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*बदल रही है दुनिया* बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं रिश्तों की खूबियाँ गिनाए जा रहे हैं सिक्कों से रिश्ते तोले जा रहे हैं बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। छल-कपट बढ़ रही आग की तरह अपनों में भी अपने नहीं दिख रहे दूर-दूर तक रिश्तों में सिर्फ हाँ की कीमत रह गई है बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। छल-कपट उसूल बन गया है हृदय में कपट भर, इंसान महान बन गया इंसानों में अब इंसानियत नहीं—इंसान मुखौटा बन गया बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। इंसानों की सूरत में भी सुंदरता का मुखौटा लगा लिए इंसानों के सूरत नज़र नहीं आते हैं बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। गुब्बारे में हवा भर, दूध में ज़हर मिला बाज़ार में बेचे जा रहे हैं पूछो तो सिर्फ कीमत गिनाए जा रहे हैं बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। मदिरा के प्रसार में बड़े-बड़े पोस्टर लटकाए जा रहे टीवी के विज्ञापन में फायदा गिनाए जा रहे हैं संघ के माध्यम से नशा-मुक्ति आंदोलन चलाए जा रहे हम देख रहे—दुनिया बदल रही है...। प्रश्न को दबाए जा रहे हैं तथ्य को मिथ्या बताए जा रहे हैं बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। *एस.टी.डी. मौर्य,*✍️ कटनी (मध्य प्रदेश)
शीर्षक- प्रेम की रंगत* हम लिखें कहानी प्रेम की, तुम प्रेम बन जाना...। मैं बनूँ दीप तो तुम मेरी परछाई बन, जीवन भर साथ चलना...। मैं बनूँ कभी उलझन तो बेहिचक प्रश्न करना...। उलझन से प्रश्न का प्रेम-करुण महक कम न करना...। फूलों सा मुकुट तुम्हारा, पायल की खनक तुम्हारी...। बागों के आँगन में पायल की खनक तुम्हारी...। फूलों की पंखुड़ी की तरह जुल्फ़ें तुम्हारी...।फूलों सी मुस्कान सदा रहती है तुम्हारी...। नयन की रंगत, नयन की प्रेम नज़र तुम्हारी...। पियोनी सी कहानी है नयन की तुम्हारी...। नयन की पलक छाँव की तरह तुम्हारी, वर्षा की बूँद की तरह है कहानी तुम्हारी...। तुम मेरे साथ रहना उम्र भर, प्रीत बरसाना, छाँव बन जाएगी जग में प्रीत हमारी...। -एसटीडी मौर्य ✍️ 7648959825
बंधन इंसानियत के बंधन टूट रहे, न जाने इंसान क्या तराश रहे...। जाति-धर्म का जाल बुन, स्वयं को ही बांध रहे हैं...। प्रेम-करुणा पन्नों में लिख, स्वयं के अंदर घृणा भर रहे हैं...। नद-नाले के आँसू बह रहे, इंसान उन्हें खूबसूरत झरना बता रहा...। फूलों की खुशबू स्वयं को तराश रही, न जाने ये भंवरे फूलों का रस चुरा रहे...। चिड़ियों की चीँ-चीँ सूनी-सूनी हो रही, कोयल-कबूतर न जाने कहाँ जा रहे...। पायल की खनक में कोई मधुर आवाज़ नहीं, न जाने लोग किसकी आवाज़ सुन रहे...। - एस.टी.डी. मौर्य ✍️
स्नेह की ज्योति तुम हो स्नेह की दिव्य ज्योति, आँगन में भर देती हो प्रियता की रंगत। प्रियांशी-सी चंचल तुम नटखट, दीप-सा हर मन जगमगा देती हो...। सत्येंद्र-सी सत्य की आभा लेकर, सुमित-सी सबकी सच्ची मीत, फूलों-सा जीवन महका देती हो...। वर्षा की बूंद-सी निर्मल, अभिषेक-सी पावन तुम, माथे पर शुभम की रौनक़ बनती हो...। मौसम-सी शीतल छाँव हो, अँधेरे में अंशुल-सी उजियारी हो...। – एस.टी.डी. मौर्य ✍️
शीर्षक *इश्क़ होने तो दीजिए* नफ़रत ही सही बेफ़िक्र कीजिए, दफ़्तरों का शहर, ज़ख़्म होने तो दीजिए। माना कि इश्क़ में ज़िंदगी है बसी, मगर पहले इश्क़ होने तो दीजिए...। दौलत-शोहरत तराज़ू की तौल है, वज़न तो बताने तो दीजिए। इश्क़ के अँधेरे में, मुझे डूबने तो दीजिए...। माना कि इश्क़ इबादत है यहाँ, मुझे इश्क़ में दफ़न होने तो दीजिए यहाँ। क़बूल नहीं इश्क़ मुझे, पहले इश्क़ होने के लिए फ़रमाने तो दीजिए यहाँ...। सुना है इश्क़ में लोग घुट-घुट कर जीते हैं यहाँ? एकतरफ़ा इश्क़ में आशिक़ पिस जाते हैं क्या यहाँ? आशिक़ों को आशिक़ी मुझे फ़रमाने तो दीजिए। - *एस.टी.डी. मौर्य* ✍️ 7648959825
