Quotes by VIRENDER VEER MEHTA in Bitesapp read free

VIRENDER  VEER  MEHTA

VIRENDER VEER MEHTA Matrubharti Verified

@veermehta
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विक्रम संवत 2083. . . चैत्र नवरात्रि पर्व। प्रथम दिवस "माँ शैलपुत्री"

ऊर्जा, स्थिरता, आधार और नए शुभारंभ का प्रतीक।
|| ●⃝जय ●⃝माता ●⃝शैलपुत्री ||

वैदिक पंचांग के अनुसार विक्रम संवत 𝟮𝟬𝟴𝟯 का आरंभ शुक्ल प्रतिपदा तिथि 𝟭𝟵/03/26 प्रातः 𝟲.𝟱𝟮 से।

मंगल कामनाओं की शुभ इच्छाओं के साथ,
💝 🔶🔷 शुभ दिन 🔷🔶 💝

. . . . वीर।

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#दूसरों_द्वारा_डाली_गई_मिट्टी_से_दफ़न_नहीं_होना_है
. . . ओशो की कलम से।

एक बार किसी गाँव में एक किसान का बैल एक सूखे कुएँ में गिर गया। बहुत देर तक वह बैल वहाँ पड़ा चिल्लाता रहा, लेकिन किसान ने कोई कदम नहीं उठाया। किसान उसकी चिल्लाहट सुनता रहा और सोचता रहा कि वह क्या करे और क्या नहीं ?
अंततः किसान ने विचार किया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चुका है और वह उसके लिए अनुपयोगी है, अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं है इसलिए बैल को इसी सुखे कुएँ में दफ़न कर देना चाहिए। किसान ने अपने कुछ परिचितों को बुलाया और उन सब के साथ मिलकर एक-एक फावड़ा मिट्टी कुएं में डालनी शुरू कर दी।
बैल का रूदन अभी तक जारी था, लेकिन जल्दी ही उसे स्थिति का आभास हो गया। और उसके बाद वह अचानक आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया। कुछ देर उसकी आवाज न सुनाई देने पर जब उन लोगों ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गए।. . .
अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था, वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर नीचे गिरी मिट्टी पर चढ़ कर उस पर खड़ा हो जाता था। बरहाल जैसे-जैसे वे लोग उस बैल पर फावड़ों से मिट्टी गिराते गए, वैसे-वैसे वह हिलहिल कर उस मिट्टी को गिरा कर; उसकी एक सीढी सी बनाकर ऊपर चढ़ता गया और जल्दी ही आश्चर्यजनक ढंग से वह ऊपर तक पहुंच गया और अंततः बाहर कूदकर भाग गया।

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दरअसल हमारे जीवन का सच भी यही है; जिनके लिए हम उपयोगी नहीं होते, वे हमारे जीवन में बहुत तरह की मिट्टी फेंकतें हैं। हमें आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में हमारी आलोचना करता है, कोई हमारी सफलताओं से ईर्ष्या के कारण बेकार में ही भला बुरा कहता है, कोई हमसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता है जो हमारे आदर्शों के विरुद्ध होते हैं। ये सब एक तरह से फेंकी हुई मिट्टी ही है।
ध्यान रहे. . . ऐसे में हमें हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की मिट्टी को गिराकर उससे सीख ले कर; उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किए आगे बढ़ना है।
. . . V€€R 💝

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विश्व पृथ्वी 🌍दिवस... अप्रैल 22.

पृथ्वी एक कैनवास की तरह है जिसे ईश्वर ने अपनी कला से स्वर्ग जैसा बनाया, और मनुष्य को उसकी बाग़डोर दे दी; ताकि वह पृथ्वी को और अधिक सुंदर और समृद्ध बना सके।
लेकिन. . .
मनुष्य ने क्या किया ?
धरा के संसाधनों का बेहिसाब दुरुपयोग किया, अपने अविष्कारों के लिए प्राकृतिक संपदा का अंधाधुंध विनाश किया।
अभी भी समय है,
धरा पर सृजन हो विनाश नहीं,
धरा का रक्षण हो भक्षण नही।
वरना भविष्य कैसा होगा, सहज ही कल्पना की जा सकती है।

विश्व पृथ्वी 🌍दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

. . . वीर।

(पृथ्वी दिवस एक वार्षिक आयोजन है जिसे 22 अप्रैल को दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के लिए आयोजित किया जाता है। इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप की थी।)

