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"अधूरा भी पूरा है" क्या ज़रूरी है कि जो शुरू किया उसे पूरा करना ही है… क्या हम कुछ अधूरा नहीं छोड़ सकते? कोई रास्ता, कोई याद, कोई सपना, कोई किताब… क्या होगा अगर कुछ बात बीच में ही रह जाए तो? क्या हर नदी का समंदर तक जाना ज़रूरी है? क्या हर चाँद का पूरा गोल दिखना ज़रूरी है? अगर कोई गीत बीच में ही रुक जाए, तो क्या वो कम सुंदर लगेगा? देखो तो सही… भगवान ने भी दुनिया पूरी नहीं बनाई। कहीं पहाड़ आधे, कहीं नदियाँ प्यासी, कहीं धूप कम, कहीं छाँव उदास। उसने चाँद पर भी दाग छोड़ दिया, शायद इसलिए कि कमी में भी खूबसूरती होती है। हम क्यों डरते हैं अधूरेपन से? अधूरी बात में ही तो फिर मिलने की आस होती है। अधूरी किताब में ही तो नया सपना पलता है। अधूरे रास्ते में ही तो लौट कर आने का मन करता है। जो पूरा हो गया, वो कहानी बनकर खत्म हो जाता है, पर जो अधूरा रह गया, वो साँस बनकर चलता रहता है। पूरा होना मतलब रुक जाना है, अधूरा होना मतलब चलते रहना है। तो रहने दो कुछ बातें अनकही, कुछ रास्ते बिना मंज़िल, कुछ सपने बिना रंग के। शायद भगवान ने भी हमें अधूरा बनाया है… ताकि हम एक-दूसरे से जुड़ कर उसकी दुनिया को पूरा कर सकें। प्राची गुर्जर…..
"मैं और मेरे अक्षर”……. आईने से डरती हूँ मैं, वो सच दिखा देता है, मैं तो वो हूँ जो लफ़्ज़ों में ख़ुद को छुपा लेता है। मैंने कभी देखना नहीं चाहा ख़ुद को दर्पण में… मेरी आँखों के कोर पर काजल टिकता नहीं, माथे पर बिंदी का बोझ उठता नहीं, नहीं चाहिए मुझे खन-खनाती चूड़ियों का श्रृंगार… मेरा शोर तो मेरे अक्षरों के पार है। मैं अक्सर बह जाती हूँ स्याही की नदी में, अक्षर से भाषा, भाषा से वेदना की गहराई में। मेरा जी अटका है एक अजीब तड़पन में… जिसे न गहने चाहिए, न डोली का क़रार, बस चाहिए एक कोना किताब के हाशिये का उधार। लोग कहते हैं “औरत हो, सँवर जाओ”, मैं कहती हूँ “शब्द हूँ, बिखर जाओ”। मेरी माँग का सिंदूर कविता की सुर्ख़ लकीर है, मेरा गजरा ग़ज़लों की महकती तहरीर है। रात जब दुनिया सोती है, मेरी क़लम रोशन होती है, मेरे ख़्वाब पाँव में पायल नहीं, नज़्मों की पाज़ेब पहन कर जागते हैं। मेरा आँचल शब्दों से सिला है, मेरी मेहंदी अख़बार की सुर्ख़ियों से रची है। मुझे दुनिया से नहीं, ख़ुद की परछाईं से पर्दा है, क्योंकि दर्पण में सिर्फ़ जिस्म उतरता है और मैं तो रूह की इबारत हूँ। मैं प्रेमचंद के पन्नों की कोई थकी हुई औरत हूँ, महादेवी के आँसू से भीगी कोई प्रार्थना हूँ, अमृता के ख़त की आख़िरी अधूरी सतर हूँ। मेरी तड़प न मायके की देहरी की है, न ससुराल की दीवार की, मेरी तड़प उस सुबह की है जहाँ औरत को पढ़ने से पहले नापा न जाए, जहाँ उसके क़लम की नोक को उसके गहनों से पहले सराहा जाए। तो रहने दो मुझे यूँ ही बे-रंग, बे-साज़… बिना काजल, बिना बिंदी, बिना चूड़ियों के अल्फ़ाज़। मैं ख़ामोश सही, मगर मेरे हर लफ़्ज़ में इनक़लाब है, मैं तन्हा सही, मगर मेरी किताबों में पूरा हिसाब है। प्राची गुर्जर…..
