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इत्र की तरह है तू,
तेरी महक से ही मेरी रूह को पनाह मिलती है.🍁🍂💞

narayanmahajan.307843

क्या सरकार के द्वारा रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 49% से 74% करना राष्ट्रहित में है?
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डिफेन्स में 74% FDI का मतलब है कि हम अपना देश अधिकृत रूप से गंवाने के कगार पर आ चुके है। ज्यादातर सम्भावना है कि, अगले 3-4 वर्ष में यह सीमा 100% बढ़ा दी जायेगी और तब हम घोषित रूप से एक परजीवी / गुलाम देश होंगे।
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(1) 1990 तक भारत में परमिट राज था। हथियारों के निर्माण में न तो निजी कम्पनियों को मुक्त रूप से उत्पादन करने की छूट थी, और न ही विदेशी कम्पनियों को। किन्तु WTO समझौते के बाद जब लाइसेंस राज ख़त्म किया गया तो राष्ट्रिय सुरक्षा का विषय होने के कारण हथियारों के उत्पादन में विदेशी निवेश पर प्रतिबन्ध जारी रखा गया। कारगिल युद्ध में भारत को अमेरिका से हथियारों की मदद चाहिए थी, और तब भारत को हथियार निर्माताओ की काफी शर्तें माननी पड़ी। हथियारो के निर्माण में विदेशी निवेश को खोलना इसमें से एक था।
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2001 में हमें डिफेन्स में 26% एफडीआई की अनुमति देने के लिए बाध्य होना पड़ा।
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2015 में वे फिर से यह सीमा 49% तक बढ़वाने में कामयाब हुए।
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2020 में कोरोना की हड़बोंग में उन्होंने अब इसे 74% तक बढ़वा लिया है।
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FDI in defence limit raised to 74%; FM Sitharaman announces major ‘Make in India’ push for defence
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(2) पेड मीडिया द्वारा ऍफ़डीआई के समर्थन में दिए गए गलत तर्क :
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2.1. डिफेन्स में एफडीआई से भारत में टेक्नोलोजी ट्रांसफर होगा !!
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जटिल तकनीक के मामले में टेक्नोलोजी ट्रांसफर सिर्फ एक थ्योरी है, और व्यवहारिक रूप से जटिल निर्माण की तकनीक ट्रांसफर की ही नहीं जा सकती। और हथियारों के निर्माण में टेक्नोलोजी ट्रांसफर की बात करना एक निर्मम मजाक है। दुनिया के किसी देश ने आज किसी भी देश को हथियारों की तकनीक का हस्तांतरण नहीं किया है, और न ही किया जा सकता है। इस बारे में विस्तृत विवरण के लिए यह जवाब पढ़ें - Pawan Kumar Sharma का जवाब - विश्व स्तरीय अंतरिक्ष और मिसाइल प्रोग्राम होने के बावजूद भी भारत तेजस के लिए जेट इंजन क्यों नहीं बना पाया?
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2.2. भारत पहले से ही विदेशियों से हथियार आयात कर रहा है, अत: विदेशी भारत में आकर हथियार बनाते है तो हमें कोई नुकसान नहीं !!
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पहली बात तो यह है कि, यह तर्क देने वाले इस बिंदु को जानबुझकर गायब कर देते है कि, किन कानूनों को गेजेट में छापने से भारत स्वदेशी तकनीक आधारित जटिल हथियारो का निर्माण कर सकता है। तो पहले वे भारत में हथियार निर्माण संभव बनाने के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध करते है, जिससे हमें हथियार आयात करने पड़ते है, और फिर वे कहते है कि भारत को हथियार आयात करने पड़ रहे है, अत: हमें विदेशियों को बुलाकर भारत में हथियार बनाने के कारखाने लगाने के लिए कहना चाहिए !!
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इससे हमें निम्न तरह के नुकसान होंगे
जब तक विदेशी निवेश की सीमा 49% थी तब तक विदेशी किसी हथियार कम्पनी पर अपना स्वामित्व नहीं ले सकते थे। 74% स्टेक के बाद अब हथियार निर्माण कम्पनियों पर विदेशियों का स्वामित्व निर्णायक जाएगा। अत: अब अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच कम्पनियां भारत में बड़े पैमाने पर हथियार निर्माण के कारखाने लगाएगी।
