Quotes by Sonu Kumar in Bitesapp read free

Sonu Kumar

Sonu Kumar

@sonukumai


रफाल जेट से भारत की कौन सी सैन्य कमी पूरी होगी?
·
भारत फाइटर प्लेन्स के इंजन नहीं बनाता, अत: हम अपनी सेना चलाने के लिए विदेशियों के लड़ाकू विमानो पर बुरी तरह से निर्भर है। इस स्थिति में हमारे पास 2 विकल्प बचते है :
.
हम गेजेट में वे आवश्यक क़ानून प्रकाशित करें जिससे हम फाइटर प्लेन बनाने की क्षमता जुटा सके
हम विदेशियों से लड़ाकू विमान ख़रीदे।
.
मैं बिंदु 1 में दिए गए विकल्प पर काम करने के मानता हूँ, और विदेशी हथियारों को खतरे के रूप में देखता हूँ। वजह यह है कि विदेशी हथियारों के कारण भारत की सेना युद्ध लड़ने के लिए विदेशियों पर निर्भर हो जाती है।
.
(1) 1967 की बात है, तब अमेरिका ने भारत को आने वाली गेंहू की सप्लाई को बाधित कर दिया था। भारत को यह गेंहू Public Law-480 के तहत आता था, और अमेरिका इसे बिना किसी वाजिब कारण के रोक नहीं सकता था। अत: उन्होंने परिवहन प्रक्रिया के झमेले डालकर इसकी सप्लाई तोड़ दी जिससे भारत में गेंहू की कमी हो गयी।
.
दरअसल, इस समय अमेरिका विएतनाम पर बम गिरा रहा था, और इंदिरा जी हनोई पर बमबारी करने की आलोचना की थी। और इंदिरा जी के इस बयान से अमेरिकी हथियार निर्माता नाराज हो गये थे !!.
.
जब इंदिरा जी ने कहा कि, भारत वही कह रहा है जो पोप एवं यूएन महासचिव कह रहे है, तो अमेरिका ने जवाब दिया कि –
लेकिन पोप एवं यूएन को अपने नागरिको को खिलाने के लिए हमारे गेंहू की जरूरत नहीं है !!
.
Public Law-480 के तहत भारत को ये गेंहू लेने के लिए रूपये में भुगतान करना होता था, डॉलर में नहीं। आज की तरह तब भी भारत के पास डॉलर नहीं थे। अत: भारत को अपमान का घूँट पीना पड़ा - Swallowing the humiliation
.
ध्यान देने वाली बात यह है कि, यदि तब यह खबर मीडिया में नहीं आती तो भारत को पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदा नहीं होना पड़ता। इस तरह पेड मीडिया किसी देश के प्रधानमंत्री को अपने देशवासियों और पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदा होने से बचा लेता है !!
.
पाकिस्तान को भी गेंहू अमेरिका ही देता था, और जब शिपयार्ड से गेंहू ऊँट गाड़ियों पर लादकर ले जाया जाता था, तो ऊँटो के गले में तख्तियां लटकायी जाती थी। इस तख्तियों पर बड़े अक्षरों में लिखा होता था – Thank you America !!
.
(2) भारत का चीन से युद्ध होता है तो हमें फाइटर प्लेन्स की जरूरत होगी। यदि डॉलर हो तो गेंहू ख़रीदे जा सकते है किन्तु फाइटर प्लेन्स नहीं। क्योंकि फाइटर प्लेन्स गेंहू नहीं है। रूस के अलावा सिर्फ अमेरिकी+ब्रिटिश+फ्रेंच को ही ये बनाने आते है। और ये तीनो देश (अमेरिका+ब्रिटिश+फ्रेंच) एक ही ब्लॉक है।
.
पेड मीडिया के प्रायोजको ने रफाल पर Thank you America & Thank you France की तख्ती न लटकाकर हमें सार्वजनिक शर्मिंदगी से बचा लिया है। और बदले में पेड मीडिया के प्रायोजक (अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच धनिक) हमसे इसकी बड़ी कीमत वसूल रहे है।
.
रफाल के साथ 3 समस्याएं है :
.
रफाल End Use Monitoring Agreement (EUMA) के साथ आया है : मतलब अमेरिकी-फ्रेंच हथियार निर्माता हमें किसी समय किसी देश पर इसके इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देते है तो हम इसका इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। उदाहरण के लिए जब एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान ने F-16 का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया था तो अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि वे F-16 का इस्तेमाल भारत पर न करें।
.
बस इसी तरह अमेरिकी-फ्रेंच किसी भी समय हमें रफाल का इस्तेमाल न करने के लिए कह सकते है। और फिर हम इनका इस्तेमाल नहीं कर पायेंगे। जब आपको हथियार चलाना हो तो निर्यातक से इसकी अनुमति लेनी होती है। संक्षेप में इसी को EUMA कहते है।
