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यदि पीएम जूरी कोर्ट का प्रस्तावित कानून गेजेट में छाप देता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक बता कर रद्द कर देता है, तो क्या किया जा सकता है ? https://hi.quora.com/q/gtevjihzvzgehiip/जूरी-कोर्ट-शेषन-हायर-सुप्रीम-कोर्ट-में-जूरी-अदालतो-की-स्थापना . जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून की कोई भी धारा भारतीय संविधान के किसी भी अनुच्छेद एवं भारत में लागू किसी भी क़ानून की किसी भी धारा का उलंघन नहीं करती है। यहाँ तक कि पीएम को जूरी कोर्ट गेजेट में निकालने के लिए लोकसभा की अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं है। पीएम इस पर हस्तक्षर करके सीधे गेजेट में छाप सकता है। किन्तु यह तकनिकी बिंदु है, व्यवहारिक नहीं। . व्यवहारिक बिंदु यह है कि यदि पीएम जूरी कोर्ट गेजेट में छापता है तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों के पास इस क़ानून को खारिज करने की विवेकाधीन शक्ति है। और इसीलिए यह तय है कि कोई न कोई बहाना बनाकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज इसमें अडंगा जरुर लगायेंगे। . और तब पीएम निम्नलिखित में से कोई या क्रमिक रूप से सभी कदम उठा सकता है : . (i) पीएम गेजेट में सुप्रीम कोर्ट जज पर वोट वापसी की प्रक्रिया छापेगा। वोट वापसी आने के बाद भारत के नागरिक अमुक सुप्रीम कोर्ट जज को नौकरी से निकाल कर किसी ऐसे व्यक्ति को यह नौकरी दे देंगे जो जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा नहीं लगाए। (ii) यदि सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज वोट वापसी का क़ानून भी ख़ारिज कर देता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज के खिलाफ संसद में महाभियोग लाएगा। पीएम महाभियोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को नौकरी से निकालकर अपने किसी भी वफादार को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है। (iii) यदि महाभियोग गिर जाता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-भतीजो आदि के खिलाफ सीबीआई लगाकर उलटे सीधे मुकदमे कायम करेगा और उन्हें जेल में डाल देगा। पीएम इसके लिए लोकसभा के प्रस्ताव का इस्तेमाल करेगा। ज्ञातव्य है कि लोकसभा को यह शक्ति है कि वह देश के किसी भी व्यक्ति को बिना कोई मुकदमा चलाये जेल में डाल सकती है। और इसकी अपील अदालत में नहीं की जा सकती। (iv) पीएम गेजेट में जनमत संग्रह की प्रक्रिया छापेगा, और देश के सामने यह प्रश्न रखेगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज को नौकरी से निकाल दिया जाना चाहिए। यदि 51% मतदाता जनमत संग्रह में “हाँ” दर्ज कर देते है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को निकाल देगा। जनमत संग्रह में यदि कोई प्रस्ताव पास हो जाता है तो फिर उसे लोकसभा या राज्यसभा द्वारा रोका नहीं जा सकता। (v) यदि जनमत संग्रह के पास होने के बावजूद सांसद इसमें अडंगा करते है तो पीएम सांसदों पर वोट वापसी का क़ानून छापेगा ताकि नागरिक जूरी कोर्ट का विरोध कर रहे सांसदों को निकाल कर नए सांसद भेज सके। (vi) यदि सांसद वोट वापसी के दायरे में आने से इनकार करते है तो पीएम लोकसभा भंग करके नए चुनावो की घोषणा करेगा। नए चुनावों में वे सभी सांसद हार जायेंगे जो जूरी कोर्ट के विरोध में थे, और वे प्रत्याशी जीत कर संसद में जायेंगे जो जूरी कोर्ट के समर्थन में है। . ये सब सीधे तरीके है। इसके अलावा पीएम टेढ़े तरीको का इस्तेमाल करके भी सुप्रीम कोर्ट जज को काबू कर सकता है : . पीएम इमरजेंसी का प्रस्ताव पास करेगा, और सुप्रीम कोर्ट बंद करवा देगा। आपातकाल लगाने के बाद पीएम जीतने मर्जी उतने क़ानून छाप सकता है और सुप्रीम कोर्ट इन कानूनों का रिव्यू नहीं कर सकता। आपातकाल लगाने के बाद पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को उसके रिश्तेदारों के एनकाउन्टर वगेरह करने की धमकी भी दे सकता है। पीएम के पास पुलिस और मिलिट्री होती है। . अत: यदि पीएम बल प्रयोग करने पर आये तो सुप्रीम कोर्ट जज को 2 मिनिट में ठिकाने कर सकता है। हालांकि मेरे विचार में पीएम को आपातकाल लगाकर इस तरह की हिंसात्मक कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है, और न ही उसे इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। ऐसे कई सीधे और कानूनी तरीके मौजूद है जिनका इस्तेमाल करके पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से सुप्रीम कोर्ट जज को चित कर सकता है। . यदि पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से यह स्थापित कर देता है कि, सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज नागरिको के बहुमत की मंशा के खिलाफ जा रहा है तो अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी(*) सक्रीय होकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज से मुलाक़ात करने को तत्पर हो जायेंगे। और इससे पहले कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सुप्रीम कोर्ट जज से मुलाक़ात करें सुप्रीम कोर्ट जज या तो इस्तीफा दे देगा या फिर जूरी कोर्ट में अडंगा लगाना बंद कर देगा। . तो मेरे विचार में सही तरीका यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा लगाते है तो पीएम इस स्थिति को लोकतान्त्रिक तरीके से निपटाए, बल प्रयोग से नहीं। . (*) अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जब सत्ता में बैठा कोई व्यक्ति स्पष्ट बहुमत के खिलाफ जाता है तो जिन भी लोगो में अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी का अंश है वे लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक कदम उठाते है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी अपने विवेक से सही गलत का फैसला नहीं करते। वे बस लोकतान्त्रिक मूल्यों का पालन करते है। अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी, अहिंसामूर्ती महात्मा मदन लाल जी धींगरा, अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद आदि उधम सिंह जी के ही प्रकार थे, और गोरो द्वारा लोकतंत्र की अवहेलना किये जाने के कारण वे अपने अपने तरीके से विभिन्न परिस्थितियों में गोरो से मुलाक़ात करते रहते थे। . --------- . काम की बात : लोकतान्त्रिक तरीके से पीएम सिर्फ तभी आगे बढ़ पायेगा जब कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करें। यदि देश के नागरिको को जूरी कोर्ट के क़ानून के बारे में कोई जानकारी नहीं है, और न ही कार्यकर्ताओ में इस क़ानून का समर्थन मौजूद है, तो पीएम को जनता का समर्थन नहीं मिलेगा, और पीएम सुप्रीम कोर्ट जज के आगे टिक नहीं पायेगा। . वजह यह है कि सुप्रीम कोर्ट जज को पेड मीडिया के प्रायोजको का समर्थन प्राप्त है। अत: जब सुप्रीम कोर्ट जज जूरी कोर्ट को ख़ारिज करेगा तो देश के सभी मीडिया हाउस, सभी पेड मीडिया पार्टियाँ एवं उनके नेता, सभी सांसद, सभी पेड बुद्धिजीवी, सभी पेड संविधान विशेषग्य, सभी पेड कलाकार आदि सुप्रीम कोर्ट जज के पक्ष में एवं जूरी कोर्ट केविरोध में खड़े हो जायेंगे। . आम असूचित नागरिक पेड मीडिया द्वारा संचालित इस गिरोह की चपेट में आकर पीएम के कदम का विरोध करना शुरू कर देंगे, या कम से कम पीएम का समर्थन नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में पीएम इस गिरोह से निपट नहीं सकता। पीएम इस गैंग से सिर्फ तब निपट सकता है जब पीएम को कम से कम 8 से 10 लाख ऐसे कार्यकर्ताओ का समर्थन हासिल हो, जो जूरी कोर्ट के ड्राफ्ट के समर्थन में है, और पेड मीडिया की गिरफ्त से बाहर है। . सार यह है कि, जूरी कोर्ट जैसा क़ानून पीएम के चाहने भर से रातों रात देश में लागू नहीं किया जा सकता। इसका सिर्फ एक रूट यह है कि बिना पेड मीडिया की सहायता के भारत में कम से कम 10 लाख कार्यकर्ताओ को जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करने के लिए तैयार किया जाए। और 10 लाख कार्यकर्ताओं तक पहुँचने के लिए कम से कम 10 करोड़ नागरिको तक जूरी कोर्ट ड्राफ्ट की जानकारी पहुंचानी होगी। वो भी पेड मीडिया के बिना। जाहिर है, यह काफी दुरूह एवं लम्बी प्रक्रिया है। यह काम तब और भी चुनौतीपूर्ण बन जाता है, जब पेड मीडिया के प्रायोजक जूरी ट्रायल के बारे में गलत एवं अधूरी सूचनाएं देकर लोगो को लगातार भ्रमित करते रहने वाले है। . जूरी कोर्ट जैसे क़ानून को गेजेट में छपवाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है। इसे पढ़े -- Pawan Kumar Sharma का जवाब - क्या भारत सुपर पावर बन सकता है? कैसे और कब? नागरिकों की क्या भूमिका होनी चाहिए? . मेरा मानना है कि, जूरी ट्रायल मानव जाति द्वारा खोजा गया एक मात्र लंगर है जो सरकार को संविधान एवं इसके सिद्धांतो का पालन करने के लिए सफलतापूर्वक बाध्य कर सकता है - थॉमस जेफरसन ( अमेरिकी स्वतंत्रता के घोषणा पत्र के लेखक ) . -----------
अमेरिका अपना नुकसान की भरपाई भारत को युद्ध में धकेलने से करवा रहा हैं.. भारत के मोदी राहुल केजरीवाल तीनों अमेरिका के सामने घुटने टेक चूके हैं.. जनता के पास बचने का समाधान फिलहाल यही हैं की जितना जल्दी हो सके EVM की जगह चुनाव बैलेट पेपर से होने चाहिए | क्योंकि तीनों की चोटी us uk धनिको के पास हैं क्योंकि पेड मिडिया के स्पोंसर वही हैं.. यदि भारत की जनता अमेरिका जैसे वोटवापसी सिस्टम, जूरी कोर्ट, बैलेट पेपर चुनाव, जनमत संग्रह, हथियारबंद नागरिक समाज क़ानून लागु करवाने के लिए PM, CM पर दबाव बनाने चाहिए | #CancelEVM #VotvapsiPassbook #JuryCourt #TCP #Gunlawreferndum #GunLawIndia #CoorgGunLawReferendum
क्या हम भारत में चीनी उत्पादों से छुटकारा पा सकते हैं? . चीन की सेना भारत की सेना से कई गुना ज्यादा ताकतवर है, अत: हम चीनी उत्पादों से बच नहीं सकते। यदि हम अपनी सेना को चीन से ज्यादा ताकतवर बना ले तो हम चीन के बढ़ते नियंत्रण से छुटकारा पा सकते है। किन्तु तब अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियां हमारी पूरी अर्थव्यवस्था को टेक ओवर कर लेगी। और यदि हमें अमेरिकी-ब्रिटिश से बचना है तो यह जरुरी है कि हमारी सेना अमेरिका के बराबर ताकतवर हो। . इस जवाब में मैंने ज्यादातर चीन के बढ़ते हुए नियंत्रण के बारे में बताया है, इसके समाधान के बारे में मैं फिर किसी जवाब में लिखा जाएगा। . -------- . (0) चीन का नियंत्रण भारत में क्यों बढ़ रहा है ? . (A) चीन के पास बड़े पैमाने पर तकनिकी उत्पादन करने का आधार है, जिसकी वजह से वे ऐसी वस्तुएं बनाते है, जो भारत नहीं बना पाता। और इसीलिए चीन से हमें ये वस्तुएं लेनी पड़ती है। यदि भारत को चीनी उत्पादों से छुटकारा पाना है तो गेजेट में ऐसे क़ानून छापने होंगे जिससे हम भारत में स्वदेशी तकनिकी उत्पादन बढ़ा सके। . अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियां बेहद उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाती है, और भारत के विशाल मध्य वर्ग के लिए यह काफी महंगे है। अत: हम सस्ते और चिल्लर तकनिकी उत्पादो के लिए चीन पर निर्भर होते जा रहे है। या तो खुद बनाओ या चीन से लो। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। चीनी वस्तुओ का बहिष्कार करना इतना बकवास रास्ता है कि मैं इस पर बात करके भी अपना टाइम जाया नहीं करना चाहता। . (B) लेकिन सिर्फ तकनिकी उत्पादन करने से भी हम चीनी सामान से छुटकारा नहीं पा सकते। इसके लिए यह जरुरी है कि हमारी सेना चीन का मुकाबला करने में आत्मनिर्भर हो। मतलब यदि चीन के मोबाईल रोकने है तो सिर्फ चीन से बेहतर मोबाईल बनाकर हम उन्हें नहीं रोक सकते। इसके लिए हमें चीन से अच्छे फाइटर प्लेन बनाने होंगे !! हम चीन से बेहतर फाइटर प्लेन बनेंगे तो चीन के मोबाईल रुकेंगे। वर्ना नहीं। . भारत की सेना कमजोर होने के कारण चीन भारत पर उन कानूनों को गेजेट में छापने के लिए दबाव बनाता है जिससे चीन का भारत की अर्थव्यवस्था में नियंत्रण बढे। और इस तरह का दबाव सैन्य ताकत द्वारा बनाया जाता है। अन्तराष्ट्रीय मामलों में कोई कूटनीति वगेरह नहीं होती है। ये परले दर्जे की बकवास है, जिसे पेड मीडिया एवं पेड रक्षा विशेषज्ञों द्वारा नागरिको की आँखों में धुल झोंकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सारी कूटनीति बातें सीधे लफ्जो में होती है। . उदाहरण के लिए, चीनी आकर सीधे यह कहते है कि हमें भारत के अमुक ट्रेन ट्रेक पर रेल चलाने के ठेके दो, इतने उतने कर मुक्त सेज दो, वर्ना हम अपनी सेना भारत की सीमा में घुसा देंगे। अब यदि भारत उनकी बात मान जाता है तो कूटनीति सफल है, और भारत अपनी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र चीनियों के हवाले कर देगा। यदि भारत टालता रहता है तो शी जिनपिंग भारत की सीमा में सेना घुसाना शुरू करेंगे। जैसे ही 5 किलोमीटर सेना अन्दर घुसेगी भारत उनकी मांगे मान लेगा और सेना लौट जाएगी। बस यही विदेश नीति है। . और फिर समाधान की गलत दिशा में धकलने के लिए पेड मीडिया एवं आई टी सेल को चीनी आयटमो का बहिष्कार करने के लिए कैम्पेन चलाने के लिए कह दिया जाता है। कार्यकर्ता इस बात को समझ नहीं पाते कि चीनी भारत सरकार के जरिये घुस रहे है, तो इस तरह के फर्जी बहिस्कार कैम्पेन से चीनियों को रोका नहीं जा सकता। . ——— . निचे कुछ उदाहरण दिए है जिससे आप जान सकते है कि चीनी आयटमो के इस तरह के फर्जी बहिष्कार कैम्पेन किस तरह चीनियों के लिए कवर का काम करते है, और वे सरकार को बाध्य करके किस तरह भारत में तथा भारत की सीमओं पर अपना नियंत्रण बढाते जा रहे है : . (1) इंडस्ट्रियल पार्क एवं सेज : 2014 में मोदी साहेब के पीएम बनने के बाद शी जिनपिंग पहली बार मोदी साहेब से मिलने भारत आये थे। और जब वे भारत आये तो अपनी सेना साथ लेकर आये। जैसे ही शी ने अहमदाबाद में लेंड किया वैसे ही चीन की सेना ने भारत में घुसना शुरू किया। . चीनी दो मोर्चो पर भारत की सीमा में 5 किलोमीटर तक अन्दर घुस आये। भारत ने चीन को 5 इंडस्ट्रियल पार्क, सेज और हाई स्पीड ट्रेन चलाने के ठेके दिए। डील होने के बाद जब शी जिनपिंग भारत से निकल गए तब चीन की सेना ने भारत छोड़ा !!! और जब शी जिनपिंग भारत आये तो इससे पहले उन्होंने अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करने वाले बयान दिए व अरुणाचल प्रदेश को चीन के नक़्शे में भी दिखाया !!! . यह खबर पढ़ें - China's President Talks Trade in India as Troops Face Off at Border . 1.1. और ये इंडस्ट्रियल पार्क एवं सेज क्या है ? . इनका आकार 100 एकड़ से 1000 एकड़ होगा, इन चाइनीज़ पार्को में यातायात, परिवहन, बिजली, पानी आदि के लिए चाइनीज़ नियम लागू होंगे। लेबर लॉ, PF लॉ, LBT , कस्टम, जीएसटी आदि टेक्स इन पर या तो इन पर लागू नही होंगे या फिर इन्हें कई प्रकार की छूटें मिलेगी। इन कम्पनियों को 30% आयकर भी नही देना होगा। हमारी देशी कम्पनियो को ये सब टेक्स चुकाने होंगे और वो लागत बढ़ने से मार्केट से बाहर हो जायेगी। चाइनीज़ हमारे यहाँ का कच्चा माल और सस्ता लेबर उपयोग कर के भारत के बाज़ार में अकल्पनीय माल डंप कर देंगे और उन्हें भारी मुनाफा होगा । . 1.2. और हमें इस मुनाफे के बदले में डॉलर भी चुकाने होंगे !!! तो आप खुद अंदाजा लगा सकते है कि जब सरकार चीनियों को 1000 एकड़ के कर मुक्त प्लाट पकड़ा रही है, ताकि वे यहाँ आकर उत्पादन करे तो आप उन्हें कैसे रोकेंगे !!! ये सेज / इंडस्ट्रियल पार्क उत्पादन इकाइयां नहीं है, बल्कि भारतीय इकाईयों के लिए क़त्ल खाने है। . सेज में एक्सपोर्ट के नाम पर ये टेक्स में छूट ले लेते है, और यह खुली हुयी बात है कि सेज इकाइयां शेल कम्पनियां खोलकर राउंड ट्रिपिंग करती है, और फर्जी एक्सपोर्ट दिखाती है। चीनियों के पास काफी डॉलर है। वे भारत में आने बाद हमारे मंत्रियो को घूस देकर और भी ऐसे क़ानून छपवाएंगे जिससे भारत की स्थानीय इकाइयां और भी बर्बाद हो जायेगी। और समस्या यह है कि भारत के कार्यकर्ता नेताओं के भाषण सुनते है, लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं देते कि उनके नेता गेजेट में क्या क़ानून छाप रहे है !! . 1.3. 2014 में एग्रीमेंट हुआ था, और फिर आगे की प्रक्रिया शुरू हुयी। बीच में भारत की तरफ से काम में रुकावटें डाली जाने लगी तो 2017 में चीन ने फिर से अपनी सेना भारत में भेजकर हमारे दो बंकर नष्ट कर दिए, और मानसरोवर यात्रियों का जत्था रुकवा दिया !! . Face-off between Chinese, Indian troops in Sikkim after PLA 'transgression' - Times of India ► . 1.4. अभी चाइना ने विभिन्न राज्यों में अपने पार्क का इन्फ्रास्त्रक्चर लगाना शुरू किया है, और जल्दी ही ये कार्यशील हो जायेंगे . 2018 की खबर - Chinese investments in special economic zones in India . बीच में यदि रुकावट आई तो फिर से चीन की सेना भारत में घुसेगी !! . ———- . (2) चाइनीज रेलवे : अब चाइना की नजर भारत के हाई स्पीड रेलवे नेटवर्क पर है। चीन भारत में कई हाई स्पीड कोरिडोर्स खरीदना चाहता है, ताकि रेलवे सेक्टर को टेक ओवर कर सके। . India seeks China's help for speeding-up of Bangalore-Chennai train corridor . 