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// टच वुड //

हालाँकि ब्रिटिश अंग्रेजी का यह शब्द आज भी मध्यम वर्ग में इतना कॉमन नहीं है कि हर कोई इसे बोलता नज़र आए, लेकिन फिर भी शिक्षित वर्ग में इस शब्द का प्रयोग अक़्सर किया जाता है। ये नहीं कहा जा सकता कि 'टच वुड' बोलने वाले कितने लोग इसके वास्तविक मायने जानते है, लेकिन यदि इसका सही अर्थ जानने वाले भी इसे प्रयोग करते हैं, तो यह सहज ही आश्चर्यजनक है।

वैसे 'टच वुड' का प्रयोग करना ऐसे ही है जैसे हमारे यहाँ 'नज़र न लगे' कहा जाता है। और नज़र न लगने के टोटकों का यह विश्वास दुनिया के कई समुदायों में भिन्न-भिन्न रूपों में पाया जाता है। अपने यहाँ भी लाल मिर्च जलाना, धूनी देना, काजल लगाना, काला/लाल धागा बाँधना, नींबू लटकाना या नज़र बट्टू के मुखौटे टाँगना, जैसे सैकड़ों उपाय किए जाते हैं। और आजकल तो मोबाईल में भी बुरी नज़र रोकने के लिए एक इमोजी 👁️ आ गई है।
बहरहाल बात हो रही थी, टच वुड की। और ब्रिटिश अंग्रेजी में 'टच वुड' या अमेरिकन अंग्रेजी में 'नॉक ऑन वुड' यह बताने के लिए प्रचलित है कि आप जो कुछ कर रहे हैं उसमें आपको सफलता की, अच्छे भाग्य की उम्मीद रहे। आप 'टचवुड' कहते हैं और सुनने वाला भी आपसे सहमत होता हुआ कभी-कभी टचवुड कहता है। टचवुड बोलने के साथ ही लकड़ी का स्पर्श करना शुभ माना जाता है और बअगर टचवुड बोलकर लकड़ी को टच नहीं करते तो यह भी अशुभ माना जाता है।
लेकिन शायद कम लोग ही जानते होंगें कि एक क्रिस्चियन विश्वास के अनुसार सूखी लकड़ी में दुष्ट आत्माओं का निवास होता है और यदि हम कुछ सौभाग्य की बात कहते हैं तो दुष्ट आत्माएँ सुन लेती हैं और उसमें बाधा उत्पन्न करती हैं; इसलिए लकड़ी को छूकर उन्हें शान्त किया जाता है जिससे दुर्भाग्य न आए। माना जाता है कि इस शब्द का प्रयोग ईसा पूर्व से चला आ रहा है।
बहरहाल अब ये चाहे विश्वास हो या मिथक, लेकिन हमारे यहाँ तो ये उन नजर बट्टूओं की एक कड़ी ही बनता जा रहा है, बाकी विश्वास अपना-अपना।
. . . वीर।

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#विश्व_रंगमंच_दिवस

ये जिंदगी का रंगमंच और शतरंज़ की बिसात है।
कहीं सहरा, कहीं दरिया, ये क़ुदरत के अंदाज है।
परिंदों और जानवर से ज़ुदा तेरी इक पहचान है,
निभा क़िरदार शिद्दत से, न भूल कि तू इंसान है।

. . . विश्व रंगमंच दिवस (World Theatre Day) हर वर्ष 27 मार्च को मनाया जाता है। वर्ष 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टिट्यूट ने इस दिन की स्थापना की थी। ऐसा माना जाता है कि पहला नाटक पांचवी शताब्दी के प्रारंम्भिक दौर में एथेंस में एक्रोप्लिस में स्थित थिएटर ऑफ़ डायोनिसस में आयोजित हुआ था। और उसके बाद ही थिएटर पूरे ग्रीस में तेज़ी से चर्चित हुआ।
विश्व रंगमंच दिवस मनाने का उद्देश्य लोगों में

थिएटर को लेकर जागरुकता लाना और थिएटर की अहमियत याद दिलाना है।

हालांकि भारत में बदलते समय के साथ रंगमंच का चलन कम हो गया है, लेकिन फिर भी 'मल्टीप्लेक्स' के बावजूद, आज भी नाट्य अकादमी, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज और नुक्कड़ नाटक के जरिए, रंगमंच काफी प्रचलन में है।

. . . वीर।

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💧#विश्व_जल_दिवस 💧

हमारी तीसरी पीढ़ी ने झरनों और नदियों के रूप में बेशुमार जल देखा होगा,
हमारी पिछली पीढ़ी ने इसे नदियों से कुँओं में सीमित होते हए देखा होगा,
हमारी पीढ़ी ने कुओं से सरकारी नलों के बीच जल को यात्रा को देखा है,
और आज की नई पीढ़ी धीरे-धीरे जल की बोतलों और कैन के बीच की यात्रा देख रही है।. . .
अब आने वाली पीढ़ियों में जल का भविष्य जाने क्या होगा ?