.
रफाल में kill Switch (KS) है : यदि कोई आयातक देश EUMA का उलंघन करता है तो निर्माता देश KS का इस्तेमाल करके हथियार को बंद कर देते है। और फिर रफाल काम नहीं करेगा !!
.
स्पेयर पार्ट्स पर निर्भरता : अगले चरण में वे रफाल के स्पेयर पार्ट्स भेजना बंद कर देंगे, और रफाल पार्किंग स्टेंड में खड़ा रहेगा और कभी उड़ान नहीं भर सकेगा !!
.
तो क्या होगा यदि भारत अमेरिकियों की बात नहीं मानता है, जैसे यदि पीएम सरकारी बैंको, रेल, सार्वजानिक उपक्रम आदि अमेरिकियों-फ्रेंच को बेचने से मना कर देता है, या अमेरिकियों को भारत में यूनिवर्सिटीज खोलने से रोक देता है, और अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच हथियार निर्माता पाकिस्तान को 200 रफाल और 500 F-16 दे देते है, और साथ ही अमेरिकी-फ्रेंच हमें स्पेयर पार्ट्स भेजना बंद कर देते है ?
.
जवाब आपको पता है। क्योंकि यदि अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच हथियार निर्माता हमें फाइटर प्लेन्स / स्पेयर देने से इनकार कर देते है, या विलम्ब से देते है तो हम बुरी तरह फंस जायेंगे।
.
किसी देश की सेना को नियंत्रित करने का यह सबसे अच्छा तरीका है – उनकी सेना में अपने फाइटर प्लेन्स, रडार, हैलिकोप्टर आदि इंस्टाल करो। और फिर आप अमुक देश को अपनी उँगलियों पर नचा सकते हो !! दुसरे शब्दों में, रफाल आने के बाद हमारी निर्भरता अमेरिकी-फ्रेंच हथियार निर्माताओं पर और भी बढ़ गयी है !! और इसीलिए हम अपनी राष्ट्रिय संपत्तियां और भी तेजी से खोने वाले है।
.
तो रफाल एक उन्नत विमान है, लेकिन यह भारत के लिए कितना उपयोगी बना रहेगा, इसका फैसला अमेरिकी-फ्रेंच तय करेंगे, हम नहीं !!
.
(3) समाधान :
.
जैसा कि आप पिछले कुछ दिनों से अपने आस पास देख ही रहे है कि बीजेपी-कोंग्रेस-आपा के शीर्ष नेता एवं उनके समर्थक ऊपर दी गयी समस्या को समस्या की तरह नहीं देखते है। इसीलिए वे EUMA , Kill Switch और Spare Parts की समस्या पर जानबूझकर खामोश है।
.
और वे इसे समस्या के रूप में इसीलिए नहीं देखते है, क्योंकि अभी तक पेड मीडिया ने उन्हें इसे समस्या के रूप में देखने के लिए नहीं कहा है !!
.
और ठीक है, अभी हमारे पास प्लेन्स नहीं है, और चीन हम पर चढ़ा हुआ है, अत: हम चाहे या न चाहे हमें अमेरिका या रूस में से किसी देश से तो तत्काल में फाइटर प्लेन्स लेने ही पड़ेंगे। तो इस स्थिति में रफाल खरीदने को लेकर मेरा विरोध नहीं।
.
लेकिन मेरा ऐतराज यह है कि, तब भी कोंग्रेस-बीजेपी-आम आदमी पार्टी के नेता एवं उनके समर्थक जानबुझकर उन आवश्यक कानूनों की चर्चा को क्यों टाल रहे है, जिन्हें लागू करके हम स्वदेशी हथियारों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर सके !! उलटे वे नागरिको में यह भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे है, कि रफाल के आने से भारत की सेना मजबूत हो गयी है।
.
और यह भ्रम फैलाने के लिए वे – सिर्फ इस बिंदु को बार बार रेखांकित करते है कि रफाल आने के कारण चीन का मुकाबला करने की हमारी क्षमता बढ़ गयी है, किन्तु वे इस बात को जानबूझकर छिपा रहे है कि, इसी के साथ हम अमेरिकी-फ्रेंच हथियार निर्माताओ पर और भी निर्भर हो गए है।
.
बहरहाल, यदि आप इसे समस्या के रूप में देखते है तो मेरे विचार में इसका समाधान प्रस्तावित वोइक (WOIC) क़ानून द्वारा किया जा सकता है। यदि वोइक एवं जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छाप दिया जाता है तो मेरा मानना है कि, भारत Made in India & Made by Indians की नीति पर चलते हुए अगले कुछ ही वर्षो में स्वदेशी तकनीक आधारित लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता जुटा लेगा।
.
EUMA , Kill Switch और Spare Parts की समस्या के बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है, कृपया इसे पढ़ें -
https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/860309497675462/
.
#WOIC , #JuryCourt
.
======

