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Feroj Khan

Feroj Khan

@ferojkhan.536289


तारे फलक के सभी जगमगाने लगे
चाँद निकला तो सभी के चेहरे मुस्कुराने लगे

हमने उफ तक न की ये जाँ निकलने पे
हाँ मर गये तब, जब रुठकर वो जाने लगे

एक ठोकर क्या लगी उनकें पाँव को
राह के तमाम पत्थर हटाने लगे

अन्धेरों के खौफ से हमने जलाये थेे चिराग
तनहा पाकर हमें ये उजाले सताने लगे

मुझे घर याद आ गया परदेश में
परिंदें लौट के शाम को जब घर को जानें लगे

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मेरे वास्ते जिन्दगी की दुआ मत कर
हाथ उठाकर, खुदा खुदा मत कर

अब सो भी जा, सोया जमाना जैसे
मेरी तरह तारे गिना मत कर

वो हो गया उदास फिर से
उसके अतीत को छुआ मत कर

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मेरी खामोशी का
सबब बस
इतना है
मुझे जानना है
तेरी बातों में दर्द
कितना है
- Feroj Khan

गम की उंगली
पकड़ चल रहा था मैं
और जमाने ने
हमें
तन्हा समझ लिया
- Feroj Khan

बरसती बारिशों में
हम आंसूओं को छुपाते रहे
जो माँगा दरिया ने
हम लुटाते रहे
💐💐💐
- Feroj Khan

हमनें सितारों की बात की
कभी लुटाये नही

वो भी आने की बात करते
कभी आये नहीं

धुल की निगाहें, हैं जमी इस खिड़की पर
पर्दो को रहने दो, हटाये नहीं

आज परिंदे मेरी छत पे हीे सो गये
ये बात जगाकर सय्याद को कोई बताये नहीं

थरराह उठी दिवार मेरे कमरें की
सिरहाने रक्खा चिराग मेरे कोई बुझाये नहीं

मुझे मिट्टी में रख दो बस जल्द से जल्द
बेकरारी और मेरी यूँ बढायें नहीं

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अश्क आंखों से बरसते रहे
तमाम उम्र इक मुस्कुराहट को तरसते रहे

पतझड़ ने साख पे जब से ली है पनाह
पत्ते रास्तों पे भटकते मिलें

आंधियों से जो न घबराये कभी
मेरी टूटती हर सांसें पे बुझते गये

नजर के तीर पे बस निकला है दम
जुबाँ की चोट पे सदियों तलक बिखरते रहे

वो पत्थर हो चुका अब मेरे लिए
जिसे अपने सीने का दिल हम समझते रहे

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कल कुछ लोग
पेड़ काटने आये थे
मेरे गाँव में

धुप बड़ी तेज है
ये कहकर
वैठ गये
उसी की छाँव में

जो जिन्दगी सांसों की मोहताज हैं
उस जिन्दगी के लिए
कितना गिड़गिडाते हैं
हम यहाँ-वहाँ

गलियों में भटकना छोड़ा है जबसे
मेरा मकाँ मुझसे परेशां हो गया है