“बूंद से मिट्टी तक “…… आज सुबह उठी तो देखा बारिश पड़ रही थी… हर बूँद पातों से होके ज़मीं पे गिर रही थी… क्या ज़रूरी था बूँद का पत्तों से होके गुज़रना… और इतनी मुश्किलों के बाद मिट्टी में मिल कर ख़ुद का वजूद ख़त्म करना? हाँ, ज़रूरी था। क्योंकि पत्ते की हथेली पर रुक कर बूँद ने जाना, छुअन बिना भी कोई अपना होता है यही तो प्यार है। पल भर का ठहराव, पूरी उम्र का करार है। ज़मीन पर गिरना टूटना नहीं था… वो तो मिट्टी की कोख में उतरना था। बूँद मिट्टी न बने, तो अंकुर फूटेगा कैसे? और अंकुर न फूटे, तो किसी थके हुए को छाँव मिलेगी कैसे? हम भी तो बूँद ही हैं। कभी किसी की बातों से टकरा कर ठिठक जाते हैं….. ये जैसे अपनेपन का मरहम है। कभी हालातों के पत्थर पर गिर कर छिल जाते हैं ….ये ज़िंदगी का संघर्ष है। कभी लगता है अब सब शून्य है, मन के भीतर घना अवसाद है… कि साँसें चलती हैं पर जीने की आस नहीं है। पर देखो न… हर बार मिट्टी में खो जाने के बाद, उसी जगह से एक नन्ही उम्मीद सर उठाती है। वजूद मिटता नहीं, वो बीज बन जाता है। तो अगली बार जब बारिश देखो, तो बूँद का गिरना मत गिनना… उसका मिट्टी होना देखना। क्योंकि जो खो गया लगता है, वही किसी और के लिए उग आता है। प्राची गुर्जर……
"ठहरा हुआ पल" कभी-कभी यूँ ही इंतज़ार अच्छा लगता है, जैसे शाम को ढलता सूरज सच्चा लगता है। ना किसी के आने की जल्दी, ना किसी के जाने का डर। बस एक ख़ाली कुर्सी, एक कप चाय, और थोड़ा सा सब्र। हवा में कोई आहट ढूँढना, दरवाज़े को यूँ ही तकना। घड़ी की टिक-टिक सुनना, और पलकों को धीरे से झपकना। ये इंतज़ार मोहब्बत का नहीं, ये तो ख़ुद से मिलने का है। जो बीत गया उसको शुक्रिया, जो आएगा उसपे यकीन रखने का है। कभी-कभी रुक जाना भी ज़रूरी है, भागती दुनिया में ठहरना ज़रूरी है। इंतज़ार सज़ा नहीं होता हमेशा, कभी-कभी ये दुआ सा लगता है। प्राची गुर्जर…..
“वो जो आया ही नहीं…..” इंतज़ार करते-करते अब आदत हो गई है, दर्द भी अब इबादत हो गई है। सुबह उठते ही दरवाज़ा देख लेते हैं, शाम ढले फिर खिड़की ताक लेते हैं। कोई पूछे किसका इंतज़ार है, हम हँस के बात टाल देते हैं। चिट्ठियाँ अब भी आती हैं, पर नाम उसका नहीं होता। कदमों की आहट सुनाई देती है, पर चेहरा वो ही नहीं होता। लोग कहते हैं भूल जा, हम कहते हैं क्या भूलें? जो आया ही नहीं कभी, उसको कैसे दिल से निकालें? अब तो हाल ये है अपना, इंतज़ार से ही इश्क़ हो गया। जिसके आने की थी उम्मीद, ना आने से ही सब्र हो गया। प्राची गुर्जर……
“सफेद बालों वाला इश्क़……” मुझे पसंद है बुज़ुर्ग जोड़ों को साथ देखना, उनकी मोहब्बत से सीखना….. तो उसी पे लिखा है। मैं देखती हूँ उन्हें कहीं छज्जे पे बैठे, वो अख़बार पढ़ते हैं, ये स्वेटर बुनती हैं। बीच-बीच में नज़रें मिलती हैं, बिन बोले ही सारा दिन गुज़र जाता है। कोई शोर नहीं, कोई दिखावा नहीं, बस एक कप चाय, दो हिस्सों में बांटी जाती है। मैं देखती हूँ उन्हें किसी बगीचे में, धीमी चाल से, पर क़दम मिलाकर चलते। वो लाठी थामे हैं, पर इनका हाथ नहीं छोड़ते, ये फूल तोड़ें तो वो मना नहीं करते। बेंच पर बैठकर घंटों ख़ामोश रहते, फिर भी लगता है बातें हज़ार करते। मैं देखती हूँ उन्हें ट्रेन के बाद भी, स्टेशन पर उतरते ही वो भीड़ में ढूँढते हैं। "संभल के" कहना अब आदत हो गई है, पचास साल बाद भी फ़िक्र नई सी लगती