2.1. चाइना कुमिंग को कलकत्ता से भी जोड़ना चाहता है। यदि चीन यह रूट हथिया लेता है तो पूर्वोतर राज्यों पर भारत की पकड़ कमजोर हो जायेगी। ट्रेन रूट द्वारा चीन भारत के बाजार को चीनी उत्पादों से पाट देगा। पेड बुद्धिजीवी इस योजना को यात्रियों की संख्या की नजर से अव्यवहारिक बता रहे है। किन्तु चीन की योजना इस रूट से भारत में बड़े पैमान पर माल डंप करने की है। . China wants to build bullet train service with India that connects Kunming and Kolkata . अब यदि आप किसी भी समझदार किस्म के पेड विशेषग्य से पूछेंगे कि, जब शी जिनपिंग भारत आते है तो अपनी सेना भी साथ ले आते है, और फिर उनके सैनिक आकर हमारे बंकर नष्ट कर देते है, तो हम उन्हें भारत में कर मुक्त सेज क्यों दे रहे है ? तो वे बहुत ही राजदाराना लहजे में आपको यह समझायेंगे कि यह कूटनीति है, तुम नहीं समझोगे !!! और फिर वे इसे विकास से भी जोड़ देंगे !! . ——— . (3) चीन का POK पर नियंत्रण : चीन ने POK स्थित झेलम नदी पर 1100 मेगावाट जो की क्षमता में दुनिया का सबसे बड़ा पॉवर प्रोजेक्ट होगा का निर्माण शुरू किया। भारत ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है क्योंकि इससे हमारी सुरक्षा को खतरा है। किन्तु 2015 में चीन ने हमारे विरोध को खारिज कर दिया !! और तो और इस प्रोजेक्ट के लिए पैसा भी उस बैंक (AIIB) से आ रहा है जिसमे हमने बिलियंस ऑफ़ डॉलर्स दे रखें है !! . China firm to build mega dam in PoK despite India's strong opposition . तो जब हमारे सम्बन्ध इतने अच्छे है कि 2014 में हम चीनियों को कर मुक्त सेज देते है, तो चीन बाँध पर भारत के ऐतराज को खारिज क्यों कर देता है ? पेड रक्षा विशेषग्य कर्हेंगे कि यह अन्तराष्ट्रीय कूटनीति है। पर मैं कहूँगा कि चीन की सेना इतनी ताकतवर हो चुकी है कि वह हमारे ऐतराज वगेरह सुनता भी नहीं है, और हमारे नेता भी जब ऐतराज दर्ज करवाते है तो उन्हें पता होता है कि वे एक रस्म पूरी कर रहे है !! . ——— . (4) तिब्बत : चीन ने तिब्बत में दुनिया का सबसे ऊँचे और बड़े बाँध का निर्माण कर लिया है। ब्रह्मपुत्र नदी पर बने इस विशालकाय बाँध से चीन 2.5 बिलियन किलो वॉट बिजली का सालाना उत्पादन करेगा। थोड़ी बहुत बिजली तिब्बत को भी मिलेगी, बाकी चीन को जायेगी। भारत इस परियोजना पर शुरू से ही एतराज जताता आ रहा था, क्योंकि इससे पूर्वोत्तर भारत की पारिस्थितिकी चीन के नियंत्रण में आ जायेगी, और चीन किसी भी समय बाँध के गेट खोलकर पूर्वोत्तर के राज्यों को जल-मग्न कर सकता है। . China operationalises biggest dam on Brahmaputra in Tibet, India worried . ——— . (5) श्रीलंका : श्रीलंका ने अपने तट का १०० हेक्टेयर का इलाका चीन को 99 साल की लिज़ पर दे दिया है। चीन वहाँ पर 1.4 बिलियन डॉलर खर्च करके अपना पोर्ट बना रहा है, और चीन ने वहाँ अपना युद्धपोत और पनडुब्बी भी तैनात की। भारत ने श्रीलंका से इस प्रोजेक्ट को नामंजूर करने को कहा तथा इसे श्रीलंका ने रोक भी दिया था। लेकिन इस प्रोजेक्ट को फिर से मंजूरी मिल गयी और काम शुरू हो गया। मोदी साहेब और अजित डोभाल साहेब ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया, जिसे श्रीलंका सरकार ने खारिज कर दिया है। . India Asked Lanka to Stop Colombo Port City Project, Says Gotabaya . ——— . (6) मालदीव भी : मालदीव ने चीन को मालदीव के टापू खरीदने और उनको विकसित करने के लिए क़ानून बनाकर अनुमति दी। अब चीन भारत और मालदीव के बीच बिखरे इन टापुओं का अधिग्रहण करके और नए टापू भी बना रहा है। इससे भारत और चीन के बीच मालदीव की उपस्थिति लुप्त हो जायेगी और चीन सीधे भारत तक बढ़ आएगा। भारत सरकार ने इस पर चिंता व्यक्त की है, किन्तु चीन और मालदीव ने भारत को "चिंता न करने" को कहा है। . Get Ready: China Could Build New Artificial Islands Near India . ——— . (7) और नेपाल भी : मधेशी नेपाल और भारत के उत्तरी राज्यों की सीमा से लगे नेपाल के तराई क्षेत्र में रहते है, तथा भारत के प्रतीकात्मक प्रतिनिधी माने जाते है। चीन ने नेपाल को चाबी दी जिसके फलस्वरूप नेपाल ने अपने नए संविधान में मधेशीयों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया, और इस वजह से भारत और नेपाल के रिश्ते बिगड़े। . विरोध प्रदर्शन की हिंसा में 50 से ज्यादा मधेशी मारे गए और नेपाल के स्थानीय गैर मधेसी समुदाय में एंटी इंडिया सेंटीमेंट्स पैदा हो गए। चीन ने नए संविधान का स्वागत किया, और चीन ने नेपाल को तेल-गैस आदि की आपूर्ति शुरू कर दी है। पहली बार चीन एवं नेपाल ने साझा युद्धाभ्यास करना शुरू किया। भारत की नाराजगी पर नेपाल के प्रधानमंत्री का कहना है कि भारत उनके निजी मामलो में टांग न अड़ाए तो बेहतर होगा !! . नेपाल को इंटरनेट सेवा अब तक भारत उपलब्ध करवाता था, किन्तु अब चीनी उस पर कब्ज़ा कर रहे है !!! . Nepal to get internet connection from China . चाइना एवं नेपाल को चीन से जोड़ने के लिए अब ट्रेन ट्रेक भी डाल रहा है। ट्रेन रूट से कनेक्ट हो जाने के बाद चीन का नियंत्रण नेपाल पर काफी बढ़ जाएगा। . China's growing footprint in Nepal: Challenges and opportunities for India | ORF . कुल मिलाकर नेपाल में चीन अपने कदम बढ़ा चुका है और जल्दी ही हम श्री लंका, मालदीव की तरह नेपाल भी चीन के हाथों गँवा देंगे !! आखिर नेपाल को भी चीन के तकनिकी उपकरण जैसे मोबाईल फोन, डीवीडी प्लेयर, हथियार आदि चाहिए। भारत तो ये सब खुद चीन से ले रहा है, तो नेपाल को भारत क्या आर्थिक लाभ दे सकेगा !! . Should Rising China-Nepal Military Ties Worry India? . ऊपर दिया गया सारा विस्तार पिछले 6-7 वर्षो के दौरान किया गया है। उपरोक्त ब्यौरों से मैं यह बिंदु स्पष्ट करना चाहता हूँ कि चीन सभी तरफ से भारत की तरफ तेजी से बढ़ रहा है, और उसने अब भारत में भी अपना सेट अप लगाना शुरू कर दिया है। . चीन हमले की स्थिति में है। हमारी सेना परजीवी होने के कारण हम चीन के इस सामरिक-आर्थिक हमले को नहीं रोक सकते। यदि हम आर्थिक रूप से रोकने की कोशिश करेंगे तो चीन सामरिक नुकसान पहुंचाकर भारत में घुसेगा। और यदि हम चीन को रोकने के लिए अमेरिका की शरण लेंगे तो अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत को पूरी तरह से निगल जायेगी !! . यदि बचना है तो सिर्फ एक रास्ता है - हमें अपनी सेना को आत्मनिर्भर बनाना होगा। इतना आत्मनिर्भर कि हम अमेरिका के सामने टिक जाएँ। वर्ना चीन से बचाने की एवज में अमेरिका हमें खा जाएगा। भारत के तमाम नेता और राजनैतिक पार्टियाँ अमेरिका के सामने पूरी तरह से समर्पण कर चुके है और वे भारत को अमेरिकी कम्पनियों के सुपुर्द करने के लिए काम कर रहे है !! . तो कार्यकर्ताओ को यह बात समझ लेनी चाहिए कि , जब भी हम चीनी उत्पादों को रोकने की कोशिस करेंगे तो हमें चीन की सेना से डील करना पड़ेगा। हम चीन की सेना से डील नहीं कर सकते और इसीलिए हमें चीनियों को भारत में घुसने की अनुमति देनी पड़ रही है। और भारत ही क्यों हमारे सभी पडौसी देशो की यही स्थिति है। चीन सभी को बलात रूप से टेक ओवर करता जा रहा है। . ———- . (8) टाइम पास समाधान : चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करो। ये समाधान बकवास इसीलिए है क्योंकि पैसा मुफ्त में नहीं आता। व्यक्ति जब कोई वस्तु खरीदता है तो वह चाहता है कि उसे कम पैसे में बेहतर वस्तु मिले। उसे आप राष्ट्रवाद का चकमा देकर घटिया एवं महंगी वस्तु खरीदने के लिए सिर्फ क्षणिक तौर पर ही प्रेरित कर सकते है। वास्तव में नहीं। . ——— . (9) वास्तविक समाधान : सेना को आत्मनिर्भर एवं मजबूत बनाने के लिए हमें नए कानूनों की पूरी सीरिज चाहिए। किसी देश के तकनिकी उत्पादन की गुणवत्ता को तय करने वाले कई तत्व है। इन तत्वों में निम्नलिखित 5 तत्व इसे सबसे अधिक प्रभावित करते है : . (A) अदालतें (B) कर प्रणाली (C) भू प्रबंधन के क़ानून (D) जज-पुलिस-राजनेता का भ्रष्टाचार (E) गणित-विज्ञान की शिक्षा का स्तर . जजों का भ्रष्टाचार इंजीनियरिंग गुणवत्ता को सबसे ज्यादा एवं गणित-विज्ञान की शिक्षा का स्तर सबसे कम प्रभावित करता है। भारत के सभी सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार है, किन्तु भारत के जज तुलनात्मक रूप से सबसे ज्यादा भ्रष्ट है। और इसीलिए भारत तकनिकी उत्पादन में पिछड़ गया है। इनमे से दो तत्वों के बारे में विवरण एवं समाधान मैंने अन्य जवाबो में लिखा है। शेष 3 तत्वों पर मैं फिर किसी जवाब में लिखूंगा। . =========
क्या भारत सुपर पावर बन सकता है ? कैसे ? और नागरिकों की इसमें क्या भूमिका होनी चाहिए ? . [ इस प्रश्न का अंतिम हिस्सा बेहद व्यावहारिक है। अच्छी बात यह है कि प्रश्न इस तरह नहीं पूछा गया कि - भारत को सुपर पॉवर बनाने के लिए हमें कैसे "नेता" की जरूरत है, या सुपर पॉवर बनने के लिए हमें किस नेता को वोट करना चाहिए !!! . पेड मीडिया ( जिसमें सभी प्रकार की फ़िल्में और पाठ्यपुस्तके भी शामिल है ) द्वारा लगातार नागरिको को यह विश्वास दिलाया जाता है कि किसी भी तरह के बदलाव के लिए हमें सबसे पहले "एक नेता कम मसीहा" की जरूरत है। और "नेता की जरूरत" की इस गलतफहमी से बाहर आने में ज्यादातर नागरिको के जीवन का अधिकांश निकल जाता है। फिर कई मसीहाओ से नाउम्मीद होने के बाद वे अपना शेष "कुछ नहीं हो सकता" का मन्त्र दोहराते हुए बिताते है।] . खंड (अ) में संक्षेप में बताया गया है कि भारत को सुपर पॉवर बनाने के लिए किन क़ानून ड्राफ्ट्स की जरुरत है। खंड (ब) में जन आन्दोलन की प्रकृति एवं इसके स्ट्रक्चर के बारे में जानकारी है। खंड (स) में उन कदमो का विवरण है जिन्हें उठाकर आप एक आम नागरिक के तौर पर भारत को सुपर पॉवर बनाने में अपना योगदान दे सकते है। . ———— खंड – (अ) ———— . क्या भारत सुपर पॉवर बन सकता है ? . आज की तारीख में अमेरिका सुपर पॉवर है। मेरा मानना है कि अमेरिका की ताकत की वजह वहां के क़ानून है। उन्होंने गेजेट में ऐसे क़ानून छापे है जिससे वहां के उत्पादक वर्ग को कारोबार करने में सुविधा मिली है, और वे तकनीक जुटा कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खड़ी कर पाए। इसमें मुख्य रूप से जूरी सिस्टम एवं वोट वापसी क़ानून शामिल है। . जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की। भारत में जज सिस्टम होने के कारण बड़ी कम्पनियां छोटे कारोबारियों के बाजार से बाहर करने में सफल हो जाती है। यदि हम भारत में करो का ढांचा, अदालतें एवं पुलिस सुधार दें तो भारत की इकाइयां तेजी से तरक्की कर सकती है। . दूसरा मुख्य बिंदु देश की खनिज संपदाओ एवं प्राकृतिक संसाधनों को 90 करोड़ भारतीयों की संपत्ति घोषित करने का है। यदि हम भारत के प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोक देते है तो भारत अपने पैरो पर खड़ा हो सकता है। क्योंकि जिस गति से पिछले 270 वर्षो से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हमारे खनिज लूट रही है, जल्दी ही हम रीते हो जायेंगे। और एक बार यदि हम कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हो गए, तो पुलिस-अदालतें-कर प्रणाली सुधारने से भी कोई लाभ नहीं होगा। . तो जैसे जैसे हम अपने खनिज गँवा रहे है वैसे वैसे भारत के आत्मनिर्भर एवं मजबूत होने की संभावित संभावनाएं कमजोर होती जा रही है। मैं जूरी सिस्टम, वोट वापसी, वेल्थ टेक्स एवं धन वापसी(*) कानूनों के बारे में अन्य जवाबो में लिखता रहा हूँ, अत: इस जवाब में मैं सिर्फ उन कदमो का वर्णन करूँगा जिन्हें उठाकर देश में ये क़ानून लाये जा सकते है, ताकि भारत को अमेरिका के बराबर शक्तिशाली बनाया जा सके। . ———————— . (*) धन वापसी : खनिजो एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने के लिए एक प्रस्तावित क़ानून है। इस क़ानून के आने बाद देश की सभी राष्ट्रीय सम्पत्तियों के मालिक 90 करोड़ भारतीय होंगे, भारत सरकार नहीं। भारत सरकार इसकी ट्रस्टी या न्यासी की स्थिति में रहेगी। तब यदि कोई कम्पनी खनिज निकालना चाहती है, तो उसे इसकी खुली नीलामी लगानी होगी, और रोयल्टी से आने वाला पैसा "90 करोड़ भारतीयों का संयुक्त खाते" नाम के एकाउंट में जाएगा। तब जिंदल 107 रूपये प्रति टन के हिसाब से कोयला नहीं खोद सकेगा, और उसे रोयल्टी के रूप में अन्तराष्ट्रीय दरो के हिसाब से प्रति टन 2000 रूपये चुकाने होंगे। जिंदल को 107 रूपये में कोयले की यह खान 2015 में दी गयी थी !!! . Jindal Steel and Power bags Gare Palma coal bloc; stock jumps 25 per cent . जब अंग्रेज भारत से गए थे तो उन्होंने अपने सभी वफादारो को इफरात में जमीने और खाने दी थी। टाटा को 1946 में झारखंड क्षेत्र के माइनिंग राइट्स सिर्फ 1 रुपया प्रति टन में दिए गए थे। हाँ, आपने सही पढ़ा है। यहाँ कोई टाइपिंग मिस्टेक नहीं है। टाटा के पास 1 रूपये प्रति टन के हिसाब से कोयला निकालने के माइनिंग राइट्स है। और टाटा पिछले 70 सालो से 1 रूपये में यह कोयला खोद रहा है !!! . A Tata Coalgate? 999-yr mine lease at 25p a bigha! - Firstpost . अख़बार का नाश्ता एवं टीवी का डिनर करने वाले नागरिको को यह समझना चाहिए कि मीडिया ख़बरें छुपाने का कारोबार है। पेड मीडिया सिर्फ भ्रष्टाचार पर बोलता है, लूट पर नहीं। और जिंदल एवं टाटा तो टोकन के रूप में लूट रहे है। भारत के ज्यादातर खनिज संसाधनों पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का नियन्त्रण है, और यह बढ़ता जा रहा है। वे लगभग मुफ्त में इनका दोहन करते है। लेकिन इन्हें रिपोर्ट नही किया जाता। और चूंकि विदेशी चिल्लर संसाधन नहीं लूटते इसीलिए बजरी और पत्थर कौन कौन लूट रहा है, इस बारे में पेड मीडिया छापता रहता है !! . गोदरेज को देखिये। गोदरेज के पास मुंबई में 15 करोड़ वर्ग फुट जमीन खाली पड़ी है, और यह इस पर एक रूपया भी टेक्स नहीं चुकाता !! और कुछ 10 घरानों ने मुंबई की 20% जमीन पर कब्ज़ा किया हुआ है। और ऐसा नहीं है कि ये जमीन इन्होने बनाई है। ये सरकारी जमीने अंग्रेज इन्हें मुफ्त में देकर चले गए थे !! इन लोगो ने ट्रस्ट बनाकर इन जमीनों को दबाकर रखा हुआ है। . Nine landowners control a fifth of Mumbai's habitable area - Times of India . यदि देश में वेल्थ टेक्स आ जाता है तो अगले दिन ये लोग इन जमीनों पर फ्लेट बनाकर बेचने लगेंगे, और सप्लाई बढ़ने से जमीनों के दाम गिर जायेंगे। और यह स्थिति सिर्फ मुंबई की नहीं बल्कि पूरे देश की है !! तो वोट वापसी एवं जूरी सिस्टम जैसे क़ानून धन वापसी एवं वेल्थ टेक्स जैसे क़ानूनो का आना सुनिश्चित करते है, जो कि अर्थव्यवस्था, उत्पादन एवं तकनिकी विकास की रीढ़ है। . ———————— . देश के अन्य स्वतंत्र कार्यकर्ताओं की तरह मेरा भी मानना है कि जूरी सिस्टम , वोट वापसी, धन वापसी, वेल्थ टेक्स जैसे क़ानून किसी नेता की पूँछ पकड़ कर नहीं लाये जा सकते, बल्कि इसके लिए देश के कार्यकर्ताओ को जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए प्रयास करना चाहिए। यदि भारत के कार्यकर्ता जन आन्दोलन खड़ा करने में कामयाब हो जाते है तो इन कानूनों को लाया जा सकता है। इन कानूनों के आने के 3–4 वर्षो के भीतर भारत तेजी से विकास करना शुरू करेगा और 10 वर्षो के भीतर खुद को इतना ताकतवर बना लेगा कि हम अमेरिका का मुकाबला कर सके। . निचे जूरी सिस्टम, वोट वापसी क़ानूनो के सन्दर्भ में एक सामान्य जन आन्दोलन खड़ा करने की प्रक्रिया बतायी गयी है। ये विवरण बताते है कि एक आम भारतीय नागरिक होने के नाते आप इस तरह का जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए क्या कदम उठा सकते है। दी गयी प्रक्रिया सभी प्रकार के विषयों पर जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए भी वाजिब खाका बताती है। अगले खंड में जन आन्दोलन की बुनियादी प्रकृति के बारे में जानकारी है, और अंतिम खंड इसे खड़ा करने की प्रक्रिया बताता है। . ———— खंड - (ब) ———— . (A) जन आन्दोलन क्या है ? . आन्दोलन एवं जन आन्दोलन में नेतृत्व का अंतर होता है। आन्दोलन के केंद्र में कोई न कोई नेता होता है, लेकिन जन आन्दोलन नेतृत्व विहीन होता है। यदि आन्दोलन में कोई नेता है तो इसे जन आन्दोलन नहीं कहा जा सकता। किन्तु समस्या यह है कि नेता विहीन आन्दोलन खड़ा नहीं किया जा सकता। नेता के अभाव में आन्दोलनकारी दिशा विहीन होकर विघटित हो जायेंगे। हमारा सुझाव है कि कार्यकर्ताओ को क़ानून ड्राफ्ट को अपना नेता बनाना चाहिए। यदि जूरी सिस्टम, वोट वापसी कानूनों के ड्राफ्ट उपलब्ध है तो इन लिखित ड्राफ्ट्स के नेतृत्व में जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए काम शुरू किया जा सकता है। . तो पहली आवश्यकता है - जूरी सिस्टम, वोट वापसी कानूनों के ड्राफ्ट, जिसके नेतृत्व में जन आन्दोलन खड़ा किया जाएगा। जो इन क़ानून ड्राफ्ट्स का समर्थन करेगा वह इस आन्दोलन में जुड़ता जायेगा और आन्दोलन आगे बढ़ना शुरू करेगा। यदि आप किसी अन्य मुद्दे पर जन आन्दोलन खड़ा करना चाहते है तो आपकोअमुक विषय के क़ानून ड्राफ्ट की जरूरत होगी। यदि आपने किसी व्यक्ति को नेता बनाकर आन्दोलन खड़ा करने की कोशिश की तो आन्दोलन का ट्रिगर नेता के हाथ में आ जायेगा, बाद में आन्दोलन को नष्ट करने के लिए नेता या तो बिक जायेगा, या दबा दिया जाएगा, या मार दिया जाएगा। उदाहरण - राष्ट्रबंधु राजिव भाई दीक्षित . (B) ड्राफ्ट के नेता, यानी कि जूरी सिस्टम-वोट वापसी के ड्राफ्ट को जन जन तक पहुँचाना, ताकि नागरिक क़ानून ड्राफ्ट का समर्थन करना शुरू करें . ड्राफ्ट को करोड़ो नागरिको तक पहुँचाने के दो रास्ते है - (1) पेड मीडिया , (2) स्वयंसेवी स्वतंत्र कार्यकर्ता। यदि आप जूरी सिस्टम, वोट वापसी जैसे कानूनो पर जन आन्दोलन खड़ा करना चाहते है तो पेड मीडिया आपका समर्थन नहीं करेगा। बल्कि आपकी मुख्य प्रतिद्वंदी पेड मीडिया ही रहेगा। अत: पेड मीडिया का रास्ता यहाँ बंद हो जाता है। यदि आपके पास पेड मीडिया नहीं है तो आपको आम नागरिको में से छोटे छोटे लाखों कार्यकर्ताओ(*) की जरूरत होगी, जो इस ड्राफ्ट की जानकारी जन जन तक पहुंचा कर आन्दोलन को आगे बढ़ाएंगे। . ———————— . (*) कार्यकर्ता या एक्टिविस्ट कौन है ? और भारत में कितने कार्यकर्ता है ? . एक कार्यकर्ता वह व्यक्ति है जो भारत को मजबूत बनाने के लिए निस्वार्थ भाव से अपने धन और समय का एक अंश व्यय करने के लिए प्रतिबद्ध है , तथा बदले में उसका प्राथमिक लक्ष्य कोई ख्याति, धन , पद आदि प्राप्त करना नहीं है। मेरे अनुमान में भारत में कई लाख कार्यकर्ता है, लेकिन उनमे से सभी राईट टू रिकॉल, जूरी सिस्टम कानूनो का प्रचार नहीं करेंगे। लेकिन यदि कुछ 2 लाख कार्यकर्ता भी प्रति सप्ताह 4 घंटे का समय इन कानूनो के प्रचार में देते है, तो कुछ ही सप्ताह में पहला चरण पूरा हो जाएगा। . बहुधा ये कार्यकर्ता राजनैतिक ख़बरों को फॉलो करते है, और देश को सुधारने के लिए अपने स्तर पर छोटे छोटे कदम उठाने के लिए तत्पर रहते है। ये कार्यकर्ता किसी राजनैतिक दल से सम्बद्ध भी हो सकते है, या स्वतंत्र भी हो सकते है। अमूमन सच्चे कार्यकर्ता स्वतंत्र होते है, और किसी नेता वगेरह के नियंत्रण में काम नही करते। हालांकि भारत के अधिकांश कार्यकर्ता ब्रांडेड नेताओं पर निर्भर बने हुए है। . कार्यकर्ताओ को यह बात समझ लेनी चाहिए कि, आम नागरिको का जन आन्दोलन के शुरूआती चरणों में न्यूनतम सहयोग रहेगा। जैसे जैसे कार्यकर्ता बढ़ेंगे वैसे वैसे नागरिक इन क़ानून ड्राफ्ट्स का समर्थन करेंगे। और अंतिम चरण में वे आन्दोलन में अपनी भूमिका निभायेंगे। मतलब नागरिक इस आन्दोलन को आगे बढाने के लिए अपने श्रम, धन आदि से कोई सहयोग नहीं करेंगे। इसे आगे बढाने का काम कार्यकर्ताओ को ही करना होगा। किसी भी देश में लगभग 98% नागरिक ही होते है, और इनसे कार्यकर्ताओ को बेहद कम उम्मीद रखनी चाहिए। किन्तु ये 2 लाख कार्यकर्ता भारत के 90 करोड़ नागरिको में बिखरे हुए है, अत: इन्हें ढूँढने के लिए कार्यकर्ताओ को सभी 90 करोड़ नागरिको तक पहुंचना होगा। . ———————— . तो दूसरी आवश्यकता है - ऐसे लाखों कार्यकर्ता जो जूरी सिस्टम-वोट वापसी क़ानून ड्राफ्ट के नेतृत्व में आन्दोलन खड़ा करने के लिए प्रयास करने को तैयार हो। . (C) जन आन्दोलन खड़ा करने के लिए तीसरी जरूरत प्रेरणा की है। इसके लिए हमारा सुझाव है कि यदि कार्यकर्ता जूरी सिस्टम, वोट वापसी, धन वापसी और वेल्थ टेक्स आदि कानूनों को लाने के लिए जन आन्दोलन खड़ा करना चाहते है तो उन्हें अनिवार्य रूप से अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी(*) को अपना प्रेरणा स्त्रोत बनाना चाहिए। इस तरह के क़ानून उधम सिंह जी की सहयोग बिना किसी भी तरह से नहीं लाये जा सकते। . महात्मा उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जन आन्दोलन का औचित्य सिर्फ तब पूरा होता है जब कुल नागरिको के 51% नागरिक इस आन्दोलन का समर्थन करे। यदि जन आन्दोलन जूरी सिस्टम, वोट वापसी कानूनों के पक्ष में बहुमत सिद्ध कर देता है, तो आन्दोलन की बाधाओं को दूर करने के लिए अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सक्रीय हो जायेंगे। यदि आन्दोलन बहुमत साबित नही कर पाता है तो उधम सिंह जी सक्रीय नही होंगे और आन्दोलन असफल हो जाएगा। . ———————— . (*) अंहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी से क्या आशय है ? . उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जब जब सत्ता बहुमत की अवहेलना करती है, तब तब उधम सिंह जी सक्रीय होकर जनता के प्रतिनिधि बनकर सत्ताधीशो से मुलाकात करके उन्हें जनता की इच्छा से अवगत कराते है। उधम सिंह जी सही-गलत में नहीं मानते। वे सिर्फ बहुमत में मानते है। अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी, अहिंसा मूर्ती राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस आदि उधम सिंह जी के ही अंश है। उधम सिंह जी का अंश किसी भी व्यक्ति में हो सकता है। यदि जनता का बहुमत सत्ता से कोई मांग करता है, किन्तु सत्ता स्पष्ट रूप से इसकी अवहेलना करती है, तो कार्यकर्ताओ में मौजूद उधम सिंह जी का अंश सक्रीय हो जाता है। . ———————— . तो तीसरी और आखिरी जरूरत यह है कि - आन्दोलनकारी कार्यकर्ता अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी से प्रेरणा ले। . पाठक कृपया इस बात को नोट करे कि एक जन आन्दोलन खड़ा होने में दशको एवं सदियाँ भी लग सकती है। ब्रिटिश 1050 में जूरी सिस्टम से इंट्रोड्यूस हुए और वहां के कार्यकर्ताओ को जूरी सिस्टम गेजेट में छपवाने ( मैग्नाकार्टा ) में 200 वर्ष लगे। इसी तरह अमेरिका में जूरी सिस्टम एवं स्वतंत्रता आन्दोलन ने खड़े होने में 3 दशक लिए। आचार्य चाणक्य में निर्देशन में चलाये जाने वाले आन्दोलन को जन आन्दोलन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। क्योंकि आचार्य इसे लीड कर रहे थे। यदि चाणक्य आन्दोलन से बाहर हो जाते तो ज्यादातर सम्भावना थी कि धनानंद का तख्ता नहीं पलटा जा सकता था। . मोहन के नेतृत्व में चलाया गया फ्रीडम मूवमेंट न तो आन्दोलन था, और न ही जन आन्दोलन। यह एक ड्रामा था। आन्दोलन का स्विच मोहन के हाथ में था। वे जब चाहते तब आन्दोलन को ट्रिगर करते थे और जब चाहते आन्दोलन को वापिस ले लेते थे !! द अन्ना के नेतृत्व में चलाया गया जनलोकपाल का हाईटेक ड्रामा भी जन आन्दोलन नहीं था। पेड मीडिया का इस पर पूरी तरह से नियंत्रण था। 