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​🎤 કટાક્ષ કવિતા: સ્માર્ટ મીટરની માયા
​ધાબા ઉપર સોલાર નાખી, અમે પકડી બેઠા તડકો,
પણ સ્માર્ટ મીટર જોઈને જીવમાં લાગે મોટો ફડકો!
​સૂર્યદેવ તો રોજ સવારે મફતમાં મોકલે કિરણો,
કંપની વાળા યુનિટ વધારી, કાઢે અમારો કચરો!
​પહેલાં બિલ આવતું બે મહિને, જીવ થોડો ગભરાતો,
હવે સ્માર્ટ મીટર તો પલ-પલના પૈસા ખાઈ જાતો!
​ઘરમાં પંખો ચાલુ કરું તો મીટર મારે કુદકો,
ફ્રીજ ખોલતાં એવું લાગે, જાણે ખિસ્સામાં થયો ભડાકો!
​સરકારે કીધું'તું કે, "સ્માર્ટ" થઈ જશે જમાનો,
પણ આ તો અમારો જ કૂવો ખોદી, એમાં નાખ્યો ગિન્નો!
​તડકો અમારો, છાપરું અમારું, તોય બિલ કેમ વધે છે?
સ્માર્ટ મીટરના નામે જાણે, આખું ગામ લૂંટાય છે!
હિના ગોપીયાણી

heenagopiyani.493689

सादगी में ही कुछ बात है,
जैसे धड़कन के पास गुलाब नहीं, बस एक सादा सा ख्वाब है।
सफ़ेद पंखुड़ियों में छुपाया है दिल का हाल,
थोड़ा सा सुकून, और बस तुम्हारा ही ख्याल। 🌼

sanket_0_6

नाश्ता टाईम..

🥪ग्रील सँडविच टोस्ट🥪
साधे सोपे पटकन होणारे....
पावाच्या स्लाइस ला आतून दोन्हीं बाजूने
हिरवीगार कैरी कांदा चटणी..
मध्ये एक चीज स्लाइस
आणि त्यावर बारीक चिरलेला🧅कांदा 🍅 टोमॅटो...
गॅस टोस्टर वर खरपुस भाजलेला
सोबत चहा अथवा कॉफी
पसंद अपनी अपनी..🙂🙂

मला सँडविच सोबत कडक कॉफी आवडते 😋

jayvrishaligmailcom

Do you know that the ultimate conflict resolution strategy and a key to attain peace in life after a conflict has occurred is pratikraman (asking for forgiveness)?

Read more on: https://dbf.adalaj.org/xgOYHqE0

#spirituality #forgiveness #spiritual #doyouknow #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

GOOD MORNING 🌅

harshparmar8722

आजकल 'फ़िल्टर' से चेहरे चमक जाते हैं,
पर इंसान उस फ़िल्टर के बारे में कभी नहीं सोचता; जिससे उसका व्यक्तित्व चमक जाए।
. . . क्योंकि वह फ़िल्टर है, *आत्मविश्वास* जो कभी बाज़ार में नहीं मिलता।
. . . वीर।
🔷☀️🔷 शुभ प्रभात 🔷☀️

veermehta

सुबह होती है तो दिन भर रात होने का इन्तेजार रहता है,
और जब रात आती है तो सुबह का.....
कमबख्त ये समझ नही आता कि आखिर इंसान चाहता क्या है ज़िन्दगी से !

-MASHAALLHA

mashaallhakhan600196

जो रिश्ता निभा न सको
छोड़ दो, वो बात जो समझा न सको

क्या फायदा ऐसी चादर रखके
मुँह तो ढक जाये, पाँव फैला न सको

सच्ची महोब्बत हाँ उसी को कहते हैं
भुलना चाहो मगर भुला न सको

मरे जुगनू क्यों उठा लाये इस घर में
हम बेजार कब थे, गर नूर घर में फैला न सको

रास्ते की ठोकर हटा दी ये कहकर
ताकि मेरे अपनों को गिरा न सको

ऐसी तंग गलियाँ भी नहीं मेरे घर तक की
मिलना चाहो, मगर मुझतक आ न सको

ferojkhan.536289

women's power 🥹🥹... please like kr diya kro 🥹🥹🥹🥺🥺

tejendragodara639990

*એવું તો શું પાપ કર્યું કે એક સારા માણસને બ્લોક કરવો પડ્યો!કોઇ પરસ્પર સંવાદ થકી જીવન જીવવાની સીડી હાથ લાગી જાય તો જીવનકેડી ચડવામાં સરળ પડે.તમે તો સાફ સુથરા રસ્તાને બંધ કરવા ગાંડા બાવળના કાંટાની વાડ કરી.શું એ કાંટાળી વાડ ઉખાડી ફેંકવા આ જગતનો દરેક માનવી અસમર્થ છે?છતાં કમળનો ભમરો તાકાતવર હોવાં છતાં સાંજ પડે કમળ સંકોચાય તેમ તેં પણ અંદર સંકોચાઇ રાત વિતાવે છે.કેમકે એને વિશ્વાસ છે કે સવાર પડશે જ અને કમળ ખીલશે.હું પાછો આ વિશાળ સરોવરમાં ખીલેલાં કમળને નીરખી ખુશી મનાવીશ.*
. - વાત્સલ્ય

savdanjimakwana3600

सोचा दो चार पल सुकून के
चलो लेते हैं हम भी बीता
कमबख्त दिल हैं के पूछता हैं
बार बार बेबसी का हीं पता

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

कहीं फ्रिज खोला गया
मिला मृत प्राणी

हरे ड्रम को तोड़ा फोड़ा गया
मिला मृत प्राणी

फर्श खुदे
निकला मृत आदमी

झील तालाब कुआं
तैर रहा मृत आदमी

ये जीवित प्राणी कहां चला गया ?

