The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
श्राद्ध पक्ष का मानना या न मानना. . . एक प्रश्न !! (श्राद्ध पक्ष समाप्ति विशेष) हिन्दू संस्कृति के अनुसार ये एक शाश्वत नियम है कि मृत्यु केवल शरीर को प्राप्त होती है, आत्मा अजर-अमर है और वह समय अनुसार दूसरे शरीर (अर्थात एक नए जन्म) को धारण करती है तो यहाँ एक स्वाभाविक सा प्रश्न उठता है; जब हमारे 'पितरों' ने पुनर्जन्म ले लिया है, तो हम श्राद्ध किसके लिए करते हैं ? प्रश्न स्वाभाविक है और विचारणीय भी। यहाँ यदि सनातन धर्म के मूल में इन बातों पर विचार करें, तो हो सकता है कुछ बातें तर्कहीन भी लगें और कई कर्म मान्यताएं केवल झूठ या पाखंड भी लगें। लेकिन वास्तव में सनातन धर्म में इस प्रश्न को केवल शरीर या आत्मा के संदर्भ में नहीं, बल्कि श्रद्धा, कर्तव्य, कर्म और पीढ़ियों के आपसी संबंध से जोड़ा गया है। यदि भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों को देखें, तो एक शरीर द्वारा पुराने वस्त्रों को त्यागकर नया शरीर धारण करने के मूल में यही भाव सामने आता है कि शरीर भले ही नश्वर है, लेकिन आत्मा अजर-अमर है और उसकी यात्रा निरंतर आगे की ओर चलती रहती है। अतः यदि थोड़ा गहरे में सोचें, तो सही में श्राद्ध का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने पूर्वजों को उसी पुराने शरीर में उपस्थित मानकर उन्हें जल या भोजन पहुँचा रहे हैं। श्राद्ध का मूल भाव है—उनका स्मरण करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उनके कल्याण की कामना करना। यदि हम मान लेते हैं कि हमारे पूर्वज पुनर्जन्म ले चुके हैं, तो अवश्य ही वे कहीं किसी नए परिवार में एक नया जीवन जी रहे होंगे; लेकिन जरा विचार कीजिए, जिन पूर्वजोँ ने हमारे परिवार में कभी पिता, माता-पिता, दादा-दादी के रूप में हमारा पालन-पोषण किया था, क्या उनका महत्व और भावनात्मक स्थान इस लिए समाप्त हो जाता है कि वह हमारे जीवन से जा चुके हैं। हम जिस वंश, परिवार, संस्कार और जीवन-परंपरा से जुड़े हैं, उसका इतिहास हमारे पूर्वजों से ही बनता है। उनका स्मरण किसी एक शरीर तक तो सीमित हो ही नहीं सकता। क्या हम उनके नाम (या अपने वंश) पर वर्ष में एक दिन स्मरण, सम्मान और धार्मिक अर्पण की परंपरा नहीं निभा सकते जो अप्रत्यक्ष में सहज ही श्रद्धा और प्रकृति से भी जुड़ी हुई है। वस्तुतः श्राद्ध अपने पितरों तक जल या भोजन अर्पित करने का आयोजन मात्र नहीं है, बल्कि यह उनके संबंधों के प्रति हमारी श्रद्धा का परिचायक है। श्राद्ध उनके प्रति एक कृतज्ञता है, एक परंपरा है, जिसे हम निभाते हैं, निभाना ही चाहिए। और यही श्राद्ध के नाम में भी निहित है. . . श्रद्धया क्रियते इति श्राद्धम्। अर्थात श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म। सादर।। . . . वीर।। 💝
