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"दिल का सही है, कोई इसको भा जाए तो धड़कने लगता है, और दिमाग साला... 'इफ और बट' की पूरी एक्सेल शीट खोलकर बैठ जाता है!" - MASHAALLHA
दिल की धड़कन से जब आवाज़ आती है, तेरी चाहत बेहिसाब आती है। जब तू ठहरता है ग़ैर के दरमियाँ, मत पूछ कैसे मेरी जान जाती है। - MASHAALLHA
"बेतहाशा ये मोहब्बत और इसकी इन्तहा देखिए, कि वो मेरे दिल के सिवा, मेरी जिंदगी के किसी हिस्से में नहीं" - MASHAALLHA
"दिल की राहत" कदम थम गए मेरे जब उस पर नजर मेरी गई, वो मुस्कुराए दूर से मुझे देख कर फिर धड़कने ठहर सी गई। फिर एक खुशी झलक उठी आंखों के दरमिया से, एक अरसा बाद आज इस दिल को राहत मिल गई। मैं ठहरा नहीं इस दफा बस दौड़ पड़ा उसकी तरफ, बाहों में समेट कर उसे, मेरी दुनिया मुकम्मल हो गई। -MASHAALLHA
तू चाहिए— तू चाहिए हर किमत पर हमें, ये ज़िद की है इस दिल ने मेरे। अब चाहे हो रास्ता कांटों से भरा, बस हम चले आएंगे पीछे तेरे। हो अगर तुझको भी अहसास तो, इस मोहब्बत को पर लग जाएं मेरे। बाहें फैलाकर मैं मौजूद हूँ, तू आकर सीने से लग जा मेरे। -MASHAALLHA
-पड़ोस की छत पर एक चाँद - आज पड़ोस की छत पर एक चाँद देखा मैंने, आसमाँ का नहीं था वो, जिसे पहली बार देखा मैंने। बयान कैसे करूँ वो कितना हसीन और दिलकश है, उसके चेहरे पर सिमटा, ये सारा आसमाँ देखा मैंने। दिल में उतर जाए इतनी कशिश है उसमें, हर धड़कन को उसकी तरफ बढ़ता देखा मैंने। कुछ दीवारें, कुछ मकान रोक देते हैं रास्ता मेरा, वरना उसकी आँखों में, मेरे लिए भी एक अहसास देखा मैंने। अब हर रोज़ उसी छत पर ठहर जाती हैं नज़रें मेरी, अपनी तक़दीर को उस चाँद की चौखट पर बार-बार देखा मैंने। -MASHAALLHA
शामिल है इसमें... सब सच होगा नहीं, कुछ झूठ भी शामिल हैं इसमें, चेहरे पर जो मुस्कान है, कुछ अश्क भी शामिल हैं इसमें। छुपाना चाहा हमने इस दर्द को उनसे लेकिन, पर वो सब समझ गए, यही तो कमाल की बात है उनमें। और मोहब्बत कोई ऐसे ही नहीं करता किसी से, यहाँ दीवानों की हद नहीं, और कितने ही जज़्बात शामिल हैं इसमें। -MASHAALLHA
—गुरूर का महल— मजाक बनाकर किसी का खुद पर गर्व करना, यह हुनर है तो फिर इस हुनर से तौबा करना। हर शख्स यहा अपने वजूद का है मालिक, किसी की सादगी उसकी कमजोरी मत समझना। रह जाएगी वो सभी ऊचाई उस शख्स से नीचे, जिसने तुम्हे सीखाया हर मुश्किल मे आगे बढ़ना। अहसान भूलाकर खुदको क्या समझते हो तुम, औकात याद आ जायेगी जब वक्त से होगा लड़ना। गुरूर का ये महल कब तक रहेगा टीका, एक ना एक दिन तो तय है इसका गिरना। -MASHAALLHA
—आख़िरी रास्ता— अब दरख़्त सूखे पत्तों से घिरे हैं, हवाएँ उदासी में झूम रही हैं। महफ़िलों को सन्नाटों ने घेर रखा है। तन्हाइयाँ वीरान सड़कों पर घूम रही हैं, उड़ाने थक गईं तो इन परिन्दों ने, अब ख़ाक को ही आशियाँ बना लिया है। ये क्या चल रहा है, ये कैसा मौसम बदल रहा है, सूरज पश्चिम से निकल पूरब में ढल रहा है। क्यों अब शांत हैं वो लोग, जिनकी आवाज़ों में शोर था? क्यों अब वो दिखाई नहीं देती, वो शान-ओ-शौकत? क्या खो दिया उन्होंने, जिसका उन्हें इल्म ही नहीं, वो अब आख़िरी रास्ते पर हैं मौजूद, और उन्हें ख़बर ही नहीं। -MASHAALLHA
"हुनर दिल तोड़ने का" ये हुनर कहाँ से सीखा है तुमने, किसी दिल को इतनी आसानी से तोड़ जाने का। हमसे तो एक ख़्वाब भी बदला नहीं जाता, और तुम तजुर्बा लिये हो पल भर में बदल जाने का। सोचा न था इतनी वफ़ा दोगे तुम हमें, कि तुम हक़ ही छीन लोगे हम से मुस्कुराने का। -MASHAALLHA
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