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vrinda 🌸 - vrinda
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बीत चुके है इतने दिन, हे रघुनंदन अब तो आ जाओ। ना सही जाए यह पीड़ा मुझसे, आकर इस लंका से अपनी सिया को लिवा ले जाओ। पल पल व्याकुल तुम बिन यहां मैं हे नाथ अब तो आ जाओ। ना सही जाए यह विरह आ कर दर्श दिखा जाओ। सोने की इस लंका में ना कोई सुख मैं पाती हूं तुम बिन हे रघुनाथ मैं विरह अग्नि में तपती जाती हूं। करो कृपा हे अवध बिहारी रो रो पुकारे सीता तुम्हारी। बीत चुके है इतने दिन अब, हे रघुनंदन आ जाओ। वध करके इन दुष्टों का प्रभु संग अपने तुम लिवा जाओ - vrinda
"रामायण - महाभारत क्षणिका", को मातृभारती पर पढ़ें :, https://www.matrubharti.com भारतीय भाषाओमें अनगिनत रचनाएं पढ़ें, लिखें और सुनें, बिलकुल निःशुल्क! - vrinda
कुछ क्षण पहले सभा में खड़ी वो अपने सतीत्व की परीक्षा दे रही थी। राम के भरे दरबार में जानकी अपनी पवित्रता का प्रमाण दे रही थी। वाल्मीकि संग लव कुश, सिया के साथ थे। पर नगर के वासियों के हृदय, अभी भी विषाक्त थे। जब दे दे सफाई जानकी हर गई, तो भू देवी उनके प्रमाण बन आ गई थी। साबित कर अपना चरित्र पवित्र, जानकी अब जा रही थी। कुछ क्षण पहले सभा में खड़ी वो अपने सतीत्व की परीक्षा दे रही थी। प्रमाण देख नगर के वासी हाथ जोड़ विनती करने लगे राम भी अपनी सिया को रोकने भागन लगे। पर नियति से हारी सिया अपना जीवन त्याग चुकी थी। जब तक राम पहुंचें उन तक, वो सिया तो यह धरा छोड़ कर जा चुकी थी......... - vrinda
बंद है दरवाजे नगर के प्रिए, तुम इस अंधकार में कहां और कैसे जाओगी...... बोली धीरज धर के सिया हे रघुनंदन, प्राणप्रिय जब दरवाजे बंद है हृदय के तो मैं इस नगर कैसे रह पाऊंगी...... हर पल हर क्षण यहां रहकर अग्नि परीक्षा तो ना दे पाऊंगी...... - vrinda
mmm - vrinda
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