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મારું દિલ નાજુક છે,તમારા કઠોર જવાબ સહન નથી કરી શકતું ત્યાં દિવસ રાત ઉજાગરો આખો.
હું ક્યાં માગું છું,કોઇ સ્થૂળ ચીજ! ફક્ત તમારો હસમુખો માસુમ ચહેરો રૂબરૂ જોવા તડપે છે,મારી આંખો.
- વાત્સલ્ય

savdanjimakwana3600

जिंदगी.,....

कभी धूप है, कभी छाँव है जिंदगी,
कभी हँसी है, कभी घाव है जिंदगी।
जो कल मिला था, आज दूर हो गया,
यही तो बदलता हुआ भाव है जिंदगी।
कभी अपने भी पराए हो जाते हैं,
कभी अजनबी दिल के करीब आते हैं।
जिसे हम समझते हैं अपना हमेशा,
वही अक्सर हमें सबक सिखाते हैं।
गिरना भी पड़े तो घबराना नहीं,
टूट जाओ मगर बिखर जाना नहीं।
रास्ते चाहे कितने भी मुश्किल हों,
अपने कदमों को पीछे हटाना नहीं।
वक्त किसी के लिए रुकता नहीं,
दर्द हमेशा दिल में टिकता नहीं।
आज अगर आँखों में आँसू हैं तो क्या,
हर मौसम हमेशा एक-सा रहता नहीं।
बस चलते रहो, चाहे राह कठिन हो,
उम्मीद रहे तो मंज़िल भी निश्चित हो।
जिंदगी ने जो दिया, उसे स्वीकार करो,
और जो नहीं मिला—उसका इंतज़ार करो।
क्योंकि जिंदगी नाम ही चलते रहने का है,
गिरकर फिर अपने पैरों पर खड़े होने का है।
हार मान लेना तो आसान है मगर,
असली मज़ा तो जिंदगी से लड़ने का है।

mannugujjar

"...ओ साजना..."

क्यों नहीं आए तुम पहले
जब शाम हो रही थी
सूरज टूट रहा था
बिखर रहा था
डूब रहा था बारिश में

क्या तभी तुम्हें दस्तक देनी थी?

प्रभात देखी है तुमने
मौसम कुछ अलग होता हैं
रौशनी पेड़ो के झुरमुट से
छलनी नहीं हो रही होती है
बल्कि आ रही होती है छलकर
आहिस्ता दबे पांव -
पिंजरे में कैद चिड़िया की तरह नहीं
वह गाती है मधुर विरह में गहराई से।

हां, तुम्हें उन दिनों ही आ जाना चाहिए था
जब उन्स की बूंदे बदन पर प्रेम लिखती थी।

पर आ ही गई हो न तुम
मैं तो अब भी तुम्हारे कूचे के
किसी किराना दुकान पर घंटों सिगरेट पीता
खड़ा रह सकता हु
उठे धुएं में तुम्हारे घर को उतनी ही देर निहार सकता हु
जितना उन दिनों देखा करता था
जब तुम थी; कही गई नहीं थी।

जामुनी सारी में किसी लकड़ी के ठेले पर
मुझे देखते हुए तुम
चाय का एक-एक घुट पीया करती थी।

क्या मेरी वह चूड़ियां
तुमने संभालकर रखी है
बैंक के किसी लॉकर में
या उन नजरों से छुपाकर
जो नजरे जानती थी
की तुम मुझे सिर्फ जानती नहीं हो जान।

और वह पायल?
अरे हां, कितनी मीठी याद है वो
जब तुम्हारे पैर मैले न हो
इसलिए तुमने मेरे हाथों पर
अपना मुलायम पांव रखा था
उसी दिन तो मैंने तुम्हें वह पायल पहनाई थी
अपने हाथों से।