Read More

राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड के प्रस्तावित क़ानून की कुंजी
.
(1) यह क़ानून सरकार द्वारा हथियाये जा चुके सभी देवालयों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करता है।
.
(2) यह कानून सभी हिन्दूओ के लिए एक राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड (R.H.B.) नामक ट्रस्ट का गठन करेगा, जिसका प्रमुख हिन्दू संघ प्रधान कहलायेगा। हिन्दू संघ प्रधान वोट वापसी पासबुक के दायरे में होगा, और यदि आप उसके काम-काज से संतुष्ट नहीं है, तो वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर उसे निकालने और किसी अन्य व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकते है। आप अपनी स्वीकृति SMS, ATM या मोबाईल एप से भी दे सकेंगे।
.
(3) भारत के निम्नलिखित नागरिक हिन्दू बोर्ड के सदस्य हो सकेंगे :
.
उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी या सनातनी हिन्दू कहते है।
सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि पन्थो के अनुयायी भी यदि इस बोर्ड में जुड़ना चाहते है तो इसकी सदस्यता ले सकेंगे।
यह क़ानून इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, पर कोई दायित्व या प्रतिबन्ध नहीं लगाता। इन धर्मो के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे
[ टिप्पणी : यह क़ानून किसी भी प्रकार से उन नागरिको पर हिन्दू होने का लेबल नही लगाता जो स्वयं को हिन्दू नहीं कहते या हिन्दू नहीं कहलाना चाहते। उदाहरण के लिए यदि कोई जैन या सिक्ख पंथ का अनुयायी इसमें नामांकित होता है तो भी उसकी कानूनी-धार्मिक-सामाजिक पहचान प्रवृत कानूनों के अनुसार जैन / सिक्ख धर्म के अनुयायी के रूप में बनी रहेगी ]
.
(4) प्रधानमंत्री एक अधिसूचना जारी करके राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या का स्वामित्व हिन्दू बोर्ड को सौंपेंगे। इसके अलावा हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का भी प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है।
.
(5) यदि एवं जब भारत के सभी मतदाताओ में से 45 करोड़ मतदाता इसी कानून में दी गयी जनमत संग्रह प्रक्रिया का प्रयोग करते हुए निचे दिए 3 मंदिरो के भूखंड बोर्ड को सौंप देते है तो हिन्दू बोर्ड इन मंदिरों की देख रेख करेगा :
.
कृष्ण जन्म भूमि देवालय, मथुरा
काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी
अमरनाथ देवालय, कश्मीर
.
(6) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय सनातन संप्रदाय रजिस्ट्रार नामक अधिकारी की नियुक्ति करेंगे, जो उन सम्प्रदायों को लोकतांत्रिक रूप से प्रबंधित करने में व्यवस्थागत सहयोग करेगा जिनका उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप की सनातन संस्कृति है, तथा वे एक पंथ या सम्प्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त धार्मिक ट्रस्ट है। ऐसे धार्मिक सम्प्रदायों में जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि सभी भारतीय संप्रदाय शामिल है। रजिस्ट्रार का ट्रस्ट की धार्मिक मान्यताओ में कोई दखल नहीं होगा। सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है किन्तु यह पहले से SGPC द्वारा शासित है, अत: सिक्ख पंथ रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर रहेगा।
.
(7) यदि संघ प्रधान, राष्ट्रिय सनातन रजिस्ट्रार, उनके स्टाफ एवं नागरिको के मध्य कोई आपसी विवाद होता है, या किसी मंदिर धारण करने वाले ट्रस्ट आदि के बीच स्वामित्व का कोई मामला आता है तो मामले का निपटान हिन्दू बोर्ड की सदस्य सूची में दर्ज नागरिको की जूरी करेगी। यदि आपका नाम बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में है तो आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी में आकर आपको मामला सुनकर फैसला देना होगा। जूरी का गठन बोर्ड की मेम्बर लिस्ट से लॉटरी द्वारा किया जाएगा। मामले की प्रकृति अनुसार जूरी में 12 से 1500 तक नागरिक हो सकेंगे।
.
यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो Pm को एक पोस्टकार्ड / ट्विट भेजे – प्रधानमंत्री जी, कृपया हिन्दू बोर्ड गेजेट में छापे , #HinduBoard
.
हिन्दु बोर्ड का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक में देखें -- https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/2241776019273955
.
=====