1857 के विद्रोह की शुरुआत महात्मा मंगल पांडे ने की थी, लेकिन बाद में इस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। हालांकि नागरिको के बहुमत का इसे समर्थन हासिल था, लेकिन यह समर्थन निष्क्रिय श्रेणी का था। दरअसल यह आन्दोलन न होकर एक क्रान्ति थी। टेलीग्राम का अविष्कार हो जाने एवं क्रांतिकारियों के कारतूस समाप्त होने जाने के कारण यह असफल रहा। . 1977 में जन आन्दोलन के कारण ही श्रीमति इंदिरा गांधी जी को इमरजेंसी समाप्त करनी पड़ी थी। उन्होंने यह ताड़ लिया था कि जनता का बहुमत आपातकाल को हटाये जाने के पक्ष में है, और यदि उन्होंने चुनाव नहीं करवाए तो किसी भी समय अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सक्रीय होकर संजय गाँधी से मुलाक़ात कर सकते है !! बहरहाल, उनका चुनाव कराने का उनका फैसला सही था और नतीजो में यह बात साबित भी हुयी कि बहुमत उनके साथ नहीं था। . ———— खंड - (स) ———— . इस खंड में वे चरण दिए गए है जिन्हें उठाकर " जूरी सिस्टम, वोट वापसी, धन वापसी आदि क़ानून ड्राफ्ट्स के नेतृत्व में अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह केन्द्रित, कार्यकर्ता निर्देशित जन आन्दोलन "खड़ा किया जा सकता है। . देश के सभी स्वतंत्र कार्यकर्ताओं — भारत को अमेरिका जितना शक्तिशाली बनाने के लिए आपको कौनसे कार्यो को सफलता पूर्वक करना होगा, और इन कार्यो को पूरा करने के दौरान आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा ? और किस तरह से भारत के कार्यकर्ता इन विहंगम कार्यो को पूरा करने के लिए पर्याप्त नागरिक / कार्यकर्ता / इंजीनियर्स और पर्याप्त धन जुटा सकते है ? . अध्याय, और किये जाने वाले कार्यो कि सूची : . 00. परिचय . 01. पहला काम : कम से कम 543 एक्टिविस्ट्स को लोकसभा, 5000 एक्टिविस्ट्स को विधानसभा और लगभग 200,000 एक्टिविस्ट्स को स्थानीय निकायो के चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना। . 02. दूसरा काम : 75 करोड़ नागरिको को ज्यूरी सिस्टम, धन वापसी, वोट वापसी आदि क़ानून ड्राफ्ट के बारे में "सूचित" करना ; कृपया इस बात पर विशेष ध्यान दें कि यह जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओं द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए, पेड मिडिया द्वारा नही। यदि यह जानकारी पेड मीडिया के माध्यम से दी जाती है तो वे आन्दोलन में किसी न किसी नेता को खड़ा कर देंगे, और फिर नेता को गिरा कर आन्दोलन भी गिरा देंगे। . 03. तीसरा काम : 45 करोड़ नागरिको को राजी करना कि वे प्रधानमंत्री को चिट्ठी भेजकर इन कानूनों को गेजेट में छापने का आदेश दें। . 04. चौथा काम : 45 करोड़ नागरिको के संज्ञान में यह बात लेकर आना कि (a) 45 करोड़ नागरिक अपने प्रधानमंत्री को चिट्ठी भेज चुके है , (b) तथा 45 करोड़ नागरिकों को यह भी जानकारी होना कि 45 करोड़ नागरिको द्वारा चिट्ठी भेजी जा चुकी है , (c) दुसरे शब्दों में, वोट वापसी, धन वापसी, जूरी सिस्टम कानून ड्राफ्ट्स और चिट्ठी भेजे जाने कि जानकारी "कॉमन नॉलेज" में लेकर आना !! . 05. पांचवा काम : ( पहले से चौथे तक चरण पूरे होने के बावजूद यदि सांसद और प्रधानमंत्री राईट टू रिकॉल जूरी सिस्टम कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से मना कर दे तो ) -- 45 करोड़ नागरिको को तैयार करना कि वे अपने सांसदों को इस्तीफा देने का आदेश देने के लिए चिट्ठी भेजे। . 06. छठा काम : 45 करोड़ नागरिको को उन उम्मीदवारों को वोट देने के लिए तैयार करना जिन्होंने जूरी सिस्टम, धन वापसी के क़ानून ड्राफ्ट को अपने एजेंडे में शामिल किया है। . 07. सातवाँ काम : उस परिस्थिति का सामना करना जब जूरी सिस्टम, वोट वापसी ड्राफ्ट के मुद्दों पर जीतकर जाने वाले सांसद इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से मना कर दे। . 08. आठवां काम : सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश द्वारा इन कानूनो को खारिज कर दिए जाने के हालात का सामना करना। . 09. नवां काम : उस स्थिति से निपटना, जब प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी , रिजर्व बैंक अधिकारी, सार्वजनिक उपक्रमों के अधिकारी आदि जूरी सिस्टम, वोट वापसी का विरोध करें और इन्हे रोकने के लिए लिए गड़बड़ी फैलाये। . 10. दसंवा अतिरिक्त काम : अमेरिका / चीन द्वारा खुले / छिपे हुए सशस्त्र हमलो, आर्थिक और मौद्रिक प्रतिरोधों का सामना करना। . 11. ग्यारवाँ काम : इन कार्यों को पूरा करने के लिए किस तरह हम लाखों-करोड़ो कार्यकर्ता, नागरिक, इंजीनियर्स और जरुरी कौशल, प्रशिक्षण और योग्यता जुटा सकते है ? और किस तरह हम इन कार्यो को पूरा करने के लिए धन जुटा सकते है। . 12. बारहवां काम : क्यों जहां तक हो सके इनमे से ज्यादातर कार्यो को समानांतर रूप से एक साथ किया जाना चाहिए, न कि क्रमिक रूप से। . 13. तेरहवां काम : क्या भारत को ताकतवर बनाने का अन्य कोई शार्ट कट है ? जिससे इस भारी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया से बचा जान सके ? . 14. सारांश . ================== . 00. परिचय . कई कार्यकर्ता हम रिकालिस्ट्स से पूछते है की -- भारत को अमेरिका जितना ताकतवर बनाने के लिए हमें कौन से कार्य करने होंगे ? इस जवाब में उन सभी कार्यो और चरणो को सूचीबद्ध किया गया है, जिनका पालन भारत के कार्यकर्ता कर सकते है। . 01. पहला काम : कम से कम 543 एक्टिविस्ट्स को लोकसभा, 5000 एक्टिविस्ट्स को विधानसभा और लगभग 200,000 एक्टिविस्ट्स को स्थानीय निकायो के चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना। . हम एक जन आंदोलन खड़ा करने पर काम कर रहे है , ताकि वर्तमान या नए सांसदों को जूरी सिस्टम, धन वापसी कानूनो को लागू करने के लिए बाध्य किया जा सके। इसीलिए हमें 543 लोकसभा और 5000 विधानसभा उम्मीदवारों की आवश्यकता होगी, जो चुनावो में भाग ले सके। तो चुनाव लड़ना क्यों जरुरी है ? आखिर क्यों रिकालिस्ट्स चुनावो में भाग लिए बिना इन कानूनो को लागू करवाने में असफल रहेंगे ? (a) मान लीजिये कि रिकालिस्ट्स देश के सभी एक्टिविस्ट्स को इन कानूनो के बारे में जानकारियाँ देते है, और 2 लाख एक्टिविस्ट्स को रिकालिस्ट्स में बदल देते है। (b) मान लीजिये कि ये लाखों एक्टिविस्ट्स 70 करोड़ नागरिको को इन कानूनो के बारे में जानकारी दे देते है। (c) और मान लीजिये कि उनमे से 45 करोड़ नागरिक अपने सांसदों एवं प्रधानमंत्री को चिट्ठी द्वारा आदेश भेज देते है कि इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। (d) और 70 करोड़ नागरिको को भी यह जानकारी हो जाती है कि चिट्ठी द्वारा आदेश भेजे जा चुके है। (e) और मान लीजिये कि सांसद इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से इंकार कर देते है। तो ऐसी स्थिति में क्या अहिंसा मूर्ती महात्मा ऊधम सिंह जी सांसदों से मुलाक़ात करेंगे ? नही। क्योंकि मतदाताओ ने सांसदों को इस्तीफा देने के लिए चिट्ठी नही भेजी है, और सभी सांसदों ने चुनावों से पहले ही इन कानूनो को लागू करने से इंकार कर दिया था। अत: उन पर इन कानूनो को लागू करने और इस्तीफा देने की कोई नैतिक बाध्यता नही है, और इसीलिए ऊधम सिंह जी सांसदों से मुलाक़ात नही करेंगे !! (f) अब मान लीजिये कि 45 करोड़ मतदाता अपने सांसदों को 'इस्तीफा' देने के लिए चिट्ठी भेजते है। (g) और यदि वोट वापसी कार्यकर्ता यह साफ़ कर देते है कि वे चुनावो में 'भाग' नही लेने वाले है। मैं इसे फिर से दोहराता हूँ - यदि रिकालिस्ट्स यह घोषणा करते है कि वे 'चुनावी प्रक्रियाओ में हिस्सा "नही" लेने वाले है'। तब अहिंसा मूर्ती महात्मा ऊधम सिंह जी यह निष्कर्ष निकालेंगे कि — सांसदों से मेरी मुलाक़ात का देश को क्या लाभ होगा ? क्योंकि यदि फिर से चुनाव हो भी जाते है, तो भी फिर से वही उम्मीदवार संसद में पहुँच जायेंगे जो इन कानूनो के खिलाफ है, क्योंकि इन कानूनो के समर्थक रिकालिस्ट्स ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है । अत: ऊधम सिंह जी सांसदों से न मिलने का फैसला करेंगे !! . तो इस स्थिति में सांसद यही सोचेंगे कि ऊधम सिंह जी उनसे मिलने नही आने वाले है। वे यह भी सोचेंगे कि एक तो ऊधम सिंह जी हमसे मिलने आने वाले नही है , और दूसरे, कोई भी कार्यकर्ता चुनाव लड़ने को भी तैयार नही है , इसीलिए राईट टू रिकॉल कानूनो को गैजेट में प्रकाशित न करने से हमे कोई नुकसान नही होने वाला, लेकिन यदि हम इन कानूनो को लागू कर देते है तो हमारे प्रायोजक और धनिक वर्ग हमसे नाराज हो जाएगा। इसीलिए इन कानूनो का विरोध करने में ही मेरा फायदा है। और नुकसान तो कोई है ही नही। . और इसका मतदाताओ पर भी उल्टा असर होगा। मान लीजिये कि 45 करोड़ नागरिक इन कानूनो को लागू करने के लिए चिट्ठी द्वारा आदेश भेज चुके है, लेकिन सांसदों ने इन कानूनो को लागू करने से मना कर दिया है। तब मतदाता इस असमंजस का शिकार हो जाएगा कि, — क्या मुझे सांसद को इस्तीफा देने के लिए चिट्ठी भेजनी चाहिए कि नही ? चूंकि जूरी सिस्टम का कोई भी कार्यकर्ता चुनाव लड़ने को तैयार नही है, अत: मौजूदा सांसद से इस्तीफा मांगने में कोई लाभ नही है। क्योंकि कोई भी कार्यकर्ता इन मुद्दो पर चुनाव लड़ने को तैयार नही है, अत: यदि सभी सांसद इस्तीफा दे भी देते है, और फिर से चुनाव होते है तो भी फिर से वे ही उम्मीदवार संसद में पहुंचेंगे जो वोट वापसी कानूनो का विरोध कर रहे है। अत: बेहतर यही है कि मौजूदा सांसदों को इस्तीफा देने के लिए आदेश न भेजा जाए !! . और इस कारण शायद कुछ मतदाता ( कुछ, न कि सभी ) सांसद को इन कानूनो को लागू करवाने का आदेश न भेजने का भी फैसला ले सकते है !!! कई मतदाता यह सोच सकते है कि, मौजूदा सांसदों ने चुनावो से पहले ही यह बात स्पष्ट कर दी थी कि, वे जूरी सिस्टम कानूनो को लागू करने वाले नही है। और सांसद जानते है कि मैं उन्हें इस्तीफा देने के लिए नही कह सकता, क्योंकि कोई भी रिकालिस्ट जूरी सिस्टम कानूनो के समर्थन में चुनाव लड़ने को तैयार नही है। अत: यदि मैं सांसद को चिट्ठी द्वारा आदेश भेज भी देता हूँ, तो सांसद इन कानूनो को लागू करने से साफ़ इंकार कर देंगे। अत: ये मामला अब यहीं ख़त्म हो चुका है। . तब रिकालिस्ट्स के सामने प्रश्न यह है कि — क्या हमारे पास ऐसे कार्यकर्ता उपलब्ध है जो कि सांसद बन कर वोट वापसी, धन वापसी कानूनों को लागू करने की मंशा रखते हो ? . यदि कार्यकर्ताओ के पास ऐसे उम्मीदवार नहीं है तो जूरी सिस्टम, वोट वापसी क़ानून ड्राफ्ट्स बिना शरीर की आत्मा की तरह होंगे , तथा ऐसे अमूर्त विचार का राजनीति और वास्तविक जीवन में कोई महत्त्व नहीं होगा। . कोई क़ानून ड्राफ्ट सिर्फ तभी अच्छा क़ानून ड्राफ्ट कहा जा सकता है जबकि ऐसा ड्राफ्ट 45 करोड़ नागरिको और 2 लाख कार्यकर्ताओ का समर्थन जुटा सके , और साथ ही यह प्रस्तावित ड्राफ्ट इतना प्रभावी हो कि 543 कार्यकर्ता इन कानूनो को लागू करवाने का उद्देश्य लेकर चुनाव लड़े। ताकि संसद में जाकर इन्हे लागू किया जा सके। अन्यथा ऐसे कानून ड्राफ्ट्स का प्रचार करना सिर्फ समय की बर्बादी है। . इसलिए हमें पूरे देश में चुनाव लड़ने के लिए 543 लोकसभा उम्मीदवारों और 5000 विधानसभा प्रत्याशियों की आवश्यकता होगी। और बाद में हमें लगभग 2 लाख ऐसे कार्यकर्ताओ की भी जरुरत होगी जो कि स्थानीय निकाय के चुनावो में भाग ले सके। . इसीलिए चुनावो में भाग लेना बेहद जरुरी है , और जल्दी से जल्दी रिकालिस्ट्स को इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए। . हम चुनाव लड़े बिना आगे नहीं बढ़ सकते। क्योंकि ज्यादातर मतदाता हमारी बात सिर्फ तब ही सुनेंगे जब हमारे पास चुनावो में उतरने के लिए पर्याप्त प्रत्याशी हो। वरना हमें मतदाताओ से यह सुनने को मिलेगा कि — आप लोगो द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट्स बेशक अच्छे हो सकते है। लेकिन आप के ड्राफ्ट्स यदि 543 कार्यकर्ताओ को भी चुनाव लड़ने और सांसद बनने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते तो इन ड्राफ्ट्स की अच्छाई संदेहास्पद है !!! . तो इस प्रकार 543 रिकालिस्ट्स को लोकसभा और 5000 रिकालिस्ट्स को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना सबसे पहला काम है। क्योंकि सबसे पहले कार्यकर्ताओ को इन कानूनो पर अपना भरोसा दिखाना होगा , सिर्फ तब ही मतदाता इन क़ानून ड्राफ्ट्स को पढ़ने, समझने और अपने सांसदों एवं पीएम को चिट्ठी, ट्विटर द्वारा आदेश भेजने के लिए राजी होंगे। . चुनाव न लड़ने के फैसले पर टिके रहना हमें सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचायेगा। क्योंकि जब तक बड़ी संख्या में रिकालिस्ट्स चुनाव नही लड़ेंगे, धन वापसी, वोट वापसी कानूनो के समर्थको की संख्या नही बढ़ेगी। जूरी सिस्टम क़ानून ड्राफ्ट्स को अपने एजेंडे में शामिल करके सबसे पहले 2009 में एक रिकालिस्ट ने चुनाव लड़ा था। 2015 तक इस संख्या में कोई इजाफा नहीं हुआ। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनावों में 15 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। किन्तु तब भी 545 सीटो के हिसाब से यह संख्या 3% ही है !! कार्यकर्ता इस बात को नोट करें कि उन्हें इसके लिए किसी राजनैतिक पार्टी के भरोसे पर रहने की जरूरत नहीं है। वे निर्दलीय भी चुनाव लड़ सकते है। . =============== . 02. दूसरा काम : 75 करोड़ नागरिको को ज्यूरी सिस्टम, वोट वापसी आदि क़ानून ड्राफ्ट के बारे में ‘सूचित’ करना ; यह जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओं द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए, पेड मिडिया द्वारा नही । . रिकालिस्ट्स को दूसरा काम यह करना होगा कि वे भारत के 70 करोड़ नागरिको को वोट वापसी, ज्यूरी सिस्टम आदि क़ानून ड्राफ्ट्स की जानकारी दें। इसके लिए हमें 70 करोड़ पेम्फ्लेट, करोडो पुस्तिकाएं और करोड़ो डीवीडी तैयार करके उनका वितरण करना होगा !! या हमें नागरिको को इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वे इन पुस्तिकाओं और डीवीडी को दुकानो से ख़रीदकर पढ़ें और देखें। पर्चो की छपाई और डीवीडी के वितरण का अनुमानित व्यय प्रति नागरिक लगभग 400 रू के हिसाब से हमें अनुमानित 28 हजार करोड़ रूपयो की आवश्यकता होगी। . अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि - किस तरह एक्टिविस्ट्स 70 करोड़ नागरिको को इन पर्चो को पढ़ने और डीवीडी को सुनने के लिए राजी कर पाएंगे ? . नागरिक इन पर्चो को तब ही पढ़ने में रुचि दिखाएँगे जब ; (a) पेड मिडिया इन कानूनो की प्रशंषा करे (b) कार्यकर्ता अपने परिचित नागरिको को इन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। . पेड मिडिया का विकल्प हमारे लिए हमेशा के बंद है। इसीलिए हमारे पास सिर्फ यही तरीका शेष है कि, कार्यकर्ता अपने परिचित नागरिको से इन कानूनी ड्राफ्ट्स को पढ़ने का आग्रह करे। एक कार्यकर्ता लगभग 1000 नागरिको को ड्राफ्ट्स पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है, अत: हमें कम से कम 70 करोड़ / 10 / 1000 = 70 हजार कार्यकर्ताओ को आवश्यकता होगी। चूंकि कई नागरिक एक से अधिक कार्यकर्ताओ के संपर्क में आयेंगे और सूचनाओ का दोहराव होगा, अत: आकलन में सटीकता बनाये रखने के लिए हमें तीन गुना अधिक कार्यकर्ताओ की गणना करनी चाहिए। इस हिसाब से 70 करोड़ नागरिको को इन कानूनी ड्राफ्ट्स की सूचना पहुंचाँने के लिए कम से कम 2 लाख कार्यकर्ताओ की आवश्यकता होगी। . क़ानून ड्राफ्ट्स की जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओ द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए, न कि पेड मिडिया द्वारा। क्योंकि पेड मिडिया द्वारा सूचित नागरिक एक दायित्व है न कि एक सम्पति, अत: तब कार्यकर्ताओ को नागरिको से जुड़े रहने के लिए हमेशा पेड मिडिया पर निर्भर रहना पड़ेगा। लेकिन यदि नागरिक कार्यकर्ताओ से जुड़े हुए है तो मिडिया को भुगतान किये बिना भी कार्यकर्ता नागरिको से जुड़े हुए रह सकते है। इसीलिए यह बहुत जरूरी है कि, नागरिक यह सूचनाए पेड मिडिया की जगह कार्यकर्ताओ द्वारा प्राप्त करे। . इस समय कुछ 100-200 कार्यकर्ता है जो कि पूरे देश में फैले हुए है, और इन कानूनो का प्रचार नागरिको में कर रहे है। इसलिए रिकालिस्ट्स को ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदलने के लिए प्रयास करने चाहिए। तो यदि वोट वापसी कार्यकर्ता 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदलने में असफल रहते है तो क्या होगा ? ऐसी स्थिति में, रिकालिस्ट्स खेल से बाहर हो जाएंगे। . कोई यह प्रश्न पूछ सकता है कि - किस आधार पर 2 लाख कार्यकर्ताओ की आवश्यकता बतायी गयी है। असल में यह एक मोटा अनुमान है। मतलब यह है कि, निश्चय ही इसके लिए न तो कुछ हजार कार्यकर्ताओ की आवश्यकता है, न ही करोड़ो कार्यकर्ताओ की। जो बात समझना जरुरी है वह यह है कि - कार्यकर्ताओ की संख्या पर्याप्त रूप से इतनी होनी चाहिए कि, कोई रिकालिस्ट 1% से अधिक रिकालिस्ट्स से परिचित हुए बिना और आपसी संपर्क के अभाव के बावजूद अपना काम जारी रखें और बिना किसी सम्प्रेषण के आंदोलन आगे बढ़ता रहे। . अध्याय - 2 का सार यह है कि : पहला काम यह है कि कार्यकर्ताओ द्वारा 70 करोड़ नागरिको को इन कानून ड्राफ्ट्स के बारे में सूचित किया जाए तथा ऐसा करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रियाओ का पालन किया जाए : (2a) लाखो कार्यकर्ताओ तक अपनी पहुँच बनायी जाए। (2b) लगभग 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदला जाए - मतलब कार्यकर्ताओ को इस बात के लिए राजी किया जाए कि वे अपने धन से जूरी सिस्टम, धन वापसी, वोट वापसी आदि कानूनो के पर्चे छपवायें, डीवीडी बनाकर वितरण करें और सभाएं आयोजित करके नागरिको को इन कानूनो के बारे में जानकारी दे। (3c) तथा नागरिको को इन ड्राफ्ट्स को पढ़ने के लिए तैयार क