ये वही मनहूस दिन था
तुम्हारे भाई ने मुझे देख लिया था
पायल पहनाते हुए,

और उसी दिन से
शाम होने लगी
सूरज टूटने लगा
बिखरने लगा ही था बारिश में -

के तुमने दस्तक दी
फिर एक बार
और मैं चल पड़ा
मचल पड़ा फिर एक बार।

अब तुम देखना प्रभात
ऊषा का मौसम ही कुछ अलग होता हैं
लेकिन अब पेड़ो के झुरमुट से नहीं
बल्कि आ रही है तुम्हारे हिस्से के हर रंध्र से।

मैं सतर्क हु
क्योंकि अब वे आंखे ज्यादा पैनी हो गई हैं
चुभने लगी है उनकी आंखों में तुम्हारी पायल।

आहिस्ता दबे पांव
कुछ भी हो सकता हैं
क्योंकि यहां लड़की के पैदा होते ही
उसके लिए सोने का पिंजरा तैयार किया जाता है।

कल तुमने मुझसे पूछा था कि
क्या मैं अब भी तुम्हारे साथ हु
और मैंने कुछ भी न सोचते हुए
हां, में सिर हिला दिया था

कुछ भी न सोचते हुए
अनकहे ही महसूस करते हुए
सामनेवाले को पढ़ लेना ही प्रेम है।

anupgajare819691

good morning 🌅

nikitavinzuda6548

🌸रात गुजार लूँ🌸

तेरी ज़ुल्फ़ों तले रात गुज़ार लूँ,
जिस्मों की हरारत सँभाल लूँ।

मुद्दतों बाद मिले हो, चाँदनी रात है,
मिल जाओ इस तरह की थकान उतार लूँ।

तेरे होंठों की ख़ामोशियों को पढ़ूँ,
तेरी साँसों में अपनी साँसें वार लूँ।

तेरी धड़कन से अपनी धड़कन मिला,
आज ख़ुद को तुझ पर निसार लूँ।

तेरी बाँहों में कुछ पल ठहर जाऊँ,
सारी दुनिया से ख़ुद को किनार लूँ।

आज की रात फिर लौटकर आए न आए,
आ तुझे अपनी यादों में शुमार लूँ।

✍️बेनी सागर

benisagar

— THE UNIVERSAL SCIENCE OF LIFE
शून्य — जीवन का सार्वभौमिक विज्ञान
The Science of Being Here, Now
और पुस्तक का केंद्रीय सूत्र:
जो जीवन अभी है, उसे छोड़कर जीवन की खोज करना ही मनुष्य का मूल भ्रम है।
0 वह स्थान नहीं जहाँ पहुँचना है; 0 वह वर्तमान है जहाँ से कभी हटे ही नहीं थे।
Agyat Agyani

Independent Researcher & Philosopher
Founder — Vedanta 2.0 ©
ORCID: https://orcid.org/0000-0000-8083-0685

शोध-दृष्टि

Agyat Agyani एक स्वतंत्र शोधकर्ता और दार्शनिक हैं, जिनका कार्य विज्ञान, वेदांत, चेतना और अस्तित्व के बीच संवाद स्थापित करने की दिशा में केंद्रित है। Vedanta 2.0 के माध्यम से वे प्राचीन भारतीय प्रज्ञा को आधुनिक वैज्ञानिक, दार्शनिक और अस्तित्ववादी (Existential) परिप्रेक्ष्य में पुनर्पाठ करने का प्रयास करते हैं।

उनकी दृष्टि किसी धार्मिक सिद्धांत की स्थापना के बजाय जीवन, चेतना और अस्तित्व को प्रत्यक्ष अनुभव तथा संरचनात्मक चिंतन के आधार पर समझने पर केंद्रित है।

यह कार्य इस मूल प्रश्न से आरंभ होता है—

क्या जीवन को समझने के लिए हमें जीवन से बाहर किसी अंतिम उत्तर की आवश्यकता है, या जीवन स्वयं अपने उत्तर का प्रथम और प्रत्यक्ष आधार है?