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जब विदेशी भारत में आकर हथियार बनायेंगे तो नेताओं को धमका कर / उन्हें ब्राइब / म्राइब देकर सरकारी हथियार कम्पनियों का बचा खुचा बेस भी तोड़ देंगे। इससे हम हथियारों के निर्माण में विदेशियों पर और भी निर्भर हो जायेंगे । हथियार निर्माण की सरकारी कम्पनियों को अब धीरे धीरे या तो बंद कर दिया जाएगा या विदेशी इनका अधिग्रहण कर लेंगे।
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पेड मीडिया पूरी तरह से हथियार कम्पनियों के नियंत्रण में काम करता है। अत: हथियार कंपनियों के भारत में सीधे घुस आने के बाद मीडिया की शक्ति विस्फोटक रूप से बढ़ेगी, जिससे भारत के नेताओ की निर्भरता अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों पर और भी बुरी तरह से बढ़ जायेगी।
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हथियार कम्पनियों का मुख्य धंधा खनिज लूटना है। अत: अब वे भारत के नेताओं से ऐसे क़ानून छपवाएंगे जिससे वे लगभग मुफ्त में भारत के मिनरल्स लूट सके। तो अभी भारत के प्राकृतिक संसाधन की बहुत बड़े पैमाने पर लूट होने वाली है। और यह लूट पूरी तरह से कानूनी होगी।
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ये कम्पनियां जितना मुनाफा बनाएगी उसके बदले हमें डॉलर चुकाने होंगे। पहले हम हथियार लेने के लिए सीधे डॉलर चुका रहे थे, और अब रिपेट्रीएशन के रूप में डॉलर चुकायेंगे। मतलब ऍफ़डीआई डॉलर संकट में कोई कमी नहीं लाता, बल्कि इसमें इजाफा ही करता है।
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ऍफ़डीआई सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण विषय है, और डिफेन्स में यह काफी खतरनाक है। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए निचे दिए गए तीनो जवाब पढ़ें।
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(i) Pawan Kumar Sharma का जवाब - प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति क्यों दी जाती है? इससे हमें क्या फायदे और नुकसान होंगे?
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(ii) Pawan Kumar Sharma का जवाब - भारत के मीडिया को नियंत्रित करने वाली शक्तियों का एजेंडा क्या है ?
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(iii) Pawan Kumar Sharma का जवाब - क्या इंदिरा गांधी वाक़ई सबसे ताक़तवर भारतीय प्रधानमंत्री थीं?
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(3) यह अमेरिका की चीन के साथ युद्ध की तैयारी है। युद्ध कब होगा मुझे नहीं पता। लेकिन जैसे जैसे अमेरिका भारत का अधिग्रहण करता जाएगा वैसे वैसे युद्ध करीब आता जाएगा। और इस मामले में डिफेंस में एफडीआई निर्णायक है। दरअसल, अमेरिका भारत पर इतना कंट्रोल ले चुका है कि वह चीन का किला तोड़ने के लिए अब भारत का इस्तेमाल एक ऊंट की तरह कर सकता है। भारत और चीन के बीच इस युद्ध में चीन ख़त्म हो जाएगा और भारत आधे से अधिक बर्बाद होगा, और चीन के ख़त्म होने के बाद अमेरिका भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में बदल देगा।
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तो अगले कुछ वर्षो में निम्नलिखित में से कोई एक या एक से अधिक परिस्थितियों के घटने की सम्भावनाए प्रबल है :
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यदि पहले चरण में भारत एवं चीन का युद्ध शुरू होता है तो भारत के ज्यादातर नागरिक चीन के खिलाफ युद्ध का समर्थन नहीं करेंगे, अत: ज्यादातर सम्भावना है कि अमेरिका भारत के नेताओं का इस्तेमाल करके पाकिस्तान पर हमला करने के हालात खड़े करेगा। भारत की जनता पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में जाने के लिए आसानी से तैयार हो जाएगी। उदाहरण के लिए अमेरिका से चाबी मिलने के बाद भारत POK, गिलगित-बाल्टिस्तान पर हमला कर सकता है।
