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Raju kumar Chaudhary

Raju kumar Chaudhary Matrubharti Verified

@rajukumarchaudhary502010
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छोटी चिंगारी – बड़ी आग

1. शुरुआत
एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का लड़का रहता था। पढ़ाई में अच्छा था, पर परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। अक्सर लोग कहते – “इससे कुछ नहीं होगा, ये बस सपना देखता है।”


2. संघर्ष
अर्जुन ने हार नहीं मानी। दिन में खेतों में काम करता और रात में पढ़ाई करता। कई बार थककर गिर पड़ता, पर खुद से कहता – “अगर अब हार गया, तो ज़िंदगी भर हार जाऊँगा।”


3. प्रेरणा का क्षण
गाँव के पास एक लोहार को देखा। वह बार-बार लोहे को आग में डालकर हथौड़े से पीटता था। अर्जुन ने पूछा – “इतनी बार क्यों पीटते हो?”
लोहार मुस्कुराया और बोला – “लोहे को मजबूत बनाने के लिए बार-बार चोट और तपिश ज़रूरी है।”


4. परिणाम
अर्जुन ने यह सीख अपने जीवन में उतार ली। लगातार मेहनत करता रहा। वर्षों बाद वही अर्जुन सरकारी परीक्षा में पास होकर अफसर बना।
आज वही लोग, जो उसे ताने देते थे, उसकी मेहनत की मिसाल देते हैं।




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सीख:
छोटी-छोटी मेहनत की चिंगारियाँ मिलकर बड़ी सफलता की आग जलाती हैं।
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भाग 1 : परिचय

अध्याय 1 : गाँव और मासूमियत

प्रतापपुर गाँव की सुबह किसी पुराने भजन जैसी होती थी—धीमी, मधुर और आत्मा को छू लेने वाली। जब पूर्व दिशा से सूरज की लालिमा आसमान पर बिखरती, तो ऐसा लगता मानो धरती ने सुनहरा आँचल ओढ़ लिया हो। खेतों में ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमकतीं और हवा में मिट्टी की खुशबू घुल जाती।

गाँव का जीवन सरल था। लोग सूर्योदय से पहले उठते, पशुओं की देखभाल करते और फिर खेतों में जुट जाते। औरतें कुएँ से पानी भरतीं, आँगन लीपतीं और लोकगीत गातीं। बच्चे स्कूल जाने से पहले नदी किनारे नहाने जाते और फिर खेलकूद में खो जाते।

उसी गाँव में अर्जुन रहता था। वह पंद्रह साल का था—दुबला-पतला, गेहुँआ रंग, आँखों में गहरी चमक। पिता गरीब किसान थे, माँ गृहिणी। आर्थिक स्थिति कमजोर थी, मगर अर्जुन का मन पढ़ाई और सपनों में डूबा रहता। उसके अंदर कुछ बनने की लगन थी, और सबसे बड़ी बात—दिल बहुत साफ़ था।

सावित्री, दूसरी ओर, गाँव के ज़मींदार ठाकुर साहब की इकलौती बेटी थी। उसके घर की हवेली ऊँची दीवारों और नीले दरवाज़ों से घिरी थी। लोग कहते थे कि सावित्री राजकुमारी जैसी है—नाज़ुक, सुंदर और पढ़ी-लिखी। मगर उसकी सादगी उसे सबसे अलग बनाती थी।

उनकी पहली मुलाक़ात गाँव के मेले में नहीं, बल्कि बरसात के दिन नदी किनारे हुई थी। सावित्री खेलते-खेलते फिसल गई और उसके पाँव में चोट लग गई। भीड़ में से अर्जुन ही था जिसने उसकी मदद की। उसने अपनी गमछा फाड़कर पट्टी बाँधी और कहा—
“अब ठीक है। डरने की ज़रूरत नहीं।”

सावित्री ने उस दिन पहली बार उसे गौर से देखा। उसकी आँखों में ईमानदारी थी और आवाज़ में अपनापन।

यहीं से उनकी दोस्ती शुरू हुई।

धीरे-धीरे यह दोस्ती गहरी होती गई। स्कूल में सावित्री अक्सर गणित और हिंदी में कमजोर पड़ जाती, तो अर्जुन उसकी मदद करता। बदले में सावित्री उसके लिए अपनी हवेली से कभी किताब, कभी मिठाई चुपके से लाती। दोनों को लगता था जैसे वे एक-दूसरे की कमी पूरी कर रहे हों।

गाँव के बच्चे जब खेलते, तो अर्जुन और सावित्री भी शामिल होते। कभी कंचों में अर्जुन जीत जाता, तो सावित्री मुँह फुला लेती। अर्जुन हँसकर कहता—
“अगली बार तुम जीतोगी, वादा।”