इसी प्रश्न से Vedanta 2.0 में शून्य (0), वर्तमान, चेतना, द्वैत-अद्वैत, अस्तित्व और मानव अनुभव को एक समकालीन वैचारिक ढाँचे में देखने का प्रयास किया गया है।

Vedanta 2.0 ©
An independent philosophical framework exploring the synthesis of science, Vedanta and existential inquiry.

«प्राचीन प्रज्ञा को आधुनिक भाषा में दोहराना नहीं, बल्कि उसे वर्तमान मनुष्य के जीवन और अनुभव के प्रश्नों के सामने पुनः जाँचना—इसी दिशा में यह कार्य एक स्वतंत्र प्रयास है।»

https://www.vedanta2life.com

bhutaji

ઢોલ, ઢોલક, ગવાર, બુદ્ધિ વગરનું, શુદ્ર, એટલે ઝીણા જીવ જંતુઓ, નારી, એટલે પ્રકૃતિ. પ્રકૃતિ જડ છે એટલે એને તમે પીડા ના આપો તો ના સુધરે. પ્રકૃતિ સજીવની પણ હોય અને નિર્જીવની પણ હોય. વિચારો કે તમે પથ્થર પર પડો કે પથ્થર તમારા પર પડે લાગશે તો તમને જ઼.દારૂડિયો દારૂ ના મૂકે છેલ્લે દારૂ દારૂડિયા ને મૂકી દે.આગ, પાણી, વાયુ આ પ્રકૃતિ છે આ ત્રણ તત્વ શરીરમા વધે તોય નુકસાન કરે અને ઘટે તોય નુકસાન કરે. વાત, પિત્ત અને કફ સરખું હોવું જોઈએ. જો આદત સારી હોય તો જીવન સુધરે અને ખરાબ હોય તો જીવન બગાડે. માટે જે આપણો આત્મા છે એનું કહ્યું માનવાનું જો મનનું કહ્યું માનશો તો મરશો. લી, "આર્ય "

aryvardhanshihbchauhan.477925

कविता पार्ट 1
औरत के लिए


शायरी किताबों पर ही अच्छी लगती है
औरत के लिए
मर्द यह करते हैं मर्द वह करते हैं औरत के लिए
फिर औरत क्यों रोती है

रियल लाइफ में देखो
हर कविता बेकार लगती है
औरत के लिए

कोई चांद नहीं कोई शान नहीं
ना सुनहरा जहां
ना कोई सितारा ना खुद का कोई सूरज
बस खाली आसमान


लोग कहते हैं बंजर है
धरती यहां की
जहां औरत रहती है
बस खुद की



तुमने कहा
औरत के लिए मर्द क्या-क्या नहीं करते
पर हर औरत इतनी खुश नसीब नही होती
की कविता से बाहर
उस औरत की जिंदगी कोई मर्द आ कर
उसकी जिंदगी सवार दे


सच यह है कि औरत को मर्द नहीं चाहिए
बस चाहिए एक साथी जो उसके साथ चलते रहे
सच यह है कि
औरत को मर्दों से कुछ नहीं चाहिए
ना धन दौलत ना ना चांद सितारे
ना हीरा मोती
बस औरत को चाहिए उसे समझने वाला एक इंसान

उसे एक ऐसा इंसान चाहिए
जो औरत को कहे
तु औरत नहीं एक इंसान है
और आजादी पर जितना मेरा हक है
उतना ही तुम्हारा भी



औरत इसलिए नहीं खुश होती की
दुनिया की हर कविता
उसे पर लिखी जा रही है


औरत इसलिए रोती है
क्योंकि उस कविता में
औरत पूरी तरह से खुद की नहीं है
कभी कोई कविता औरत को पूरी तरह से शामिल किया ही नहीं है


औरत को कविता से बाहर वह मर्द चाहिए
जो औरत को उसे अपना कर दे
और कहे जी ले
अपनी जिंदगी मैं हूं ना
तेरे साथ

abhinisha

पन्द्रह अगस्त सन सैतालिस, को ये भारत आजाद हुआ,
सूरज निकला अँधेर छँटा, जोरों से जिन्दाबाद हुआ।।