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पहले भारत पाकिस्तान का युद्ध शुरू होगा, और फिर अपना निवेश बचाने के लिए चीन को बीच में आना पड़ेगा। फर्स्ट राउंड में अमेरिका भारत को सिर्फ सीमित मात्रा में हथियारो की मदद भेजेगा, और जब भारत पिटने लगेगा तो अमेरिका भारत की तरफ से युद्ध की कमान संभाल लेगा, एवं बड़े पैमाने पर हथियार भेजना शुरू कर देगा। और भारत के नागरिक सोचेंगे कि अमेरिका हमें "बचाने" आया है !!
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यदि पाकिस्तान के राजनेता युद्ध को टालने की कोशिश करते है (जो कि वे कर सकते है) तो अमेरिका पाकिस्तान के जनरलों को डॉलर एवं हथियार भेजेगा और कश्मीर पर हमला करने को कहेगा। इस तरह भारत एवं पाकिस्तान का युद्ध शुरू होगा। बाद में अमेरिका भारत को डबल हथियार भेजेगा और भारत की सेना पाकिस्तान में अंदर तक घुस जाएगी। जैसे ही भारत की सेना POK में घुसेगी, CPEC को बचाने के लिए चीन को बीच में आना पड़ेगा।
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यदि चीन पाकिस्तान की सेना को भारत पर हमला करने से रोकने में सफल हो जाता है तो अमेरिका आतंकी समूहों एवं इंटर्नल इंसरजेंसी का सहारा लेगा। अमेरिका कश्मीर में हथियार भेजकर गुह युद्ध शुरु करेगा। साथ ही अमेरिका असम में भी हथियार भेजेगा। इन दोनों हिस्सों में यदि हथियार आने शुरू हो जाते है तो हिन्दुओ का बड़े पैमाने पर कत्ले आम होगा और लाखो नागरिको को पलायन करना पड़ सकता है।
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और तब भारत में State Vs इस्लामिस्ट का एक गृह युद्ध शुरू हो सकता है, जिसमें बड़ी संख्या में मुस्लिमों का कत्ले आम हो सकता है। इससे भारतीय मुस्लिमो बचाने के लिए ईरान, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान साथ में आ सकते है, और भारत में कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों को बड़े पैमाने पर हथियार भेजना शुरू कर देंगे। तब यह जंग भारतीय हिन्दू Vs एशियाई महाद्वीप के मुस्लिम के बीच बन जायेगी। तब अमेरिका भारत को हथियारों की मदद करना शुरु करेगा और जंग शुरू हो जाएगी।
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और इस तरह के दर्जनों पहलू हो सकते है जिनका इस्तेमाल करके अमेरिका भारत, पाकिस्तान, चीन, ईरान, अफगानिस्तान के बीच जंग शुरू कर सकता है। हमारी समस्या यह है कि भारत के पास इससे बचने का कोई उपाय नहीं है। सब कुछ तय करने वाला अमेरिका है। या तय करने वाला है चीन। यदि ये देश भारत को जंग का मैदान बनाना तय करते है तो भारत क्या चाहता है, यह महत्वहीन है। भारत की इच्छा महत्त्वहीन इसलिए है क्योंकि भारत जंग लड़ने और खुद को जंग से बचाने के लिए अमेरिकी हथियारों पर बुरी तरह से निर्भर है।
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(4) तो युद्ध कब होगा ?
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इसका जवाब मेरे पास नहीं है। किसी के पास नहीं है। इतिहास हमें यही बताता है कि इसी तरह की बातें चलती रहती है, और अचानक किसी भी समय किसी न किसी वजह से युद्ध शुरू हो जाता है। हम बस इतना देख सकते है कि युद्ध की तैयारी कहाँ हो रही है । और यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है, कि अमेरिका चीन के खिलाफ युद्ध की तैयारी कर रहा है। और जब तक अमेरिका भारत की सेना, जमीन एवं संसाधनों का इस्तेमाल न करें, तब तक अमेरिका किसी भी स्थिति में चीन से लड़ नहीं सकता। चीन को तोड़ने के लिए उसे भारत चाहिए ही चाहिए।
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यदि भारत के नागरिक सरकार पर दबाव बनाकर ऍफ़डीआई को रूकवाने में कामयाब हो जाते है, तो अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार कंपनियों द्वारा भारत का अधिग्रहण करने की प्रक्रिया रूक जाएगी, और युद्ध कुछ समय के लिए टल जाएगा। सिर्फ कुछ समय के लिए !!
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युद्ध पूरी तरह से इसीलिए नहीं टलेगा, क्योंकि भारत के सेना विदेशी हथियारों पर निर्भर है। अत: तब अमेरिका पाकिस्तान का इस्तेमाल करके जंग शुरू करेगा। यदि पाकिस्तान को पूरे पूरे अमेरिकी हथियार (मिलिट्री ड्रोन, फाइटर प्लेन, लेसर गाइडेड मिसाइले, लेसर गाईडेड बम, आदि) मिल जाते है, तो पाकिस्तान भारत के काफी अंदर तक घुस आएगा।