सावित्री खिलखिलाकर हँस देती और उसका हँसना पूरे माहौल को रोशन कर देता।

लेकिन गाँव की चौकस निगाहें इस दोस्ती को मासूम नहीं मानती थीं। लोग कानाफूसी करने लगे। बुज़ुर्ग कहते—
“किसान का बेटा और ज़मींदार की बेटी? यह दोस्ती ज़्यादा दिन नहीं चलेगी।”

पर अर्जुन और सावित्री इन बातों से बेपरवाह थे। उनके लिए यह बंधन दुनिया से ऊपर था।

एक दिन शाम को, जब आसमान लाल हो रहा था और पक्षियों के झुंड लौट रहे थे, सावित्री ने अचानक पूछा—
“अर्जुन, क्या तुम सोचते हो कि हम हमेशा ऐसे ही मिलते रहेंगे?”

अर्जुन मुस्कुराया और बोला—
“हाँ, क्यों नहीं? दोस्ती कभी नहीं टूटती।”

सावित्री ने धीमी आवाज़ में कहा—
“पर अगर लोग हमें रोकें तो?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए उत्तर दिया—
“फिर भी मैं तेरे साथ रहूँगा।”

उसे कहाँ पता था कि यह मासूम वादा एक दिन उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगा।

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भाग 1 : परिचय

अध्याय 1 : गाँव और मासूमियत

प्रतापपुर गाँव की सुबह किसी पुराने भजन जैसी होती थी—धीमी, मधुर और आत्मा को छू लेने वाली। जब पूर्व दिशा से सूरज की लालिमा आसमान पर बिखरती, तो ऐसा लगता मानो धरती ने सुनहरा आँचल ओढ़ लिया हो। खेतों में ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमकतीं और हवा में मिट्टी की खुशबू घुल जाती।

गाँव का जीवन सरल था। लोग सूर्योदय से पहले उठते, पशुओं की देखभाल करते और फिर खेतों में जुट जाते। औरतें कुएँ से पानी भरतीं, आँगन लीपतीं और लोकगीत गातीं। बच्चे स्कूल जाने से पहले नदी किनारे नहाने जाते और फिर खेलकूद में खो जाते।

उसी गाँव में अर्जुन रहता था। वह पंद्रह साल का था—दुबला-पतला, गेहुँआ रंग, आँखों में गहरी चमक। पिता गरीब किसान थे, माँ गृहिणी। आर्थिक स्थिति कमजोर थी, मगर अर्जुन का मन पढ़ाई और सपनों में डूबा रहता। उसके अंदर कुछ बनने की लगन थी, और सबसे बड़ी बात—दिल बहुत साफ़ था।

सावित्री, दूसरी ओर, गाँव के ज़मींदार ठाकुर साहब की इकलौती बेटी थी। उसके घर की हवेली ऊँची दीवारों और नीले दरवाज़ों से घिरी थी। लोग कहते थे कि सावित्री राजकुमारी जैसी है—नाज़ुक, सुंदर और पढ़ी-लिखी। मगर उसकी सादगी उसे सबसे अलग बनाती थी।

उनकी पहली मुलाक़ात गाँव के मेले में नहीं, बल्कि बरसात के दिन नदी किनारे हुई थी। सावित्री खेलते-खेलते फिसल गई और उसके पाँव में चोट लग गई। भीड़ में से अर्जुन ही था जिसने उसकी मदद की। उसने अपनी गमछा फाड़कर पट्टी बाँधी और कहा—
“अब ठीक है। डरने की ज़रूरत नहीं।”

सावित्री ने उस दिन पहली बार उसे गौर से देखा। उसकी आँखों में ईमानदारी थी और आवाज़ में अपनापन।

यहीं से उनकी दोस्ती शुरू हुई।

धीरे-धीरे यह दोस्ती गहरी होती गई। स्कूल में सावित्री अक्सर गणित और हिंदी में कमजोर पड़ जाती, तो अर्जुन उसकी मदद करता। बदले में सावित्री उसके लिए अपनी हवेली से कभी किताब, कभी मिठाई चुपके से लाती। दोनों को लगता था जैसे वे एक-दूसरे की कमी पूरी कर रहे हों।

गाँव के बच्चे जब खेलते, तो अर्जुन और सावित्री भी शामिल होते। कभी कंचों में अर्जुन जीत जाता, तो सावित्री मुँह फुला लेती। अर्जुन हँसकर कहता—
“अगली बार तुम जीतोगी, वादा।”

सावित्री खिलखिलाकर हँस देती और उसका हँसना पूरे माहौल को रोशन कर देता।

लेकिन गाँव की चौकस निगाहें इस दोस्ती को मासूम नहीं मानती थीं। लोग कानाफूसी करने लगे। बुज़ुर्ग कहते—
“किसान का बेटा और ज़मींदार की बेटी? यह दोस्ती ज़्यादा दिन नहीं चलेगी।”

पर अर्जुन और सावित्री इन बातों से बेपरवाह थे। उनके लिए यह बंधन दुनिया से ऊपर था।

एक दिन शाम को, जब आसमान लाल हो रहा था और पक्षियों के झुंड लौट रहे थे, सावित्री ने अचानक पूछा—
“अर्जुन, क्या तुम सोचते हो कि हम हमेशा ऐसे ही मिलते रहेंगे?”

अर्जुन मुस्कुराया और बोला—
“हाँ, क्यों नहीं? दोस्ती कभी नहीं टूटती।”

सावित्री ने धीमी आवाज़ में कहा—
“पर अगर लोग हमें रोकें तो?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए उत्तर दिया—
“फिर भी मैं तेरे साथ रहूँगा।”

उसे कहाँ पता था कि यह मासूम वादा एक दिन उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगा।

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भाग 1 : परिचय

अध्याय 1 : गाँव और मासूमियत

प्रतापपुर गाँव की सुबह किसी पुराने भजन जैसी होती थी—धीमी, मधुर और आत्मा को छू लेने वाली। जब पूर्व दिशा से सूरज की लालिमा आसमान पर बिखरती, तो ऐसा लगता मानो धरती ने सुनहरा आँचल ओढ़ लिया हो। खेतों में ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमकतीं और हवा में मिट्टी की खुशबू घुल जाती।

गाँव का जीवन सरल था। लोग सूर्योदय से पहले उठते, पशुओं की देखभाल करते और फिर खेतों में जुट जाते। औरतें कुएँ से पानी भरतीं, आँगन लीपतीं और लोकगीत गातीं। बच्चे स्कूल जाने से पहले नदी किनारे नहाने जाते और फिर खेलकूद में खो जाते।

उसी गाँव में अर्जुन रहता था। वह पंद्रह साल का था—दुबला-पतला, गेहुँआ रंग, आँखों में गहरी चमक। पिता गरीब किसान थे, माँ गृहिणी। आर्थिक स्थिति कमजोर थी, मगर अर्जुन का मन पढ़ाई और सपनों में डूबा रहता। उसके अंदर कुछ बनने की लगन थी, और सबसे बड़ी बात—दिल बहुत साफ़ था।

सावित्री, दूसरी ओर, गाँव के ज़मींदार ठाकुर साहब की इकलौती बेटी थी। उसके घर की हवेली ऊँची दीवारों और नीले दरवाज़ों से घिरी थी। लोग कहते थे कि सावित्री राजकुमारी जैसी है—नाज़ुक, सुंदर और पढ़ी-लिखी। मगर उसकी सादगी उसे सबसे अलग बनाती थी।

उनकी पहली मुलाक़ात गाँव के मेले में नहीं, बल्कि बरसात के दिन नदी किनारे हुई थी। सावित्री खेलते-खेलते फिसल गई और उसके पाँव में चोट लग गई। भीड़ में से अर्जुन ही था जिसने उसकी मदद की। उसने अपनी गमछा फाड़कर पट्टी बाँधी और कहा—
“अब ठीक है। डरने की ज़रूरत नहीं।”

सावित्री ने उस दिन पहली बार उसे गौर से देखा। उसकी आँखों में ईमानदारी थी और आवाज़ में अपनापन।

यहीं से उनकी दोस्ती शुरू हुई।

धीरे-धीरे यह दोस्ती गहरी होती गई। स्कूल में सावित्री अक्सर गणित और हिंदी में कमजोर पड़ जाती, तो अर्जुन उसकी मदद करता। बदले में सावित्री उसके लिए अपनी हवेली से कभी किताब, कभी मिठाई चुपके से लाती। दोनों को लगता था जैसे वे एक-दूसरे की कमी पूरी कर रहे हों।

गाँव के बच्चे जब खेलते, तो अर्जुन और सावित्री भी शामिल होते। कभी कंचों में अर्जुन जीत जाता, तो सावित्री मुँह फुला लेती। अर्जुन हँसकर कहता—
“अगली बार तुम जीतोगी, वादा।”

सावित्री खिलखिलाकर हँस देती और उसका हँसना पूरे माहौल को रोशन कर देता।

लेकिन गाँव की चौकस निगाहें इस दोस्ती को मासूम नहीं मानती थीं। लोग कानाफूसी करने लगे। बुज़ुर्ग कहते—
“किसान का बेटा और ज़मींदार की बेटी? यह दोस्ती ज़्यादा दिन नहीं चलेगी।”

पर अर्जुन और सावित्री इन बातों से बेपरवाह थे। उनके लिए यह बंधन दुनिया से ऊपर था।

एक दिन शाम को, जब आसमान लाल हो रहा था और पक्षियों के झुंड लौट रहे थे, सावित्री ने अचानक पूछा—
“अर्जुन, क्या तुम सोचते हो कि हम हमेशा ऐसे ही मिलते रहेंगे?”

अर्जुन मुस्कुराया और बोला—
“हाँ, क्यों नहीं? दोस्ती कभी नहीं टूटती।”

सावित्री ने धीमी आवाज़ में कहा—
“पर अगर लोग हमें रोकें तो?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए उत्तर दिया—
“फिर भी मैं तेरे साथ रहूँगा।”

उसे कहाँ पता था कि यह मासूम वादा एक दिन उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगा।

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तेरे नाम – उपन्यास

अध्याय 1 – राधे की दुनिया

कैंपस की गलियों में अगर किसी का नाम सबसे पहले लिया जाता था, तो वह था राधे। उसका नाम सुनते ही सहपाठियों की धड़कनें तेज़ हो जातीं। उसका अंदाज़ ऐसा था कि हर कोई उससे डरता, लेकिन मन ही मन उसकी दबंगई का लोहा भी मानता था।

राधे की चाल में एक अकड़ थी। वह जहाँ से गुज़रता, सबकी नज़रें उसी पर टिक जातीं। उसके माथे पर बिखरे बाल, कंधे पर तौलिया और आँखों में जलती आग—यही उसकी पहचान थी।

लेकिन यह सख़्त और जिद्दी चेहरा भीतर से उतना मज़बूत नहीं था। राधे की ज़िंदगी में बहुत खालीपन था। माँ-बाप का साया बहुत पहले उठ गया था। दोस्तों की भीड़ थी, पर सच्ची दोस्ती का एहसास कहीं खो गया था।

रातें उसके लिए सबसे भारी होतीं। दिन में वह अपने गुस्से और दबंगई से दुनिया को डराता, लेकिन रात के सन्नाटे में वह खुद से डरता था। कई बार छत पर बैठकर वह तारों को ताकता और सोचता—"क्या यही ज़िंदगी है? लड़ाई, गुस्सा और डर? या कहीं कोई और रास्ता भी है?"

लेकिन उसे पता नहीं था कि उसकी ज़िंदगी का रास्ता जल्द ही बदलने वाला है। कोई ऐसा आने वाला है, जो उसकी इस उग्र दुनिया को नरमाई से छूकर बदल देगा।

"राधे की आँखों में आग थी, लेकिन किस्मत उसकी आँखों में अब प्रेम का दीया जलाने वाली थी।"


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अध्याय 2 – खालीपन की छाया

राधे के बाहरी स्वरूप को देखकर कोई भी सोच सकता था कि वह एक निडर और ताक़तवर इंसान है। लेकिन जो लोग उसकी आँखों में गहराई से झांकते, वे समझ जाते कि वहाँ एक ऐसा खालीपन है जिसे वह दुनिया से छुपाए फिरता है।

उसका बचपन आसान नहीं था। पिता का सख़्त स्वभाव और माँ का जल्दी बिछड़ जाना, दोनों ने उसके मन में गहरी चोट छोड़ी थी। पिता अक्सर कहा करते थे—
"मर्द को दर्द नहीं दिखाना चाहिए।"
शायद इसी वाक्य ने राधे को ऐसा बना दिया था—गुस्सैल, ज़िद्दी और कठोर।

राधे के पास दोस्तों की कमी नहीं थी। कॉलेज में उसके इर्द-गिर्द कई लोग रहते, लेकिन उनमें से कोई भी उसका अपना नहीं था। सब उसकी ताक़त से जुड़े थे, उसके दिल से नहीं। शाम को वह दोस्तों के साथ हंसी-ठिठोली करता, पर जब अकेला होता तो उसके मन में सवाल उठते—
"क्या सच में ये लोग मेरे अपने हैं? अगर एक दिन मैं हार गया, तो क्या ये मेरे साथ खड़े होंगे?"

रातें उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थीं। जब पूरा मोहल्ला नींद में डूबा होता, तब राधे सिगरेट के धुएँ में अपने दर्द को दबाने की कोशिश करता। धुआँ कमरे में फैलता और उसकी आँखें नम हो जातीं। लेकिन वह आँसू बहाने से डरता था।

"जिस वीराने में अब तक राधे भटक रहा था, वहाँ जल्द ही कोई ऐसी रौशनी आने वाली थी जो उसकी आत्मा को नया जीवन देगी।"


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अध्याय 3 – पहली मुलाक़ात

बसंत उत्सव का माहौल था। हर ओर रंग-बिरंगे कपड़े, हंसी-ठिठोली और संगीत की गूंज फैली थी। भीड़ में भी राधे हमेशा की तरह अकेला खड़ा था। उसकी निगाहें चारों ओर घूम रही थीं, पर मन कहीं और खोया था।

अचानक उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी—सफेद सलवार-कमीज़ में लिपटी, आँखों में झील-सी गहराई और चेहरे पर मासूमियत की चमक। वह निर्जला थी।

राधे की आँखें उस पर ठहर गईं। यह पहली बार था जब किसी को देखकर उसका दिल बेकाबू धड़क उठा। निर्जला ने हल्की मुस्कान दी और आगे बढ़ गई।

उस शाम राधे छत पर बैठा तारों को निहार रहा था। बार-बार वही चेहरा उसकी आँखों के सामने आ रहा था। पहली बार उसे लगा कि उसकी ज़िंदगी में किसी ने बिना बोले दस्तक दी है।

"राधे की दुनिया अब बदलने वाली थी। निर्जला का आना उसकी ज़िंदगी में बसंत की पहली बयार था।"


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अध्याय 4 – प्रेम का अंकुर

पहली मुलाक़ात के बाद राधे की दुनिया बदल गई। अब वह अक्सर कॉलेज के गलियारों में घूमता कि कहीं निर्जला की झलक मिल जाए।

निर्जला की सरलता और मासूमियत ने राधे को भीतर से बदल दिया। वह अब बिना वजह झगड़े करने से बचने लगा।

एक दिन लाइब्रेरी में राधे ने निर्जला को देखा। उसने हिम्मत जुटाकर कहा—
"तुम्हें शायद ये किताब चाहिए थी।"
निर्जला ने मुस्कुराकर धन्यवाद कहा। राधे के दिल पर यह मुस्कान अमिट छाप छोड़ गई।

"राधे को अब एहसास हो चुका था कि उसका दिल उस मासूम लड़की की ओर खिंच रहा है। यह सिर्फ एक मुलाक़ात नहीं थी—यह एक नई शुरुआत थी।"


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अध्याय 5 – विरोध की दीवारें

राधे और निर्जला के बीच की नज़दीकियाँ गहरी हो रही थीं। लेकिन निर्जला का परिवार बेहद परंपरावादी था। जब उन्हें यह पता चला, तो घर में सख़्त माहौल बन गया।

राधे का गुस्सा फिर से भड़क उठा। उसने कहा—
"मैं तुझसे दूर नहीं रह सकता।"
निर्जला ने धीमी आवाज़ में उत्तर दिया—
"राधे, प्यार का मतलब दीवारें तोड़ना नहीं, बल्कि दिल जीतना होता है।"

"प्रेम का अंकुर तो फूट चुका था, पर अब उसके सामने समाज और परिवार की कठोर दीवारें खड़ी थीं।"


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अध्याय 6 – टूटता संतुलन

राधे ने जितनी बार कोशिश की, उसका गुस्सा प्रेम के रास्ते में रोड़ा बन गया। एक दिन कॉलेज में झड़प ने उसकी ज़िंदगी बदल दी। हादसा इतना गंभीर था कि पुलिस और परिवार का झगड़ा बढ़ गया।

अस्पताल में राधे का शरीर घायल था, पर उसके मन में टूटन और अकेलापन गहरा था।
निर्जला हर दिन उसके पास आती, पर वह भी मजबूर थी।

"राधे का शरीर अस्पताल में था, लेकिन उसकी आत्मा कहीं और भटक रही थी।"


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अध्याय 7 – अधूरी मोहब्बत

समय के साथ राधे की ज़िंदगी और निर्जला का परिवार दोनों में दूरी बढ़ती गई। निर्जला अब मजबूरी में निर्णय लेने लगी थी।

राधे के भीतर का पागलपन अब अकेलेपन में बदल गया। वह अक्सर छत पर बैठता और निर्जला का नाम फुसफुसाता।

"निर्जला अब उसके सामने नहीं थी, लेकिन उसके नाम की मिठास और उसकी यादों की छाया हमेशा राधे के दिल में जिंदा रही।"


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अध्याय 8 – अंतिम करुणा

राधे ने समझ लिया कि प्रेम केवल पाने का नहीं, बल्कि त्याग और समझदारी का भी नाम है। वह छत पर बैठा, निर्जला के बारे में सोचते हुए धीरे मुस्कुराया।

"अधूरी मोहब्बत हमेशा अधूरी नहीं रहती। वह अमर हो जाती है, और अपने नाम से हर दिल को छू लेती है।"

राधे और निर्जला की प्रेम कहानी इस बात का प्रमाण है कि कभी-कभी प्यार की ताक़त केवल मिलने में नहीं, बल्कि यादों, त्याग और दिल की गहराई में भी होती है।

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. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की कहानी

1. जन्म और बचपन
डॉ. अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। उनके पिता जैनुलाब्दीन एक साधारण पोस्ट ऑफिस में काम करते थे। कलाम बचपन से ही बहुत सरल और मेहनती स्वभाव के थे। वे पढ़ाई में तेज और स्वभाव में विनम्र थे।

2. शिक्षा और संघर्ष
कलाम की शुरुआती शिक्षा रामेश्वरम में हुई। वे विज्ञान और गणित में बहुत रुचि रखते थे। बचपन में ही उन्होंने अपने जीवन में उच्च उद्देश्य निर्धारित कर लिया था: "मैं देश के लिए कुछ बड़ा करूंगा।"

उनकी आर्थिक परिस्थितियाँ कठिन थीं, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। पढ़ाई के लिए वे किताबें उधार लेकर पढ़ते और हर संभव मेहनत करते।

3. करियर की शुरुआत
कलाम ने 1954 में मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। उसके बाद उन्होंने भारतीय वायुसेना में काम करने का मौका पाया, लेकिन देश की सेवा करने के लिए उन्होंने इस अवसर को छोड़कर DRDO (Defense Research and Development Organisation) और फिर ISRO (Indian Space Research Organisation) में काम करना शुरू किया।

4. मिसाइल मैन बनना
डॉ. कलाम ने भारत में मिसाइल प्रौद्योगिकी को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे “भारत का मिसाइल मैन” कहलाए। उनके नेतृत्व में भारत ने अग्नि और पृथ्वी मिसाइलें विकसित कीं। उनकी मेहनत और दूरदर्शिता ने भारत को आत्मनिर्भर रक्षा तकनीक में अग्रणी बनाया।

5. राष्ट्रपति का पद
डॉ. कलाम सिर्फ एक वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि देशभक्त और सरल व्यक्ति थे। उनके व्यवहार में विनम्रता और सादगी थी। 2002 में उन्हें भारत का 11वाँ राष्ट्रपति चुना गया। राष्ट्रपति रहते हुए भी वे बच्चों और युवाओं से जुड़े रहे। उन्होंने शिक्षा, विज्ञान और देशभक्ति के संदेश पूरे देश में फैलाए।

6. जीवन दर्शन
डॉ. कलाम का जीवन प्रेरणा का स्त्रोत है। उनके कुछ प्रसिद्ध विचार:

"सपने वो नहीं जो हम सोते वक्त देखते हैं, सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते।"

"सफलता के लिए हार मत मानो, लगातार प्रयास करो।"

"युवा शक्ति में देश की शक्ति है।"


7. उनका अंतिम समय
27 जुलाई 2015 को शिलांग में एक व्याख्यान देते हुए उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु से पूरा देश शोक में डूबा। लेकिन उनकी शिक्षाएँ, विचार और प्रेरणा आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं।


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💡 सीख:
डॉ. कलाम की कहानी हमें सिखाती है कि कठिनाइयाँ चाहे कितनी भी बड़ी हों, मेहनत, लक्ष्य और ईमानदारी से जीवन में कुछ भी संभव है। वे हमें बताते हैं कि शिक्षा, स्वप्न और सेवा के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।

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Always Stay Alert
Once upon a time, there was a lion that grew so old that he was unable to kill any prey for his food. So, he said to himself, I must do something to stay my stomach else I will die of starvation.

He kept thinking and thinking and at last an idea clicked him. He decided to lie down in the cave pretending to be ill and then who-so-ever will come to inquire about his health, will become his prey. The old lion put his wicked plan into practice and it started working. Many of his well-wishers got killed. But evil is short lived.

The lion replied, “I am not feeling well at all. But why don’t you come inside?”

Then the fox replied, I would love to come in, sir! But on seeing, all footprints going to your cave and none coming out, I would be foolish enough to come in.

Saying so, the fox went to alert the other animals.

📜Moral of the Story:-"Always Keep Your Eyes Open and Stay Alert before Walking in Any Situation."

हमेशा सतर्क रहो

हरे-भरे जंगल में एक समय का शेर बहुत ही ताक़तवर और साहसी था। उसकी दहाड़ सुनते ही पूरा जंगल काँप उठता था। लेकिन धीरे-धीरे समय बीता, शेर बूढ़ा हो गया। अब उसमें पहले जैसी ताक़त न रही। शिकार के पीछे दौड़ना उसके बस की बात नहीं रही। भूख से व्याकुल शेर सोच में डूब गया –

"अगर यूँ ही रहा, तो भूख से मेरी मृत्यु निश्चित है। मुझे कोई चाल चलनी होगी।"

बहुत देर तक सोचने के बाद उसके दिमाग में एक दुष्ट योजना आई। उसने अपने गुफा में लेटकर बीमार होने का नाटक करना शुरू कर दिया। जो भी जानवर उसका हाल पूछने आता, वह उसे पकड़कर खा जाता।

कुछ दिनों तक यह चालाकी चलती रही। कई भले जानवर उसके शिकार बने। धीरे-धीरे जंगल में बेचैनी फैलने लगी, लेकिन किसी को असली कारण पता न था।

इसी बीच एक दिन चतुर लोमड़ी वहाँ से गुज़री। उसने शेर की गुफा के पास पहुँचकर शेर को आवाज़ दी –

“महाराज! आप कैसे हैं? आपकी तबियत कैसी है?”

शेर कराहते हुए बोला –
“अरे लोमड़ी बहन! मैं बहुत बीमार हूँ। भीतर आओ और मेरा हाल-चाल पूछो।”

लोमड़ी ने गुफा के द्वार से चारों ओर देखा और मुस्कुराते हुए बोली –
“महाराज! आपकी बीमारी तो मैं देख रही हूँ… लेकिन उससे भी बड़ी बीमारी आपके पदचिह्न बता रहे हैं। सारे पैरों के निशान आपकी गुफा की ओर तो दिखते हैं, मगर कोई बाहर निकलता नहीं दिखता। क्या मैं इतनी मूर्ख हूँ कि भीतर जाकर खुद को आपकी दावत बना लूँ?”

इतना कहकर चतुर लोमड़ी तुरंत वहाँ से चली गई और जंगल के बाकी जानवरों को भी सचेत कर दिया।

शेर की चालाकी बेकार हो गई। उसकी भूख और धोखेबाज़ी ने उसे अकेला और असहाय बना दिया।


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📜 कहानी की शिक्षा (Moral):
"किसी भी परिस्थिति में आँखें खुली रखो, सतर्क रहो और समझदारी से निर्णय लो। क्योंकि चालाक लोग हमेशा भोलेपन का फ़ायदा उठाते हैं।"

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श्रवण कुमार की कथा

श्रवण कुमार भारतीय संस्कृति और रामायण काल की एक ऐसी पवित्र कथा का पात्र है, जो "माता-पिता की सेवा और आज्ञाकारिता" का प्रतीक माना जाता है। उसकी कहानी संतानों के लिए आदर्श है।


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जन्म और स्वभाव

श्रवण कुमार का जन्म एक ग़रीब किन्तु धर्मपरायण परिवार में हुआ था। उसके माता-पिता अंधे थे। श्रवण बचपन से ही अत्यंत सेवा भावी, विनम्र और धर्मनिष्ठ था। उसका सबसे बड़ा उद्देश्य अपने माता-पिता की सेवा करना और उन्हें सुख देना था।


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तीर्थयात्रा की इच्छा

जब उसके माता-पिता वृद्ध हो गए, तब उन्होंने अपने बेटे से कहा —
“बेटा, अब हमारा जीवन अंतिम पड़ाव पर है। मरने से पहले हम चारों धाम और तीर्थ स्थानों की यात्रा करना चाहते हैं।”

श्रवण कुमार ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया —
“माता-पिता! आपकी यह इच्छा मेरे लिए आज्ञा है। मैं आपको तीर्थयात्रा अवश्य कराऊँगा।”


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कंधे पर पालकी यात्रा

क्योंकि माता-पिता अंधे और वृद्ध थे, श्रवण ने दो टोकरियाँ बाँस की एक लंबी बल्लियों से बाँधकर कंधों पर पालकी बना ली। एक टोकरी में माँ और दूसरी में पिता को बिठाकर, वह स्वयं पैदल ही तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़ा।
वह दिन-रात अपने माता-पिता को ढोकर नदियों, जंगलों और पहाड़ों से गुजरता रहा।


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घटना – दशरथ द्वारा वध

एक बार श्रवण अपने माता-पिता को लेकर जंगल में किसी नदी (सरयू नदी) के किनारे पहुँचा। वहाँ उसके माता-पिता को प्यास लगी।
श्रवण जल लेने के लिए मटकी लेकर नदी किनारे गया। संयोग से उसी समय अयोध्या के राजा दशरथ शिकार खेलने निकले थे। उन्हें जल भरने की ध्वनि सुनाई दी। दशरथ को भ्रम हुआ कि कोई जंगली पशु जल पी रहा है। उन्होंने निशाना साधकर बाण चला दिया।

बाण लगते ही श्रवण घायल होकर तड़प उठा।


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अंतिम शब्द

राजा दशरथ वहाँ पहुँचे तो देखा कि यह कोई पशु नहीं बल्कि एक ब्रह्मचारी युवक है। उन्होंने पछतावा करते हुए श्रवण से क्षमा माँगी।
श्रवण ने कहा —
“राजन्! मैंने अपने माता-पिता को नदी किनारे बैठाया है। वे अंधे हैं और मेरी बाट जोह रहे हैं। कृपया उन्हें जल पहुँचा दीजिए और मेरी मृत्यु का समाचार भी धीरे-धीरे दीजिए, क्योंकि अचानक सुनने पर उनका हृदय टूट जाएगा।”

इतना कहकर उसने प्राण त्याग दिए।


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माता-पिता की मृत्यु और शाप

दशरथ ने करुणा से भरे मन से श्रवण के माता-पिता को जल दिया और सारा वृतांत बताया।
श्रवण के माता-पिता ने यह सुनते ही अत्यंत दुख में प्राण त्याग दिए। मरते समय उन्होंने दशरथ को शाप दिया —
“जिस प्रकार आज हम अपने पुत्र-वियोग में तड़प रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हें भी पुत्र-वियोग का दुःख सहना पड़ेगा।”

यह शाप आगे चलकर राम के वनवास और दशरथ की मृत्यु का कारण बना।


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शिक्षा

श्रवण कुमार की कथा हमें सिखाती है कि —

माता-पिता की सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं।

माता-पिता की इच्छा पूरी करना संतान का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

किसी भी कार्य में जल्दबाज़ी और बिना सोचे-समझे कदम उठाने से अनर्थ हो सकता है।

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1. आत्मा की मृत्यु के बाद की यात्रा

गरुड़ पुराण के अनुसार जब मनुष्य की मृत्यु होती है, तो उसके शरीर से प्राण निकलकर यमदूतों द्वारा ले जाया जाता है।

यदि जीव ने सत्कर्म किए हों तो यमदूत बड़े सौम्य रूप में आते हैं।

यदि जीव ने पापकर्म किए हों तो यमदूत भयंकर रूप धारण करके आत्मा को बाँधकर खींचते हैं।


यात्रा का मार्ग (सूक्ष्म शरीर की गति):

मृत्यु के बाद आत्मा 12 दिन तक घर के आसपास मंडराती रहती है।

13वें दिन से यमलोक की ओर यात्रा आरंभ होती है।

यह यात्रा 17 दिनों से लेकर 348 दिनों तक की बताई गई है।

बीच-बीच में आत्मा को अपने कर्मों की झलक दिखाई जाती है।



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2. यमलोक पहुँचने पर न्याय

आत्मा को यमराज के दरबार में लाया जाता है। वहाँ

चित्रगुप्त पाप-पुण्य का लेखा पढ़ते हैं।

यदि पुण्य अधिक है तो आत्मा को स्वर्ग भेजा जाता है।

यदि पाप अधिक हैं तो आत्मा को नरक में यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं।

यदि पुण्य और पाप बराबर हों तो पुनर्जन्म मिलता है।



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3. नरक का वर्णन

गरुड़ पुराण में 84 प्रकार के नरक बताए गए हैं।
कुछ प्रमुख नरक और पाप:

तमिस्र नरक – दूसरों की संपत्ति हड़पने वाले यहाँ यातना भोगते हैं।

अंधतमिस्र नरक – पत्नी के साथ छल करने वाले।

रौरव नरक – हिंसा और हत्या करने वाले।

महारौरव नरक – जीव-जंतु को पीड़ा देने वाले।

कुम्भीपाक नरक – व्यभिचारी, दूसरों की पत्नी से संबंध रखने वाले।

कालसूत्र नरक – माता-पिता का अपमान करने वाले।

असिपत्रवन नरक – धर्म का अपमान करने वाले, झूठे गुरु।


हर नरक में भयंकर यातनाएँ होती हैं –
आग में जलाना, काँटों पर गिराना, उबलते तेल में डालना, भूखे जानवरों से कटवाना इत्यादि।


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4. श्राद्ध और पिंडदान की कथा

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि मृत आत्मा को यमलोक की यात्रा के दौरान बहुत कष्ट होते हैं।

श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण के द्वारा जीव की आत्मा को शांति मिलती है।

जो पुत्र पिंडदान करता है, वही अपने पितरों को नरक से छुड़ा सकता है।

यदि श्राद्ध न किया जाए तो आत्मा भटकती रहती है और उसे मोक्ष नहीं मिलता।



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5. मोक्ष की कथा

एक समय गरुड़ ने भगवान विष्णु से पूछा –
“हे प्रभु! मृत्यु का इतना भयावह रूप देखकर जीव कैसे मुक्त हो सकता है?”

भगवान विष्णु बोले –

जो मनुष्य सत्य, दया, दान और धर्म का पालन करता है,

जो सदा हरि नाम का स्मरण करता है,

जो अपने माता-पिता, गुरु और ब्राह्मणों का सम्मान करता है,


वह मृत्यु के पश्चात सीधे वैकुण्ठधाम जाता है और उसे पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।


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निष्कर्ष

गरुड़ पुराण केवल मृत्यु और नरक का वर्णन ही नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य मोक्ष है।
जो व्यक्ति पाप से बचे और धर्म व भक्ति के मार्ग पर चले, वही मृत्यु के भय से मुक्त होकर शाश्वत आनंद को प्राप्त करता है।

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🌸🙏 श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🌸

यह पावन पर्व आपके जीवन में प्रेम, आनंद, सौभाग्य और समृद्धि लेकर आए।
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कृष्णा के चरणों में सिर झुका लो, जीवन सफल हो जाएगा।" 🌺🎉

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