कुछ देर चुप रहने के बाद
मैंने अपनी नब्ज टटोली
नतीजा.. वही
मृत प्राणी

ferojkhan.536289

“ज़िंदगी में कुछ फैसले ऐसे भी लेने पड़ते हैं,
जहाँ सही होकर भी हर रोज़ टूटना पड़ता है…
ना जीने की खुशी बचती है, ना मरने की हिम्मत,
बस अंदर ही अंदर घुट-घुट कर मरना पड़ता है…!”

ganeshkumar6818

— उजालों का सन्नाटा —

​"ये तन्हाइयाँ मार ही डालेंगी हमें एक दिन,
कम्बख़्त ये रात भी ढलने का नाम नहीं लेती।

ज़माने भर को बाँटते रहे जो उजाले कभी,
आज उनकी ही तक़दीर में शाम नहीं ढलती।"

-MASHAALLHA

mashaallhakhan600196

बात बढ़ी बगावत पे जा पहुँची
बगावत बढ़ी अदावत पे जा पहुंची

महज इतना ही कहा था सर न झुकायेगें
बात सर की सहादत पे जा पहुँची

बेजार था उनसे, मनाने को मुझको
निगाह उनकी शरारत पे जा पहुँची

सुबह हुआ जन्नत सा आगाज, शाम तक तबीयत कयामत तक जा पहुंची

बरसे हैं बादल, बाद मुददत के
आग बुझते-बुझते राहत पे जा पहुंची




अर्थ

अदावत= दुश्मन
सहादत= शहीद
बेज़ार = नाराज
आगाज= शुरूवात

ferojkhan.536289

☀️कुरडई ची भाजी

उन्हाळ्यात एक किलोच्या कुरडया घरी गव्हाचा चिक तयार करून केल्या होत्या
पांढऱ्या शुभ्र, नाजुक आणि चवदार झाल्या होत्या
नमुना म्हणुन मित्र मैत्रिणी शेजारी नातेवाईक यांना भरपुर वाटुन झाल्या
प्रत्येक सणाला तळून झाल्या
खुप चवदार झाल्या होत्या
जेव्हा डबा तळाशी आला तेव्हा लक्षात आले
कुरडई ची भाजी मात्र राहून गेली 😊😊
लगेच उरलेल्या कुरडई ची भाजी केली

☀️दोन तीन कुरडया घेऊन
भरपुर पाण्यात भिजत घातल्या
छान फुगल्या होत्या
दोन तास भिजल्यावर त्या हलक्या हाताने सोडवून घेतल्या
थोडे तुकडे केले
व त्यातील सर्व पाणी काढून टाकले
व त्या थोड्या पिळून घेतल्या

☀️मोहरी हिंग फोडणी करून
कढीलिंब मिरची व कांदा पारतून घेतला
एक छोटा टोमॅटो चिरुन टाकला
त्यावर या पिळून घेतलेल्या कुरडई टाकल्या

☀️थोडे परतुन किंचित हळद व मीठ घातले
झाकण ठेवून पाच सात मिनीटे वाफ दिली
लुसलुशीत भाजी तयार होती
वर थोडे कोथींबीर खोबरे पेरले..
ही भाजी नुसती खा नाहीतर पोळी अथवा ब्रेड सोबत खा.. मस्त लागते

jayvrishaligmailcom

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rajukumarchaudhary502010

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तुम कहाँ — ठंडी, शीतल-सी छाँव हो, प्रिय।
मैं कहाँ — कड़क-सी धूप हूँ, प्रिय।
तुम शीतल-सी छाँव में मन मोह लेती हो,
मैं कहाँ — कैसे छाँव देता हूँ, प्रिय।
तुम चलने वाली पवन-सी हो,
मैं ठहरा-सा सरोवर हूँ, प्रिय।
तुम पहाड़ों के बीच से निकलने वाली धार हो, प्रिय,
मैं कहाँ — समुद्र का ज्वार-भाटा हूँ, प्रिय।
तुम गले की ठंडक हो, प्रिय,
मैं कहाँ — गले की नमकीन प्यास हूँ, प्रिय।
तुम ठंडी रात की चाँदनी हो, प्रिय,
मैं कहाँ — गर्मी की धूप हूँ, प्रिय।
तुम महकों की राजकुमारी हो,
मैं कहाँ — शहरों का मुसाफ़िर हूँ, प्रिय।
-एस.टी.डी मौर्य ✍️
#stdmaurya

stdmaurya.392853

अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

अपने पैरों में मैं
इनके सम्मान की बेड़ियां पाती हूं।
अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

अपनी उमर के साथ साथ
मैं उनके‌ लिए और भी
कीमती हो जाती हूं
अगर हूं मैं सुंदर
तो उनके मन में
अनजाना डर बैठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।

अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

ना हो जो रंग रुप मेरा
तो भी उनकी चिंता बन जाती हूं।
शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।
सारे अरमान पूरे कर उनके
विदा हो कर मैं उन्हें छोड़ जाती हूं।
शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।

अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

छोड़ जाने के बाद उनको मैं
जब अपने ढर को जाती हूं
तो खुद को उस घर में
अब मैं मेहमान पाती हूं।
अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।
शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।

vrinda1030gmail.com621948

joke

rammake323039

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some true words 🥹🥹.....

tejendragodara639990