है। वो टिकट रखती हैं, ये पैसे गिनते हैं, सफ़र ख़त्म हो, पर हमसफ़र नहीं बदलते हैं। मैं देखती हूँ उन्हें मंदिर की सीढ़ियों पर, वो चढ़ नहीं पाते तो ये हाथ बढ़ाती हैं। प्रसाद में पहला निवाला उसे खिलाती हैं, दुआ में पहले उसका नाम लगाती हैं। लोग कहते हैं इश्क़ जवानी में होता है, मैं कहती हूँ इश्क़ तो बुढ़ापे में पूरा होता है। कभी वो रूठे तो ये चश्मा साफ़ करती हैं, कभी ये खाँसे तो वो पानी ले आते हैं। ना गुलाब, ना तारीफ़, ना वादे बड़े-बड़े, बस एक-दूजे की दवाई वक़्त पे याद दिलाते हैं। मुझे पसंद है बुज़ुर्ग जोड़ों को साथ देखना, क्योंकि उन्होंने सिखाया मोहब्बत उम्र नहीं देखती, मोहब्बत बस निभाना देखती है। प्राची गुर्जर…..
“मुझे पसंद है टूटना..." मुझे पसंद है खिड़की का वो कोना, जहाँ धूप आती है, पर रुकती नहीं। बस मेरे कंधे को छूकर चली जाती है, जैसे कोई पुराना खत पढ़कर रख दिया हो। मुझे पसंद है अधूरे काम, मेज़ पर बिखरी हुई किताब, आधा लिखा हुआ कागज़, कलम की खुली हुई टोपी। बताते हैं कि मैं अभी ज़िंदा हूँ, कि अभी कुछ बाकी है। मुझे पसंद है बारिश के बाद की मिट्टी, जो कुछ नहीं बोलती, बस साँस लेती है। और मैं उसके साथ साँस लेती हूँ। मुझे पसंद है अपने हाथों को देखना, इनमें लकीरें कम, कहानियाँ ज़्यादा हैं। कहीं चाय का दाग, कहीं कलम की स्याही, सब सबूत हैं कि मैंने जीने में कंजूसी नहीं की। लोग कहते हैं मैं खोई रहती हूँ, मैं कहती हूँ मैं मिली हुई हूँ। खुद से, इस पल से, इस सांस से। मुझे पसंद है टूटना, क्योंकि टूटने के बाद ही पता चलता है कि मैं कितनी मज़बूत थी। प्राची गुर्जर …….
मेरे दोस्त….. कितने दोस्त हैं तुम्हारे? हाँ दोस्त... दोस्ती सबको पसंद है... मुझे भी है। पर मेरी दोस्ती मतलबी लोगों से नहीं। मेरी दोस्ती है अंधेरों से जो मुझे उजालों तक ले जाने के क़ाबिल बना रहे हैं। जो गिराते हैं, ताकि उठना सिखा सकें। जो डराते हैं, ताकि हिम्मत पहचान सकूँ। मुझे बैठना पसंद है अपनी ख़ामोशी के साथ वो मेरी पक्की सहेली है। क्योंकि वो शोर नहीं करती, सिर्फ़ सुनती है... मेरे एहसास, मेरे आँसू, मेरी वो बातें जो लफ़्ज़ों से कहने लायक़ नहीं। वो डाँटती नहीं, बस समझती है। मैं रोज़ अपने ख़ास दोस्त 'अकेलेपन' के साथ बैठकर खाना खाती हूँ। वो हर निवाले पर मुझे रिश्तों की अहमियत समझाता है। बताता है कि भीड़ में भी इंसान कितना तन्हा हो सकता है, और तन्हाई में भी कोई कैसे तुम्हारा अपना बन जाता है। मेरे दोस्तों का कोई रूप नहीं, कोई रंग नहीं... अदृश्य हैं वो सब। पर रहते हैं मेरे अंदर, मेरी साँसों में, मेरी रग-रग में। हर क़दम पर मुझे संभालते हैं, जब दुनिया धक्का देती है, तो यही मुझे थाम लेते हैं। लोग पूछते हैं, "तुम अकेली क्यों रहती हो?" मैं हँस कर कहती हूँ, "अकेली कहाँ... मेरे साथ मेरी पूरी महफ़िल है।" मेरा दर्द मेरा दोस्त है…..जो मुझे मज़बूत बनाता है। मेरी रातें मेरी दोस्त हैं …..जो मुझे सपने बुनना सिखाती हैं। मेरा सब्र मेरा दोस्त है …..जो मुझे टूट कर बिखरने नहीं देता। और हाँ, जब सब छोड़ जाएँ, तो यही अदृश्य दोस्त कंधे पर हाथ रख कर कहते हैं…. "चल... अभी सफ़र बाक़ी है। हम हैं ना तेरे साथ।" तो मेरी दोस्ती आम नहीं... वो ख़ास है, बेमिसाल है। क्योंकि मेरे दोस्त दिखते नहीं, पर ज़िंदगी के हर मोड़ पर मिल जाते हैं। प्राची गुर्जर …..