चुनाव आयोग कितना निष्पक्ष है? . मेरा मानना है कि यदि कोई व्यक्ति भारत के 3 सबसे भ्रष्ट आदमियों की सूची बनाता है तो वह बिना आगे पीछे देखे सीधे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश, चुनाव आयुक्त एवं रिजर्व बैंक गवर्नर का नाम नाम क्रमश: 1, 2, 3 नंबर पर लिख सकता है। पीएम वगेरह जैसे पदों का नाम बहुत बाद में आता है। . केंचुआ का मुख्य टारगेट भारत में EVM को जारी रखना एवं छोटी पार्टियों के रास्ते में पत्थर फेंकना है, ताकि उन्हें आगे बढ़ने से रोका जा सके। इसके लिए केंचुआ ने कितने और किस किस तरह के क़ानून छापे हुए है, ये आपको सिर्फ तब ही पता चलता है, जब आप चुनाव लड़ने जाते हो। फिलहाल मैंने निचे केंचुआ की एक हरकत का ब्यौरा दिया है, जिससे आप अंदाजा लगा सकते हो केंचुआ किस तरह काम करता है। . PMP02* के नेता मोदी साहेब ने 2018 में गेजेट में फाइनेंस बिल का लेबल लगाकर एक इबारत छापी। यह इबारत कहती है कि – कोई भी भारतीय या विदेशी व्यक्ति बैंक में पैसा जमा करके एवज में इलेक्टोरल बांड ले सकता है, और ये बांड किसी भी राजनैतिक पार्टी को दे सकता है। राजनैतिक पार्टी ये बांड अपने बैंक खाते में जमा करेगी और नियत राशि अमुक पार्टी के खाते में जमा हो जाएगी !! . स्पष्टीकरण : मान लीजिये कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी X वालमार्ट या जिंदाल से 50 करोड़ का चंदा लेना चाहती है, और यह भी चाहती है कि वालमार्ट का नाम सामने नहीं आये। तो वालमार्ट बैंक में जाकर 50 करोड़ के इलेक्टोरल बांड खरीदेगा और X को दे देगा। चुनावी बांड प्रोमेसरी नोट की तरह होता है, और इस पर दाता का नाम नहीं लिखा होता। फिर X अपने बैंक को ये बांड देगा और बैंक X के खाते में 50 करोड़ ट्रांसफर कर देगा। . अब X को अपनी लॉग बुक में सिर्फ यह लिखना है कि उसने 50 करोड़ इलेक्टोरल बांड से प्राप्त किये। X को यह नहीं बताना है कि उसे ये बांड किसने दिए थे !! और न ही केंचुआ उससे पूछेगा कि X को ये बांड किसने दिए थे !! Now, foreign poll funding won’t be scrutinised . साफ़ है कि मोदी साहेब एवं संघ के स्वयंसेवको ने इस क़ानून को सिर्फ इसीलिए लागू किया, ताकि बड़ी पार्टियाँ विदेशियों से गुमनाम पैसा ले सके !! और अब वे विदेशियों से पैसा ले भी रहे है। . सबूत ? . माफ़ कीजिये, लेकिन उन्होंने क़ानून ही इस तरह से बनाया है कि इसका कभी कोई सबूत नहीं जुटाया जा सकता !! . मोदी साहेब ने जब यह क़ानून छापा तो PMP01* की नेता सोनिया जी एवं PMP03* के नेता अरविन्द केजरीवाल जी ने भी इस क़ानून का पूरा समर्थन किया था !! यह बिल बिना किसी चर्चा के सीधे पास हुआ। जब यह क़ानून छपा तो पेड मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि, इस क़ानून के आने के बाद राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता आएगी !!! ( PMP01* = में PMP से आशय पेड मीडिया पार्टी है, और 01 कोंग्रेस का कोड है। बीजेपी=संघ का कोड 02 एवं आम आदमी पार्टी का कोड 03 है। पेड मीडिया पार्टी से आशय ऐसी पार्टी से होता है, जो पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे के समर्थन में रहती है। पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा क्या है, इस बारे में फिर किसी जवाब में। ). पेड मीडिया से फीडिंग लेने वाले किसी भी बुद्धिजीवी या जीनियस से आप इस बारे में पूछेंगे कि फाइनेंस बिल क्या है, तो वह आपको आज भी यही बतायेगा कि इस बिल से चुनावी भ्रष्टाचार कम होगा, और चंदे में पारदर्शिता आएगी !! पारदर्शिता कैसे आएगी, इस बारे में ये बुद्धिजीवी आपको कुछ नहीं बताएँगे। क्योंकि पेड मीडिया ने भी इन्हें इस बारे में कुछ नहीं बताया है। पेड मीडिया ने इन्हें सिर्फ इतना ही बताया है कि, इससे पारदर्शिता आती है !! बस !! . कांग्रेस एवं बीजेपी को 2010 में हाई कोर्ट ने विदेशियों से चंदा लेने का दोषी ठहराया था। तब से इस मामले पर कार्यवाही लंबित थी। अत: मोदी साहेब ने इस क़ानून को भूतलक्षी प्रभाव ( Retrospectively ) के साथ छापा। यदि मोदी साहेब इस क़ानून को 10 साल पीछे जाकर यानी 2008 से भी लागू करते तो कांग्रेस एवं बीजेपी दोनों ही इस भ्रष्टाचार की चपेट में आने से बच जाते। किन्तु कांग्रेस को उनके अन्य पुराने पापो से बचाने के लिए मोदी साहेब और भी पीछे गए !! . कितना पीछे ? . मोदी साहेब ने इस बिल को 42 साल पीछे जाकर यानी 1976 से लागू किया !! मतलब 2010 में कांग्रेस-बीजेपी ने जो अपराध किया था और जो मामला अभी चल रहा है , वह अपराध अब गैर कानूनी नहीं रह गया है , बल्कि कानूनी हो गया है !! और 1976 के बाद में किये गए ऐसे सभी अपराध भी अब अपराध नहीं रहे !! बताइये !! . जब मोदी साहेब ने यह क़ानून छापा था तो राईट टू रिकॉल पार्टी ने इस क़ानून का विरोध किया था और उनके कार्यकर्ताओ ने पीएम को ट्विट भेजे थे कि इस बकवास क़ानून को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए। किन्तु उन्होंने इस क़ानून को जारी रखा। . —————— . अब 2020 में केंचुआ एवं पेड मीडिया की हरकत देखिये : . आज से 4 दिन पहले यानी 10 फरवरी 2020 को पेड नेशनल हेराल्ड एवं Paid The Print ने यह खबर लगाईं कि – चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बांड से पैसा जुटाने वाली जिन पार्टियों की सूची का एफिडेविट दिया है उनमे राईट टू रिकॉल पार्टी का नाम भी है !! Unrecognised parties receive funds via electoral bond scheme . These parties don't have a fixed symbol but still got cash through electoral bonds . They include Sabse Badi Party, Rashtriya Peace Party, Hindustan Action Party, Nagarik Ekta Party, Bharat Ki Lok Jimmedar Party, Vikas India Party and Right to Recall Party, according to a submission made by the Election Commission (EC) in the Supreme Court this week. A registered but unrecognised political party cannot contest elections on a fixed symbol of its own. It chooses from a list of symbols the Election Commission provides. This makes it difficult to track the electoral history of such parties. सुप्रीम कोर्ट में केंचुआ (EC) द्वारा प्रस्तुत एफिडेविट के अनुसार, इसमें सबसे बड़ी पार्टी, राष्ट्रीय शांति पार्टी, हिंदुस्तान एक्शन पार्टी, नगरिक एकता पार्टी, भारत की लोक जिम्मेदार पार्टी, विकास इंडिया पार्टी और राइट टू रिकॉल पार्टी शामिल है। . पेड नेशनल हेरल्ड एवं पेड द प्रिंट ने हवाला दिया है कि, केंचुआ ने सुप्रीम कोर्ट में यह हलफनामा दाखिल किया है। अब या तो केंचुआ का यह शपथपत्र पूरी तरह से झूठा है, या फिर पेड नेशनल हेरल्ड एवं पेड द प्रिंट को झूठी खबर लगाने के लिए भुगतान किया गया है। . सबूत ? . क्योंकि राईट टू रिकॉल पार्टी के पास कोई बैंक खाता नहीं है। और पार्टी के पास पहले भी कोई खाता नहीं रहा है। RRP ने आज तक कभी भी कोई बैंक एकाउंट नहीं खुलवाया। यह पार्टी पैसो का कोई लेनदेन करती ही नहीं है। जब से पार्टी बनी है, तब से पार्टी के पास शून्य रूपये है। कोई बैंक खाता नहीं, कोई एनजीओ नहीं, कोई ट्रस्ट नही, कोई चंदा नहीं , कोई कैश नहीं। राईट टू रिकॉल पार्टी ने आज तक कभी किसी भी रूप में कोई चंदा भी नहीं लिया है !! . और यह बात केंचुआ को भी मालूम है कि, राईट टू रिकॉल पार्टी के पास न तो कोई खाता है, और न ही इनके पास पैसा है। कैसे ? . यदि पार्टी किसी चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारती है तो उन्हें ऑडिट करके चुनावी खर्चे का हिसाब केंचुआ को भेजना पड़ता है। तो हर विधानसभा में चुनाव में RRP पार्टी के उम्मीदवार चुनाव लड़ते है, और फिर केंचुआ को हिसाब भी भेजा जाता है। अभी तक जितनी भी बार उन्हें हिसाब भेजा गया है, उसमे राईट टू रिकॉल पार्टी की सभी एंट्रियाँ शून्य, शून्य, शून्य या Nil, Nil Nil होती है। और हिसाब की लॉग बुक में लिखा जाता है कि – कोई बैंक खाता नहीं, कोई अनुदान नहीं, कोई चंदा नहीं, कोई नकदी नहीं !! . और RRP अभी तक इस तरह 4 चुनावों का हिसाब भेज चुकी है। RRP के उम्मीदवारों को चुनाव खुद के खर्चे पर लड़ना होता है, और उन्होंने जितना खर्चा किया उसका हिसाब एक उम्मीदवार के रूप में वे सीधे केंचुआ को भेजते है। . इलेक्टोरल बांड को भुनाने के लिए इसे एकाउंट में जमा करना होता है। जब पार्टी के पास बैंक खाता ही नहीं है तो फिर पार्टी इलेक्टोरल बांड को कहाँ जमा करेगी, और कहाँ से पैसा लेगी !! बताइये !!! . यह खबर क्यों लगवायी गयी ? . इसके पीछे 2 वजहें है : 1. छवि ख़राब करना : कुछ 40 से 50 लाख पाठको तक उन्होंने यह जानकारी पहुंचा दी है कि इन लोगो को गुमनाम पैसा मिल रहा है। और पाठको की खोपड़ी में यह कील भी ठोक दी है कि, बड़ी पार्टियों को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिले तो कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि उन्हें तो ट्रेक किया जा सकता है। पर जिन पार्टियों को परमानेंट सिम्बल नहीं मिला है उन्हें ट्रेक नहीं किया जा सकता, अत: यदि छोटी पार्टियों को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिले तो यह खतरनाक है !! . खबर को फिर से पढ़ें कि इसे किस तरह ड्राफ्ट किया गया है -- A registered but unrecognised political party cannot contest elections on a fixed symbol of its own. It chooses from a list of symbols the Election Commission provides. This makes it difficult to track the electoral history of such parties. एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल अपने स्वयं के निर्धारित प्रतीक पर चुनाव नहीं लड़ सकता है। यह केंचुआ द्वारा प्रदान किए गए प्रतीकों की एक सूची चिन्ह चुनता है। इससे ऐसी पार्टियों के चुनावी इतिहास को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। . ( स्थायी चुनाव चिन्ह हासिल करने के लिए किसी राज्य या लोकसभा चुनाव में कुल मतों के 5% वोट लाने होते है !! ) . मतलब, न्यूज पाठक के दिमाग में यह बात डालती है कि यदि मान्यता प्राप्त पार्टी को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिलता है तो कोई भ्रष्टाचार नहीं होता है, किन्तु छोटी पार्टियों को यदि बांड से पैसा मिले तो यह दुरूपयोग है !! क्यों ? क्योंकि स्थायी चिन्ह नहीं होने के कारण इनके इतिहास को ट्रेक नहीं किया जा सकता !! मतलब क्या है इस बात का !! . सभी रजिस्टर्ड पार्टियों की पूरी कुंडली केंचुआ के पास रहती है। 800 पेज का एप्लीकेशन जमा करना पड़ता है, तब जाकर वे साल भर में पार्टी को रजिस्टर्ड करते है। कौन पार्टी कितने उम्मीदवार उतार रही है, कहाँ से उतार रही है, सब की सूचना देनी होती है। हर उम्मीदवार को 28 पेज का एफिडेविट देना पड़ता है। चुनाव के दौरान दिन में 2 बार केंचुए को रिपोर्ट करना पड़ता है। . क्या पेम्पलेट छपवा रहे हो, किधर प्रचार कर रहे हो इत्यादि प्रकार की सभी सूचनाएं देनी होती है। इन सब से वो ट्रेक नहीं कर सकते !! लेकिन स्थायी सिम्बल मिलने के बाद वे ट्रेक कर लेंगे !! तो ठीक है, 5% वोट लाने का क़ानून निकाल दो और रजिस्टर्ड पार्टियों को परमानेंट सिम्बल दे दो, ताकि छोटी पार्टियों को भी ट्रेक कर सको। पर ऐसा तो उनने करना नहीं है !! क्योंकि इससे बड़ी पार्टियों की ताकत कम हो जायेगी। . और PMP02 एवं PMP01 के पास तो परमानेंट सिम्बल है न, तो बताओ PMP02 को पिछले साल जो 950 करोड़ और PMP01 को जो 150 करोड़ का चंदा इलेक्टोरल बांड से मिला है, उसका सोर्स क्या है ? कौनसा अखबार या केंचुआ बतायेगा कि PMP01 एवं PMP02 ये 1100 करोड़ किधर से लेकर आई है !! ट्रेक करो और बता दो !! है हिम्मत ? . 2. टाइम ख़राब करना : अभी एक लेटर केंचुआ को लिखना पड़ेगा और एक-एक लेटर पेड नेशनल हेरल्ड एवं Paid The Print को भी लिखना पड़ेगा। मतलब 12 से 14 घंटें तो इसमें ही फुंक जायेंगे। केंचुआ की यह सबसे मुख्य नीति है, छोटी पार्टियों के प्राण पीने की। वो हर महीने किसी न किसी टाइप का एक पटाका फेंकता रहता है, ताकि टाइम चूसा जा सके। वे जानते है कि, छोटी पार्टियों के पास स्टाफ वगेरह नहीं होता, तो वे उन्हें इस तरह के क्लर्की वर्क में उलझाकर रखते है। अब केंचुआ तो इस तरह के पुरजो का कोई जवाब भेजता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट जायेंगे तो वहां इनके भी बाप बैठे हुए है। . इसके बाद राईट टू रिकॉल पार्टी के कार्यकर्ताओं को आगे भी हमेशा के लिए यह स्पष्टीकरण देते रहना पड़ेगा कि, RRP को इलेक्टोरल बांड से कोई पैसा नहीं मिला। लेकिन ज्यादातर लोग RRP की बात का विश्वास नहीं करेंगे। वे केंचुआ, नेशनल हेरल्ड की बात को ही विश्वसनीय मानेंगे। तो RRP के कार्यकर्ताओ को अब आने वाले कई सालों तक भी लगातार यह स्पष्टीकरण देते रहना पड़ेगा !! और इसमें RRP के कार्यकर्ताओ के लाखों घंटे बर्बाद होते रहने वाले है !! . बुद्धिजीवी यह तर्क देंगे कि आप लोग केंचुआ एवं मीडिया हाउस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट क्यों नही गए, मानहानि का दावा क्यों नहीं किया आदि। पर बुद्धिजीवियों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सुप्रीम कोर्ट में पाँव रखने में भी 25 हजार का खर्चा हो जाता है, जो कि छोटी पार्टियों के लिए एक बड़ी राशि होती है। . —————- . भारत में 3 संस्थाएं ऐसी है जो 1950 से ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के कंट्रोल में रही। 2002 तक यह नियंत्रण बढ़ता-घटता रहा, किन्तु पेड मीडिया की शक्ति बढ़ने के कारण आज यह निर्णायक स्तर तक बढ़ गया है। इन तीनो संस्थाओ के मुखिया की नियुक्ति अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों यानी कि पेड मीडिया के प्रयोजको से कंसल्ट करने के बाद की जाती है। यदि पीएम इन 3 संस्थाओ को कंट्रोल करने की कोशिश करेगा तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों एवं पीएम के बीच तनाव बढ़ जाएगा, और वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करके पीएम को गिराने की कार्यवाही करना शुरू कर देंगे। ये तीन संस्थाएं है : सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायधीश चुनाव आयुक्त रिजर्व बैंक गवर्नर इन तीनो संस्थाओ के पास पीएम को डिस्टर्ब करने और यहाँ तक की गिराने की ताकत भी है। . अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पेड मीडिया के माध्यम से इन तीनो संस्थाओ का ऐसा हव्वा खड़ा किया हुआ है कि न तो इन संस्थाओ के मुखिया पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जा सकता है, न ही इनके खिलाफ कभी कोई जांच खोली जा सकती है, न ही इन्हें दण्डित किया जा सकता है। . यदि पीएम इनसे पंगा लेने जाता है तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों द्वारा नियंत्रित पेड मीडिया इन 3 संस्थाओ के साथ खड़ा हो जायेगा और पूरे देश में इस तरह का ड्रामा स्टेज किया जाएगा कि पीएम इन “निष्पक्ष एवं संवैधानिक” संस्थाओ को दबाने या नियंत्रित करने के प्रयास कर रहा है, और पीएम की यह हरकत लोकतंत्र की हत्या है, असंवैधानिक, है आदि आदि !! . और उन्होंने पेड मीडिया के माध्यम से नागरिको के दिमाग में भी यह बात बहुत अच्छी तरह से डाली हुई है कि ये संवैधानिक संस्थाएं लोकतंत्र एवं संविधान की रक्षक है, इन पर हमला करना मतलब संविधान पर हमला है, आदि आदि, और इसी टाइप की फालतू बातें। तो जब भी पीएम एवं इन संस्थाओं के बीच आपस में टकराव आएगा तो पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित सभी बुद्धिजीवी इन संस्थाओ के समर्थन में चले जाते है। केंचुआ एवं भ्रष्ट जजों का इस्तेमाल करके पीएम को गिराने का एक अच्छा उदाहरण आप इस जवाब में पढ़ सकते है – क्या इंदिरा गांधी वाक़ई सबसे ताक़तवर भारतीय प्रधानमंत्री थीं? . केंचुआ किस तरह पीएम एवं अन्य राजनैतिक दलों को कंट्रोल करता है ? . पहली बात तो अकेला केंचुआ अपने बूते पर पीएम का कुछ उखाड़ नहीं सकता। किन्तु पेड मीडिया के प्रायोजक केंचुआ+सुप्रीम कोर्ट+पेड मीडिया की सहायता से पीएम को 3 दिन में जमा कर सकते है। वे ऐसा कैसे करते है और कैसे कर सकते है, इसका जवाब बहुत लम्बा हो जाएगा। अत: निचे मैंने इसे संक्षेप में बताया है। . EVM पर कंट्रोल : पेड मीडिया द्वारा EVM के बारे में नागरिको को काफी अफीम पिलाई गयी है। पेड मीडिया द्वारा इसमें से एक सबसे बड़ा झूठ यह है कि PMP02 पार्टी EVM को हैक करके चुनाव जीतती है !! यह एकदम बकवास आरोप है । . (a) असल में पीएम कभी भी EVM को कंट्रोल नहीं कर सकता। चुनावों की घोषणा होने के बाद पीएम केंचुआ के दफ्तर में न तो कदम रख सकता है, न ही उन्हें कोई निर्देश दे सकता है !! केंचुआ पूरी तरह से पीएम के कंट्रोल से बाहर होता है। निम्नलिखित फैसले सिर्फ केंचुआ लेता है और पीएम का इसमें शून्य दखल होता है : EVM का डिजाइन केंचुआ तय करता है EVM कहाँ बनेगी केंचुआ तय करता है EVM कहाँ स्टोर होगी केंचुआ तय करता है इसके ट्रांसपोर्टेशन का ठेका किस कम्पनी को जाएगा, केंचुआ तय करता है यदि EVM में वोटो की हेराफेरी का कोई आरोप है, तो खुद की जांच भी केंचुआ खुद ही करता है, और खुद को क्लीन चिट भी जारी करता है !! EVM के बारे में पीएम कोई जांच नहीं खोल सकता। यदि पीएम केंचुआ से EVM का डिजाइन मांगे तो केंचुआ नहीं देगा पीएम के पास केंचुआ का सिर्फ यह इलाज है कि, पीएम सुप्रीम कोर्ट के पास जा सकता है। किन्तु यदि सुप्रीम कोर्ट और केंचुआ एक ही पाले में है तो पीएम के हाथ में कुछ नहीं है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट केंचुआ से भी आगे की आयटम है, और पीएम के काबू से बाहर है। कैसे ? सुप्रीम कोर्ट अपनी नियुक्ति खुद ही करता है। और खुद की नियुक्ति खुद करने की इस प्रक्रिया पर आपको आपत्ति है तो इसकी अपील भी खुद सुप्रीम कोर्ट में ही होती है। मतलब वे खुद के मुकदमे खुद ही सुनते है और खुद ही खुद को बरी कर देते है !! यदि पीएम कोई क़ानून छापता है तो सुप्रीम कोर्ट के पास अमुक क़ानून को केंसल करने की संवैधानिक शक्ति है सुप्रीम कोर्ट पीएम के खिलाफ कोई भी जाँच खुलवा सकता है, और पीएम के खिलाफ जांच करने वाली एजेंसी यानी सीबीआई को सीधे अपनी निगरानी में ले सकता है। सुप्रीम कोर्ट पीएम के खिलाफ कोई भी मुकदमा स्वीकार करके पीएम को दोषी ठहरा सकता है, और पीएम को जेल भी भेज सकता है !! सुप्रीम कोर्ट पर कोई आरोप भी नहीं लगाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट पर आरोप लगाना भी गैर कानूनी है !! मतलब वे अवमानना के मामले में आपको जेल में डाल देते है !! सार यह है कि, पीएम केंचुआ से इसीलिए नहीं भिड़ सकता क्योंकि केंचुआ के पीछे एनाकोंडा खड़ा है । और जैसे ही पीएम केंचुआ एवं सुप्रीम कोर्ट से टकराव लेगा वैसे ही पेड मीडिया के प्रायोजको से इशारा मिलने के बाद देश के सभी पेड पत्रकार, पेड संपादक, पेड बुद्धिजीवी, सभी राजनैतिक पार्टियो के नेता पीएम पर आरोप लगाना शुरू कर देंगे, कि पीएम संवैधानिक संस्थाओ को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है !! . दुसरे शब्दों, में पेड मीडिया के प्रायोजक भारत में EVM को जारी रखना चाहते है, ताकि EVM के माध्यम से पीएम एवं अन्य राजनैतिक पार्टियों के नेताओ की घड़ी दबाकर रखी जा सके। केंचुआ एवं सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से वे EVM को कंट्रोल करते है और EVM के माध्यम से नेताओं को। और पेड मीडिया के माध्यम से ही वे आपको यह पुड़िया देते है कि, पीएम EVM को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है !! जबकि सच यह है कि पीएम तो खुद EVM का विक्टिम है !! . वे अपनी सभी प्रायोजित पार्टियों को समय समय पर साँसे देकर एक संतुलन बनाकर रखते है। यदि PMP02 कंट्रोल से बाहर जाने लगेगी तो वे EVM का इस्तेमाल करके PMP03 का वोट शेयरिंग बढाने लगेंगे, और PMP03 उनके एजंडे से बाहर जायेगी तो फिर से PMP01 का वोटिंग काउंट बढ़ने लगेगा। 2023 तक पेड मीडिया का इस्तेमाल करके वे PMP03 को राष्ट्रिय स्तर पर स्थापित कर देंगे और तब PMP03 2024 के चुनावों में PMP02 के नेताओं के लिए किल स्विच का काम करेगी। . (b) EVM को हैक किया जा सकता है। यह दूसरी बकवास है जिसे पेड मीडिया द्वारा EVM मुद्दे की बैंड बजाने के लिए फैलाया गया है। सच्चाई यह है कि, EVM एक इलेक्ट्रोनिक डिवाइस है, और यह उसी के इशारों पर काम करती है, जिसने इसे प्रोग्राम किया हो। मतलब EVM को प्रोग्राम किया जा सकता है, किन्तु इसे हैक नहीं किया जा सकता . EVM की प्रोग्रामिंग केंचुआ करता है, अत: EVM ठीक उसी तरह से काम करेगी जिस तरह केंचुआ चाहेगा। उन्होंने प्रोग्रामिंग शब्द को साइड में करने के लिए हैकिंग शब्द को इस तरह से फैलाया जिससे लगे कि जिस तरह इंटरनेट में हैकिंग होती है, उसी तरह से EVM भी हैक हो सकती है। जो कि एक झूठी बात है। यह थ्योरी इसीलिए गढ़ी गयी ताकि इस तथ्य को चर्चा से बाहर रखा जा सके कि केंचुआ खुद ही EVM में वोटो की हेरा फेरी करता है, और केंचुआ के अलावा यह हेरा फेरी और कोई कर भी नहीं सकता। . (c) केंचुआ जब बुलाता है तो कोई EVM का कोई हैकर नहीं जाता। . केंचुआ न तो EVM खोलने देता है, और न ही इसका डिजाइन देता है। केंचुआ का स्टेंड रहता है कि EVM में प्रोग्राम मेरा रहेगा और तुम EVM को हैक करके दिखाओ !! चूंकि केंचुआ EVM को खोलने नहीं देता, अत: कोई भी इंजीनियर उसके चेलेंज में नहीं जाता है। और इंजीनियर्स को जादू आता नहीं है !! . इस वीडियो में सोफ्टवेयर इंजीनियर राहुल मेहता जी ने जन्तर मंतर पर पब्लिक डेमो में बताया है कि, EVM में केंचुआ कैसे धांधली करता है। कृपया वीडियो देखें - https://www.youtube.com/watch?v=jnazWH5715Q&fbclid=IwAR3odKoAuVCl7B1-lfSa0pjvMkxO7c5ew8ddS2rNY-wnHO3dxp5WP8YD08o . केंचुआ किस तरह EVM में वोटो की हेराफेरी करता है इस बारे में यह जवाब पढ़ें – Pawan Kumar Sharma का जवाब - ईवीएम मशीन के साथ वीवीपैट क्यों लगाई जाती है? . समाधान ? . (1) पेड मीडिया द्वारा इस तरह की फर्जी ख़बरें छापने एवं केंचुआ द्वारा इस तरह के झूठे एफिडेविट देने जैसी हरकतें रोकने के लिए जूरी कोर्ट की जरूरत है। अभी पेड मीडिया कुछ भी उल्टा पुल्टा छाप सकता है, क्योंकि उन्हें पता है कि कोई सजा तो होने वाली नहीं है। जूरी कोर्ट आने के बाद इस तरह के मामलो की सुनवाई नागरिको की जूरी करने लगेगी, अत: पेड मीडिया एवं केंचुआ इस तरह की हरकत करने का जोखिम नहीं उठाएंगे। . (2) हमें EVM केंसल करके बेलेट पेपर की तरफ लौट आना चाहिए। जब तक भारत में EVM शुरू रहेगी तब तक पीएम एवं सभी राजनैतिक पार्टियाँ पेड मीडिया के एजेंडे को आगे बढाने के लिए बाध्य है। यदि वे पेड मीडिया के एजेंडे को आगे नहीं बढ़ाएंगे तो पेड मीडिया EVM का इस्तेमाल करके उन्हें चुनाव हर देगा। . पेड मीडिया के प्रयोजको का एजेंडा क्या है, और कैसे वो भारत के पीएम को कंट्रोल करते है इस बारे में विस्तृत रूप से मैं फिर किसी जवाब में लिखूंगा। ————-