पूरी धरती पर जालिम ने, अपना परचम लहराया था,
दुनियाँ के कोने – कोने में, अपना झण्डा फहराया था,
ये सूरज नहीं डूबता था, जिसके शासित भू-भागों में,
जिसने इस पूरी धरती को, बाँटा था कितने भागों में,
वो जालिम अत्याचारी जो, लोगों पर हुक्म चलाता था
गोरी चमड़ी का दानव था, जग में अंग्रेज कहाता था ।।

अब इस धरती की बात करें,जो चीखा करती जोरों से,
जो पीड़ित और प्रताणित थी, उन अत्याचारी गोरों से,
अपने लालों के बलिदानों, पर हर दिन हरपल रोती थी,
लेकिन वो बीज वीरता के, आँगन – आँगन में बोती थी,
माटी का पोषण पा पा कर, पौधे प्रवीर कुछ उगते थे,
जो अंग्रेजों के सीनों में, भाले बन बनकर चुभते थे ।।

सौ दो सौ साल लड़े थे जो, बरसों-बरसों बलिदान हुए,
जो पीढ़ी – पीढ़ी जन्म लिए, पीढ़ी – पीढ़ी कुर्बान हुए,
वो बलिदानी वो क्रांतिवीर, सीधे – सीधे अड़ जाते थे,
अपनी हिम्मत के दम पर जो, अंग्रेजों से भिड़ जाते थे,
लक्ष्मी बाई, नाना, तात्या, के जैसे कितने जान दिये,
मंगलपाण्डे या वीरकुंवर,बनके कितने बलिदान दिये ।।

आगे उपजे कुछ भगत सिंह, कुछशेखर थे कुछबिस्मिल थे,
जब आजादी की लपट उठी, तब लाखों योद्धा शामिल थे,
ना जाने कितने भस्म हुए, यज्ञान्दोलन में आहुति बन,
फिर निकल पड़ी जनता सारी, फिर टूट गई सारी जकड़न,
कुछ गाँधी नेहरू कुछ सुभाष, कुछ सावरकर बन कर आए,
कुछतिलक लाजपत कुछपटेल,भारत की जनता को भाए।।

हुँक्कार भरा फिर लोगों ने, फिर एक लक्ष्य को साधा था,
माँ भारति को जंजीरों में, जिसने कस कर के बाँधा था,
उसका अब अंत सुनिश्चित था, जब लोगों ने था ललकारा,
अत्याचारी अंग्रेजों को, दौड़ा – दौड़ा कर था मारा,
जब उग्र हुआ था आन्दोलन, तब गोरे थर – थर काँपे थे,
अब देश छोड़कर जल्दी ही, जाना है, स्थिति भाँपे थे ।।

लेकिन फिर कुछ ने धरती माँ, को दो टुकड़ों में बांट दिया,
नफरत की ऐसी आग जली, खुद ने ही खुद को काट दिया,
झंझावातों के बाद “विजय”, फिर सुबह सुहानी आई थी,
हर ओर खुशी के दीप जले, हर ओर रौशनी छाई थी,
फिर ऊँचे अंबर में अपना, आजाद तिरंगा लहराया,
सदियों सदियों के संघर्षों, का हमने शुभ प्रतिफल पाया ।।

पन्द्रह अगस्त सन सैतालिस, को देश मेरा आजाद हुआ,
सूरज निकला अँधेर छँटा, जोरों से जिन्दाबाद हुआ।।

vijaypshahi

अब ना जाने किस से प्यार करती है

और किसे खोने से डरती है

सच्चे प्यार को वो समझती नहीं

और पूजा महादेव की करती हैं....!!

anisroshan324329

જય શ્રી રાધેકૃષ્ણ 🙏🏻

falgunidostgmailcom

सत्ता के सौदागर”
सिंहासन पर बैठे नागों पर, जनता कब तक फूल चढ़ाए?
जो रक्षक थे इस धरती के, वे ही घर-घर आग लगाए।

वचन बेचते, धर्म बेचते, बेच रहे ईमान वतन का,
सोने की थाली में परोसें, विष हर भूखे निर्धन का।

माथे पर जनसेवा लिखकर, भीतर काला लोभ छिपाए,
हाथ जोड़कर वोट माँगते, फिर जनता को भूल ही जाएँ।

खेतों की हरियाली सूखी, महलों में उत्सव की रातें,
रोटी रोती चौखट-चौखट, हँसती रहती झूठी बातें।

ओ भारत के वीर जवानो!
कब तक यूँ अपमान सहोगे?