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यदि अमेरिका ऐसा नहीं करता है, या नहीं कर पाता है, तो वक्त के साथ चीन की सेना मजबूत होती जायेगी, और फिर चीन भारत के साथ ठीक वही करेगा जो की आज अमेरिका भारत के साथ कर रहा है। मतलब चीन भारत का आर्थिक एवं सैन्य रूप से अधिग्रहण कर लेगा।
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असल में, इन सभी स्थितियों में या इस तरह की किसी भी स्थिति में भारत की स्थिति खुद को बचाने के लिए इधर उधर भागने वाले की रहेगी। और हथियारों की लिस्ट लेकर जाने के लिए हमारे पास सिर्फ 2 ठिकाने है – रूस एवं अमेरिका !!
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रूस अब हमसे काफी दूर हो चुका है, और कोई वजह नहीं कि वह भारत को बचाने के लिए या तो अमेरिका या तो चीन से दुश्मनी मोल ले। क्योंकि भारत की स्थिति एक तरबूज की है, जिसे काटने और काटकर बांटने के लिए चीन एवं अमेरिका चाकू लेकर खड़े है। अभी ऍफ़डीआई के माध्यम से दोनों देश थोड़ी थोड़ी फांके ले रहे है।
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यदि ऐसे ही चलता रहा तो धीरे धीरे अमेरिका एवं चीन भारत को आधा आधा बिना किसी जंग के ही बाँट लेंगे। और यदि जंग हो जाती है, भारत किसके हिस्से में जायेगा इसका फैसला जंग करेगी। मतलब यह उसी तरह की लड़ाई है, जो ब्रिटिश एवं फ्रांसिस आज से 220 साल पहले भारत में लड़ रहे है। ब्रिटिश के पास फ़्रांस से बेहतर हथियार थे अत: तब भारत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हिस्से में चला गया था।
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(5) भारत में आपको ऐसे कई बुद्धिजीवी मिलेंगे जो इसे समस्या के रूप में देखते ही नहीं है कि, भारत की सेना विदेशियों के हथियारों पर निर्भर है !! घूम फिर कर वे अपनी बहस को इस बिंदु के इर्द गिर्द रखते है कि, भारत की सेना “पर्याप्त” रूप से मजबूत है। अमेरिका हमारा मित्र देश है, अत: वह चीन को ख़त्म करने के बाद भारत को ख़त्म नहीं करेगा। अब भारत का कभी युद्ध नहीं होगा, अत: आपको भय फैलाने की जरूरत नहीं है। और यदि भारत को युद्ध का सामना करना पड़ता भी है तो भारत की सेना पर्याप्त रूप से मजबूत है !! आदि आदि
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दुसरे शब्दों में, वे भारत की सेना को विदेशियों के हथियारों पर निर्भर बनाए रखना चाहते है, ताकि अमेरिका भारत की जमीन एवं संसाधनों का इस्तेमाल चीन को तोड़ने में कर सके। दरअसल, ये बुद्धिजीवी युद्ध की चर्चा को टाल कर भारत को युद्ध की तरफ धकेल रहे है। और वे ऐसा इसीलिए कर रहे है, क्योंकि पेड मीडिया ने उन्हें ऐसा करने के लिए चाबी दी है।
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मेरे विचार में, भारत के प्रत्येक नागरिक को अब इस बारे में स्टेंड लेना चाहिए कि क्या वह अमेरिका को चीन के खिलाफ अपनी सेना एवं जमीन का इस्तेमाल करने देना चाहता है या नहीं। और यदि आप भारत की जमीन का इस्तेमाल चीन के खिलाफ करने देना चाहते है, तो आपको यह बात समझ लेनी चाहिए कि, यह फैसला पेड मीडिया का है, आपका नही। क्योंकि पेड मीडिया के प्रायोजक इस युद्ध की तैयारी पिछले 10 वर्षो से कर रहे है। भारत में ऍफ़डीआई उनकी इसी तैयारी का हिस्सा है।
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(6) समाधान : मेरा प्रस्ताव जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर का है। यदि ये दोनों क़ानून गेजेट में छाप दिए जाते है तो भारत अगले 5-6 वर्ष में स्वदेशी तकनीक आधारित इतने ताकतवर हथियार बना सकता है, कि हम चीन एवं अमेरिका की सेना का मुकाबला कर सके। यदि एक बार हम खुद के हथियार बनाने की क्षमता जुटा लेते है, तो युद्ध को टाला जा सकता है।
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यदि हम स्वदेशी हथियारों का उत्पादन करने में असफल रहते है तो चीन से युद्ध टल जाने पर भी अमेरिका भारत का पूरी तरह से अधिग्रहण कर लेगा।
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sonukumai