विश्व डाक दिवस।। अक्तूबर 09 ...! एक दौर था, जब पोस्ट ऑफिस का अर्थ ही पोस्ट कार्ड और मनी ऑर्डर था जिसे देखकर लोगों के चेहरे पर ख़ुशी की झलक आ जाती थी। समय बदला और इनके मायने बदल गए, आज के समय में पोस्ट ऑफिस की कई सुविधाएँ आधुनिक तकनीक की भेंट चढ़ गई। भले ही हम आज आधुनिक हो गए हैं, आपसी रिश्तों में, संपर्क में पहले से कहीं ज़्यादा क़रीब हो गए हैं, बहुत सी बातों में सुविधजनक हो गए हैं। लेकिन क्या. . . . हम उन अहसासों को कभी जी पाते हैं, जो कभी एक पोस्ट कार्ड, अंतर्देशीय पत्र या एक मनीऑर्डर के आने से मन में पनप जाते थे। एक गाँव या क़स्बे का डाकिया भले ही हमारा अपना नहीं होता था, लेकिन फिर भी सबका सांझा होता था; जिसके आने से भर से उम्मीदें जाग जाती थी। आज के डिजिटल दौर में भले ही वह सब नहीं है, लेकिन 'पोस्ट ऑफिस' की अहमियत आज भी कम नहीं हुई है। आज 'भारतीय डाक' सिर्फ़ पत्र का जरिया न रहकर बैंकिंग, ई-कॉमर्स और डिजिटल सेवाओं जैसी अन्य नागरिक सेवाओं की पहचान बन चुका है। आज, विश्व डाक दिवस के अवसर पर अपनों को करीब लाने और रिश्तों को मजबूती देने वाले डाक विभाग में कार्यरत भाई-बहनों सहित सभी को विश्व डाक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।। . . . वीर।।
महज़ इत्तफ़ाक़ है, तेरा ख़्वाबों में आकर हमें रुला देना। वरना बरसो गुजर गए, आँखों के समंदर को सहरा हुए।। . . . वीर। 💝
आजकल 'फ़िल्टर' से चेहरे चमक जाते हैं, पर इंसान उस फ़िल्टर के बारे में कभी नहीं सोचता; जिससे उसका व्यक्तित्व चमक जाए। . . . क्योंकि वह फ़िल्टर है, *आत्मविश्वास* जो कभी बाज़ार में नहीं मिलता। . . . वीर। 🔷☀️🔷 शुभ प्रभात 🔷☀️
विक्रम संवत 2083. . . चैत्र नवरात्रि पर्व। प्रथम दिवस "माँ शैलपुत्री" ऊर्जा, स्थिरता, आधार और नए शुभारंभ का प्रतीक। || ●⃝जय ●⃝माता ●⃝शैलपुत्री || वैदिक पंचांग के अनुसार विक्रम संवत 𝟮𝟬𝟴𝟯 का आरंभ शुक्ल प्रतिपदा तिथि 𝟭𝟵/03/26 प्रातः 𝟲.𝟱𝟮 से। मंगल कामनाओं की शुभ इच्छाओं के साथ, 💝 🔶🔷 शुभ दिन 🔷🔶 💝 . . . . वीर।
#दूसरों_द्वारा_डाली_गई_मिट्टी_से_दफ़न_नहीं_होना_है । . . . ओशो की कलम से। एक बार किसी गाँव में एक किसान का बैल एक सूखे कुएँ में गिर गया। बहुत देर तक वह बैल वहाँ पड़ा चिल्लाता रहा, लेकिन किसान ने कोई कदम नहीं उठाया। किसान उसकी चिल्लाहट सुनता रहा और सोचता रहा कि वह क्या करे और क्या नहीं ? अंततः किसान ने विचार किया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चुका है और वह उसके लिए अनुपयोगी है, अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं है इसलिए बैल को इसी सुखे कुएँ में दफ़न कर देना चाहिए। किसान ने अपने कुछ परिचितों को बुलाया और उन सब के साथ मिलकर एक-एक फावड़ा मिट्टी कुएं में डालनी शुरू कर दी। बैल का रूदन अभी तक जारी था, लेकिन जल्दी ही उसे स्थिति का आभास हो गया। और उसके बाद वह अचानक आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया। कुछ देर उसकी आवाज न सुनाई देने पर जब उन लोगों ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गए।. . . अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था, वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर नीचे गिरी मिट्टी पर चढ़ कर उस पर खड़ा हो जाता था। बरहाल जैसे-जैसे वे लोग उस बैल पर फावड़ों से मिट्टी गिराते गए, वैसे-वैसे वह हिलहिल कर उस मिट्टी को गिरा कर; उसकी एक सीढी सी बनाकर ऊपर चढ़ता गया और जल्दी ही आश्चर्यजनक ढंग से वह ऊपर तक पहुंच गया और अंततः बाहर कूदकर भाग गया। ●●● दरअसल हमारे जीवन का सच भी यही है; जिनके लिए हम उपयोगी नहीं होते, वे हमारे जीवन में बहुत तरह की मिट्टी फेंकतें हैं। हमें आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में हमारी आलोचना करता है, कोई हमारी सफलताओं से ईर्ष्या के कारण बेकार में ही भला बुरा कहता है, कोई हमसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता है जो हमारे आदर्शों के विरुद्ध होते हैं। ये सब एक तरह से फेंकी हुई मिट्टी ही है। ध्यान रहे. . . ऐसे में हमें हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की मिट्टी को गिराकर उससे सीख ले कर; उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किए आगे बढ़ना है। . . . V€€R 💝
विश्व पृथ्वी 🌍दिवस... अप्रैल 22. पृथ्वी एक कैनवास की तरह है जिसे ईश्वर ने अपनी कला से स्वर्ग जैसा बनाया, और मनुष्य को उसकी बाग़डोर दे दी; ताकि वह पृथ्वी को और अधिक सुंदर और समृद्ध बना सके। लेकिन. . . मनुष्य ने क्या किया ? धरा के संसाधनों का बेहिसाब दुरुपयोग किया, अपने अविष्कारों के लिए प्राकृतिक संपदा का अंधाधुंध विनाश किया। अभी भी समय है, धरा पर सृजन हो विनाश नहीं, धरा का रक्षण हो भक्षण नही। वरना भविष्य कैसा होगा, सहज ही कल्पना की जा सकती है। विश्व पृथ्वी 🌍दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ। . . . वीर। (पृथ्वी दिवस एक वार्षिक आयोजन है जिसे 22 अप्रैल को दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के लिए आयोजित किया जाता है। इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप की थी।)
// टच वुड // हालाँकि ब्रिटिश अंग्रेजी का यह शब्द आज भी मध्यम वर्ग में इतना कॉमन नहीं है कि हर कोई इसे बोलता नज़र आए, लेकिन फिर भी शिक्षित वर्ग में इस शब्द का प्रयोग अक़्सर किया जाता है। ये नहीं कहा जा सकता कि 'टच वुड' बोलने वाले कितने लोग इसके वास्तविक मायने जानते है, लेकिन यदि इसका सही अर्थ जानने वाले भी इसे प्रयोग करते हैं, तो यह सहज ही आश्चर्यजनक है। वैसे 'टच वुड' का प्रयोग करना ऐसे ही है जैसे हमारे यहाँ 'नज़र न लगे' कहा जाता है। और नज़र न लगने के टोटकों का यह विश्वास दुनिया के कई समुदायों में भिन्न-भिन्न रूपों में पाया जाता है। अपने यहाँ भी लाल मिर्च जलाना, धूनी देना, काजल लगाना, काला/लाल धागा बाँधना, नींबू लटकाना या नज़र बट्टू के मुखौटे टाँगना, जैसे सैकड़ों उपाय किए जाते हैं। और आजकल तो मोबाईल में भी बुरी नज़र रोकने के लिए एक इमोजी 👁️ आ गई है। बहरहाल बात हो रही थी, टच