जिनकी नसों में स्वार्थ बहा हो,
क्या उनको भगवान कहोगे?

यह धरती राणा की धरती, यह चंद्रगुप्तों की जननी,
यहाँ नहीं बिकता मानव, यहाँ नहीं झुकती है धरणी।

जब-जब सत्ता अंधी होती, जनता बन जाती ज्वाला,
एक चिंगारी ही काफी है, जल जाए अन्याय का जाला।

उठो युवाओं! हुंकार भरो,
अब कलम बने रण का भाला,
सत्य-अग्नि से दग्ध करो तुम
हर भ्रष्टाचारी का जाला।
जिस दिन भूखा किसान उठेगा,
टूटेंगे सोने के सिंहासन,
जनता जब क्रोधित होती है,
डगमग होता हर शासन।

mannugujjar

💌 दिल का notification #06
शीर्षक: रिश्तों मे नाराजगी

रिश्तों मे नाराजगी जायज़ हे,
पर इतनी भी लंबी नहीं के वो लौट के न आए

"रास्तों पर धुंध सी छाई है..."
"माैसम फिर लौट के आया है..."
"वक्त बदला है... तुम भी बदल जाओ..."

"दिल अभी भी तुम्हारा है..."
"चाहो तो लौट के आ जाओ।"

धड़क ते रहिए ❣️
✍🏼जिगर अशोक पंड्या

----------+++----------
कोई हे जो नाराज हे तुमसे तो भेज दीजिए उन्हें, क्या पता एक नोटिफिकेशन से बात बन जाए।

{ 💌अगला नोटिफिकेशन
काँटे}

pandyajigar

तिरंगा,,,,,,,,🌹🌹🙏🌹🌹🇮🇳🇮🇳🇮🇳

drbhattdamayntih1903

“છે એક રંગ આભનો, તો એક રંગ ધરાનો,
કેમ ન કહું કે, છે એક રંગ આપણાં મનનો !”

મનોજ નાવડીયા

manojnavadiya7402

" परवाज़-ए-इश्क़ "

धड़कनों में आज नया एक साज़ होने लगा है,
जब से इस दिल में तेरा आग़ाज़ होने लगा है।
मेरी हर सांस में बस तेरा अंदाज़ होने लगा है,
जब से मुझ पर एक तेरा ही नाज़ होने लगा है।

बिन तेरे मेरा हर एक दिन उदास होने लगा है,
यह दिल अब तेरा करम-नवाज़ होने लगा है।
छुपाए भी नहीं छुपती यह तेरी चाहत अब तो,
तुझे देखने को दिल बेताब आज होने लगा है।

तेरी यादों का हम करें भी तो अब क्या करें?
हर इक नज़ारा भी मुझसे नाराज़ होने लगा है।
तेरी एक झलक देखने को ये दिल है बेकरार,
तेरी जुदाई का हर लम्हा दराज़ होने लगा है।

मिलकर तुझसे मिल गई जैसे पंखों को उड़ान,
मेरे इश्क़ का आसमान में परवाज़ होने लगा है।
भूलकर इस दुनिया को, बस तुझे पा लें हम,
"व्योंम" तेरी बांहों का मोहताज होने लगा है।

✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.

omjay818

ૐ નમઃ શિવાય 🙏
" શિવ સ્તુતિ "