ख़ामोश जवाब…… ज़रूरी नहीं हर सवाल का जवाब हो... कोई जवाब न होना भी जवाब हो सकता है। और अगर तुम पूछो कि "कहाँ तक जाना है?" तो मैं फिर चुप हो जाऊँगी। क्योंकि कुछ मंज़िलों के नाम नहीं होते, बस एक एहसास होता है कि रुकना नहीं है। मैंने सपनों को अब ताले में नहीं रखा, ना दीवारों पर टाँगा है। मैंने उन्हें अपनी थकान में बोया है, अपनी नींद में सींचा है। वो अब दिखते नहीं, पर उगते ज़रूर हैं हर उस सुबह में, जब मैं गिर कर भी उठ जाती हूँ। लोग कहते हैं “बड़ा सोचो", मैं कहती हूँ "सच्चा सोचो" क्योंकि बड़े सपने अक्सर दुनिया के लिए होते हैं, और सच्चे सपने... सिर्फ़ अपने लिए। तो मेरा जवाब यही है कि मैं जवाब नहीं दूँगी। मैं बस चलती रहूँगी, उस रास्ते पर जो अनजान है, उन पैरों से जो थके हैं, उस उम्मीद से जो ज़िद्दी है। एक दिन जब पहुँच जाऊँगी, तो तुम ख़ुद देख लेना... मेरी ख़ामोशी क्या कह रही थी। क्योंकि कुछ कहानियाँ सुनाई नहीं जातीं, वो एक रोज़ सब को ख़ुद सुन जाती है । प्राची गुर्जर …..
उम्मीदें….. मेरी कई उम्मीदें थीं दोस्तों से, अपनों से, खुद के सपनों से... कभी बेफिक्र होकर, बिना सोच-विचार, मैं उन उम्मीदों के पीछे भागा करती थी। न परवाह थी लोगों की, न समाज की, न किसी तंज की... बस इतना मालूम था कि "जो होगा, देखा जाएगा"। फिर वक़्त ने आँखें खोलीं। कुछ सपने गिरे, कुछ अपने बिखरे, कुछ दोस्तों ने रास्ते बदले, कुछ मैंने। जिन बातों पर हँसा करती थी, उन्हीं बातों ने रुलाया। जिस "देखा जाएगा" पर ऐतबार था, उसने ही आईना दिखाया। और अब जब देखने की बारी आई, जो हुआ उससे... अब मैं बहुत फ़िक्र करती हूँ। न जाने, न चाहते हुए भी, मुझे परवाह रहती है लोगों की, समाज की, और हर एक तंज की। मुझे अब मालूम है बेपरवाह होने की कीमत वो हँसी से नहीं, नींदों से चुकाई जाती है। अब हर कदम से पहले, करती हूँ मैं बहुत सोच-विचार। न जाने अब उम्मीदें चल पड़ी हैं किसी अलग दिशा में जो मेरी नज़रों से ओझल है, और अब मैं उनके पीछे भाग रही हूँ, थके हुए पैरों से, पर ज़िद्दी हौसलों के साथ। मैं अब भी भागती हूँ, बस अब गिरने से डरती हूँ। पहले उड़ती थी, अब संभल-संभल कर चलती हूँ। शायद बड़े होना यही है कि सपने वही रहते हैं, बस उन तक पहुँचने के रास्ते बदल जाते हैं। और हम, उन रास्तों पर चलते-चलते, खुद को थोड़ा-थोड़ा खो कर, फिर से पा लेते हैं। और शायद उम्मीदें भागती नहीं, हमारे साथ बड़ी हो जाती हैं। बचपन में दौड़ती थीं, अब साथ चलती हैं, हाथ थामे, धीरे-धीरे... पर रुकती नहीं। प्राची गुर्जर…..
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