तुम कहाँ — ठंडी, शीतल-सी छाँव हो, प्रिय।
मैं कहाँ — कड़क-सी धूप हूँ, प्रिय।
तुम शीतल-सी छाँव में मन मोह लेती हो,
मैं कहाँ — कैसे छाँव देता हूँ, प्रिय।
तुम चलने वाली पवन-सी हो,
मैं ठहरा-सा सरोवर हूँ, प्रिय।
तुम पहाड़ों के बीच से निकलने वाली धार हो, प्रिय,
मैं कहाँ — समुद्र का ज्वार-भाटा हूँ, प्रिय।
तुम गले की ठंडक हो, प्रिय,
मैं कहाँ — गले की नमकीन प्यास हूँ, प्रिय।
तुम ठंडी रात की चाँदनी हो, प्रिय,
मैं कहाँ — गर्मी की धूप हूँ, प्रिय।
तुम महकों की राजकुमारी हो,
मैं कहाँ — शहरों का मुसाफ़िर हूँ, प्रिय।
-एस.टी.डी मौर्य ✍️
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