શિવ શંકર કૈલાસ નિવાસી;
હાથ ત્રિશુળ, ભુજંગ ધારી;
દેવાધિદેવ જય શ્રી મહાદેવ,
ભોલેનાથ સદા મંગલકારી;

ગળે રૂદ્રમાળા, અંગ ભભૂત,
શીશે ગંગ વહે, બિજ ચંદ્રધારી;
વાઘ ચમ્મર, મૂંડમાળા ધરતા,
વગાડે ડમરું કરે નંદી સવારી;

નાચે નાચ તાંડવ શ્રી નટરાજા,
મહા મૃત્યુંજય કલ્યાણકારી;
ત્રિનેત્ર, નિલકંઠ, નાગેશ્વરાય,
મહાકાલેશ્વર, ભોલે ભંડારી;

શિવજી, શિવાજી, શ્રી શિવા,
પૂજા કરતી આ દુનિયા સારી;
ધરા સંગ "વ્યોમ" પર પૂજાયા,
ૐ નમઃ શિવાય, શિવ ૐકારી;

✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી) અજાર. મુ. રાપર.

omjay818

સ્વાતંત્ર્ય દિવસ સ્પેશિયલ...

એકલવીર સાપ્તાહિકમાં પ્રકાશિત થયેલ મારો લેખ...

#martyrsofindia #patriotic #jaihind

mothiyavgmail.com3309

गुलाबी पेरूचे पंचामृत

श्रावण महिन्यात अथवा कोणत्याही धार्मिक कार्यक्रमात जेवणात पंचामृताचे फार महत्व असते
कोणत्याही फळाचे पंचामृत करता येते
पानात वाढलेले पंचामृत पानाची शोभा वाढवत असते

साहित्य..
एक मोठा गुलाबी पेरू
दोन मुठभाजलेले शेंगदाणे
मुठभर भाजलेले तीळ
कढीलिंब,बडीशेप
जीरे मोहरी हिंग मेथी
एका लिंबा एवढ्या चिंचेचा कोळ
तेवढाच गुळ
मीठ, तिखट, हळद ,काळा मसाला
दोन सुक्या मिरच्या

कृती
गुलाबी पेरूच्या मध्यम आकाराच्या फोडी करून घेतल्या

सुके खोबरे काप तळून घेतले
एक मूठ दाण्याचे आणि भाजक्या तिळाचे कूट केले
एक मुठ दाणे अखंड ठेवले
जीरे ,मोहरी ,हिंग ,मेथी , सुक्या मिरच्या घालून फोडणी केली
कढीलिंब त्यात खरपुस तळून
पेरूच्या फोडी घातल्या
वेगळे ठेवलेले दाणे आणि तळलेले खोबरे काप घातले
झाकण ठेवून एक वाफ आली की
फोडी बुडतील ईतके पाणी घालून परत झाकण ठेवले
एक उकळी आली की आवडीनुसार तिखट ,मीठ, हळद, काळा मसाला, गूळ, चिंचेचा कोळ , बडीशेप घातली
दाण्याचे आणि तिळाचे कुट घालून एकसारखे करून घेतले
शेवटी एक झाकण ठेवून वाफ आणली
चवीष्ट चमचमीत पेरुचे पंचामृत तयार आहे
पोळी ,पुरी, भात, धिरडी कशासोबत ही मस्त लागते
नुसते सुध्दा टॉक,😋 लागते
तोंडाला चव आणते 😊😊

jayvrishaligmailcom

શ્રાવણ માસ એટલે માત્ર શિવપૂજા નહીં,
પણ શિવ જેવા ગુણોને જીવનમાં ઉતારવાનો અવસર...

ગળી જાય અપમાન જે વિના અદાવત,
કહેવાય એ મહાદેવજીના સાચા ભગત!

ચાલો, આ શ્રાવણમાં મહાદેવ પાસેથી
સમતાથી જીવવાની અને સૌને આશીર્વાદ આપવાની કળા શીખીએ. 🙏🔱: https://dbf.adalaj.org/buhYqkc1

#harharmahadev #omnamahshivay #shiva #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150