ऐसे रखूँगा ख़्याल तेरा मैं
जैसे प्राइवेट अस्पताल वाले मरीज का रखते हैं....❤️

hardik89

प्रेम अपनी परिपूर्ण मंजिल तलाश करता है,
अपनी प्रेमिका को ही पत्नी बनाना चाहता है..❤️🌻

hardik89

આંખમાં આકાશ લઈ ફરતો રહ્યો,
મૂંગું કોઈ વાદળ હતો એ છોકરો;

રણની રેતીમાં પગલાં લખતો રહ્યો,
પોતાનો જ સાક્ષી હતો એ છોકરો;

ભીડ વચ્ચે નામ ઘણાં સાંભળ્યા,
પણ અંદરથી એકલો હતો એ છોકરો;

હાસ્યના હોઠે દીવો રાખી દીધો,
અંતરમાં અંધકાર હતો એ છોકરો;

ઠોકરોને ભાગ્ય માની ચાલતો,
દર્દનો વ્યવહાર હતો એ છોકરો;

સવાલોની સાંજ ઊતરે ત્યારે,
પોતાનો જ જવાબ હતો એ છોકરો;

સમય સામે ઝૂકી ન ગયો ક્યારેય,
મૌનનો મિનાર હતો એ છોકરો;

'કલ્પ' કહે, રણમાં ફૂલ ખીલે ક્યારેક,
એવો જ એક અણસાર હતો એ છોકરો..!!

- પંકજ ગોસ્વામી 'કલ્પ'

pankajgoswamy7187

होली की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹🌹🙏🌹🌹

drbhattdamayntih1903

Happy Holi, 🌹🌹🙏🌹🌹

drbhattdamayntih1903

જય શ્રી કૃષ્ણ

thakorpushpabensorabji9973

Happy Holi 🥰🥰

inkimagination

હું ભરી આવું રંગની મુઠ્ઠી,તું લઈ આવજે કોરું મન,
કેસુડાનાં ફૂલની સાખે, વગડો બનશે વૃંદાવન.

sonalpatadiagmail.com5519

नशीब......🗒️✍️❣️

mywrites

तुम सहेज कर रखना मेरे प्रेम के रंगों को...
सुना हैं.... एक और दुनिया है इस दुनिया के बाद, हम वहां मिलेंगे ...! ❤️

narayanmahajan.307843

✔️💯

narendraparmar2303

😊😊😊

meghnasanghvi9829

નાના હતા તો પહેલા એકબીજાને ચિઠ્ઠી લખતા અને તહેવારો માં કલર નાની નાની પડીકી માંપણ મોકલી
દેતા . પોસ્ટ ઓફિસ ના લાલ ડબ્બામાં ચિઠ્ઠી દોડતા નાખવા જાતા અને અઠવાડિયા 10 દિવસ સુધી પાછી ચિઠ્ઠી ની વાટ જોતા હતા અને તે કલરને અમે લગાડ્યો છે તે પણ ચિઠ્ઠીમાં પાછા લખી અને મોકલતા 😊
પણ હવે તેવું ક્યાં રહ્યુ છે.
હવે મોબાઈલ આવી ગયા પછી ચિઠ્ઠી નો વ્યવહાર બંધ થઈ ગયો છે અને મોબાઈલ ની હિસાબે
કોઈ પાસે સમય રહ્યો નથી એક કલર નો ફોટો પણ મોકલ તા નથી એકબીજાને એટલે દૂર થઈ ગયા છે.
Dhamak

heenagopiyani.493689

मेरी चूड़ियों में जितना रंग सजा है ना…
उतना ही रंग आज तुम पर चढ़ाऊँगी।
इतना गहरा रंग होगा कि
न पानी छुड़ा पाएगा,
न वक्त मिटा पाएगा…
और याद रखना —
ये किसी और का नहीं,
सिर्फ मेरे सुहाग का रंग है।” 💫

archanalekhikha

मैं अपनी पत्नी को हर रोज़ 150 रुपये बचाने के लिए बाज़ार ले जाता था, तिजोरी खोलने के तीन साल बाद... राज़ जानकर मैं अवाक रह गया।

मेरा नाम राकेश है, मैं लखनऊ में रहता हूँ। शादी से पहले, मेरी पत्नी अनीता की एक पक्की नौकरी थी, जिसका मासिक वेतन लगभग 30,000 रुपये था। मैंने सोच-समझकर हिसाब लगाया था: उसकी तनख्वाह पति-पत्नी और बच्चे, दोनों के खर्चों के लिए काफ़ी थी, और मेरी तनख्वाह 60,000 रुपये - पूरी तरह से बचत में, घर, सोना-चाँदी खरीदने में खर्च होगी।

लेकिन अनीता के गर्भवती होने के बाद सारी योजनाएँ धरी की धरी रह गईं।

जब से मेरी पत्नी ने नौकरी छोड़ी है

हमारी शादी को दो महीने भी नहीं हुए थे जब अनीता गर्भवती हुई। जब वह एक महीने से ज़्यादा गर्भवती थी, तब उसका गर्भपात हो गया। शहर के अस्पताल के डॉक्टर ने उसे लंबा आराम करने की सलाह दी। अनीता ने कंपनी छोड़ने के लिए कहा, लेकिन उसका बॉस नहीं माना, इसलिए उसे नौकरी से निकाल दिया गया।