क्या भारत में पहले की तुलना में सांप्रदायिक तनाव ज्यादा बढ़ गए हैं और इसके क्या कारण हैं? . पेड मीडिया के प्रायोजक यानी अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार कम्पनियों के मालिक भारत में हिन्दू-मुस्लिम सिविल वॉर को ट्रिगर करना चाहते है, ताकि निम्नलिखित लक्ष्य पूरे किये जा सके : हिन्दुओ को ईरान में भारतीय सेना भेजने के लिए तैयार करना भारतीय मुस्लिमों को एक बार फिर अलग देश की मांग करने के लिए तैयार करना भारत में बड़े पैमाने पर कन्वर्जन करना . अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक उपरोक्त लक्ष्यों की पूर्ती के लिए पेड मीडिया पार्टियो, पेड मीडिया नेताओं, पेड बुद्धिजीवियों, पेड बॉलीवुड कलाकारों, पेड साहित्यकारों एवं पेड मीडिया कर्मियों का इस्तेमाल कर रहे है। निचे मैंने बताया है कि पेड मीडिया के प्रायोजक ऐसा कैसे कर रहे है, और किन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करके इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है। . [टिप्पणी : इस जवाब में 2 खंड है पहला खंड राजनैतिक घटनाओं एवं उनके आकलन पर निकाले गए निष्कर्ष पर आधारित है। दुसरे शब्दों में, खंड (अ ) में मेरे पूर्वाग्रहो, अनुभवो, अनुमानों एवं मेरी राय आदि का घालमेल है। खंड (ब ) औचित्यपूर्ण समाधान के बारे में बताता है।] . खंड : अ . (1) भारत में आजादी से पहले हिन्दू-मुस्लिम तनाव : . ब्रिटिश के आने से पहले भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच सामुदायिक स्तर पर तनाव काफी कम था। औरंगजेब के प्रारम्भिक काल में यह तनाव बढ़ा, लेकिन औरंगजेब के बाद तनाव फिर से कम हो गया था। . प्रत्येक समाज में भाषा, क्षेत्र, परम्पराएं, नस्ल, जाति, धर्म आदि के आधार पर कई छोटी मोटी दरारे होती है। जैसे जैसे दरारे चौड़ी होगी आपसी संघर्ष एवं अलगाव बढ़ता जाएगा। गोरो ने भारतीय समाज में जितनी भी दरारें थी, उन्हें चिन्हित किया और फिर इन दरारो को चौड़ा एवं गहरा करने के लिए गेजेट में क़ानून छापने शुरू किये। इसी में से एक दरार हिन्दू-मुस्लिम तनाव था। इसके लिए उन्होंने गाय, मुस्लिम प्रतिनिधित्व, एवं पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित नेताओं आदि का इस्तेमाल किया। . जिन्ना मुसलमानों का नेता नहीं था, और मुस्लिम उसे अपने पास भी नहीं बैठाते थे। गोरो ने पेड मीडिया का इस्तेमाल करके उसे मुस्लिम नेता के तौर पर स्थापित किया। उसका काम मुस्लिमों को अलग देश की मांग करने के लिए तैयार करना था। . संतुलन बनाने के लिए यही काम उस समय गोरो द्वारा समर्थित कट्टर हिन्दू नेता भी कर रहे थे। 25 साल तक चली एक्सरसाइज के बाद गोरे भारतीय उपमहाद्वीप को 3 हिस्सों में विभाजित करने में सफल रहे। जब गोरे भारत से गए तो यह सुनिश्चित करके गए थे जवाहर लाल जनसँख्या नियंत्रण का क़ानून नहीं छापेंगे, ताकि धार्मिक जनसँख्या का अनुपात असंतुलित हो सके। . (2) 1989 से साम्प्रदायिक राजनीती फिर से शुरू हुई : . 1947 से 1985 तक हिन्दू-मुस्लिम तनाव में मामूली घटत-बढ़त के बावजूद यह मुद्दा राजनीती से दूर रहा। लेकिन 1988 से जब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको ने भारत को टेकओवर करना शुरू किया तो पेड मीडिया का इस्तेमाल करके उन्होंने इसमें फिर से इंधन डालना शुरू किया। . अफगान-सोवियत वॉर के दौरान अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक पाकिस्तान के साथ मिलकर इस्लामिस्ट कट्टरपंथीयों को सोवियत रूस के खिलाफ बेकिंग दे रहे थे। 89 में वॉर ख़त्म होने के बाद इस्लामिक कट्टरपंथियों की कुछ तंजीमो को कश्मीर में रोजगार दे दिया गया। . सोवियत के उखड़ने से भारत में दूसरा ध्रुव ख़त्म हो गया था, अत: भारत के भी ज्यादातर नेताओं एवं पार्टियों ने अपने आप को टिकाए रखने और बढ़ाने के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों को जॉइन कर लिया था। अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने जब भारत में घुसना शुरू किया तो धार्मिक एजेंडे के तौर पर उन्हें भारत में हिन्दू-मुस्लिम अलगाव खड़ा करना था। इसके लिए उन्होंने ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाना शुरू किया, जो इसमें ईंधन डाल सके। . (2.1) कश्मीरी पंडितो का पलायन : कश्मीर में आजादी की तहरीक पहले से ही चल रही थी, लेकिन इस पर इस्लामिक कट्टरपंथियों का कब्ज़ा नहीं था। 1987 में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों एवं पकिस्तान की बेकिंग से इस मूवमेंट को इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हाईजेक कर लिया था। यह बात खुली हुयी थी कि हथियारबंद दस्तो द्वारा कश्मीरी पंडितो पर बड़े पैमाने पर हिंसक हमला होना तय है। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के निर्देश पर केंद्र सरकार ने ये सब कुछ होने दिया और जानबूझकर मिलिट्री नहीं भेजी। . इस समय केंद्र सरकार बीजेपी=संघ के समर्थन से चल रही थी। लेकिन न तो बीजेपी=संघ ने मिलिट्री भेजने की मांग रखी, और न ही कश्मीरी पंडितो के पलायन के बाद उन्होंने सरकार से अपना समर्थन वापिस लिया !! (?) . कश्मीरी पंडितो के पलायन ने पूरे देश को हिला दिया था। बीजेपी=संघ के नेताओं ने इस घटना का पूरे देश में व्यापक प्रचार किया ताकि पार्टी का विस्तार किया जा सके। और उन्होंने विस्तार किया भी। मैंने खुद भी संघ उन्ही दिनों जॉइन किया था और संघ की सभाओं में 1998 तक इस घटना को काफी हौलनाक तरीके से डिसकस किया जाता था। . (2.2) बांग्लादेशी घुसपैठ : 89 से सऊदी अरब के धनिकों ने बांग्लादेशीयों को असम में घुसने के लिए फाइनेंस करना शुरू किया। पहली आवक 71 के युद्ध में हुयी थी। 86 से फिर आवक शुरू हुयी और 90 से इसमें निरंतरता आने लगी। आई बी रिपोर्ट के अनुसार 2001 तक देश में 1.5 करोड़ अवैध बांग्लादेशी आ चुके थे। . (2.3) विवादित ढांचे को गिराना : 90 से 92 तक मंदिर आन्दोलन चला। यहाँ शुरू से ही यह लक्ष्य था कि ढाँचे=मस्जिद को गिराना है, ताकि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इसे उछाला जा सके। बीजेपी=संघ के नेताओं ने मस्जिद गिराने की प्लानिंग की और कोंग्रेस एवं अन्य पेड मीडिया पार्टियों ने इसके लिए रास्ता तैयार किया। . बीजेपी=संघ से लेकर केंद्र सरकार और सभी नेताओं को 6 महीने पहले से पता था कि एक सामूहिक भीड़ द्वारा ढाँचे=मस्जिद को गिराया जाएगा। वाजपेयी ने इसे अपनी सार्वजनिक सभाओं में इशारतन व्यक्त किया था। . वाजपेयी का एक वीडियो यह देखिये – https://www.youtube.com/watch?v=-EhMmJEwbTg . राव के पास कई सारे विकल्प थे जिनका इस्तेमाल करके वे शांतिपूर्ण तरीके से ढाँचे को गिराए जाने से रोक सकते थे। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों द्वारा उन्हें हस्तक्षेप न करने के निर्देश थे, अत: उन्होंने ठीक उसी तरह से टाइम पास किया, जैसे कश्मीरी पंडितो के समय वीपी सिंह सरकार ने किया था !! जिस दिन ढांचा गिराया गया उस दिन CRPF की टुकड़ी कुछ ही दूरी पर मौजूद थी और प्रधानमंत्री कार्यालय को लगातार मेसेज भेजे जा रहे थे, लेकिन उन्हें हर बार “इंतजार करने” के आदेश दिए गए। . Replug: How PM P.V. Narasimha Rao picked up the pieces after Babri demolition . As kar sevaks milled into Ayodhya and mocked at the massed but immobilised Central troops in Faizabad next door, half a dozen leftist MPs drove up to the Prime Minister's office in Delhi. In the gathering dusk, they made a last-minute appeal to P.V. Narasimha Rao to take control of Ayodhya because they suspected the real intentions of the sangh parivar. "Avert a disaster," pleaded the CPI(M)'s Somnath Chatterjee.The glum-visaged head of government listened patiently and explained what he had done and also the assurances the Kalyan Singh government gave the Supreme Court. The Sanskrit scholar narrated a sloka, which the delegation did not comprehend. For their benefit he translated: "For doing any work, seven steps have to be taken. One takes the first six steps and leaves the seventh to God. I have taken the six steps." Next day, the insensitive God to whom Rao left the seventh step did not oblige the devout believer in karma. जैसे ही कारसेवकों ने अयोध्या में घुसना शुरू किया तो कुछ ही दूरी पर सैन्य टुकड़ी मौजूद थी। आधा दर्जन कम्युनिस्ट सांसद प्रधानमंत्री के पास पहुंचे और उन्होंने आशंका व्यक्त की कि अनहोनी होने वाली है। राव ने धैर्य से उनकी बात सुनी और फिर उन्हें संस्कृत का एक श्लोक सुनाया। चूंकि सांसद इसका अर्थ नहीं समझ सके इसीलिए संस्कृत के विद्वान पीवी नरसिम्हा राव ने उसका सार समझाते हए कहा कि - किसी भी काम को करने के लिए सात कदम उठाने पड़ते है। आदमी 6 कदम उठाता है, और सातवें को भगवान पर छोड़ देता है। मैंने 6 कदम उठा लिए है !!" और अगले दिन, असंवेदनशील ईश्वर ने वह सातवां कदम उठाया जिसे उठाने का दायित्व राव ने कर्म में विश्वास करने वालो पर छोड़ दिया था। . रिटायर होने के बाद एक साक्षात्कार में यह पूछे जाने पर कि, क्या वे मानते है कि उनके अनिर्णय की वजह से बाबरी मस्जिद गिरायी गयी, राव ने जवाब दिया था कि – फैसला न लेना भी एक फैसला होता है !! . 7 दिसम्बर को अन्तराष्ट्रीय मीडिया एवं अंग्रेजी अखबारों में “बाबरी मस्जिद गिरायी गयी” रिपोर्ट किया गया था, जबकि ज्यादातर हिन्दी अखबारों ने “विवादित ढांचा ध्वस्त” नाम से हेडलाइन बनायी थी। मैंने उस समय हिन्दी के जो भी अख़बार पढ़े थे उनमे "विवादित ढाँचे" का ही इस्तेमाल किया गया था। किन्तु अंतराष्ट्रीय सनसनी बनाने के लिए अंग्रेजी अखबारों ने मस्जिद रिपोर्ट किया !! इन्डियन एक्सप्रेस ने भी “Disputed Site” का इस्तेमाल किया। लेकिन बाद में इसे सभी जगह पर मस्जिद लिखा जाने लगा। . न्यूयार्क टाइम्स ने खबर लगाईं – हिन्दू उग्रवादियों ने मस्जिद गिरायी Hindu Militants Destroy Mosque, Setting Off a New Crisis in India . The Hindu - Babri Masjid destroyed . Times of India - Kar sevaks destroy Babri Masjid . Hindustan Times - Babri Masjid demolished . Indian Express - Disputed structure pulled down . इस तरह की घटनाएँ सिर्फ तब अंजाम दी जा सकती है, जब अदालतें आपके हाथ में हो। भारत की अदालतें 47 से ही ब्रिटिश धनिकों के नियंत्रण में थी, लेकिन 91 में कॉल्जियम लाकर उन्होंने अदालतों को अपनी फौलादी पकड़ में ले लिया था। वस्तुत: इस आयोजन के किसी भी शिल्पकार को सजा नहीं हुयी। वाजपेयी को तो आरोपी तक नहीं बनाया गया। . ढांचा=मस्जिद ध्वस्त होने के बाद ISI ने दाउद को धमाके करने के लिए आवश्यक सहयोग दिया, और मुंबई में धमाके हुए। ( ISI अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के खिलाफ जाकर दाउद को सहयोग नहीं कर सकता था ) . वाजपेयी जनसँख्या नियंत्रण एवं बंगलादेशियो को निष्कासित करने का वादा करके सत्ता में आये थे। 1999 से 2004 तक वाजपेयी ने सरकार चलायी लेकिन उन्होंने ये 2 क़ानून गेजेट में नहीं छापे, और न ही इनका ड्राफ्ट सामने रखा !! . 2002 के गुजरात दंगो में मोदी साहेब की कोई नकारत्मक भूमिका नहीं थी। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पेड मीडिया के माध्यम से उन्हें “हीरो” बना दिया। मतलब इस बात को स्थापित किया गया कि दंगो के दौरान मोदी ने मुस्लिम विरोधी फैसले लिए थे !! (जो कि एक गलत आरोप था, एवं पेड मीडिया द्वारा उनकी छवि चमकाने के लिए बनाया गया था।) . 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह जी ने सरकार चलायी और उन्हें यह निर्देश थे कि, वे जनसँख्या नियंत्रण एवं बांग्लादेशियों को निष्कासित करने का क़ानून नहीं छापेंगे। अत: उन्होंने भी साइलेंटली 10 साल निकाल दिए ताकि समस्या पनपती रहे। . पेड मीडिया का समर्थन मिलने से 2014 में मोदी साहेब पीएम बने और फिर उन्होंने उपरोक्त 2 कानूनों को टालने के लिए 6 साल का टाइम पास किया। टाइम पास के अलावा उन्होंने भारत में सम्पूर्ण ध्रुवीकरण की प्रक्रिया भी शुरू की ताकि हिंसा की जमीन बनायी जा सके। . आज आप साफ़ तौर पर देख सकते है कि पूरे देश को पेड मीडिया के प्रायोजक 2 खेमो में बाँट चुके है। वो भी खुले तौर पर। एक झुण्ड में छद्म हिंदूवादी एवं छद्म राष्ट्रवादी है, दुसरे झुण्ड में छद्म सेकुलर, कथित टुकड़े टुकड़े गैंग, कथित अर्बन नक्सल, कथित वामपंथी आदि। और सभी "खुले तौर" पर खेमे खड़े करने का काम कर रहे है। . (3) कैसे अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भारत में हिन्दू-मुस्लिम गृह युद्ध शुरू कर सकते है ? . वे उसी ट्रेक का इस्तेमाल कर रहे है जिस ट्रेक का इस्तेमाल उन्होंने 47 में और 90 में कश्मीर पंडितो के निष्कासन में किया था। उनकी योजना दिए गये चरणों में काम कर रही है – . (3.1) पहले पेड मीडिया पार्टियों एवं नेताओं का इस्तेमाल करके वे तनाव भड़काएंगे . (3.2) फिर पेड मीडिया पार्टियों एवं पेड मीडिया नेताओं का इस्तेमाल करके दंगे करवाएंगे . (3.3) फिर आई टी सेल का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया पर भड़काऊ एवं फेक न्यूज फैलायेंगे इन सभी मामलो में न तो पुलिस कार्यवाही करेगी, न ही जज किसी को दंड देगा। उलटे पेड मीडिया एवं सोशल मीडिया पर उकसाने वाले इन लोगो को कवरेज दिया जाएगा, ताकि इससे ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुँचाया जा सके। यदि पुलिस एवं अदालतें सुधार दी गयी तो यह तीनो चरण रूक जायेंगे। अत: ये सब होता रहे इसके लिए वे पुलिस एवं अदालतें सुधारने का कानून नहीं छापेंगे। . (3.4) 2 करोड़ अवैध बंगलादेशीयों को देश में बनाये रखना, और कथित NRC की चाबी देकर हड़काना ताकि उन्हें हथियार उठाने के लिए तैयार किया जा सके। यह एक वास्तविक वजह है, जो भारत में हिन्दू-मुस्लिम गृह युद्ध को शुरू कर सकती है। अभी जो CAA को NRC से मिक्स करने का ड्रामा हुआ है उसका एक बड़ा उद्देश्य यह था कि असम NRC से बाहर रह गए अवैध बंगलादेशीयों को हथियार पकड़ने के लिए तैयार किया जा सके। इसीलिए असम के NRC में यह प्रावधान नहीं रखा गया कि जो अवैध बंगलादेशी NRC से बाहर रह जायेंगे, उन्हें भारत से कैसे निष्कासित किया जायेगा। तो NRC एवं CAA ने इन्हें भारत से निष्कासित नहीं किया है। दुसरे शब्दों में सरकार ने भारत के अंदर हथियार पकड़ने वालो की एक फ़ौज तैयार कर ली है। . (3.5) साम्प्रदायिक तनाव की इन सभी घटनाओं को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह रिपोर्ट किया जायेगा, जिससे यह स्थापित किया जा सके कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव लगातार बढ़ रहा है, और भारत में हिन्दू-मुस्लिम साथ नहीं रह सकते। वे पिछले 2-3 साल में इतना बारूद बिछा चुके है कि अब यदि वे असम में इस्लामिक कट्टरपंथियों को हथियार ( AK-47, ग्रेनेड आदि ) भेजना शुरु करे तो असम में बड़े पैमाने पर कत्ले आम होने लगेगा, और लाखो हिन्दू उसी तरह भारत की और पलायन करेंगे जैसे कश्मीरी पंडितो ने किया था। इस दौरान हजारो लोगो की जाने जा सकती है। इसके बाद वे भारत के अन्य राज्यों में भी हथियार भेजना शुरू करेंगे और पूरा देश चपेट में आ जाएगा। एक बार यह सब शुरू होने के बाद यह कई सालों तक रुकने वाला नहीं है। वे अलग अलग गुटों को हथियार भेजते रहेंगे और पेड मीडिया का इस्तेमाल करके दंगा भड़काते रहेंगे। . (4) क्या मोदी साहेब, आडवानी या योगी जी हिन्दू-मुस्लिम तनाव के लिए जिम्मेदार है ? . दरअसल, भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ाने का मसला अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के वैश्विक राजनैतिक लक्ष्यों एवं अपने कारोबारी हितो से जुड़ा हुआ है। पेड मीडिया के प्रायोजको की शक्ति का मूल स्त्रोत ऐसे निर्णायक हथियार है, जिन पर भारत की सेना बुरी तरह से निर्भर करती है। न्यायपालिका से लेकर सभी मुख्य संस्थाओं एवं प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, सोशल मीडिया तक में उनका अब निर्णायक दखल है। इसके अलावा सभी पेड मीडिया पार्टियाँ एवं नेता अपने को टिकाये रखने के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों पर बुरी तरह से निर्भर करते है। . संघ=बीजेपी के नेता यदि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के एजेंडे से बाहर जायेंगे तो वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करके उन्हें रिप्लेस कर देंगे। यह सब कुछ इस तरह से चलता है कि सभी पेड मीडिया पार्टियों एवं नेताओं में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का सहयोग लेने का एक तरह का कम्पीटीशन शुरू हो जाता है। जो नेता उनके एजेंडे को अच्छे तरीके से आगे धकेलेगा उसका मीडिया कवरेज बढ़ता जाएगा। . संघ 1925 से ही काम कर रहा है और उन्होंने 1951 में ही अपनी पार्टी का गठन कर लिया था। लेकिन संघ=बीजेपी को जब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पेड मीडिया का सपोर्ट देना शुरू किया सिर्फ तब उन्होंने तेजी से विस्तार करना शुरू किया। और वे नेता आगे निकल