसमान को छूने की ज़िद नहीं की। मैं तो बस इतना चाहती थी कि कोई मेरी उड़ान से डरे नहीं। लोग कहते हैं, “तुम बहुत ऊँचा सोचती हो।” उन्हें कौन समझाए, ऊँचाई मेरी मंज़िल नहीं, मेरी साँस है। जिस दिन मेरे हिस्से का आसमान मुझसे छिन जाएगा, उस दिन मैं ज़िंदा तो रहूँगी, मगर वैसी ही… जैसे पिंजरे में बैठी चिड़िया, जिसके पंख सलामत हैं, पर उड़ान नहीं। इसलिए मेरी हर कविता में थोड़ा-सा आसमान रहता है। क्योंकि धरती ने मुझे जन्म दिया है, पर… जीना मैंने हमेशा आसमान से सीखा है। प्राची गुर्जर….
“कैसे” ये दिल के अरमान तुम तक पहुँचें, राहों में बिखरे हैं, जुड़ें तो जुड़ें कैसे। ये साँसें मेरी होकर भी तुम पर ही ठहरी हैं, अब लौटकर मुझ तक मुड़ें तो मुड़ें कैसे। तुम इश्क़ हो, धोखा हो, या मेरी ही दुआ हो, हम तुमको बिना पढ़े समझें तो समझें कैसे। हर रोज़ तुम्हारी याद का मौसम उतरता है, हम अपने ही घर में ठहरें तो ठहरें कैसे। तुम किसी और की दुनिया के चराग़ों में बसे हो, हम अपने अँधेरों को भरें तो भरें कैसे। हमने तो तुम्हें रूह की तरह अपने भीतर रखा, अब ख़ुद से तुम्हें अलग करें तो करें कैसे। तुम्हारे शहर से हर रोज़ गुज़रता है ख़याल मेरा, मगर उन गलियों में उतरें तो उतरें कैसे। तुम्हें पाने की दुआ भी अब लबों पर नहीं आती, मगर दिल को ये बात कहें तो कहें कैसे। तुम्हारे बाद भी धड़कन ने तुम्हारा नाम छोड़ा नहीं, अब इन धड़कनों को बदलें तो बदलें कैसे। लोग कहते हैं कि वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है, जिस ज़ख़्म में तुम बसे हो, भरें तो भरें कैसे। तुम किसी और के होकर भी मेरे ख़्वाबों में रहते हो, हम इन ख़्वाबों से जागें तो जागें कैसे। एक उम्र से हम तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़े हैं, अब लौटकर अपनी ही तरफ़ चलें तो चलें कैसे। प्राची गुर्जर….
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