वुड की। और ब्रिटिश अंग्रेजी में 'टच वुड' या अमेरिकन अंग्रेजी में 'नॉक ऑन वुड' यह बताने के लिए प्रचलित है कि आप जो कुछ कर रहे हैं उसमें आपको सफलता की, अच्छे भाग्य की उम्मीद रहे। आप 'टचवुड' कहते हैं और सुनने वाला भी आपसे सहमत होता हुआ कभी-कभी टचवुड कहता है। टचवुड बोलने के साथ ही लकड़ी का स्पर्श करना शुभ माना जाता है और बअगर टचवुड बोलकर लकड़ी को टच नहीं करते तो यह भी अशुभ माना जाता है। लेकिन शायद कम लोग ही जानते होंगें कि एक क्रिस्चियन विश्वास के अनुसार सूखी लकड़ी में दुष्ट आत्माओं का निवास होता है और यदि हम कुछ सौभाग्य की बात कहते हैं तो दुष्ट आत्माएँ सुन लेती हैं और उसमें बाधा उत्पन्न करती हैं; इसलिए लकड़ी को छूकर उन्हें शान्त किया जाता है जिससे दुर्भाग्य न आए। माना जाता है कि इस शब्द का प्रयोग ईसा पूर्व से चला आ रहा है। बहरहाल अब ये चाहे विश्वास हो या मिथक, लेकिन हमारे यहाँ तो ये उन नजर बट्टूओं की एक कड़ी ही बनता जा रहा है, बाकी विश्वास अपना-अपना। . . . वीर।
#विश्व_रंगमंच_दिवस ये जिंदगी का रंगमंच और शतरंज़ की बिसात है। कहीं सहरा, कहीं दरिया, ये क़ुदरत के अंदाज है। परिंदों और जानवर से ज़ुदा तेरी इक पहचान है, निभा क़िरदार शिद्दत से, न भूल कि तू इंसान है। . . . विश्व रंगमंच दिवस (World Theatre Day) हर वर्ष 27 मार्च को मनाया जाता है। वर्ष 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टिट्यूट ने इस दिन की स्थापना की थी। ऐसा माना जाता है कि पहला नाटक पांचवी शताब्दी के प्रारंम्भिक दौर में एथेंस में एक्रोप्लिस में स्थित थिएटर ऑफ़ डायोनिसस में आयोजित हुआ था। और उसके बाद ही थिएटर पूरे ग्रीस में तेज़ी से चर्चित हुआ। विश्व रंगमंच दिवस मनाने का उद्देश्य लोगों में थिएटर को लेकर जागरुकता लाना और थिएटर की अहमियत याद दिलाना है। हालांकि भारत में बदलते समय के साथ रंगमंच का चलन कम हो गया है, लेकिन फिर भी 'मल्टीप्लेक्स' के बावजूद, आज भी नाट्य अकादमी, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज और नुक्कड़ नाटक के जरिए, रंगमंच काफी प्रचलन में है। . . . वीर।
💧#विश्व_जल_दिवस 💧 हमारी तीसरी पीढ़ी ने झरनों और नदियों के रूप में बेशुमार जल देखा होगा, हमारी पिछली पीढ़ी ने इसे नदियों से कुँओं में सीमित होते हए देखा होगा, हमारी पीढ़ी ने कुओं से सरकारी नलों के बीच जल को यात्रा को देखा है, और आज की नई पीढ़ी धीरे-धीरे जल की बोतलों और कैन के बीच की यात्रा देख रही है।. . . अब आने वाली पीढ़ियों में जल का भविष्य जाने क्या होगा ? एक बार विचार जरूर कीजिए. . . . ! जल बनाया नहीं जा सकता, केवल बचाकर ही इसकी पूर्ति की जा सकती है। इसलिए यथा संभव बचाने का प्रयास करें। "जल है तो कल है, जल है तो जीवन है।" 💦 💦 // वीर //
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved | Powered by Custom Web Development Company India.
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser