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भाव-पुष्प


कुछ लोग प्रेम को परिभाषित करते हैं,
कुछ इस पर तर्क करते हैं।

प्रेम में तर्क नहीं होता,
इसमें कोई सवाल नहीं होता।

कुछ कहने के लिए जवाब नहीं होते,
मैं से हम तक, की राह का पता नहीं होता।

प्रेम जाना है तो करना होगा,
बिना प्रेम किए, क्या प्रेम समझाएंगे?
कहते हैं उसने हमें धोखा दिया,
हमने तो बड़ी शिद्दत से किया।

हमें पहले पता होता तो न करते,
न देते उनको अपना दिल।

आती है याद बाबा बुल्ले शाह,
इश्क शायरी में उन्होंने कहा है—
"ज़हर देख के पीता तो क्या पीता?
और इश्क देख के किया तो क्या किया?"

और इश्क कभी दुःख नहीं होता,
इश्क हार और जीत से फर्क नहीं पड़ता।

किसी शायर ने भी कहा है,

"इश्क में रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता,
क्योंकि महफिल में हमने दूध से ज़्यादा चाय के दीवाने देखे हैं।"

कहने को बहुत कुछ,
फिर कहेंगे क्या आपने,
कभी न इश्क किया,
या समझकर या पढ़कर लिखा।

इस पर कहूंगी, हाँ इश्क किया,
उस सांवरे से, उस मुरली वाले से।

ये दिखावा नहीं, बचपन से है,
जब शायद इश्क का मतलब नहीं पता था।

और कृष्ण कभी उनको प्रेम करने वाले,
को सेवक या नौकर नहीं समझते।

वो उन्हें चाहने वाले को सखा, सखी और गोपी कहते हैं।

— काजल

vanshsingh118873

रात की छत, और ये ठंडी हवा का शोर,
बादलों के पीछे छुपा है जैसे मेरा ही कोई और दौर।
मैं खड़ा रहा आसमान को यूँ ताकता हुआ,
जैसे हर बादल मेरे दर्द को साथ ले जाता हुआ।
खामोशी भी आज कुछ ज्यादा बोल रही है,
दिल के अंदर की बेचैनी जैसे मुझसे ही पूछ रही है।
न सितारे पास आए, न चाँद ने कुछ कहा,
बस मैं और मेरा अकेलापन, रात भर रहा।
जो दिल में था, वो बादलों में खो दिया मैंने,
और कुछ इस तरह खुद को थोड़ा रो दिया मैंने।

brokenboy190253

“मौत का दूसरा नाम”

मौत का दूसरा नाम क्या है…?
शायद अँधेरा
वो जो रोशनी को निगल जाए
और दिल के भीतर
हर रास्ता बंद कर दे…

कभी कभी,
मौत इंतज़ार भी होती है
लंबा, सर्द, और बेरहम
वो जो जीते जी इंसान को
धीरे धीरे अंदर से खा जाता है…

कुछ लोग कहते हैं
मौत अंत है
पर मेरे लिए,
वो उन तमाम लम्हों का
आख़िरी हिसाब है
जिन्हें हमने जिया नहीं…
सिर्फ़ सहा है।

प्राची गुर्जर …….

prachitanwar111

“चाँद से मेरा रिश्ता”

मुझे आवारा कहते हैं सब
कि मैं रात भर
चाँद की चौखट पर सिर टिकाए बैठी रहती हूँ
उन्हें क्या पता
कि ख़ामोशी जब सीने से लगती है
तो कैसा मरहम बन जाती है
जब रात अपना सारा शोर समेट लेती है।

सारा आलम ख़्वाब में डूब जाता है,
मगर मेरे अंदर कोई दिया टिमटिमा उठता है
उस सिमटी हुई चाँदनी के साए तले…
जैसे मैं और चाँद
एक ही साँस में सदियों का सन्नाटा जीते हों,
एक ही ज़ख़्म पर उँगली फिराते हों,
एक ही भूल चुकी दुआएँ दोहराते हों।

उन्हें बावरा कह लेने दो
उन्हें क्या इल्म
कि कायनात कितनी रहमदिल हो जाती है
जब तुम्हारे टूटे हुए दिल की
तन्हा गवाही
सिर्फ़ एक चाँद देता है।

प्राची गुर्जर …..

prachitanwar111

एक लड़की अपनी अधूरी यादों के लिए
किसी को ढूंढती फिर रहा है
शेहरो शेहरो गलियों गलियों
उसकी आंखें एक जगह नहीं टिक रही
बस भटकती जा रही है
बेहती जा रही है


वो जिसे ढूंढ रहा है
वह उसे मिल नहीं रहा
कहीं भी नहीं
ना शहरों में ना गलियों में
ना गांव में ना चलती फिरती कहीं भी राहों में
कहां जाकर छिप है
उसे नहीं पता
बस वह पागलों की तरह से ढूंढ रही है





गीत निर्मोही बलिए

बावरी हो गई मैं
बीरहा बीरहा मारा फिरती
नैना बस तुमको निहारा करती



कहा कहा ना मैंने तुमको ढूंढा बलिए

तू है की बड़ी निर्मोही
कहां जा छुपा बलिए


नैना बस तुमको डगर डगर निहार करती
डगर डगर मटका कहीं ना तो मुझको मिला बलिए

तू है बड़ी निर्मोही बलिए
तू है बड़ी निर्मोही बलिए


हु हु हु हाआ। हाआ। हाआ


नैंन मोही बिरहा बिरहा मारे रोते।
नयनं सूख गई पनिया


मोहि कुछ नहीं भावे
जोगी रे तोहरे सुरतिया बिन
जागे नैन कटे रतिया याद करतो रहित तोहरे तिरत्या


हु। हु। हु हु। हु। हू 3




मैं तो भूली बीछरी यादों के सहारे
हाथों में बिखरे हुए लेकर लकीरों के सहारे


फिरता फिरता बंजारों की तरह
बिरहा मारे मारे विचारों की तरह
फिरता फिरता बंजारों की तरह
बिरहा मारे मारे बंजारों की तरह





हा। हा। हा।


बाबरी मैं इश्क के जोक ना जानू
बीना जाने बिना पहचाने सोची ना समझी में
पर गई उलझी सी नयनं हमें अपना नयनं मिला ते



रोई मैं बिना आंसू अंखियों से रोई मैं

मैं बाबरी
बिरहा बिरहा मारे फिरती
नैनो से तुमको नहारे फिरती

तू है कि बलिए निर्मोही
मिलता ही नहीं मुझको कहीं

हा। हा। हा।

कहां जा छिपा है मेरे निर्मोही बलिए





अल्फाज
जगह-जगह ढूंढा मैंने तुझे
पागलों की तरह ढूंढा
और ढूंढता रहा
तू निर्मोही मुझे कहीं ना मिला
शायद तुम्हें मुझे इस हाल में देखकर अच्छा लगता है




अगर मजा आ रहा है तो छिपकर ही देखा करो
और मुझे देखा करो
तब तलक देखा करो
जब तलक मेरी बहेम टूट नहीं जाती
की मोहब्बत में मोहब्बत पागलों की तरह करना
मेरे हिस्से में आई
और यह हिस्सा तुम्हारे लिए कोई खास नहीं



उसे दिन से
मेरा घुटना मेरा मरना बस मेरी किस्मत है
जब नैंन तुम्हें देखकर
और कुछ देखना चाहा ही नहीं




अगर गीत आप सबको अच्छी लगे तो आगेपढ़ते रहिए
मैं आपके प्रिया राइटर अभिनिशा 🦋❤️💯

abhinisha

“मुझसे नहीं होगा “……..
सबसे मज़बूत वो नहीं
जो कभी झुकते नहीं,
सबसे मज़बूत वो हैं
जो टूटते हुए भी
अपने टूटने को पहचान लेते हैं।

कठोर चेहरों के पीछे
अक्सर थके हुए कंधे छुपे होते हैं,
और जो थककर बैठना सीख ले,
वही सच में आगे चल पाता है।

अपनी पीड़ा को कहना कमज़ोरी नहीं,
अपने दर्द को बाँटना
ख़ुद से ईमानदारी है।
“अब मुझसे नहीं होगा”
यह हार नहीं,
यह इंसान होने की सबसे सच्ची आवाज़ है।

मेहनत ज़रूरी है,
पर याद रखना
मेहनत का बोझ
अगर साँस छीन ले,
तो वह कर्तव्य नहीं
सज़ा बन जाता है।

याद रखो,
तुम पुरुष हो,
पर उससे पहले इंसान हो।
तुम्हें रुकने की इजाज़त है,
रोने की इजाज़त है,
और हर बार सब कर पाने की
कोई शर्त नहीं है।
प्राची गुर्जर …….

prachitanwar111

આજે પણ હારેલી બાજી રમવાનું પસંદ કરું છું
કારણ કે
મને ખબર છે… ક્યારેક હારેલી બાજી જ જીતની સૌથી સુંદર કહાની લખે છે. ♡

mahinikalam

https://tinyurl.com/4zm5ucbk

જોરદાર ક્વોલિટી 👌

ronakjoshi2191

क्या जीवन की भागदौड़, तनाव, असफलता, रिश्तों की उलझन और मन की बेचैनी ने आपको कभी यह सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर सच्चा समाधान कहाँ है? यह पुस्तक केवल गीता की व्याख्या नहीं, बल्कि आज के इंसान के जीवन का दर्पण है। इसमें हर अध्याय आपको स्वयं से मिलाने, सही दृष्टि देने और जीवन को नई दिशा में देखने का निमंत्रण देता है। यदि आप केवल पढ़ना नहीं, बल्कि अपने जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए है।

गीता: आज के इंसान के लिए

✍️ Shivraj Bhokare

shivrajbhokare342239

"ख़ुद को लिखूँगी" ✨

अगर लिख पाऊँ कुछ, तो मैं ख़ुद को लिखूँगी,
ख़ुद के सपने, अरमान, ख़्वाहिशें लिखूँगी…

थक गई हूँ औरों के ख़ातिर जीते-जीते,
अब सुकून भरी एक साँस ख़ुद को लिखूँगी…

लिखूँगी वो अँधेरी रातें, जिनमें रोई थी मैं,
और अब ख़ुद के लिए एक सुबह सूरज सी लिखूँगी…

अगर लिख पाऊँ कुछ, तो मैं ख़ुद को लिखूँगी।

लिखूँगी वो बंधन की बेड़ियाँ जो ज़माने ने लगाईं,
और ख़ुद के उड़ने को एक आसमान खुला सा लिखूँगी…

लिखूँगी वो खोया हुआ वजूद मेरा,
और अब ख़ुद की एक नई पहचान लिखूँगी…

अगर लिख पाऊँ कुछ, तो मैं ख़ुद को लिखूँगी…
प्राची गुर्जर …….

prachitanwar111

"नफ़रत बाँटने वाले इसलिए नहीं जीतते कि वे बहुत ताक़तवर हैं, बल्कि इसलिए जीतते हैं कि अच्छे लोग समय आने पर चुप रह जाते हैं।"

lukmankhan626159

Do you know that the prime reasons behind husband and wife causing hurt to each other through anger are expectations from each other, opinions and lack of understanding.

To know more, visit here: https://dbf.adalaj.org/4xctuvU2

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dadabhagwan1150

भीड़ का हिस्सा बनने का कोई चाव नहीं,
सबको खुश कर पाऊँ, ऐसा मेरा स्वभाव नहीं।
दुनिया के तराजू में खुद को तौलने नहीं आए,
हम यहाँ किसी और की बोली बोलने नहीं आए।

ज़िंदगी जीने आए हैं, कोई जंग जीतने नहीं,
सपनों के रंगों से भरने आए हैं, यूँ ही बीतने नहीं।
साँसों की इस रवानी को खुद से सँवारना है,
हर एक लम्हे को जी भरकर निहारना है।

दूसरों की उम्मीदों की गठरी क्यों कंधों पर उठाएँ?
खुदा ने पंख दिए हैं, तो क्यों न खुलकर उड़ जाएँ?

सपनों के कुछ अधूरे पन्ने पूरे करने आए हैं,
हौसलों की स्याही से अपनी तकदीर लिखने आए हैं।
शिकायतें लाख करे ये ज़माना तो करने दो,
हवा का रुख चाहे जो हो, हमें बस उड़ने दो!

palewaleawantikagmail.com200557

काकडी ची तंबळी

🥬काकडीची तंबळी आणि भात

🥬तंबळी" हा एक पारंपरिक मराठी खाद्यपदार्थ आहे. विशेषतः, ती एक प्रकारची चटणी किंवा रस्सा आहे, जी नारळ, दही किंवा ताक आणि मसाल्यांपासून बनवतात. ती भातासोबत खाल्ली जाते. असे गुगल सांगते
कांदा, ओव्याची पाने, टोमॅटो असे अनेक पदार्थ वापरून करता येते
उन्हाळ्यात थंड आणि पचनास हलके असल्यामुळे तंबळी खूप खाल्ली जाते.
कर्नाटक आणि महाराष्ट्रात ती खूप लोकप्रिय आहे.
'तंबळी' भातासोबत एक उत्कृष्ट साइड डिश आहे.

🥬साहित्य
एक काकडी साले काढून फोडी करून
अर्धी वाटी ओले खोबरे
कोथिंबीर
एक मिरची
अर्धा इंच आले
मीठ चवीनुसार
लाल सुकी मिरची
कढीलिंब
जिरे हिंग
वाटीभर ताक
फोडणी साठी दोन मोठे चमचे तूप

🥬कृती
प्रथम काकडीच्या फोडी, खोवलेले खोबरे, आले, मिरची, मीठ व भरपूर कोथिंबीर घालून सरसरीत वाटण करून घेणे
वाटण एका भांड्यात काढून घेऊन
जेवढी घट्टसर तंबळी हवी असेल तितके ताक घालून मिसळून घेणे
एका कढल्यात तूप घालून
जिरे हिंग व कढीलिंब आणि लाल सुकी मिरची घालून फोडणी करून घेणे
ही फोडणी तंबळी वर ओतून परत एकदा तंबळी हलवून घेणे

🥬ही तंबळी भाता सोबत चांगली लागते
उन्हाळ्याच्या दिवसात फ्रीज मध्ये थंडगार करून खायला घेतल्यास आणखीन चविष्ट लागते😋

jayvrishaligmailcom

*Aakarshan hi Vinash"

arnagvanshi051673

झोली उसकी ख़ाली थी लेकिन
फ़िर भी मुस्कुरा रहा था वह इंसान
बेशक़ सबकुछ गँवाया था उसनें
मगर गँवाया नहीं था अपना ईमान


गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

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​Contact Information
​Name: [ravi chendra
​WhatsApp: 74835 80626
​Email: [ravichendrasunnkari@gmail.com

ravichendrasunnkari901711

మీరు సినాప్సిస్ (Synopsis) ఇవ్వండి... దాన్ని అద్భుతమైన కథగా నేను మారుస్తాను!"
​సబ్-హెడ్డింగ్:
​మీ ఆలోచనలకు అక్షర రూపం... పాఠకులను కట్టిపడేసే హై-లెవల్ కంటెంట్!
​నా ప్రత్యేకతలు (Bullet Points లో):
​రోజువారీ కంటెంట్: ప్రతిరోజూ కొత్త కథ లేదా సీరియలైజ్డ్ ఎపిసోడ్స్ రాత.
​వివిధ జానర్లు: ఉత్కంఠభరితమైన థ్రిల్లర్స్, హారర్-యాక్షన్ మరియు యాక్షన్-ఫాంటసీ కథలు.
​క్వాలిటీ: ప్రొఫెషనల్ స్క్రీన్ ప్లే మరియు ఎంగేజింగ్ నరేషన్.
​హైలైట్ బాక్స్ (చిన్న బాక్స్‌లో హైలైట్ చేస్తూ):
​"రోజుకో కొత్త కథ రాసివ్వబడును!"
​సంప్రదించాల్సిన వివరాలు (కింద భాగంలో):
​పేరు: [ravi chendra ]
​ఫోన్ / వాట్సాప్: [+91 74835 80626
​ఈమెయిల్: [ravichendrasunnkari@gmail.com

ravichendrasunnkari901711

📖 सफलता की कीमत

Episode 1: सपना जो भूख से बड़ा था

सुबह के पाँच बजे थे।

नेपाल के पर्सा जिले के एक छोटे से गाँव में सूरज की पहली किरणें धीरे-धीरे धरती को छू रही थीं। पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी, लेकिन एक टूटी हुई झोपड़ी के अंदर अभी भी सन्नाटा था।

झोपड़ी की छत जगह-जगह से टूटी हुई थी। बरसात में पानी टपकता था और गर्मियों में धूप सीधे अंदर आ जाती थी।

उसी झोपड़ी में रहता था एक लड़का—आरव।

उम्र लगभग सोलह साल।

चेहरा साधारण था, लेकिन आँखों में कुछ असाधारण था।

एक ऐसा सपना, जो उसके गाँव के किसी भी लड़के ने कभी नहीं देखा था।

आरव की आँख खुली।

उसने सबसे पहले अपनी माँ को देखा।

माँ कोने में बैठी पुरानी साड़ी सिल रही थीं।

उनकी उंगलियों में सुई चुभ रही थी, लेकिन चेहरे पर दर्द नहीं था।

क्योंकि गरीबी में दर्द महसूस करने की भी फुर्सत नहीं होती।

"माँ, आप सोई नहीं?" आरव ने पूछा।

माँ मुस्कुराईं।

"अगर मैं सो जाऊँगी तो घर कैसे चलेगा बेटा?"

आरव चुप हो गया।

यह वही जवाब था जो वह बचपन से सुनता आया था।

उसने इधर-उधर देखा।

घर में खाने को कुछ नहीं था।

बस एक खाली डिब्बा रखा था जिसमें कभी चावल हुआ करते थे।

आरव का दिल भारी हो गया।

वह जानता था कि माँ ने कल रात खाना नहीं खाया था।

लेकिन फिर भी उन्होंने उससे कहा था—

"मुझे भूख नहीं है बेटा।"

गरीब माँएँ अक्सर यही झूठ बोलती हैं।

ताकि उनके बच्चे चैन से खा सकें।

आरव बाहर निकल आया।

गाँव के बच्चे खेल रहे थे।

कुछ लोग खेतों की ओर जा रहे थे।

कुछ लोग चाय की दुकान पर बैठे राजनीति की बातें कर रहे थे।

लेकिन आरव की दुनिया अलग थी।

वह सीधे गाँव के पुराने स्कूल की ओर चल पड़ा।

स्कूल की दीवारें टूटी हुई थीं।

खिड़कियों के शीशे नहीं थे।

लेकिन आरव के लिए वही दुनिया की सबसे बड़ी जगह थी।

क्योंकि वहीं से उसके सपनों की शुरुआत हुई थी।

स्कूल के मैदान में पहुँचकर वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया।

उसने अपना पुराना बैग खोला।

उसमें सिर्फ तीन किताबें थीं।

बाकी किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे।

अचानक उसकी नजर जमीन पर पड़ी एक पुरानी पत्रिका पर गई।

शायद किसी ने फेंक दी थी।

उसने उठाकर देखी।

कवर पर एक बहुत बड़ी कंपनी के मालिक की तस्वीर थी।

उस आदमी के पीछे ऊँची-ऊँची इमारतें थीं।

महंगी गाड़ियाँ थीं।

और हजारों लोग उसके लिए काम करते थे।

आरव उस तस्वीर को देर तक देखता रहा।

फिर धीरे से बोला—

"एक दिन मैं भी ऐसा बनूँगा।"

तभी पीछे से आवाज आई—

"अरे सुनो, अरबपति साहब!"

पूरी क्लास हँसने लगी।

वह उसका सहपाठी रोहित था।

"पहले अपने फटे जूते तो ठीक कर लो।"

सभी बच्चे जोर-जोर से हँसने लगे।

आरव ने अपने जूतों की तरफ देखा।

सचमुच वे जगह-जगह से फटे हुए थे।

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

उसने सिर्फ पत्रिका को अपने सीने से लगा लिया।

क्योंकि कुछ सपने मजाक से बड़े होते हैं।

कुछ देर बाद शिक्षक कक्षा में आए।

उन्होंने बच्चों से पूछा—

"तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?"

किसी ने कहा डॉक्टर।

किसी ने कहा पुलिस।

किसी ने कहा शिक्षक।

फिर शिक्षक ने आरव की ओर देखा।

"और तुम?"

पूरी कक्षा उसकी ओर देखने लगी।

आरव धीरे से खड़ा हुआ।

फिर बोला—

"मैं देश का सबसे सफल बिजनेसमैन बनना चाहता हूँ।"

कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

फिर पूरी कक्षा ठहाकों से गूँज उठी।

"ये?"

"सबसे बड़ा बिजनेसमैन?"

"इसके घर में खाना नहीं होता!"

हँसी बढ़ती गई।

लेकिन आरव शांत खड़ा रहा।

शिक्षक भी उसे आश्चर्य से देख रहे थे।

"क्यों बनना चाहते हो?" शिक्षक ने पूछा।

आरव की आँखें भर आईं।

उसने कहा—

"क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरी माँ भूखी सोए।"

पूरा कमरा अचानक शांत हो गया।

अब कोई नहीं हँस रहा था।

उस दिन पहली बार सबने आरव की आँखों में सपना देखा।

एक ऐसा सपना जो मजाक नहीं था।

एक ऐसा सपना जो उसकी जिंदगी बन चुका था।

शाम को वह घर लौटा।

लेकिन घर पहुँचते ही उसे कुछ अजीब लगा।

माँ बाहर नहीं थीं।

वह अंदर भागा।

माँ जमीन पर बैठी थीं।

उनके चेहरे पर कमजोरी साफ दिखाई दे रही थी।

"माँ!"

आरव घबरा गया।

"क्या हुआ?"

माँ मुस्कुराईं।

"कुछ नहीं बेटा।"

लेकिन पड़ोस की एक बूढ़ी महिला बोली—

"दो दिन से ठीक से खाना नहीं खाया है।"

आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर पत्थर रख दिया हो।

उसने पहली बार खुद को असहाय महसूस किया।

उस रात वह सो नहीं पाया।

बार-बार उसे माँ का चेहरा दिखाई दे रहा था।

रात के करीब बारह बजे वह झोपड़ी से बाहर निकला।

आसमान तारों से भरा हुआ था।

वह खेतों की ओर चला गया।

वहाँ खड़े होकर उसने आसमान की तरफ देखा।

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

लेकिन उसी समय उसके अंदर कुछ बदल गया।

उसने अपने आँसू पोंछे।

और पहली बार खुद से एक वादा किया।

"मैं गरीबी से हार नहीं मानूँगा।"

"मैं सफल बनूँगा।"

"चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े।"

हवा तेज चलने लगी।

मानो किस्मत उसकी बात सुन रही हो।

उसे नहीं पता था कि यह रास्ता आसान नहीं होगा।

उसे नहीं पता था कि सफलता उसे मिलेगी जरूर...

लेकिन उसके बदले उसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

और वह कीमत सिर्फ पैसे की नहीं होगी...

बल्कि उन लोगों की होगी जिन्हें वह सबसे ज्यादा प्यार करता था।

उस रात आरव ने जो कसम खाई...

वही उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी शुरुआत बनने वाली थी।

जारी रहेगा...

अगले एपिसोड में:

"भूख और किताबों का सौदा"

जब आरव अपनी पढ़ाई बचाने के लिए अपनी सबसे प्रिय चीज बेचने का फैसला करेगा, तब उसकी जिंदगी में एक ऐसा व्यक्ति आएगा जो उसके भविष्य की दिशा बदल देगा। 💔📚�

rajukumarchaudhary502010

उसकी आँखों में एक अजब उदासी थी,
लेकिन होठों पर एक धीमी हंसी थी।
ऐसे लग रहा था मानो कुछ तो है,

आंखें कहीं और ही घूमती,
लेकिन फिर भी मुझे देख रही थी,
जैसे मैं कोई हीरा हूं,
और वह मुझसे बहुत दूर है।

मानो एक कसक सी थी
उसके चेहरे पर,
लेकिन फिर भी वह दिल से खुश थी।

क्या था यह अजीब सा संगम,
मुझे समझ ही नहीं आया
वह इतनी खुश थी..!

या फिर वह मुझे बता ही नहीं पाई
कि वह कितनी खुश है ?

अजीब मुस्कान थी,
जैसे थोड़ा दर्द हुआ,
थोड़ी चोट लगी,
लेकिन मीठा भी लगा,
थोड़ा तीखा
और थोड़ा तेज सा लगा।

लेकिन कुछ तो था…
बात तो थी उसमें,
पता नहीं क्या बात थी
मैंने पूछा नहीं,
और वह बता नहीं पाई...🫠

manvikashveta451717