जो रिश्ता निभा न सको
छोड़ दो, बात जो समझा न सको
क्या फायदा ऐसी चादर रखके
मुँह तो ढक जाये, पाँव फैला न सको
सच्ची महोब्बत हाँ उसी को कहते हैं
भुलना चाहो मगर भुला न सको
मरे जुगनू क्यों उठा लाये इस घर में
हम बेजार कब थे, गर नूर घर में फैला न सको
रास्ते की ठोकर हटा दी ये कहकर
ताकि मेरे अपनों को गिरा न सको
ऐसी तंग गलियाँ भी नहीं मेरे घर तक की
मिलना चाहो, मगर मुझतक आ न सको