Read More

राज्य जूरी कोर्ट के प्रस्तावित कानून की कुंजी
.
[ टिप्पणी : इस क़ानून को विधानसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री हस्ताक्षर करके इसे सीधे गेजेट में प्रकाशित कर सकते है। इस क़ानून में जहाँ पर “राज्य” लिखा है वहां आप अपने राज्य का नाम लिख सकते है। ]
.
(1) यदि आपका नाम राज्य की वोटर लिस्ट में है तो यह कानून पास होने के बाद आपको निचे दिए अपराधो के मुकदमे सुनने के लिए जूरी ड्यूटी पर बुलाया जा सकता है। जूरी ड्यूटी में आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों व दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत सबूत देखकर बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई का फैसला देना होगा। मामले की गंभीरता देखते हुए जूरी मंडल में 15 से 1500 तक सदस्य होंगे :
.
हत्या, हत्या के प्रयास, मारपीट, हिंसा, जान लेवा धमकी, किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक मानव मृत्यु, Sc-St Act के मामले
अपहरण, बलात्कार, छेड़छाड़, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, महिला का पीछा करना, दहेज़, घरेलू हिंसा, डिवोर्स।
सार्वजनिक प्रसारण जिनमें सभी प्रकार के दृश्य, श्रव्य, इलेक्ट्रोनिक माध्यम जैसे - फ़िल्में, टीवी, समाचार पत्र, पुस्तकें, फेसबुक, यू ट्यूब आदि शामिल है - से सम्बंधित सभी प्रकार के मामले व आपत्तियां।
किरायेदार-मकान मालिक विवाद, 2 करोड़ से कम मूल्य की प्रोपर्टी के विवाद। मृत्यु भोज की शिकायतें ।
.
(2) जूरी सदस्यों की आयु 25 से 50 वर्ष के बीच होगी और जूरी का गठन मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा किया जाएगा। प्रत्येक मुकदमे की सुनवाई के लिए अलग से जूरी होगी, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी।
.
(3) प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। जूरी द्वारा दिए गए निर्णय को जज द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। यदि जज जूरी के फैसले को खारिज या संशोधित करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है।
.
(4) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। जिला स्तर के निम्न 8 अधिकारी इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे :
.
जिला पुलिस प्रमुख
जिला शिक्षा अधिकारी
जिला चिकित्सा अधिकारी
जिला निदेशक अभियोजन
जूरी प्रशासक
जिला जज
राज्य सूचना आयुक्त
जिला मिलावट रोक अधिकारी
.
यदि आप उपरोक्त किसी अधिकारी के काम से संतुष्ट नहीं है और उसे निकालकर अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या स्वीकृति रद्द कर सकते है।
.
---------
यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो CM को एक पोस्टकार्ड / ट्विट भेजे -- मुख्यमंत्री जी, राज्य जूरी कोर्ट गेजेट में छापें - #StateJuryCourt
.
पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें - https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/2298624793589077
.

