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MASHAALLHA KHAN

MASHAALLHA KHAN

@mashaallhakhan600196
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—हवाओ का रूख—
सभी दूर है मुझसे अभी
सभी पास होते तो क्या ?

जो दिल का हाल बताते उन्हे
तो तन्हाइयो का मलाल होता क्या ?

बुझी नहीं है चरागो की वो रोशनी
अभी थोड़ी कम है तो क्या ?

हवाओ का रूख बदलने तो दो
फिर सवेरा होने मे वक्त लगता है क्या ?

-MASHAALLHA

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रूह की ख़ुशबू -

बिना बोले जो कह दे दास्ताँ, वो बात होती है,
जो बिन देखे ही महका दे, वो एक सौगात होती है।
हज़ारों फूल खिलते हैं चमन में हुस्न की ख़ातिर,
मगर जो रूह को छू ले, वो बस ख़ुशबू की ज़ात होती है।

-MASHAALLHA

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"अब न जीत, न हार"

अब न कोई आरज़ू है बाकी, न किसी का है इन्तेज़ार।
हम ज़िन्दगी के उस दौर में आ गए हैं यार...

जहाँ दूर-दूर तक फैला है बस सुकूँ भरा नज़ारा,
न पाने की कोई हसरत बची, न खोने का मलाल।

बद्दुआएं भी अब असर नहीं करतीं हम पर,
और न काम आती है किसी की दुआ भी...

शायद किस्मत के इस खेल से आगे, बहुत आगे हैं हम,
अब न जीत की खुशी मनाते, और अब न हार की परवाह करते हैं हम।

-MASHAALLHA

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...बहता हुआ दरिया ...

मेरी कमी क्या होगी किसी को,
मैं ठहरा एक बहता हुआ दरिया,
जो बहाव की जद में बस बहता गया।

कुछ लौटते हैं मुसाफिर शहर में,
पर मैं तो बस राहों का होकर रह गया।

कौन ढूंढेगा मुझको उस गुज़रे हुए वक्त में,
मैं यादों के दरमियां बस सिमट सा गया।

ना कोई साहिल मिला, ना कोई मंज़िल मिली,
मैं तो बस दो किनारों के बीच बंट कर रह गया।


-MASHAALLHA

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—तय मुलाकात—
​कल फिर मुलाकात करेंगे तुमसे,
अधूरी ये बात फिर करेंगे तुमसे।

​जो दिल में छिपे हैं जज़्बात अभी,
वो मिलकर बयां फिर करेंगे तुमसे।

​अब क्यों उदास हो तुम...
कल फिर मिलेंगे तो हम!

​ऐसे ना तुम अब करो,
इंतजार थोड़ा तो करो।

​हम भी बेचैन हैं थोड़े, जुदा होने से डरें,
रात ही की तो बात है, फिर तय मुलाकात है।

​अब मुस्कुरा दो तो जरा,
इस गम को भुला दो जरा।

​चलो अब उठ जाते हैं, अपने घर को जाते हैं,
रात रोके तो क्या, एक-दूजे के ख़्वाब में आ जाते हैं।"

-MASHAALLHA

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—बाहर निकल कर देख लो—

जिद है करने की कुछ पर अन्जाम से डरते हैं लोग,
बेबसी चोखटो पर फिर यूहि मरते हैं लोग।

गर खाब है तो पूरा करो डरकर क्या हो जाएगा,
एक उम्र के बाद ये जख्म बनकर रह जाएगा।

बाहर निकल कर देख लो हर कोई परेशान हैं,
कोशिशो की जिद करो बाकी तुम मे जान है।

फिर तुम्हारा सोया मुकद्दर झक मारकर आएगा,
मंजिलों की चोटियों तक आसमां भी आएगा।

-MASHAALLHA

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अब इस दिल को कौन समझाए ये इश्क एक कयामत है,
मुक्कमल हो जाए तो जन्नत और अधूरा रहे तो जहन्नुम है।

फिर भी इसके आगोश में आना हर एक की चाहत है...
जानते हैं सब कि ये किसी ज़हर की तरह है, जिसे पीना भी एक इबादत है।

-MASHAALLHA

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—दिल का कातिल—

​न वो हसीं न अब वो कमाल लगता है,
उसकी हर बात अब सवाल लगता है।

​बदल गए हैं वो मौसम की तरह इस कदर,
कि अब तो उनका अपनापन भी जाल लगता है।

​ना हंसी मे उनकी वो महक आती है,
और अब ना उनकी खुशी में वो सुकुं शामिल।

​वही दे गया ज़ख्म गहरे, जो था हमारी मंज़िल,
जिसे मसीहा समझा दिल का, वो ही इस दिल का कातिल।

-MASHAALLHA

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—इश्क़ का नसीब—

​"मोहब्बत एक अहसास है जाने कितने जुड़े हैं इससे,
कोई मुकम्मल हो गया पाकर इसे और कोई तन्हा रह गया ।

​मगर अधूरा रहकर भी ये इश्क़ कम ना हुआ,
कोई कागज़ पर ग़ज़ल बनके बिखर गया, तो कोई ख़ामोशी ओढ़कर जी गया।"

-MASHAALLHA

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​—खता और खामोशी—

​खता हो कोई तो हमे माफ करना,
यू खामोश रह कर न बर्दाश्त करना।

​सजा जो भी हो हंस के मंजूर है हमें,
यू गुमसुम उदासी से न खुदको बर्बाद करना।

​तन्हाईया एक अजाब है, जहा से निकलना भी ख्वाब है,
तुम यू अकेले ना तड़पो, इस दर्द के हम भी हकदार हैं।

​मिटा कर दूरियां थाम लो हाथ मेरा,
इस टूटते हुए दिल पर थोड़ा तो रहम करना।

-MASHAALLHA

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