एक बार विचार जरूर कीजिए. . . . !

जल बनाया नहीं जा सकता, केवल बचाकर ही इसकी पूर्ति की जा सकती है। इसलिए यथा संभव बचाने का प्रयास करें।

"जल है तो कल है, जल है तो जीवन है।" 💦 💦

// वीर //

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस।

नारी अन्नपूर्णा है, और नारी 'घर - संसार'।
सृष्टि नारी बिना नहीं, यही जगत आधार।।

. . . . भले ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस वास्तव में अंतरराष्ट्रीय 'वर्किंग' (काम करने वाली) वुमेन्स डे के रूप में पूरे विश्व में मनाया जाता है लेकिन आज का यह दिन हर उस स्त्री के नाम है, जिसे हम "माँ, बहन, बेटी या पत्नी" के रूप में जानते हैं।
अब यह बात अलग है कि हम में से अधिकतर लोग 'हाउस वाइफ' को 'वर्किंग वुमेन' मानते ही नहीं हैं। इसलिए यह बात सोचने की तो है,
कि यह दिन हमें किसके लिए और कहाँ से मनाना आरंभ करना चाहिए?

बहरहाल नारी को नारायणी कहने वाले और उसे अपना सेवक मान लेने वाले समाज को #अंतरराष्ट्रीय_महिला_दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

. . . . वीर।

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शव से शिव की ओर जाना. . .
(मात्र एक विचार-चेतना)

यह एक शाश्वत सत्य है कि इस सृष्टि पर जन्म लेने वाला प्रत्येक जीव जीवन के प्रति लालायित है, लेकिन ये भी एक सार्वभौमिक सत्य है कि जैसे ही कोई जीव उत्पन्न होता है, वहीं से वह मृत्यु की ओर अग्रसर होना (गति करना) आरंभ कर देता है, अर्थात 'शव' होने की प्रक्रिया की तरफ गति करने लगता है। इसीलिए कहते हैं 'राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत्य है'
लेकिन क्या हम जानते हैं? मृत्यु अंतिम सत्य नहीं है, अंतिम सत्य है शिव। वही सत्य है, वही सुंदर है। अर्थात शिव को पाना ही एकमात्र रास्ता है मृत्यु की दिशा में ,शव की दिशा में। और यही रास्ता है सत्य की दिशा में।

वस्तुतः शव होना ही वास्तव में शिव का होना है, अर्थात मृत्यु के बाद सभी को शिव के साथ एकाकार हो जाना है। भले ही इस सृष्टि में हम डॉक्टर-इंजीनियर, अमीर-ग़रीब, साधु-संन्यासी, बुद्ध-महावीर, राम-कृष्ण बन जाएं लेकिन सभी का अंतिम पड़ाव 'शव' ही है। और जब अंततः शिव (शव) ही होना है तो जीते जी शिव होने का प्रयास क्यों नहीं?
प्रत्येक व्यक्ति शिव बन सकता है, और जो शिव बनता है, वही शव अर्थात मृत्यु के ऊपर विजय पा सकता है। संसार में हर पल अनगिनित जीव शव बनने (मरने) के लिए तैयार हैं, लेकिन उसमें से बहुत से व्यक्ति (या साधु-संन्यासी, अघोरी) शव से आगे बढ़कर शिव को खोज रहे हैं, शिव बनने के लिए लगे हुए हैं। लेकिन क्या वे सच में 'शिव' होने की राह पर हैं या केवल भ्रम में हैं।
वास्तव में 'सत्य' को पाना ही शिव को पाना है, सत्य की ओर चलना ही शिव की खोज़ है, वरना असत्य की बेड़ियों में तो हम जकड़े ही हुए हैं; जिन्हें चाहे-अनचाहे अपने असत्य कर्मों से हम इन्हें (बेड़ियों को) और अधिक पुख़्ता करते जा रहे हैं।