Read More

*नमस्कार साथियों*
यह पोस्ट उन सभी कार्यकर्ताओं के लिए है जो यह सोचते है कि हमको वोट वापसी कानून के बारे में जानकारी मिल गई है, लेकिन ये लागू कैसे होंगे ? ये लागू कब तक होंगे?
हम इन कानूनों के ड्राफ्ट को अपने स्तर पर लागू करवाने के लिए क्या प्रयास कर सकते हैं?

इस तरह के भारत में हजारों कार्यकर्ता हैं जिनको इन कानून की जानकारी मिल चुकी है और RRP पार्टी का उद्देश्य भी समझ गये है, लेकिन अब वह यह सोचते है कि कोई महापुरुष आएगा, कोई देवता पुरुष आएगा कोई अवतार होगा ,कोई टीवी पर आने वाला हीरो आएगा और इन अच्छे कानून को लागू करवा देगा लेकिन आप सभी कार्यकर्ता साथियों से मैं एक सच्चाई बता देना चाहता हूं कि जो भी नेता लोग देश के प्रमुख टीवी चैनलों पर रोजाना आते हैं जिनकी फिल्में आप देखते है, जिनके भाषण टीवी पर चलते रहते है, जिनको मीडिया मे लाइव दिखाया जाता है, जिनको विश्व स्तर की संस्थाएं पुरस्कार देती है जिनकी पुस्तके लाखो लोग पढ़ते है जो मीडिया मे बड़ी-बड़ी हस्तियां है "वह सभी लोग इन वोट वापसी समूह द्वारा प्रस्तावित किए गए कानून के खिलाफ है और वह कभी नहीं चाहते कि यह कानून भारत में लागू हो" , क्योकि वे लोग नही चाहते जनता सशक्त बन जाए क्योकि उनका लूट तंत्र फिर बंद हो जायेगा

आप इस तरह के लोगो के पीछे आस लगाकर बैठे रहना छोड़ दीजिए कि यह लोग अच्छे कानून लागू करके दे देंगे l

यह कानून लागू करवाने के लिए हम सभी को अपने स्तर पर प्रयास करने होंगे, यह बहुत छोटे-छोटे प्रयास है आप सप्ताह में 2 घंटे का समय निकालकर भी इन कानून की मांग पूरे भारत में करवा सकते हैं और अकेले ही काम शुरू कर सकते हैं l

मैं देखता हूं कि बहुत सारे कार्यकर्ता है यह कहते हैं कि जब 100 लोगों का समूह बन जाएगा तो हम काम शुरू करेंगे फिर प्रचार शुरू करेंगे लेकिन वह 100 लोगों के समूह की शुरुआत भी एक कार्यकर्ता से ही होगी तो जो पहले अकेला इनका प्रचार शुरू कर देगा वह निश्चित रूप से लीडर बन जाएगा और वह सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा तो मैं सभी कार्यकर्ताओं से निवेदन करूंगा वह सभी अपने स्तर पर कार्य शुरू करें l

ऐसे 50 से ज्यादा तरीके हैं जिनसे आप इन कानूनों का प्रचार नागरिकों में अकेले ही कर सकते हैं मैने उन तरीकों के बारे में अलग-अलग समय सोशल मीडिया पर जानकारी भी दी है और मैने खुद भी उन तरीकों का उपयोग करके इन कानून का प्रचार किया है l

