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Feroj Khan

Feroj Khan

@ferojkhan.536289


चिराग जला लेता हूँ
आफताब बुझा करके

पुराना दर्द भुल जाते हैं हम
नया दर्द दिल में बसा करके के

चिरागों की सोहबत में रहते हो शायद
उजाला रख जाते हो मेरी दहलीज पे मुस्कूरा करके

अश्कों से सिंचता हूँ रोज सुबह ओ शाम
जख्मों को रखता हूँ मैं हरा भरा करके

मत मचाओ शोर ऐ जहान वालों
बस अभी सोया है दर्द मुझको रुला करके

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एक चराग रौशन कर लेता हूँ
बुझा कर के आफताब
- Feroj Khan

मिला गम जमानें भर का
फरिश्ते रास्ता भुल गये
मेरे घर का
- Feroj Khan

उसने पुराने जख्म कुरेदें हैं
गुजरा दर्द जगाया है

हंसाने वाले तूने आज हमें
जार जार रुलाया है

क्यूँ रखते खाली कमरा दिल का
एक दर्द को बैठाया है

मैं यहीं का यहीं रह गया
परिंदा आसमां फिर आया है

आखिर निजात मिली सियाह रातों से
जहाँ में सुरज उग आया है

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अश्कों का सैलाब है
दर्द बेहिसाब है

किनारा नहीं है
मेरे डुबने की बात है

तारें गिनना मेरा शौंक है
जागने की रात है

दम घुट रहा है
कोई टीस सांसों के पास है

करीब आकर मेरा दिल बहलाओं
ये दिल बड़ा उदास है

क्यूं उन पर भरोसा कर लिया
खंजर उनके पास है

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सस्ती सांसें
महंगा खंजर

सुनसान रास्ते पे
डरा सिकंदर

बोल सिंकदर
जीता के हारा

कहता है
अपनों ने मारा
अपनों से हारा

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जमानें की रस्मों को तोड़कर आई थी तुम
तोहफा मुस्कुहटों का लाई थी तुम

हमें तब से कुछ हो गया
जब पहली दफा मुस्कुराई थी

थे तनहा से हम जमानें में
जमाना जला जब नजदिक आई थी तुम

कोई अजाब न मुझको परेशां करें
ये दुआ लब पे लाई थी तुम

जल रहे थे हम जिस वक्त धुप में
मेरी छाँव बनकर आई थी तुम

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हुई आंख बंद हमारी
हम दुनिया से गुजर गये

वो लहराते बलखाते
इतराते घर गये
और शरमाकर बोलें
डोली सजा दो मेरी
वो मर गये

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