मैं बहुत परेशान था, यह सोचकर कि "शादी के तुरंत बाद मुझे उसकी देखभाल करनी होगी।"

मेरी 60,000 रुपये की तनख्वाह, जो मुझे बचाकर रखनी चाहिए थी, पूरे परिवार पर खर्च करनी पड़ी। मेरे सास-ससुर गरीब थे और कुछ मदद नहीं कर सकते थे।

इसलिए मैंने अपनी पत्नी से सीधे कहा:

"अब से, मैं तुम्हें बाज़ार जाकर खाना बनाने के लिए सिर्फ़ 150 रुपये रोज़ दूँगा। तुम जैसे चाहो, गुज़ारा कर सकती हो, बशर्ते रात का खाना ठीक से मिले।"

मैं नाश्ता और दोपहर का खाना बाहर खाता था, इसलिए मुझे लगा कि 150 रुपये रोज़ काफ़ी हैं। मातृत्व आहार, पूरक आहार... मैंने इसे अनसुना कर दिया: "पहले, महिलाओं को बच्चे को जन्म देते समय किसी दवा की ज़रूरत नहीं होती थी, वे तब भी स्वस्थ रहती थीं।"

तीन साल बीत गए

पहले, अनीता ने बच्चे को जन्म देने के कुछ महीने बाद काम पर वापस जाने की योजना बनाई, लेकिन उसका बच्चा अक्सर बीमार रहता था, इसलिए उसे उसकी देखभाल के लिए घर पर ही रहना पड़ता था। अब तीन साल हो गए हैं। मेरा बच्चा 2 साल से ज़्यादा का हो गया है और उसे नर्सरी भेजा जाने वाला है।

पिछले तीन सालों से, मैं अपनी पत्नी को रोज़ाना ठीक 150 रुपये दे रहा हूँ। अब सोचता हूँ तो लगता है कि मैं "समझदार" हूँ: मेरी पत्नी सोच-समझकर खर्च करती है और कभी शिकायत नहीं करती। मैंने अपने सहकर्मियों के सामने शेखी भी बघारी थी कि मेरी पत्नी "गाँव की सबसे अच्छी बचत करने वाली" है। जब उन्होंने सुना, "तीन लोगों का परिवार, रोज़ाना 150 रुपये में हम क्या खाएँगे?" तो वे चौंक गए। मैं बस मुस्कुरा दिया, यह सोचकर कि मेरी पत्नी वाकई बहुत साधन संपन्न है।

मेरी सारी बचत सोने पर खर्च हो गई, जो एक तिजोरी में रखा था। बेशक, मैंने अपनी पत्नी को तिजोरी का पासवर्ड कभी नहीं बताया।

मुझे फिर से झटका लगा।

पिछले हफ़्ते मैं एक हफ़्ते के लिए बिज़नेस ट्रिप पर गया था। जब मैं घर लौटा, तो अंदर जाते ही मैंने देखा कि घर खाली था, बहुत सी चीज़ें गायब थीं। अनीता और बच्चा वहाँ नहीं थे। मैंने आवाज़ लगाई, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया।

ज़रूरी काम निपटाने के लिए मैंने जल्दी से ....


Continue

rajukumarchaudhary502010

— “सर… मैं अभी भी कुंवारी हूँ… मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी किसी आदमी के साथ नहीं रही…”

25 साल की एक युवती यह बात आँसुओं के बीच एक होटल के कमरे में कह रही थी,
उस आदमी के सामने खड़ी होकर जिसे उसने खुद चुना था।

लेकिन उससे भी बड़ा झटका उसका इंतज़ार कर रहा था…
बस पाँच मिनट बाद।

उसका नाम मरियाना नहीं, बल्कि मीरा था। उसकी उम्र 25 साल थी,
और वह अपने पर्स को कसकर पकड़े हुए काँप रही थी,
मुंबई के सबसे ऊँचे होटल के कमरे नंबर 806 के सामने।

पूरा एक साल उसने उस आदमी को जाना था:
अर्जुन, 38 साल का, सफल, शांत, शिक्षित…
या कम से कम वह ऐसा ही मानती थी।

उनकी मुलाकात काम के दौरान हुई थी।
अर्जुन ने कभी उस पर दबाव नहीं डाला,
कभी कोई अश्लील टिप्पणी नहीं की।