शीर्षक "हाँ, मैं आज़ाद हूँ" हाँ, मैं आज़ाद हूँ, मुझे गुलामी पसंद नहीं। आँखों में क्रांति है, शब्दों में इंकलाब, हाँ, मैं भगत सिंह का फैन हूँ। अन्याय मुझसे देखा नहीं जाता, ईश्वर के सामने गिड़गिड़ाना आता नहीं। आँखों में क्रांति की लौ लिए चलता हूँ, भीख माँगना मुझे पसंद नहीं। अन्याय पर मेरा मुँह बंद नहीं रहता, खून से इंकलाब लिख देता हूँ। ईश्वर जब कुछ करता नहीं, इसलिए खुद को नास्तिक कह देता हूँ। मेरे कंधों पर मेरा ही हाथ है, अन्याय देखता हूँ तो खुल कर बोल देता हूँ। मुझे मौत का कोई डर नहीं, डर तो बस इस बात का है— अन्याय पर न बोलूँ तो मेरा जीवन व्यर्थ है, इसलिए शायद, मैं कुछ नज़रों में बुरा हूँ। -एस.टी.डी. मौर्य ✍️ #stdmaurya
शीर्षक - "अभिलाषा" ऐ सुनो, मुझे इतना नज़रअंदाज़ क्यों करती हो? तीन बार बुलाता हूँ, कम से कम एक बार आवाज़ तो दो... बोल नहीं सकती, इशारा तो कर सकती हो। इशारा नहीं कर सकती, सिर तो हिला सकती हो। मानता हूँ कि तुम नफ़रत करती हो, नफ़रत ही सही, पर प्यार भी तो जता सकती हो। यह भी नहीं कर सकती, तो मेरी राह में काँटे ही बिछा सकती हो... काँटे नहीं, तो फूल भी बिछा सकती हो... दूसरों को आवाज़ देता हूँ, यूँ ही चिढ़ जाती हो। तुम्हें आवाज़ देता हूँ, फिर क्यों मुँह फेर लेती हो? मुझे जब हिचकी आती, यूँ ही नीर ले आती हो। फिर क्यों नहीं मुझे, नीर में ज़हर की पुड़िया घोल कर दे देती हो? -एस.टी.डी. मोबाईल न. 7648959825 कटनी मध्य प्रदेश #stdmaurya
मुझे जहाँ खोजोगे, मैं वहाँ मिलूँगा… बहती हुई नदी की धार में, बहती हुई शीतल-सी पवन में मिलूँगा…। मेरा कोई अपना रूप नहीं, मगर मैं हर पल तुम्हारे साथ मिलूँगा…। मुझे जीवन देने वाले तरु-वृक्ष, बहती हुई नदी की धार, और वन्य जीव हैं, मैं इनके बिन कुछ नहीं…। हरियाली ही जीवन का अलंकार है, इसके बिन तुम नहीं… हाँ… हाँ, तुम नहीं…। मेरे जाने से तुम्हें रेत-मिट्टी मिलेगी, न मिलेगी जीवन की हरियाली यहाँ…। दूर-दूर तक देख सकोगे, मगर देखने के लिए जीवन न मिलेगा यहाँ…। न कोयल की कूक सुन पाओगे, न मोर को नृत्य करते देख पाओगे यहाँ…। मेरी कुछ ऐसी कहानी यहाँ…। मैं सबको यूँ ही मुक्त में मिल जाता हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि मेरी कोई कीमत नहीं…। मैं मूल्यवान हूँ, यह हर किसी को मालूम नहीं…। पृथ्वी पर है मेरा घर, इसलिए यहाँ चहल-पहल है। मंगल नाम से बड़ा सुहावना, मगर वहाँ तो धूल ही धूल है। मैं इसलिए कहता हूँ — मुझे पहचानो, मुझे नष्ट मत करो, वरना जीवन के लिए तरस जाओगे यहाँ…।
तुम कहाँ — ठंडी, शीतल-सी छाँव हो, प्रिय। मैं कहाँ — कड़क-सी धूप हूँ, प्रिय। तुम शीतल-सी छाँव में मन मोह लेती हो, मैं कहाँ — कैसे छाँव देता हूँ, प्रिय। तुम चलने वाली पवन-सी हो, मैं ठहरा-सा सरोवर हूँ, प्रिय। तुम पहाड़ों के बीच से निकलने वाली धार हो, प्रिय, मैं कहाँ — समुद्र का ज्वार-भाटा हूँ, प्रिय। तुम गले की ठंडक हो, प्रिय, मैं कहाँ — गले की नमकीन प्यास हूँ, प्रिय। तुम ठंडी रात की चाँदनी हो, प्रिय, मैं कहाँ — गर्मी की धूप हूँ, प्रिय। तुम महकों की राजकुमारी हो, मैं कहाँ — शहरों का मुसाफ़िर हूँ, प्रिय। -एस.टी.डी मौर्य ✍️ #stdmaurya
शीर्षक -कहाँ तराशूँ मैं तुम्हारी नित्य नयन की रंगत मे ख़ुद को तरास रहा हूँ तुम्हारी फूलों की खुशबू मेरे दिल यूँ ही चुम रही बोलो तुम्हें कहाँ तरासु मैं कड़क सी धुपो मे, चाँदनी रातों मे मेरे नयनो मे बसी तुम रहती हो.. बोलो तुम्हें कहाँ तरासु मैं -एसटीडी मौर्य मोबाईल न. 7648959825 कटनी मध्य प्रदेश
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