गए जो पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे को ज्यादा तेजी से आगे बढ़ा रहे थे। . यदि आडवाणी रथयात्रा नहीं निकालते तो वे मुरली मनोहर जी जोशी का कवरेज बढ़ा देते, और तब जोशी जी रथ यात्रा निकाल कर हीरो बन जाते। यदि मोदी साहेब गुजरात में अपने जेस्चर एंटी-मुस्लिम नहीं बनाकर रखते तो वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करके तोगड़िया जी / या संजीव जी जोशी से उन्हें रिप्लेस कर देते। . और आज भी यदि मोदी साहेब तनाव को भड़काने में कमतर प्रदर्शन करने लगते है तो अमित शाह एवं योगी का कवरेज बढ़ता जाएगा, और हिंदूवादी कार्यकर्ताओ को यह शुबहा होने लगेगा कि पीएम तो अमित शाह या योगी जैसे आदमी को होना चाहिए। और इसी तरह यदि औवेसी बंधू अपने बयानों में इंधन नहीं डालेंगे तो टीवी पर उनके इंटरव्यू आने बंद हो जायेंगे। . मतलब, 1990 के बाद से सभी पेड मीडिया पार्टियों के नेताओं के कद वगेरह को सबसे ज्यादा पेड मीडिया के प्रायोजक प्रभावित करते है। नेताओ की स्थिति टायरो की तरह है, और पेड मीडिया हवा भरने वाला पम्प है। पेड मीडिया प्रायोजको द्वारा लांच की गयी आम आदमी पार्टी इसका एक बढ़िया उदाहरण है। . मेरा बिंदु यह है कि, मोदी साहेब, अमित शाह, योगी जी, ओवेसी, वारिस पठान, ममता, मुलायम आदि निर्णायक रूप से भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव भड़काने के लिए जिम्मेदार नहीं है। वे एक तरह से WWE के पहलवान है जो अपना पार्ट अदा कर रहे है। . यदि उन्हें रिंग में रहना है तो रिंग के नियमों का पालन करना होता है। टीवी-अख़बार एवं सोशल मीडिया आई टी सेल आदि वो रिंग है जिसके माध्यम से नागरिको को राजनीती दिखायी जाती है। यदि पहलवान नियमों से बाहर जाएगा तो पेड मीडिया के प्रायोजक उसे रिंग से आउट कर देंगे, और नया पहलवान उतार देंगे !! . कुछ उदाहरण जिनसे आप समझ सकते है कि, पेड मीडिया के प्रायोजक किस तरह से नेताओं का कद बढ़ाने में सहयोग करते है : मुख्यमंत्री पद : भारत के नागरिक सिर्फ विधायक को चुनते है, किन्तु उनके पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है जिससे वे यह बता सके कि किस व्यक्ति को वे मुख्यमंत्री बनाना चाहते है। तो चुनाव होने के बाद पेड मीडिया के प्रायोजक विधायको को खरीद लेते है, और अपने आदमी को मुख्यमंत्री बनवा देते है। चूंकि मुख्यमंत्री के सभी दावेदार जानते है कि पेड मीडिया के प्रायोजको का सहयोग मिलने से उनके सीएम बनने की सम्भावना बढ़ जायेगी अत: उनमे पेड मीडिया के प्रायोजको को खुश करने की होड़ शुरू हो जाती है। एक उदाहरण आप योगी जी का देख सकते है। यूपी के चुनावी नतीजे आने के बाद मोदी साहेब ने योगी जी को रोकने की काफी कोशिश की थी। वे किसी और को यूपी का सीएम बनाना चाहते थे, ताकि उन्हें आगे कम्पीटीशन की सामना नहीं करना पड़े। किन्तु अंतिम समय पर पेड मीडिया के प्रायोजको ने योगी का समर्थन किया और योगी जी सीएम बने। मंत्री पद : पेड मीडिया के प्रायोजक विधायको को मीडिया कवरेज देकर उनका कद बढ़ा देते है। जैसे टीवी पर उनके बार बार इंटरव्यू आदि। मीडिया कवरेज बढ़ने से आम विधायक / सांसद का कद शेष विधायको से ज्यादा हो जाता है, और उन्हें मंत्री बना दिया जाता है। मतलब जनता किसी व्यक्ति को सिर्फ विधायक एवं सांसद बना सकती है, किन्तु मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बना सकती। अत: विधायक एवं सांसद चुनाव जीतने के अगले दिन से ही पेड मीडिया के प्रायोजको यानी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने लगते है। ठीक वैसे ही जैसे गोरो के शासन काल में भारत के देशी राजाओं एवं बुद्धिजीवियों में वायसराय की निगाहों में आने के लिए प्रतिस्पर्धा रहती थी। उदाहरण के लिए, स्मृति जी ईरानी लगातार चुनाव हारती रही, किन्तु चूंकि उन्हें पेड मीडिया लगातार कवरेज दे रहा था अत: उनका कद बढ़ता गया और उन्हें राज्य सभा से भेजकर सीधे मंत्री पद दिए गए। और इसी तरह उन्होंने मनमोहन सिंह को सीधे पीएम के पद पर इंस्टाल किया !! टिकेट वितरण : भारत की सभी पार्टियों के स्ट्रक्चर ऐसा है कि स्थानीय कार्यकर्ताओ के पास उम्मीदवारों को तय करने के लिए वोटिंग राइट्स नहीं है। इस वजह से विधायक / सांसद टिकेट लेने के लिए पेड मीडिया के प्रायोजको के दफ्तरों में चक्कर लगाते रहते है। उन्हें भय रहता है कि यदि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक नाराज हो गए तो वे आलाकमान से कहकर उनका टिकेट काट देंगे। प्रधानमंत्री पद : प्रधानमन्त्री जैसे पद पर जाने के लिए पेड मीडिया की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। सिर्फ साल भर में वे किसी मुख्यमंत्री या मंत्री स्तर के नेता में पेड मीडिया के पम्प द्वारा इतनी हवा भर सकते है कि उसका कद पीएम के बराबर हो जाएगा। 2012 तक शिवराज सिंह एवं मोदी साहेब दोनों पीएम की रेस में बराबरी पर थे। किन्तु मोदी साहेब को पेड मीडिया ने बेतहाशा कवरेज देना शुरू किया और सिर्फ 6 महीने में मोदी साहेब के पक्ष में देश व्यापी लहर खड़ी हो गयी। इसी तरह अभी पिछले 1 वर्ष से उन्होंने अमित शाह को विस्फोटक मीडिया कवरेज देना शुरू किया है, जिससे उनका कद प्रधानमंत्री के बराबर हो गया है। . कृपया इस बात पर ध्यान दें, मेरा बिंदु यह नहीं है कि भारत के नेता वगेरह अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के एजेंट या गुलाम है। दरअसल, पेड मीडिया के प्रायोजक किसी नेता वगेरह को बाध्य नहीं करते कि वे उनके निर्देशों का पालन करें। किन्तु जो नेता उनके एजेंडे के खिलाफ काम करता है, वे उसे मीडिया कवरेज नहीं देते, लेकिन उस नेता को ज्यादा कवरेज देते है जो उनके एजेंडे को आगे बढाने के लिए संजीदगी से काम कर रहा है। . चूंकि पेड मीडिया के पास भारत का सबसे बड़ा वोट बैंक है, अत: जिन नेताओं को आगे बढ़ना होता है वे पेड मीडिया का सहयोग लेने के लिए खुद ही उनकी तरफ जाना शुरू कर देते है। और बदले में पेड मीडिया द्वारा इस तरह दर्शाया जाता है कि नेताजी कंट्रोल कर रहे है !! . यहाँ इस बात को समझना जरुरी है कि, इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि किसी नेता या व्यक्ति को नकारत्मक कवरेज दिया जा रहा है या सकारात्मक। असल में जो रिंग के नियमो का पालन नहीं करता उसे रिंग में उतारा ही नहीं जाता है। मतलब पेड मीडिया उनका फोटो तक नहीं दिखाएगा, इंटरव्यू तो बहुत आगे की बात है। . असल में पेड मीडिया पार्टियों के नेता उकसाऊ बयान इसीलिए दे रहे है क्योंकि उन्हें अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने आश्वस्त किया है कि जज उन्हें सजा नहीं देगा, और वे जो मर्जी सार्वजनिक रूप से बोल सकते है। टीवी चेनलो का इस्तेमाल भी वे इसी तरीके से कर रहे है। जो आदमी तमीज की बात करेगा ये लोग उसे टीवी पर नहीं लायेंगे। ये उस आदमी को टीवी पर लाते है जो इंधन डाले। और नेताओं को भी यह निर्देश दिए गए है कि यदि वे इंधन डालने वाले बयान देंगे तो उन्हें कवरेज दिया जाएगा। तो अब यह एक सिलसिला चल रहा है, जिस पर कोई नियंत्रण नहीं है। . एक उदाहरण अजमेर शरीफ के सदर दीवान सैयद जेनुल हुसैन चिश्ती का देखिये : . (a) जब धारा 370 ख़त्म की गयी तो इन्होने इसका समर्थन किया और मोदी-शाह को बधाई भेजी थी - Ajmer Sharif Dargah Dewan Hails Scrapping of Article 370, Congratulates Modi, Amit Shah . (b) उन्होंने इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को केंसल करने के मोदी साहेब के फैसले का भी समर्थन किया और कहा कि ट्रिपल तलाक शरियत के खिलाफ है – Triple talaq against Sharia, Muslims should refrain from eating cow meat: Dewan Ajmer Syed Zainul Abedin Ali Khan - Shafaqna India | Indian Shia News Agency . (c) उन्होंने मुस्लिमो से अपील की कि उन्हें हिन्दुओ की आस्था का सम्मान करते हुए गौ-मांस खाना छोड़ देना चाहिए। दीवान ने सार्वजनिक सभा में यह शपथ भी ली कि, अब से वे एवं उनका परिवार गौ-मांस का भक्षण नहीं करेंगे - Imam of Ajmer Dargah urges Muslims to give up beef to end ‘communal hatred’ in India . (d) उन्होंने प्रेस रिलीज जारी की कि, CAA से भारतीय मुस्लिमों को डरने की जरूरत नहीं है, और उन्हें इसका विरोध नहीं करना चाहिए - CAA, NRC not against Muslims: Ajmer dargah dewan | Jaipur News - Times of India . ( ओवेसी ने प्रतिक्रिया दी कि, अजमेर दरगाह का दीवान मुस्लिमो की आवाज नहीं है, और उनके बयान का कोई मतलब नहीं !! उन पर बयान बदलने का दबाव डाला गया और 5 दिन बाद सभी तरफ से प्रेशर बनने पर दरगाह के दीवान को अपना स्टेंड बदल दिया - Dargah Dewan takes U-turn on CAA | Ajmer News - Times of India) . मैं यहाँ ये रेखांकित कर रहा हूँ कि, चूंकि यह इमाम विष वमन नहीं कर रहा है, और हमेशा तनाव कम करने की बात करता है अत: आपने अब तक टीवी चेनल पर इस आदमी के इंटरव्यू नहीं देखें है। . यदि ये अपनी लाइन बदल देते है तो आप इन्हें भी पेड मीडिया में देखने लगेंगे, और या जब इन्हें पेड मीडिया कवरेज देने लगेगा तो ये भी अपनी लाइन बदल लेंगे !! . और इस बात पर ध्यान दें कि पेड रविश कुमार भी पेड मीडिया का अंग है, अत: वे भी ऐसे लोगो को ही टीवी पर लायेंगे जो इसमें इंधन डाल सके। फर्क यह है कि पेड रविश कुमार हिन्दू-मुस्लिम तनाव भड़काने का काम इतनी सफाई और सौम्यता से करते है कि आपको इसका एहसास नहीं होता। . और हिन्दू-मुस्लिम में ऐसे सैंकड़ो धार्मिक-राजनैतिक प्रतिनिधि है जो पेड मीडिया के एजेंडे को आगे नहीं बढ़ा रहे है, अत: आप उन्हें पेड मीडिया में नहीं देखते। इस तरह ज्यादातर नागरिको के पास हमेशा एक तरफ़ा सूचनाए होती है, और तब पेड मीडिया करोड़ो लोगो में यह कॉमन नोलेज बना पाता है कि, भारत के सभी मुसलमान CAA, NRC का विरोध कर रहे है !! और फिर अपने चारो तरफ आप इसी नेरेटिव की जुगाली देखते है !! . दरअसल वे पेड मीडिया के माध्यम से कुछ 500-700 राजनेताओं, अभिनेताओं, इमामों, धर्म गुरुओ, बुद्धिजीवियों का इस्तेमाल करके 135 करोड़ के प्रतिनिधित्व का शोशा खड़ा कर देते है। पूरा देश इन्हें देखता है, और पेड मीडिया से फीडिंग लेने वाले लोग इसी लाइन को पकड़ कर सोशल मीडिया पर भी यही सब लिखते है। . इस तरह पेड मीडिया पर बनाये गए माहौल का रिफ्लेक्शन सोशल मीडिया पर भी आ जाता है। क्योंकि जो लोग सोशल मीडिया पर लिखते-बोलते है वे भी “अपनी राय” बनाने के लिए पेड मीडिया द्वारा दी गयी सूचनाओं पर निर्भर है। . (4) अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भारत में सिविल वॉर क्यों शुरू करना चाहते है ? . अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक ईरान को ख़त्म करने में भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहते है। यदि आज ईरान एवं अमेरिका में युद्ध होता है तो ऐसी कोई वजह नहीं कि हम अमेरिका को अपनी सैनिक एवं जमीन का इस्तेमाल करने दे। ज्यादातर नागरिक कहेंगे कि हमारी ईरान से कोई दुश्मनी नहीं है, अत: ईरान Vs अमेरिका के युद्ध से हमें कोई लेना देना भी नहीं है। . किन्तु यदि भारत में हिन्दू-मुस्लिम सिविल वॉर शुरू हो जाता है तो अमेरिका भारत को आसानी से युद्ध में घसीट सकता है। वैसी हालत में अमेरिका के फेवर में दो स्थितियां उत्पन्न होगी : जब भारत में हिन्दू-मुस्लिम वॉर शुरू होगा तो अमेरिका ईरान पर हमला करेगा और तब भारतीय हिन्दू ईरान के खिलाफ अपनी सेना भेजने को तैयार हो जायेंगे। तब अमेरिका भारत का इस्तेमाल करके ईरान+चीन को ख़तम कर सकता है। गृह युद्ध शुरू होने पर सभी इस्लामिक मुल्क एंटी-इंडिया हो जायेंगे और ज्यादातर सम्भावना है कि इस्लामिक देश भारत पर हमला करें। भारत इस स्थिति से अकेले निपट नहीं सकता। अत: अब अमेरिका भारत को “बचाने” आयेगा। और फिर भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल करके पहले इस्लामिक देशो को ख़तम करेगा और फिर भारत का अधिग्रहण कर लेगा। . 2013 में रिकालिस्ट राहुल चिमनभाई मेहता ने अपने एक लेख में यह सम्भावना व्यक्त की थी कि जब अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो उसके ठीक 6 महीने पहले मोदी साहेब एक के बाद एक एंटी-इस्लामिस्ट क़ानून छापना शुरू करेंगे। Narendra Modi vs the Dynasty: Contrasting Ideas of India 2013 में लिखे गए पोस्ट का स्क्रीन शॉट : . हिन्दी अनुवाद : अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक मोदी साहेब के सामने 3 शर्तें रखेंगे : बीजेपी में छद्म सेकुलर, एंटी नेशनल, एंटी हिन्दू, एंटी स्वदेशी, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के समर्थक एवं मिशनरीज के समर्थको को टिकेट देना जब अमेरिका ईरान पर हमला करना तय करे तो हमले के 6 महीने पहले एंटी-इस्लामिस्ट आयटम जैसे – धारा 370, यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (TTT etc), राम जन्म भूमि देवालय आदि को लागू करना, अन्यथा नहीं। भारत में मिशनरीज को विस्तार करने देना यदि मोदी साहेब ये शर्ते मान लेते है तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक आम आदमी पार्टी के कवरेज में कटौती कर देंगे, वरना नहीं। . खंड अ का सार : इस खंड में मैंने हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ने का कारण बताया है, जो कि मेरे अनुमान पर आधारित है। किसी अन्य व्यक्ति का अनुमान इस बारे में अलग हो सकता है। मेरा मानना है कि, भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ना अमेरिकी-ब्रिटिश हितों के अनुकूल है। और यदि यह उनके हितो के अनुकूल है तो उनके पास ये वास्तविक ताकत है कि वे भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव घटा बढ़ा सके और अपनी जरूरत के अनुसार भारत के 3–4 टुकड़े कर सके। . भारत सरकार की ख़ुफ़िया एजेंसिया एवं असम के मुख्यमंत्री 2014 से यह रिपोर्ट कर रहे है कि अल कायदा+आईएसआई असम में अपने कैम्प चला रहे है और पाकिस्तान बांग्लादेशियों एवं रोहिंग्यो को बंदूक बनाना सिखाने के लिए मदद कर रहा है। . ISI, Al Qaeda plan to repeat 1990s Kashmir in Assam - The Sunday Guardian Live . Al Qaeda trying to set up base in Assam: Chief Minister Tarun Gogoi . मतलब मेरे मानने में यदि वे ऐसा चाहते है तो उनके पास यह करने की क्षमता है, और पेड मीडिया में नजर आने वाला भारत का कोई नेता एवं कोई भी पार्टी उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकती। दरअसल वे उनके हितो की दिशा में ही काम करेंगे !! . अगले खंड में मैंने समाधान बताया है, जिसका ऊपर दिए गए खंड से कोई लेना देना नहीं है। इस समस्या की वजह जो भी हो निचे दी गयी इबारतें समाधान कर देगी। मतलब, यदि आपको लगता है कि - यह सारा तनाव पेड रविश कुमार, वारिस पठान, ओवेसी आदि फैला रहे है तो भी इसका समाधान हो जाएगा, और यदि आपको लगता है कि मोदी-योगी-शाह इसके लिए जिम्मेदार है, तो भी इस समस्या का समाधान हो जाएगा। . खंड ब ; समाधान . (1) कौनसी इबारते गेजेट में छापकर हिन्दू-मुस्लिम तनाव को कम किया जा सकता है ? . ऊपर मैंने जो भी विवरण दिए है उनमें कुछ तथ्य एवं कुछ मेरी धारणाएं शामिल है। अत: आप इसे खारिज कर सकते है। कारण जो भी रहे हो किन्तु यह एक सच्चाई है कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव लगातार बढ़ रहा है, और यदि इसे रोका नहीं गया तो भारत में हालात हिंसक हो सकते है। निचे मैंने 4 क़ानून बताए है, जिन्हें गेजेट में छापने से हिन्दू-मुस्लिम तनाव को रोका जा सकता है। . (1.1) जूरी कोर्ट : जजों की भूमिका यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण है। पिछले 30 साल में आप नोटिस करें कि भ्रष्ट जजों ने हिन्दू-मुस्लिम तनाव भड़काने के लिए उकसाऊ बयान देने वाले कितने नेताओं को सजा दी है — शून्य !! और पिछले 30 साल में हुए किसी भी प्रकार के दंगे में कितने लोगो को सजा हुयी है – लगभग शून्य !! . इसके अलावा हर आदमी को भी यह छूट दे दी है कि वह जो मर्जी हो वैसे अलगाव वादी, उकसाने वाले, हिंसा भडकाने वाले वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल सकता है। तो इधर से भी उन्होंने दड़बा खोल दिया है। मतलब हम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे है, सिर्फ एक ट्रिगर से यह विस्फोट होने शुरू हो जायेंगे। और इसमें निर्णायक मोड़ तब आएगा जब वे हथियार भेजना शुरू करेंगे। . मेरे विचार में अदालतें सुधारने का क़ानून सबसे ज्यादा जरुरी है, और यह क़ानून हमें तत्काल चाहिए। अदालतें सुधारने के लिए मेरे 2 प्रस्ताव है : जूरी कोर्ट की स्थापना और जजों पर वोट वापसी। . जूरी कोर्ट के गेजेट में आने से अगले दिन ही उकसाने और इंधन डालने के इस पूरे सर्कस का अंत हो जाएगा। यदि हमें हिन्दू-मुस्लिम तनाव को तत्काल कम करना है तो यह सबसे जरुरी क़ानून है। जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून के गेजेट में आने कैसे एकदम से हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ना रुक जाएगा इस बारे में अधिक जानकारी के लिए यह जवाब पढ़ें – . विशेष आग्रह : जिन लोगो के पास पुलिस एवं अदालतें सुधारने के लिए बेहतर क़ानून है वे कृपया मुझे सूचित करें। यदि उनके प्रस्ताव बेहतर हुए तो मैं उनके प्रस्तावों का समर्थन
धनवापसी पासबूक क्या है? इससे कैसे देश की गरीबी खत्म हो जाएगी? . धन वापसी पासबुक एक प्रस्तावित क़ानून है जो भारत के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने के लिए लिखा गया है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य खनिजो का राष्ट्रीयकरण करके इसे भारतीय नागरिको की संपत्ति घोषित करना है, ताकि भारत की रीढ़ की हड्डी टूटने से बचाया जा सके। इसका एक स्वत: प्रभाव यह भी होगा कि भुखमरी दूर होगी, और एक सीमा तक गरीबी में भी कमी आएगी। . ( गरीबी दूर करने के लिए धनवापसी के अलावा हमें पुलिस-अदालतें एवं टेक्स के क़ानून दुरुस्त करने के लिए जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर लागू करने की भी जरूरत है, ताकि बड़े पैमाने पर छोटे एवं मझौले स्तर के कारखाने लगने का रास्ता साफ़ हो सके। ) . (1) खनिजो की लूट से क्या आशय है ? . पिछले 400 वर्षो से खनिज ऐसा क्षेत्र में जिसमें भ्रष्टाचार कम और सीधी लूट ज्यादा है। खनिजो को लूटने वाला वर्ग इतना ज्यादा ताकतवर है कि इस लूट में छोटी मछलियों के आने की कोई गुंजाईश ही नहीं है। यहाँ लड़ाई सीधी शार्को के बीच है। उदारहण के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी खनिज लूटने के धंधे में थी। . पेड मीडिया के प्रायोजक यानी अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार निर्माता पिछले 400 सालों से यह कारोबार कर रहे है। पहले उन्होंने निर्णायक हथियार बनाए और फिर उन्होंने माइनिंग कंपनियां भी खोली। आज भी खनन के बहुत सारे ऐसे क्षेत्र में जिसमें काफी आधुनिक मशीनरी का इस्तेमाल होता है। और ये मशीने सिर्फ कुछ गिनी चुनी कंपनियों को ही बनानी आती है। माइनिंग से बड़े पैमाने पैसा वही बना सकता है, या खनिज वही लूट सकता है जिसके पास ये मशीनरी हो। . उदाहरण के लिए, तेल निकालने की तकनीक दुनिया में सिर्फ 25-30 कंपनियों के पास ही है। तो जिस कम्पनी को इन कम्पनियों के मालिक ये मशीनरी देते है, वही कम्पनी खनिज निकाल पाती है। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध कोयले, कच्चा तेल और स्टील के लिए लड़ा गया। खाड़ी युद्ध भी कच्चे तेल के लिए हुआ था। ब्रिटिश-फ्रांसिस संघर्ष का कारण भी खनिज थे। अभी ईरान पर भी जो युद्ध आने वाला है, वह भी खनिज (तेल) के लिए है। . डेमोक्रेसी आने से पहले तक पेड मीडिया की प्रायोजक (हथियार निर्माता) किसी देश के खनिज लूटने के लिए सीधे सेना का इस्तेमाल करते थे। डेमोक्रेसी आने के बाद वे पेड मीडिया एवं युद्ध की धमकी देकर पहले पीएम को कंट्रोल करते है और फिर कानूनी रूप से खनिज लूटते है। और जो पीएम खनिज बचाने के लिए जाएगा उसे अंततोगत्वा युद्ध में जाना पड़ेगा। कोई दया नहीं, कोई अपवाद नहीं !! दुसरे शब्दों में, खनिज को लेकर जो संघर्ष होता है, उसका निर्णय युद्ध से ही होता है। . तो पेड मीडिया के प्रयोजको से सारा टकराव खनिजो की लूट को लेकर ही है। उन्हें खनिज लूटने है सिर्फ इसीलिए वे इतने बड़े मीडिया का खर्चा उठाते है, और उठा पाते है। यदि वे मुफ्त के खनिज नहीं लूट पाएंगे तो पेड मीडिया का घाटा भी नहीं उठा पायेंगे। . उन्हें खनिज लूटने है इसीलिए वे राजनैतिक पार्टियों का खर्चा उठाते है, और उन्हें स्पोंसर करते है। उन्हें खनिज लूटने है इसीलिए उन्हें पीएम पर कंट्रोल चाहिए, जजों पर कंट्रोल चाहिए, पुलिस पर कंट्रोल चाहिए। उन्हें खनिज लूटने है, इसीलिए वे नागरिको को हथियार विहीन रखना चाहते है, और यह भी चाहते है कि अमुक देश अपने हथियारों का उत्पादन स्वयं न कर पाए। सार यह है कि सारी वैश्विक लड़ाई सिर्फ मुफ्त के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों को लेकर है। . स्टेंडर्ड ऑइल का उदाहरण देखिये। यह कम्पनी खनिज लूटने में अग्रणी कम्पनी रही है। ऑइल रिफायनिंग की इस कम्पनी को 1870 में रोकेफेलर ने बनाया था, और 1911 में इसे कई हिस्सों में विभाजित करके भंग कर दिया गया। 1910 तक दुनिया का 70% तेल यही कम्पनी खोद रही थी। आज भी दुनिया का 40% तेल इसी के कब्जे में है। हालांकि अब इस कम्पनी की सभी सबसिडरी कम्पनीयों को ट्रेक करने में आपको 2-3 घंटे गूगल करना पड़ेगा !! अम्बानी की रिफायनिंग स्टेंडर्ड ऑइल की सबसिड़री कम्पनी की मशीनों पर ही चलती है। और इसी तरह से ये कोयला, लोहा, ताम्बा से लेकर सभी महत्त्वपूर्ण खनिज खोदते है। Standard Oil - Wikipedia . और मझौले स्तर पर मित्तल, वेदांता, टाटा, जिंदल से लेकर अम्बानी, बिरला अडानी तक ऐसे कई कारोबारी है तो खनिजो की लूट के धंधे में है। . खनिजो की लूट इतने खुले तौर पर और इतनी सफाई से की जाती है, कि पूरे देश को मालूम ही नहीं होता कि किस पैमाने पर खनिज लूटे जा रहे है। पेड मीडिया इस बिंदु को टच ही नहीं करता। ज्यादा से ज्यादा वे स्थानीय स्तर पर हो रहे बजरी, पत्थर आदि चिल्लर किस्म के खनिजो का मुद्दा उठाते रहते है, ताकि बड़ी लूट को चर्चा से बाहर रखा जा सके। . 2019 में आवंटित की गयी कुछ कोयला खदानों का उदाहरण देखिये। निचे दिए गए आंकड़े भारत सरकार की अधिकृत वेबसाईट से लिए गए है — Coal Mine Allocation . 154 रू प्रति टन 156 रू प्रति टन 185 रू टन 230 रू प्रति टन 715 रू प्रति टन 755 रू प्रति टन 1100 रू प्रति टन 1230 रू प्रति टन 1674 रू प्रति टन . दरों में इस तरह की भिन्नता क्यों ? 154 रुपये से 1674 रुपये !! लगभग 11 बार !! एक वैध कारण यह है कि -- कोयले की गुणवत्ता में संभावित भिन्नता है। लेकिन यह एक मात्र कारण नहीं है। दूसरा और वास्तविक कारण यह है कि - कई मामलों में गठजोड़ बनाकर नीलामी की शर्तों को इस तरह से ड्राफ्ट किया जाता है ताकि लक्षित कम्पनी को चिल्लर दामों में माइनिंग राइट्स दिए जा सके। . इस कारण को समझने के लिए सलंग्न तस्वीर देखें — कोयला मंत्रालय की वेबसाईट बताती है कि, कोई भी बोली लगा सकता है, लेकिन साथ में उन्होंने यह शर्त भी जोड़ी है कि अंत में उनके पास स्टील या सीमेंट का संयंत्र होना चाहिए। . तो प्रत्येक "खुली नीलामी" में इन शर्तों के अलावा भी वे ऐसी कई शर्तें जोड़ते है, जो कहती है कि यदि आपके पास संयंत्र हो तो इसे अमुक खदान से अमुक दूरी पर ही होना चाहिए !! और अमुक संयंत्र को इतनी उतनी क्षमता का होना चाहिए। तो अंत में सिर्फ वे कुछ बड़े खिलाड़ी ही बोली लगा सकेंगे जिन्हें लाभ देने के लिए यह शर्त जोड़ी गयी थी !! तो इस तरह वे कार्टेल बनाते हैं और कीमतों को कम बनाए रखते है। इसके अलावा, माइनिंग ब्लॉक का आकार इतना बड़ा रखा जाता है कि छोटे खिलाड़ी इसमें प्रतिभागी न बन सके। . यदि हम क़ानून छापकर इस कार्टेल को तोड़ देते है तो ज्यादा प्रतिष्ठान बोली लगाने आयेंगे और हमें सभी खदानों के लिए 1600 रुपये प्रति टन के हिसाब से रॉयल्टी मिलेगी। धनवापसी पासबुक का क़ानून इसी तरह के गठजोड़ एवं कार्टेल बनाने की प्रक्रिया को तोड़ने के लिए लिखा गया है। . अभी यहाँ से भ्रष्टाचार शुरू हुआ है। अगले स्तर का भ्रष्टाचार और भी व्यापक है। वे जितना खनिज निकालते है, उसका सिर्फ 10-20% ही रॉयल्टी चुकाते है। राइट्स लेने के बाद ज्यादातर खनिज अवैध रूप से निकाल लिया जाता है। इसकी कहीं एंट्री नहीं होती, और इसीलिए उन्हें रॉयल्टी भी नहीं चुकानी पड़ती !! वे सीधे मंत्रियो / जजों आदि को हफ्ता पहुंचा देते है, और मंत्रियो का आदेश आने के बाद कोई खनिज अधिकारी उनकी माइंस को सुपरवाइज करने कभी नहीं जाता !! तो उन्हें जितने इलाके की माइंस मिलती है वे उससे 5 गुना ज्यादा अतिक्रमण करके खनिज निकालते है। . उदाहरण के लिए जिंदल को 2010 में भीलवाड़ा में माइंस आवंटित हुयी थी। और जिंदल ने सभी नियमों की धज्जियाँ उड़ा कर खनिज निकाले। माइंस से लगे हुए कस्बे (पुर) की हालत यह है कि वहां के नागरिको को कस्बे से पलायन करना पड़ा। लगभग 300-400 मकान इस हद तक क्षतिग्रस्त हो चुके है कि उन्हें अपने मकान छोड़कर अन्य जगहों पर किराए पर रहना पड़ रहा है। NGT takes Jindal Saw's Bhilwara unit to task for non-compliance | Jaipur News - Times of India . पिछले 7 साल से भीलवाड़ा में जिंदल को भगाने का अभियान चल रहा है। बार बार धरने, प्रदर्शन, जुलुस, ज्ञापन वगेरह होते है, किन्तु खनन जारी रहता है। सभी पेड मीडिया पार्टियों के नेता समय समय पर जिंदल के खिलाफ प्रदर्शन का ड्रामा करते रहते है। . ड्रामा इसीलिए क्योंकि पेड मीडिया पार्टियो के ये सभी नेता खनिजो की इस लूट को रोकने के लिए आवश्यक क़ानून का विरोध करते है। यदि पेड मीडिया पार्टियों के नेता धन वापसी पासबुक क़ानून को गेजेट में छापने की मांग करेंगे तो पहला नुकसान यह होगा कि पेड मीडिया इन्हें कवरेज देना बंद कर देगा, और दूसरा नुकसान यह होगा कि, जिंदल उन्हें चंदा / घूस देना बंद कर देगा। तो ड्राफ्ट विहीन मांग को लेकर जनहित याचिकाओ एवं हवाई विरोध प्रदर्शन के ड्रामें चलते रहते है। और भीलवाड़ा में समाधान को टालने के लिए समस्या उठाने का यह ड्रामा पिछले 7 वर्षो से चल रहा है !! . और भारत में इस तरह की हजारो ( हाँ, सैकड़ो नहीं हजारो) माइंस है, जहाँ इसी तरह की लूट चल रही है। इस लूट का कोई हिसाब-किताब लेखा जोखा नहीं। औसतन 100 रू के खनिज 20 रू में खोद लिए जाते है। तो यहाँ भ्रष्टाचार नहीं है, सीधी लूट है। . उदाहरण के लिए जब ब्रिटिश भारत से गए तो टाटा को कई सारे माइनिंग राइट्स फ्री में देकर गए थे, और उनमें से एक माइंस की खबर सामने आने में 70 साल लग गए। टाटा के पास झारखण्ड में 25 पैसे एकड़ के हिसाब से कोयला खोदने के राइट्स है !! मतलब वह साल का 1 रूपया चुकाता है, और मर्जी पड़े जितना कोयला निकालता है। आज तक भारत में एक भी प्रधानमंत्री की हिम्मत नहीं हुई कि वह टाटा को नोटिस भेजकर 25 पैसे की जगह 50 पैसे कर सके !! बाजार भाव की तो बात ही भूल जाइए !! ( बाजार भाव 1500 से 2000 रू टन है ) . सारी निर्माण इकाइयां, कारखाने, औद्योगिक विकास आदि कच्चे माल की सस्ती उपलब्धता पर निर्भर करता है। दुर्भाग्य से भारत में खनिजो की पहले से कमी है। इसी खनिज को लूटने के लिए ब्रिटिश-फ़्रांसिस साम्राज्य भारत में आये। जब भारत आजाद हुआ तो नागरिको ने यह मांग की थी कि भारत के प्राकृतिक संसाधनों को भारत के समस्त नागरिको की संपत्ति घोषित करो। किन्तु जिन लोगो के हाथ में सत्ता आयी थी वे नागरिको की इस संयुक्त संपत्ति को खुद के कब्जे में रखना चाहते थे। अत: उन्होंने इन संसाधनों को सरकारी अधिकार में ले लिया। . और आज सरकारे जो खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन लुटा रही है, वह भारत के समस्त नागरिक की संपत्ति है। यदि हमारे पूर्वजो ने अंग्रेजो से लोहा लेकर उन्हें यहाँ से नहीं भगाया होता तो यह संपत्ति बचती नहीं थी। . यदि भारत के नागरिक यह क़ानून लाने में सफल नहीं होते है तो जल्दी ही भारत के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन (प्राकृतिक संसाधन में जमीन स्पेक्ट्रम आदि भी शामिल है) लूट लिए जायेंगे। और यदि एक बार हमने प्राकृतिक संसाधन गँवा दिए तो भारत औद्योगिक विकास के लिए हमेशा के लिए परजीवी हो जाएगा। क्योंकि जो देश कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हो जाता है उसकी रीढ़ हमेशा के लिए टूट जाती है। धनवापसी क़ानून इस लूट को रोक देगा। . ———— . (2) समाधान - प्रस्तावित धनवापसी पासबुक . इस क़ानून का सार : इस प्रस्तावित क़ानून के गेजेट में छपने के तुरंत बाद भारत सरकार के नियंत्रण में मौजूद सभी खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन देश के नागरिको की संपत्ति घोषित हो जायेंगे, और देश के समस्त खनिज+स्पेक्ट्रम+सरकारी भूमि से प्राप्त होने वाली रॉयल्टी एवं किराया 135 करोड़ भारतीयों का संयुक्त खाता नामक बैंक एकाउंट में जमा होगा। इकट्ठा हुयी इस राशि का 65% हिस्सा हर महीने सभी भारतीयों में बराबर बांटा जाएगा और 35% हिस्सा सेना के खाते में जाएगा। . खनिजो की नीलामी करके पैसा इकठ्ठा करने वाला राष्ट्रिय खनिज रॉयल्टी अधिकारी धन वापसी पासबुक में दायरे में होगा और नागरिक पटवारी कार्यालय में जाकर उसे नौकरी से निकालने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकेंगे। यदि खनिज अधिकारी या उसके स्टाफ के खिलाफ घपला करने की या अन्य कोई शिकायत आती है तो सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति जज के पास न होकर आम नागरिको की जूरी के पास रहेगी। यह क़ानून देश की सभी खदानों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाता है। . इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नही है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। . (1) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक धनवापसी पासबुक मिलेगी। तब भारत की केंद्र सरकार को होने वाली खनिज रॉयल्टी, स्पेक्ट्रम रॉयल्टी और केंद्र सरकार द्वारा अधिगृहीत जमीनों के किराये से प्राप्त राशि का 65% हिस्सा भारत के नागरिकों में समान रूप से बांटा जायेगा, और हर महीने यह धनराशि सीधे आपके बैंक खाते में जमा होगी। शेष 35% हिस्से का उपयोग सिर्फ सेना में सुधार के लिए खर्च होगा। जब आप राशि प्राप्त करेंगे तो इसकी एंट्री धन वापसी पासबुक में आएगी। . (2) यह कानून ऐसा कोई वादा नहीं करता कि आपको प्रति महीने 500 रू या 1000 रू या कोई स्थिर राशि प्राप्त होगी। यदि खनिजों / स्पेक्ट्रम का या जमीनों का बाजार मूल्य बढ़ता है तो आमदनी और किराया बढ़ सकता है। लेकिन यदि खनिज आमदनी और किराया घटता है तो नागरिकों को हर महीने मिलने वाली यह राशि भी घटेगी। स्पष्टीकरण : खनिज रॉयल्टी के रूप में मिलने वाली यह राशि सरकार की तरफ से दिया गया अनुदान या सहायता नहीं है। चूंकि, देश के खनिज संसाधनों पर देश के सभी नागरिको का बराबर हक़ है अत: यह राशि सभी भारतीयों को बराबर मिलेगी, और सरकार गरीब-अमीर के आधार पर इसके वितरण पर ऐसा कोई नियम नहीं लगाएगी, जिससे गरीब आदमी को ज्यादा हिस्सा एवं अमीर आदमी कम पैसा मिले। किन्तु यदि प्रधानमंत्री प्रस्तावित टू चाइल्ड पालिसी क़ानून गेजेट में छाप देते है तो टू चाइल्ड पालिसी के ड्राफ्ट में दिए गए निर्देशों के अनुसार संतानों की संख्या के आधार पर नागरिको को प्रति माह प्राप्त होने वाली खनिज रोयल्टी में कटौती / बढ़ोतरी होगी। . (3) राष्ट्रीय सम्पत्तियों पर नागरिको के स्वामित्व की घोषणा : भारत के नागरिक देश की सभी खदानों, स्पेक्ट्रम, IIM अहमदाबाद को शामिल करते हुए सभी IIM के भू-खंडो, जेएनयू के भू-खंडो, यूजीसी द्वारा पोषित सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों जिनका स्वामित्व निजी कंपनियों या ट्रस्टो के पास नहीं है, के भू-खंडो को संयुक्त और समान रूप से भारतीय नागरिकों के स्वामित्व की संपत्ति घोषित करते है। अब से ये भू-खंड भारत की राज्य सरकार या भारत की केंद्र सरकार या किसी अन्य सरकारी पक्ष या निजी पक्ष की संपत्ति नहीं है। भारत के सभी अधिकारीयों, प्रधानमंत्री, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशो से विनती की जाती है कि, भारत के नागरिको के उपरोक्त फैसले के विरुद्ध कोई भी याचिका स्वीकार ना करे। . निम्नलिखित मंत्रालयों और विभागों के सभी भू-खंड राष्ट्रीय खनिज अधिकारी के क्षेत्राधिकार में आयेंगे : विज्ञान-चिकित्सा-गणित-इंजीनियरिंग को छोड़कर IIM, UGC द्वारा पोषित सभी विश्वविद्यालय व महाविद्यालय एयरपोर्ट, एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के स्वामित्व वाले सभी भवन पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय उपभोक्ता मामलें एवं लोक वितरण मंत्रालय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय लघु उद्योग एवं कृषि एवं ग्राम उद्योग मंत्रालय कपड़ा उद्योग मंत्रालय युवा मामलें और खेल मंत्रालय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ग्रामीण विकास मंत्रालय सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय शहरी विकास एवं गरीबी उपशमन मंत्रालय राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं नीति आयोग . (4) राष्ट्रीय खनिज रॉयल्टी अधिकारी का निजी व्यक्तियों, कंपनियों, ट्रस्टों, राज्य सरकारो एवं नगर/ जिला शासन के स्वामित्व वाले भू-खण्डों, सेना, न्यायालयों, जेलों, रेलवे, बस स्टेशनों, कक्षा 12 तक के सरकारी विद्यालयों और कर संग्रहण कार्यालयों द्वारा उपयोग में लिए जा रहे भू-खण्डों पर कोई अधिकार नहीं होगा। . (5) खनिज रॉयल्टी अधिकारी 1947 से पहले एवं बाद में लीज पर दी गयी सभी लीज शुदा खदानों की लीज का बाजार भाव से पुनर्मूल्यांकन करके तय करेगा कि क्या अमुक खदान की रॉयल्टी राशि बढ़ाई जानी चाहिए या नहीं। देश की अन्य सभी खदानों, कच्चे तेल के कुओ आदि से होने वाली आय भी NMRO प्राप्त करेगा। . #DhanVapsiPassbook का सारांश समाप्त . धनवापसी पासबुक का पूरा क़ानून यहाँ देखें - Facebook.com/pawan.jury/posts/2212549868863237
अमेरिका ने 1999 के कारगिल युद्ध में भारत को हराने के बाद, सभी भारतीय प्रधानमंत्रियों ने “परमिशन मिनिस्टर” बनने पर सहमति दे दी। और सभी भारतीय विपक्षी दलों (कांग्रेस, भाजपा, सीपीएम, आप) के शीर्ष नेताओं ने भी “परमिशन मांगने वाले सदस्य” बनने को स्वीकार कर लिया। . इस सच्चाई को छिपाने के लिए बिकाऊ लोगों को पैसे दिए गए थे। लेकिन सोशल मीडिया के कारण यह बात अब सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं तक पहुंच गई है। ---------------
प्रधानमंत्री एवं मंत्रियो पर वोट वापसी लागू करने का प्रस्ताव . (Vote Vapasi over Pm and Central ministers) . यह कानून प्रधानमंत्री एवं केन्द्रीय मंत्रियो को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के लिए लिखा गया है। इस कानून को लोकसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। #P20180436109 . यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो प्रधानमंत्री को एक पोस्टकार्ड भेजे। पोस्टकार्ड में यह लिखे : . प्रधानमंत्री जी, कृपया प्रधानमंत्री एवं केन्द्रीय मंत्रियो को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के आदेश जारी करें - #VoteVapasiPM , #VoteVapasiMinister . ------क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ----- . टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। नागरिक एवं अधिकारी टिप्पणियों का इस्तेमाल दिशा निर्देशों के लिए कर सकते है। . (01) यह कानून गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, वित्त मंत्री एवं नाभिकीय ऊर्जा मंत्री पर लागू नहीं होगा। . (02) इस कानून में "मंत्री" शब्द से आशय है, इस धारा (1) दिए गए 5 मंत्रालयों के अतिरिक्त केंद्र सरकार के अधीन आने वाले सभी मंत्रालयों के केन्द्रीय मंत्री। . (03) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर राज्य के प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। निम्नलिखित जनप्रतिनिधि इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे : प्रधानमंत्री धारा (1) में बताये गए 5 मंत्रियो को छोड़ते हुए केन्द्रीय सरकार अधीन सभी केन्द्रीय मंत्री . तब यदि आप प्रधानमंत्री या किसी केन्द्रीय मंत्री के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, और उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या अपनी स्वीकृति रद्द कर सकते है। आपकी स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है। . (04) प्रधानमंत्री एवं मंत्री बनने के इच्छुक व्यक्तियों द्वारा आवेदन : . 30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक यदि प्रधानमंत्री या केन्द्रीय मंत्री बनना चाहता है तो वह कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकता है। जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, और एफिडेविट को स्कैन करके प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा। . (05) मतदाताओ द्वारा स्वीकृति दर्ज करना : . (5.1) कोई भी नागरिक किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक या मतदाता पहचान पत्र के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है। . (5.2) स्वीकृति ( हाँ ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी . (5.3) यदि कोई मतदाता अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा । . (5.4) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा। . [ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके। . रेंज वोटिंग - प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Useless Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है।] . (06) प्रधानमंत्री की नियुक्ति एवं निष्कासन : . पदासीन प्रधानमंत्री निचे दी गयी दोनों परिस्थितियों में से अपनी पसंद के अनुसार उच्च संख्या को चुन सकते है – . नागरिको द्वारा दी गयी स्वीकृतियों की संख्या, अथवा प्रधानमंत्री का समर्थन करने वाले लोकसभा सांसदों को चुनाव में प्राप्त हुए मतों का कुल योग। . यदि किसी प्रत्याशी की स्वीकृतियों की संख्या पदासीन प्रधानमंत्री की स्वीकृतियों या प्रधानमंत्री का समर्थन करने वाले सांसदों को प्राप्त मतों की कुल संख्या से 1 करोड़ अधिक हो जाती है तो पदासीन प्रधानमंत्री अपना पद त्याग सकते हैं या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है, और सांसदों से सबसे अधिक अनुमोदन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को नया प्रधानमंत्री नियुक्त करने के लिए कह सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है। अथवा सांसद सबसे अधिक स्वीकृतियां प्राप्त करने वाले व्यक्ति को नया प्रधानमंत्री चुन सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है। . ---------- . [ स्पष्टीकरण : मान लीजिये कि, X मौजूदा पीएम है, और उसे लोकसभा में 300 सांसदों का समर्थन प्राप्त है। मान लीजिये कि, इन 300 सांसदों को लोकसभा चुनाव में कुल 33 करोड़ मत प्राप्त हुए थे, और X को नागरिको से सीधे प्राप्त होने वाली स्वीकृतियो की संख्या 30 करोड़ है। . (i) मान लीजिये कि Y पीएम का एक प्रत्याशी है और उसे 32 करोड़ नागरिक स्वीकृतियां दे देते है तो भी X पीएम बना रहेगा, क्योंकि X को जिन सांसदों का समर्थन प्राप्त है, उनके मतों का कुल योग 33 करोड़ है। किन्तु यदि Y को 34 करोड़ स्वीकृतियां मिल जाती है तो X अपना इस्तीफा दे सकता है, या नहीं भी दे सकता है। . (ii) अब मान लीजिये कि, Y को 34 करोड़ स्वीकृतियां मिल जाती है, किन्तु यदि X प्रधानमंत्री के रूप में संतोषप्रद काम कर रहा है, अत: X की स्वीकृतियां बढ़कर 35 करोड़ हो जाती है, तो भी X पीएम बना रहेगा। ] . ------------ . (07) केन्द्रीय मंत्रीयों की नियुक्ति एवं निष्कासन : . यदि किसी मंत्रालय के मंत्री पद के किसी प्रत्याशी को 30 करोड़ से अधिक स्वीकृतियां प्राप्त हो जाती है, और यदि यह स्वीकृतियां अमुक मंत्रालय के पदासीन मंत्री से 1 करोड़ अधिक भी है, तो प्रधानमंत्री मौजूदा मंत्री को निकाल कर सबसे अधिक स्वीकृति पाने वाले व्यक्ति को अमुक मंत्रालय में मंत्री नियुक्त कर सकते है, या नहीं भी कर सकते है। मंत्री की नियुक्ति के बारे में अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री का ही होगा। . (08) जनता की आवाज : . (8.1) यदि कोई मतदाता इस कानून में कोई परिवर्तन चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा। . (8.2) यदि कोई मतदाता धारा (8.1) के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा। . ======ड्राफ्ट का समापन=====
बंदूकधारी भारतीय समाज के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न . (1) यह क़ानून मेरे राज्य में कैसे लागू होगा ? . इस क़ानून की धारा (1) में जनमत संग्रह का प्रावधान दिया गया है। मुख्यमंत्री इस क़ानून पर हस्ताक्षर करके इसे गेजेट में निकालेंगे और गेजेट में आने के साथ ही इस पर जनमत संग्रह शुरू हो जाएगा। तब राज्य का कोई भी नागरिक चाहे तो पटवारी कार्यालय में जाकर या अपने रजिस्टर्ड मोबाइल द्वारा SMS भेजकर इस कानून पर अपनी हाँ दर्ज करवा सकता। यदि राज्य के कुल मतदाताओं के 55% नागरिक इस पर अपनी सहमती दर्ज करवा देते है, तब सिर्फ तब ही यह क़ानून राज्य में लागू होगा। जब तक 55% मतदाता इस पर अपनी सहमती दर्ज नहीं करते है, तब तक जनमत संग्रह जारी रहेगा। यदि किसी मतदाता ने इस क़ानून पर अपनी सहमती दर्ज करवा दी है, और वह अपनी सहमती रद्द करना चाहता है तो वह किसी भी दिन अपनी स्वीकृति को रद्द भी कर सकता है। इस तरह यह क़ानून नागरिको का स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने के बाद ही राज्य में लागू होगा अन्यथा नहीं। . (2) क्या मुख्यमंत्री यह क़ानून बिना जनमत संग्रह के लागू कर सकते है ? . यदि मुख्यमंत्री चाहे तो इस कानून की धारा 1 में से जनमत संग्रह का प्रावधान निकाल कर इसे सीधे अपने राज्य में लागू कर सकते है। मुख्यमंत्री चाहे तो बिना जनमत संग्रह के इस क़ानून को राज्य के कुछ या किसी एक जिले में भी लागू कर सकते है। किन्तु इस क़ानून ड्राफ्ट के लेखको का मानना है कि, यह क़ानून 55% नागरिको की स्पष्ट सहमती प्राप्त करने के बाद ही लागू किया जाना चाहिए अन्यथा नहीं। . (3) हमें इस क़ानून की जरूरत क्यों है ? . 3.1. बाह्य आक्रमण : हथियारबंद नागरिक समाज लोकतंत्र की जननी है। प्रत्येक नागरिक का शस्त्रधारी होना राज्य को इतनी शक्ति प्रदान कर देता है कि सेना के हारने के बावजूद वे खुद की एवं अपने राज्य की रक्षा कर पाते है। . (3.1.1) हिटलर ने स्विट्जर्लेंड पर हमला करने की योजना को इसीलिए स्थगित कर दिया था, क्योंकि तब सभी स्विस नागरिको के पास बंदूक थी। जब प्रत्येक नागरिक के पास बंदूक होती है तो इसे सेना द्वारा हराया नहीं जा सकता, और न ही राज्य पर पूरी तरह से कंट्रोल लिया जा सकता है। (3.1.2) प्रत्येक अफगान के पास बंदूक होने के कारण अमेरिका, ब्रिटेन और रूस भी कई वर्षो तक चली लड़ाइयो के बावजूद अफगानिस्तान पर कभी भी पूरी तरह से नियंत्रण नहीं बना सके। (3.1.3) विएतनाम अमेरिका से 20 वर्षो तक लड़ने में इसीलिए कामयाब रहा क्योंकि सेना के हारने के बाद यह युद्ध वहां के नागरिक लड़ रहे थे। सोवियत रूस ने नागरिको को हथियार भेजे और वे अपने देश की रक्षा कर पाए। (3.1.4) ब्रिटिश भारत पर 200 वर्षो तक इसीलिए शासन कर पाए क्योंकि भारत के नागरिक हथियार विहीन थे। गोरो के पास सिर्फ 1 लाख बंदूके थे, और इन 1 लाख बन्दूको के माध्यम से उन्होंने 60 करोड़ नागरिको पर शासन किया। यदि सिर्फ 1% यानी 60 लाख भारतीयों के पास बंदूक होती तो ब्रिटिश भारत को नियंत्रित नहीं कर पाते थे। . यदि आज भारत का चीन से युद्ध हो जाता है, और अमेरिका हमें हथियारों की मदद देने से इनकार कर देता, या हमें देरी से हथियार भेजता है, तो हथियारो के अभाव में ज्यादातर से भी ज्यादा सम्भावना है कि हमारी सेना रूपी दीवार दीवार टूट जायेगी। और एक बाद यदि हमारी सीमाओं में सेना घुस आती है तो नागरिको के पास प्रतिरोध करने के लिए कोई हथियार नहीं है। तब हमारी अवस्था ईराक जैसी हो जायेगी। ऐसे संभावित संकट से बचने के लिए यह क़ानून जरुरी है। . 3.2. आंतरिक आक्रमण : प्रत्येक नागरिक के पास बंदूक होने से आन्तरिक स्तर पर भी देश काफी हद तक सुरक्षित हो जाता है, और विभिन्न अपराधो में कमी आती है। . (3.2.1) कसाब दर्जनों नागरिको को इसीलिए मार सका था क्योंकि नागरिको के पास हथियार नहीं थे। यदि मुम्बई वासियों के पास बंदूक होती तो कसाब आता नहीं था, और आ भी जाता तो 5-7 लोगो से ज्यादा को नहीं मार पाता। और आगे भी यदि इस तरह के हमले बड़े पैमाने पर होने लगते है तो हमारे पास कोई उपाय नहीं है। . (3.2.2) सिर्फ 2000 हथियारबंद इस्लामिक आतंकियों के दस्ते ने 2 लाख कश्मीरी पंडितो को घाटी से खदेड़ दिया था। यदि कश्मीरी पंडितो के पास बंदूके होती थी, तो उन्हें कभी पलायन नहीं करना पड़ता था। . (3.2.3) 2012 में असम के कोकराझार में सिर्फ 4000 हथियारबंद मुस्लिम बांग्लादेशी घुसपेठियो ने हमला करके 2 लाख हिन्दु नागरिको को अपनी जमीन, संपत्ति आदि छोड़कर पलायन करने पर मजबूर कर दिया था। यदि सभी नागरिको के पास बंदूक होती तो उन्हें अपना घर बार छोड़कर भागना नहीं पड़ता।. (3.2.4) 1947 में विभाजन के दौरान भी 20 लाख हथियार विहीन हिन्दू नागरिको को अपनी जान-माल गंवाना पड़ा था। वजह यह थी कि सीधी कार्यवाही करने वाले पक्ष के पास हथियार थे, जबकि दुसरे पक्ष के नागरिक हथियार विहीन थे। चूंकि सिक्खों के पास हथियार थे, अत: वे कुछ हद तक इसका प्रतिरोध कर पाए। . (3.2.5) भारत में निरंतर चुनाव होने, जनता का लोकतंत्र में विश्वास होने और सैनिको का सरकार पर भरोसा होने के कारण अब तक कभी तख्ता पलट नहीं हुआ है। किन्तु कोई विदेशी ताकत जैसे अमेरिका आदि भारत में तख्ता पलट करवाना चाहे तो वे कुछ ही महीनो में गृह युद्ध छिडवाकर, आतंकवादी हमले करवाकर, असुरक्षा का भाव उत्पन्न करके एवं राजनैतिक विकल्प हीनता दर्शा कर ऐसे हालात पैदा कर सकते है कि जनरल तख्ता पलट कर सकता है। . (4) इस क़ानून के गेजेट में आने से क्या परिवर्तन आयेंगे ? . 4.1. नकारात्मक प्रभाव : प्रथम चरण में गन क्राइम जैसे क्रोध जनित हमले आदि में वृद्धि होगी और बन्दुक से होने वाली मौतों में इजाफा होगा। लेकिन जैसे जैसे प्रत्येक नागरिक के पास बन्दुक पहुंचेगी वैसे वैसे दुसरे चरण में इस हिंसा में थोड़ी कमी आने लगेगी। इस क़ानून में किसी व्यक्ति को बंदूक रखने की अनुमति देने का अधिकार नागरिको की जूरी को दिया गया है। अत: जूरी मंडल गन क्राइम करने वाले नागरिको को हथियारों से वंचित कर देगा, और अपराध में गिरावट आने लगेगी। यदि पुलिस प्रमुख को वोट वापसी पासबुक के दायरे में कर दिया जाता है तो पुलिस प्रमुख यह सुनिश्चित करेगा कि अपराधी बंदूक से वंचित बने रहे। . 4.2. सकारात्मक प्रभाव : . (4.2.1) नक्सलवाद एवं संगठित अपराध की समस्या साल छह महीने में लगभग 70% तक कम हो जायेगी . (4.2.2) बलात्कार , लूट , डकैती , अपहरण आदि अपराधो में लगभग 70% की गिरावट आएगी। . (4.2.3) कसाब जैसे आतंकी हमलो में कमी आ जायेगी। और हमले होते भी है तो कम जनहानि होगी। . (4.2.4) सांप्रदायिक तनाव, एवं दंगो से सम्बधित हिंसा में कमी आएगी। . (4.2.5) भारत को अमेरिका, चीन या पाकिस्तान से होने वाले युद्ध का सामना नहीं करना पड़ेगा। और तब भी युद्ध होता है और यदि हमारी सेना रुपी दीवार टूट जाती है तो दुश्मन सेना कभी हमारी भूमि का अधिग्रहण नहीं कर पाएगी। . (4.2.6) भारत में बंदूक निर्माण की तकनीक का विकास होगा और हम इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जायेंगे। . (4.2.7) सरकारी अधिकारियो / नेताओं के व्यवहार में सुधार आएगा और दमन में भी कमी आएगी। सुदूरवर्ती एवं रिमोट एरिया में पुलिस द्वारा किये जा रहे दमन में कमी आएगी। . (4.2.8) भारत में कभी भी अन्य देशो की तरह तख्ता पलट न हो सकेगा। . (4.2.9) किसी दुश्मन देश के हमले की स्थिति में देश टोटल लोस से बच जाएगा। . तो हमारे विचार में, प्रत्येक नागरिक को बन्दुक देना ऐसा क़ानून नहीं है जिससे सारे लाभ ही हो। इससे कई आयामों में देश को फायदे होंगे, किन्तु एक आयाम में मामूली नुकसान भी होगा। सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्ष होने के कारण हमने इस क़ानून को सीधे लागू करने की जगह जनमत संग्रह कराने का प्रस्ताव किया है। . (5) बंदूके काफी महंगी है, लोग इन्हें खरीदेंगे कैसे ? . ब्रिटिश बंदूके देखकर भारतीय तकनीशियनों ने ऐसे डिजाइन का अविष्कार कर लिया था जो ब्रिटिश बन्दूको से बेहतर था। तब 1800 ई. में गोरो ने भारत के सभी बंदूक कारखानों का अधिग्रहण किया और बंदूक बनाने पर लाइसेंस नीति डाल दी। और लाइसेंस वे कभी देते नहीं थे। 1857 की क्रांति के बाद गोरो ने आर्म्स एक्ट बनाकर भारतीयों को हथियार धारण करने से भी प्रतिबंधित कर दिया था। इस कानून में बंदूक लगाने के कारखानों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया है, अत: बड़े पैमाने पर कारखाने लगना शुरू होंगे जिससे बेहतर एवं सस्ती बंदूके बनने लगेगी। . (6) क्या भारतीयों को बंदूक देने से वे एक दुसरे को मार नहीं देंगे ? . यह गलत धारणा पेड मीडिया द्वारा खड़ी की गयी है ताकि नागरिको को हथियार विहीन रखने के लिए कन्विंस किया जा सके। वे एक तरफ़ा एवं चयनात्मक सूचनाओ का इस्तेमाल करके यह भ्रम खड़ा करते है। जब बंदूक की वजह से किसी की जान जाती है तो इसे बड़े पैमाने पर कवरेज दिया जाता है, किन्तु उन घटनाओ को छिपा लिया जाता है जब बंदूको ने नागरिको की रक्षा की। बहुधा पेड मीडिया अपराध की वजह को गलत तरीके से बंदूक से जोड़ देता है, जबकि अपराध की मूल वजह भिन्न होती है। . उदाहरण के लिए, कर्नाटक के कूर्ग जिले में लगभग 80% नागरिको के पास बंदूके है, किन्तु वहां पर गन क्राइम रेट सबसे कम कम है। कर्नाटक भी भारत में ही है, और यदि भारतीयों को बंदूक देने से वे एक दुसरे को मार देंगे तो अब तक कूर्ग में लोगो ने एक दुसरो को मार क्यों नहीं दिया। यह एक वास्तविक उदाहरण है जो यह सिद्ध करता है कि - "भारतीयों को बंदूक रखने का अधिकार देने से वे एक दुसरे को मार देंगे" नामक धारणा पूरी तरह से झूठ है, और पेड मीडिया द्वारा भारतीयों के दिमाग में डाली गयी है। और ज्यादातर भारतीय इस धारणा के शिकार इसीलिए है क्योंकि पेड मीडिया इस सूचना को छिपाता है कि, कूर्ग जिले के 80% नागरिको के पास पंजीकृत बंदूके है !! और इसी तर्ज पर बंदूक के बारे में सही सूचना देने वाली कई खबरें छिपायी जाती है, और भ्रमित करने वाली खबरों को उछाला जाता है !! . (6.1) बंदूक नहीं रखने का अधिकार देने का मतलब है अपराधीयों को बंदूक रखने की छूट देना। क्योंकि कानून में नहीं मानने वाले लोग अवैध रूप से बंदूक ले आयेंगे और क़ानून में मानने वाले लोग क़ानून का पालन करने के कारण बंदूक रखने से वंचित हो जाते है। और इस तरह अपराधी प्रवृति के लोगो की शक्ति बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए दाउद या छोटा राजन जैसे लोगो ने बंदूके जुटाई और पूरी मुंबई को गन पॉइंट पर नाचने लगे। बंदूक के अलावा उनके पास कुछ नहीं था। यदि सभी मुंबई निवासियों के पास बंदूक होती तो दाउद की बढ़त ख़त्म हो जाती है, और वह इतना बड़ा गैंग खड़ा नहीं कर पाता। . (6.2) बंदूक अच्छी या बुरी नहीं होती, बल्कि इसे चलाने वाला व्यक्ति अच्छा या बुरा होता है। आप अपने घर-परिवार एवं मोहल्ले में देखिये कि कितने लोग अपराधी मानसिकता के है, और कितने लोग कानून में मानने वाले है। 99% लोग क़ानून में मानने वाले होते है। और जब क़ानून में मानने वाले लोगो के हाथ में बंदूक जाती है तो यह अपराध नहीं करती, बल्कि अपराधियो से रक्षा करती है। . (6.3) यह एक तथ्य है कि अपराध गैर कानूनी बन्दूको से होते है, वैध बन्दूको से नहीं। यदि व्यक्ति के पास वैध बंदूक होगी तो वह उनसे अपराध नहीं कर पायेगा। यदि वह रजिस्टर्ड बंदूक से अपराध करता है तो तुरंत पकड़ा जाएगा। . (6.4) दूसरा सबसे बड़ा खतरा* जिसका हम सामना कर रहे है : हमारे विचार में, अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भारत में हिन्दू मुस्लिम गृह युद्ध शुरू करना चाहते है। इसके लिए वे उसी ट्रेक का इस्तेमाल कर रहे है जिसका इस्तेमाल उन्होंने 1947 में और 1990 में कश्मीर पंडितो के निष्कासन में किया था। और इसके लिए वे पेड मीडिया पार्टियों और पेड मीडिया नेताओं का इस्तेमाल करके लगातार तनाव भड़का रहे है। . 2 करोड़ अवैध बंगलादेशीयों का देश में बने रहना एक वास्तविक वजह है, जो भारत में हिन्दू-मुस्लिम गृह युद्ध को शुरू कर सकतीहै। CAA को NRC से मिक्स करके भ्रम फ़ैलाने का एक उद्देश्य यह था कि असम NRC से बाहर रह गए अवैध बंगलादेशीयों को हथियार पकड़ने के लिए तैयार किया जा सके। इसीलिए असम के NRC में यह प्रावधान नहीं रखा गया कि जो अवैध बंगलादेशी NRC से बाहर रह जायेंगे, उन्हें भारत से कैसे निष्कासित किया जायेगा। अब यदि वे असम में रोहिंग्यो, अवैध बंगलादेशी निवासियों, घुसपेठियो और कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों को हथियार (AK-47, ग्रेनेड आदि) भेजना शुरु करे तो असम में बड़े पैमाने पर कत्ले आम शुरू हो सकता है, और लाखो हिन्दू उसी तरह भारत की और पलायन करेंगे जैसे कश्मीरी पंडितो ने किया था। . इसके बाद वे भारत के अन्य राज्यों में भी हथियार भेजना शुरू कर सकते है, और पूरा देश चपेट में आ जाएगा। एक बार यह सब शुरू होने के बाद कई सालों तक रुकने वाला नहीं है। वे अलग अलग गुटों को हथियार भेजते रहेंगे और पेड मीडिया का इस्तेमाल करके दंगा भड़काते रहेंगे। यदि वे हथियार भेजना तय करते है तो प्रत्येक नागरिक को बंदूक दिए बिना उन्हें रोकने का हमारे पास अन्य कोई उपाय नहीं है। . (*) पहले नंबर का सबसे बड़ा खतरा यह है कि हमारी सेना आयातित हथियारों पर बुरी तरह से निर्भर है। . इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करवाने के लिए हम क्या सहयोग कर सकते है ? . 1. कृपया मुख्यमंत्री कार्यालय के पते पर पोस्टकार्ड लिखकर इस क़ानून की मांग करें। पोस्टकार्ड में यह लिखे - मुख्यमंत्री जी, कृपया बंदूक रखने के क़ानून पर जनमत संग्रह कराएं - # StateGunLawReferendum . 2. ऊपर दी गयी इबारत उसी तरफ लिखे जिस तरफ पता लिखा जाता है। पोस्टकार्ड भेजने से पहले पोस्टकार्ड की एक फोटो कॉपी करवा ले। यदि आपको पोस्टकार्ड नहीं मिल रहा है तो अंतर्देशीय पत्र ( inland letter ) भी भेज सकते है। . 3. प्रधानमन्त्री जी से मेरी मांग नाम से एक रजिस्टर बनाएं। लेटर बॉक्स में डालने से पहले पोस्टकार्ड की जो फोटो कॉपी आपने करवाई है उसे अपने रजिस्टर के पन्ने पर चिपका देवें। फिर जब भी आप पीएम / सीएम को किसी मांग की चिट्ठी भेजें तब इसकी फोटो कॉपी रजिस्टर के पन्नो पर चिपकाते रहे। इस तरह आपके पास भेजी गयी चिट्ठियों का रिकॉर्ड रहेगा। . 4. आप किसी भी दिन यह चिट्ठी भेज सकते है। किन्तु इस क़ानून ड्राफ्ट के लेखको का मानना है कि सभी नागरिको को यह चिठ्ठी महीने की एक निश्चित तारीख को और एक तय वक्त पर ही भेजनी चाहिए। . तय तारीख व तय वक्त पर ही क्यों ? . 4.1. यदि चिट्ठियां एक ही दिन भेजी जाती है तो इसका ज्यादा प्रभाव होगा, और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री कार्यालय को इन्हें गिनने में भी आसानी होगी। चूंकि नागरिक कर्तव्य दिवस 5 तारीख को पड़ता है अत: पूरे देश में सभी शहरो के लिए चिट्ठी भेजने के लिए महीने की 5 तारीख तय की गयी है। तो यदि आप चिट्ठी भेजते है तो 5 तारीख को ही भेजें। . 4.2. शाम को 5 बजे इसलिए ताकि पोस्ट ऑफिस के स्टाफ को इससे अतिरिक्त परेशानी न हो। अमूमन 3 से 5 बजे के बीच लेटर बॉक्स खाली कर लिए जाते है, अब मान लीजिये यदि किसी शहर से 100-200 नागरिक चिट्ठी डालते है तो उन्हें लेटर बॉक्स खाली मिलेगा, वर्ना भरे हुए लेटर बॉक्स में इतनी चिट्ठियां आ नहीं पाएगी जिससे पोस्ट ऑफिस व नागरिको को असुविधा होगी। . और इसके बाद पोस्ट मेन 6 बजे पोस्ट बॉक्स खाली कर सकता है, क्योंकि जल्दी ही वे जान जायेंगे कि पीएम को निर्देश भेजने वाले नागरिक 5-6 के बीच ही चिट्ठियां डालते है। इससे उन्हें इनकी छंटनी करने में अपना अतिरिक्त वक्त नहीं लगाना पड़ेगा। अत: यदि आप यह चिट्ठी भेजते है तो कृपया 5 बजे से 6 बजे के बीच ही लेटर बॉक्स में डाले। यदि आप 5 तारीख को चिट्ठी नहीं भेज पाते है तो फिर अगले महीने की 5 तारीख को भेजे। . 4.3. आप यह चिट्ठी किसी भी लेटर बॉक्स में डाल सकते है, किन्तु हमारे विचार में यथा संभव इसे शहर या कस्बे के हेड पोस्ट ऑफिस के बॉक्स में ही डाला जाना चाहिए। क्योंकि हेड पोस्ट ऑफिस का लेटर बॉक्स अपेक्षाकृत बड़ा होता है, और वहां से पोस्टमेन को चिट्ठियाँ निकालकर ले जाने में ज्यादा दूरी भी तय नहीं करनी पड़ती । . 5. यदि आप फेसबुक पर है तो प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री जी से मेरी मांग नाम से एक एल्बम बनाकर रजिस्टर पर चिपकाए गए पेज की फोटो इस एल्बम में रखें। . 6. यदि आप ट्विटर पर है तो प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री जी को रजिस्टर के पेज की फोटो के साथ यह ट्विट करें : . @Cmo.. , कृपया बंदूक रखने के क़ानून पर जनमत संग्रह कराएं - #StateGunLawReferendum . 7. Pm / Cm को चिट्ठी भेजने वाले नागरिक यदि आपसी संवाद के लिए कोई मीटिंग वगेरह करना चाहते है तो वे स्थानीय स्तर पर महीने के दुसरे रविवार यानी सेकेण्ड सन्डे को सांय 4 बजे मीटिंग कर सकते है। मीटिंग हमेशा सार्वजनिक स्थल पर रखी जानी चाहिए। इसके लिए आप कोई मंदिर या रेलवे-बस स्टेशन के परिसर आदि चुन सकते है। . 2nd Sunday के अतिरिक्त अन्य दिनों में कार्यकर्ता निजी स्थलों पर मीटिंग वगेरह रख सकते है, किन्तु महीने के द्वितीय रविवार की मीटिंग सार्वजनिक स्थल पर ही होगी। इस सार्वजनिक मीटिंग का समय भी अपरिवर्तनीय रहेगा। यदि कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर कोई रेली वगेरह करना चाहते है तो महीने के 4th Sunday को सांय 4 बजे रेली कर सकते है. . 8. अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी से प्रेरित यह एक विकेन्द्रित जन आन्दोलन है। (14) धाराओं का यह ड्राफ्ट ही इस आन्दोलन का नेता है। यदि आप भी यह मांग आगे बढ़ाना चाहते है तो अपने स्तर पर जो भी आप कर सकते है करें। यह कॉपी लेफ्ट प्रपत्र है, और आप इसकी बुकलेट अपने स्तर पर छपवाकर नागरिको में बाँट सकते है। . इस आन्दोलन के कार्यकर्ता धरने, प्रदर्शन, जाम, मजमे, जुलूस जैसे उन कदमों से बहुधा परहेज करते है जिससे नागरिको को परेशानी होकर समय-श्रम-धन की हानि होती हो। अपनी मांग को स्पष्ट रूप से लिखकर चिट्ठी भेजने से नागरिक अपनी कोई भी मांग Pm / Cm तक पहुंचा सकते है। इसके लिए नागरिको को न तो किसी नेता की जरूरत है और न ही मीडिया की। . ===========
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