वह बस ध्यान से पेश आता, सवाल पूछता, धैर्य से उसकी बात सुनता…
और इसी वजह से मीरा को लगा कि वही वह आदमी है
जिसके सामने वह पहली बार अपना दिल खोलना चाहती है।

उस रात, उसने खुद उसे एक संदेश लिखा:

— “मैं आज रात तुम्हारे साथ अकेले रहना चाहती हूँ… अगर तुम भी चाहो।”

अर्जुन ने तुरंत स्वीकार कर लिया—
इतनी जल्दी कि मीरा एक पल के लिए झिझक गई।

लेकिन उसने खुद को समझा लिया।
वह उसे चाहती थी।
यह उसका अपना फैसला था।

पाँच मिनट पहले…

मीरा कमरे के अंदर एक कुर्सी पर बैठी थी,
उसकी उँगलियाँ कसकर एक-दूसरे में फँसी हुई थीं।

उसका दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था
कि उसे लगा जैसे वह छाती से बाहर निकल जाएगा।

अर्जुन उसके पास आया और धीरे से पूछा:

— “क्या तुम घबराई हुई हो?”

मीरा ने सिर हिलाया, अपनी आवाज़ को काँपने से रोकने की कोशिश करते हुए:

— “सर… मैं अभी भी कुंवारी हूँ। मैंने पहले कभी किसी के साथ कुछ नहीं किया। मुझे डर लग रहा है… कि मुझे समझ नहीं आएगा क्या करना है।”

अर्जुन पूरी तरह से स्थिर हो गया।

उसने मुस्कुराया नहीं,
मज़ाक नहीं किया,
उसे गले भी नहीं लगाया—
जैसा मीरा ने सोचा था कि शायद वह करेगा।

वह बस… उसे देखता रहा।

काफी देर तक।

उसके चेहरे पर कुछ अजीब था।
वह हैरानी नहीं थी,
वह खुशी भी नहीं थी।

मीरा ने भौंहें सिकोड़ लीं:

— “तुम मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो?”

तभी अर्जुन ने एक वाक्य कहा जिसने उसका खून जमा दिया:

— “अच्छा। अब मुझे पूरी तरह यकीन हो गया है।”

मीरा घबरा गई।

जैसे ही वह उससे पूछने वाली थी कि उसका मतलब क्या है,
अर्जुन उस छोटे से सूटकेस की तरफ चला गया जो वह साथ लाया था,
कोड डाला और उसे खोल दिया।

और मीरा की आँखें डर से फैल गईं।

उसके अंदर जो था…

वह किसी भी तरह से निजी सामान नहीं था।

बाकी…
👉 कहानी का अगला अध्याय पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर अभी जाएं… 👇👇

rajukumarchaudhary502010

Story Title: “झाड़ू वाली MBA”

(वैकल्पिक शीर्षक: “पहचान जो छुपी रह गई”, “गोल्ड मेडल और धूल”, “काव्या का सच”)


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सेठ राजेश्वर के केबिन में सन्नाटा पसरा हुआ था।
सामने खड़ी काव्या के हाथ काँप रहे थे, और मेज पर रखा उसका पुराना, मुड़ा-तुड़ा आईडी कार्ड जैसे उसकी पूरी कहानी कह रहा था।

राजेश्वर ने कार्ड उठाया।
उस पर साफ लिखा था —
Master of Business Administration – Gold Medalist.

उन्होंने भौंहें सिकोड़ लीं।

“अगर तुम सच कह रही हो… तो यहाँ झाड़ू क्यों लगा रही हो?”
आवाज़ अब पहले जैसी कठोर नहीं थी, पर संदेह अभी भी मौजूद था।

काव्या की आँखें भर आईं।

“साहब… मेरे पापा की अचानक मौत हो गई थी। उन पर भारी कर्ज था। कॉलेज से निकलते ही मुझे नौकरी मिली थी, लेकिन उसी कंपनी के मालिक ने… मेरे साथ गलत शर्तें रखीं। मैंने मना कर दिया। उन्होंने मेरे खिलाफ झूठी अफवाह फैला दी। जहाँ भी इंटरव्यू देने गई, रिजेक्ट कर दी गई। घर बचाने और माँ के इलाज के लिए… मुझे जो काम मिला, वो करना पड़ा।”

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

राजेश्वर ने पहली बार उसे एक नौकरानी की तरह नहीं, बल्कि एक पेशेवर की तरह देखा।

“और मेरी बेटी को पढ़ाने की हिम्मत कैसे हुई?” उन्होंने पूछा, पर इस बार गुस्से में नहीं—जिज्ञासा में।

काव्या ने सिर झुका लिया।
“परी मैथ्स में रो रही थी। मैंने सिर्फ समझाया… मुझे लगा ज्ञान बाँटने के लिए इजाज़त नहीं, नीयत चाहिए।”

