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Gajendra Kudmate

Gajendra Kudmate

@kudmate.gaju78gmail.com202313
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हमदर्दी जताना भी किसीसे
आज एक पेशा बन गयी हैं
कभी होती थी डोर भरोसे की
आज कमज़ोर रेशा बन गयी हैं

गजेंद्र

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दरियाँ के दो किनारे होते हैं।
बागों से हीं तो बहारें होती हैं
ढूंडते हैं हम ख़ुशी को हरतरफ़
दरअसल पास हमारे होती हैं।

गजेंद्र

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कोई करता नहीं मुँहपर
किसी और की बुराई हैं।
यहीं दुनियाँ हैं मेरे यारों
और यहीं इसकी सच्चाई हैं

गजेंद्र

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बेमतलब के रिश्तों से बेहतर
बेगाना बनकर जीना हैं।
खाकर दो निवाले गिनकर
पेटभर के पानी पीना हैं।

गजेंद्र

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कभी किसी पेड़ की छाँव हीं
उसकी दुश्मन बन जाती हैं।
कभी अनजाने में हीं उसके
क़ातिल को पनाह दे जाती हैं।

गजेंद्र

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दस्तूर जहाँ का सभी को
निभाना पड़ता हैं
ग़म दबाकर सीनें में
मुकुराना पड़ता हैं

गजेंद्र

मैं भीं बन जाऊँगा कभी
औरों के लिए एक किस्सा
वो भी दोहराएँगे मुझको जो
न रहें कभी मेरे कल का हिस्सा

गजेंद्र

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दामन था हमनें थाम लिया
नशा-ए-बेख़ुदी का
देखा था हमनें हात जब
उसके हाथ में ओर किसी का

गजेंद्र

हमनें देखा हैं अपनीं आँखों से
इक दिल के टूटने का मंज़र
जब अपनें हीं उतार देते हैं
अपनों के हीं सीनें में खंजर

गजेंद्र

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क़त्ल तो होता हैं क़त्ल
चाहे नज़रों से हो या कटार से
बंदा हो जाता हैं फ़ना
सटीक इसके एक वार से

गजेंद्र