और, 'हमें सत्य की ओर चलना है' सिर्फ यह कहने से भी काम नहीं चलेगा, क्योंकि 'सत्य' तो रेगिस्तान में पानी की वह बूंद है, जिसे ढूढ़ना बहुत-बहुत कठिन है। अगर हम अपने चारों ओर संसार में देखें, तो संसार की हर वस्तु हमें असत्य की ओर खींचती है और वास्तव में असत्य से ही तो संसार चलता नज़र आता है। असत्य तो अपने अनगिनित रूप में हमें मिलेगा, लेकिन सत्य का मिलना इतना सहज नहीं है।
इसे पाने के लिए हमें अपने शब्दों, विचारों, कर्मों, और इच्छाओं सभी को सत्य करना पड़ेगा। जब अंतःकरण और बाह्य करण, सब कुछ सत्य होगा, तभी तो सत्य की खोज़ का आरंभ होगा, तभी तो शिव की ओर चलने की यात्रा का आरंभ होगा।
क्या तैयार हैं हम सत्य की खोज़ के लिए. . . ?
शव से शिव की ओर जाने के लिए. . .?

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

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// वीर //

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‼️ अष्ट सिद्धि जिनकी पहचान,‼️
‼️ वो हैं संकट मोचन हनुमान। ‼️

#हनुमान_विजयोत्सव ...
भगवान शिव के 11 वें अवतार और मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के सर्वप्रिय भक्त हनुमान जी का जन्मोत्सव आज (चैत्र मास की पूर्णिमा) मनाया जा रहा है, लेकिन हम में से अधिकांश लोग नहीं जानते कि बाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान जी का जन्म कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को स्वाति नक्षत्र में हुआ था। और उसके अनुसार उनका जन्मोत्सव तभी मनाया जाता है। अर्थात इस प्रकार हनुमान जी एकमात्र देव हैं जिनका जन्मोत्वस दो बार मनाया जाता है।
दरअसल आज मनाए जाने वाले जन्मोत्सव को विजयोत्सव का रूप माना जाता है, जिसके मूल में उनसे जुड़ी कथा का विशेष महत्व माना जाता है जो इस प्रकार है, और शायद लगभग हम सभी उसे जानते भी हैं।

इस कथा के अनुसार एक बार बाल्यावस्था में भूख लगने पर अपनी अतीव शक्तियों के दम पर 'सूर्य' को उन्होंने फल समझकर खा लिया था। यह वही समय था जब राहु भी सूर्य को अपना ग्रास बनाने आया था लेकिन जब उन्होंने हनुमान जी को सूर्य निगलते हुए देखा तो राहु ने देवराज इंद्र से जाकर यह बात बता दी। और इस बात से इंद्रदेव ने क्रोधित होकर हनुमान जी को दंड देने के लिए उन पर वज्र का प्रहार किया। यह वज्र हनुमानजी की ठोड़ी में लगा जिससे वे बेहोश हो गए। पवन देव ने जब अपने बेटे को इस तरह से संकट में देखा तो उन्होंने क्रोधस्वरूप पूरे ब्रह्मांड में प्राणवायु को रोक दिया। इस आपात स्थिति में स्वयं ब्रह्माजी पवन देव के पास गए और बाल हनुमान को जीवनदान दिया। और मान्यता है कि वह दिन चैत्र मास की पूर्णिमा का ही दिन था। अब क्योंकि इस दिन बजरंगबली को नया जीवन मिला था, ऐसे में यह दिन उनके जन्मोत्सव (विजयोत्सव) के रूप में मनाया जाने लगा।

༺꧁ ◆ ॐ हं हनुमते नमः ◆ ꧂༻

हनुमान जन्मोत्सव की हार्दिक बधाई के साथ। __/\__
.... वीर।

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रंगों की बौछार नहीं, बस साथ काफी अपनों का।
जब अपनों का साथ है, चेहरा ख़ुद ही गुलाल है।।
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हो रंग-बिरंगी जिंदगी, जैसे 'गुलाल -अबीर''।
तन-मन पूरा शीतल कर दे, रंगों की तासीर।।

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ईश्वर से यही प्रार्थना है, यह रंगों का त्यौहार आपके जीवन में सुख, समृद्धि और अपार खुशियों के रंग भरे।

🌾🎈🍃 H∆PP¥ H0L! 🍃🎈🌾

.... वीर !

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