उसी समय दरवाज़ा खुला।
छोटी परी अंदर आई और बोली—
“पापा, दीदी ने मुझे डरना नहीं, समझना सिखाया है।”

राजेश्वर ने अपनी बेटी की कॉपी फिर से देखी।
सिर्फ जवाब सही नहीं थे—समझाने का तरीका भी प्रोफेशनल था। स्टेप-बाय-स्टेप, कॉन्सेप्ट क्लियर।

उन्होंने गहरी साँस ली।

“कल सुबह 9 बजे, मेरे ऑफिस आना,” उन्होंने कहा।

काव्या घबरा गई।
“साहब… पुलिस—?”

“इंटरव्यू के लिए,” राजेश्वर ने बीच में टोका।


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अगला दिन

कंपनी के बोर्डरूम में काव्या के सामने फाइलें रखी गईं।
मार्केट एनालिसिस, लॉस स्टेटमेंट, ग्रोथ चार्ट।

“इनमें समस्या क्या है?” राजेश्वर ने पूछा।

काव्या ने एक-एक पेज पलटा, फिर बोली—
“आपकी कंपनी की प्रोडक्ट क्वालिटी अच्छी है, लेकिन ब्रांड पोज़िशनिंग कमजोर है। डिजिटल मार्केटिंग में निवेश कम है। और सप्लाई चेन में 12% लीकेज है।”

राजेश्वर की आँखें फैल गईं।
ये वही बातें थीं जो उनकी मैनेजमेंट टीम महीनों से पकड़ नहीं पा रही थी।

“अगर मैं तुम्हें मौका दूँ तो?” उन्होंने पूछा।

काव्या ने दृढ़ आवाज़ में कहा—
“मैं आपकी कंपनी का घाटा छह महीने में मुनाफे में बदल सकती हूँ।”


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छह महीने बाद

कंपनी का टर्नओवर 30% बढ़ चुका था।
नई स्ट्रेटेजी, डिजिटल कैंपेन, और कास्ट कटिंग मॉडल ने कमाल कर दिया।

आज उसी बोर्डरूम में एक नया नेमप्लेट लगा था—

काव्या शर्मा
जनरल मैनेजर

परी दौड़कर आई और बोली—
“पापा! अब दीदी मेरी टीचर भी हैं और आपकी बॉस भी!”

राजेश्वर मुस्कुराए।

“नहीं बेटा… ये हमारी कंपनी की असली पहचान हैं। हमें बस इन्हें पहचानने में देर लगी।”


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संदेश (Message):

कभी-कभी इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों में नहीं, उसकी काबिलियत में छिपी होती है।
मौका मिलते ही हुनर अपनी जगह खुद बना लेता है

rajukumarchaudhary502010

ધુળેટીના રંગોની જેમ તમારું જીવન પણ ખુશીઓથી રંગીન બની જાય તેવી શુભેચ્છાઓ!
DHAMAK

heenagopiyani.493689

ઉંચાઈ ની આવી જ્યારે આપણી બાજી,
ત્યારે જ અમેરિકા એ કરી બાથંબાથી;
ઇન્વેસ્ટમેન્ટ મારું પડ્યું ધડામધમ,
મારી આશાનું પિલ્લુ વળી ગયું ભમ!

​ખૂબસૂરતી જ્યારે આસમાને પહોંચે,
ત્યારે જ કોઈની નજર એના પર પડે;
પોર્ટફોલિયો મારો લીલોછમ દેખાતો હતો,
ત્યાં જ મંદીનો કાળો કાગડો એને નડે.

​ગ્રીન સિગ્નલ જોઈને મેં તો લગાવી હતી દોટ,
ખબર નહોતી કે નસીબમાં લખી હશે આટલી ખોટ;
ન્યૂઝ ચેનલ વાળા રોજ નવી વાતો લાવે,
પણ મારા ગજવામાં તો ખાલી પવન જ ફાવે!

​ડોલર સામે રૂપિયો જ્યારે લથડવા લાગે,
ત્યારે રાતના મોડા સુધી મારી ઊંઘ ભાગે;
એવરેજ કરવાના ચક્કરમાં બધું જ મેં ખોયું,
લોસ જોઈને રાત્રે મેં તો છાનુંમાનું રોયું.

​પણ હિંમત નથી હારવી, આ તો છે માર્કેટની ચાલ,
આજે ભલે ખરાબ છે, પણ કાલે આવશે ગુલાલ;
ધીરજ રાખશું તો ફરીથી દિવસો વળશે,
પડેલું આ પિલ્લુ ફરી આસમાને ચડશે!

kaushikdave4631