मैंने जिस एल्बम में यह पोस्ट रखी है उस एल्बम की अन्य पोस्ट देखकर भी आप समझ सकते हैं कि इन कानून का प्रचार हम अपने स्तर पर कैसे कर सकते हैं सबसे पहले आप इन कानूनो के प्रचार से पूर्व जो इन कानूनो के प्रस्तावित ड्राफ्ट है| उनको एक बार पूरा पढ़िए

मेनिफेस्टो वोट वापसी धन वापसी पुस्तक भाग 1 वोट वापसी धन वापसी पुस्तक भाग 2 इन दोनों को पूरा जरूर पढ़िए और जिस भी कार्यकर्ता को आप जानते हैं या जो आपके मित्र है उन्हें भी इन्हें पढने के लिए तैयार करें उसके बाद अन्य तरीकों से आप इनका प्रचार शुरू करें और जो भी कानून आपको पसंद है उसके लिए हर महीने मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री को पोस्टकार्ड के माध्यम से लिखित निर्देश भेजना जरूर जारी रखें "जिस प्रकार उदरपूर्ति के लिए खाना खाते हैं इस प्रकार देश की समस्याओं के समाधान में सहयोग करने के लिए इन कानून का प्रचार लगातार करना पड़ेगा" तभी इन कानून की मांग खड़ी होगी और राजवर्ग इन कानूनों को हमारे द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट को लागू करने के लिए तैयार होगा l

महावीर प्रसाद कुमावत, भीलवाड़ा जिला, राजस्थान

संपर्क : 09887742837

-----------
https://www.facebook.com/share/p/184CzZy8HK/
आपके किसी भी तरह के प्रश्न है तो इस पोस्ट पर जाकर कमेंट कर सकते हैं l
..

Read More

राइट टू रिकॉल पार्टी और राघव चड्ढा की आम आदमी पार्टी के Right To Recall कानून ड्राफ्ट प्रक्रिया में क्या क्या फर्क है, और इनके द्वारा बताया गया रिकॉल प्रक्रिया कितने दिनों में शुरू होगा?
------------------------ जानने के लिए पूरा पोस्ट पढ़ें↓

(01) Right to Recall Party के कानून में Recall प्रक्रिया: चुनाव के बाद 7 दिन में शुरू होगा।

Raghav Chaddhas के कानून में Recall प्रक्रिया: 1.5 साल में! इन डेढ़ साल में कई कई गलत कानूनों को MLA/MP'S अपनी पार्टी अध्यक्ष के दबाव/लालच के कारण समर्थन कर सकता हैं। इससे जनता का नुकसान होगा!
.
(02) कितने लोग रिकॉल की प्रक्रिया की "शुरुआत" कर सकते हैं?

Right to Recall Party का Recall प्रक्रिया में: केवल 1 वोटर से शुरुआत हो सकता है।

आम आदमी पार्टी के - Raghav Chaddhas के Recall प्रक्रिया में: लोकसभा या विधानसभा के 35 से 40% वोटर,से हीं होगा! जिसके अभाव में रिकॉल शुरू हीं नहीं होगा! इससे जनता का नुकसान होगा।
.
(03) रिकॉल कैसे करेंगे ?

Right to Recall Party: पंजीकृत (रजिस्टर्ड) मोबाइल से sms, app द्वारा (घर बैठे) या सरकारी ऑफिस में जाकर रिकॉल को स्वीकृति देकर वोट वापसी पासबुक में दर्ज करा सकेंगे।

Raghav Chaddhas Recall : सरकारी ऑफिस में जाकर हस्ताक्षर करना होगा जिसके सैंपल उनके पास न होने पर सरकारी अधिकारी, आपके हस्ताक्षर को नकार सकता है।
.
(04) क्या कोई रसीद मिलेगी ?

Right to Recall Party : वोट वापसी पासबुक— जो की हर वोटर को मिलेगी, में वोटर रिकॉल की स्वीकृति दर्ज की जाएगी। यह वोट वापसी पासबुक रसीद के समान होगी।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : नहीं, जिसके अभाव में आपकी रिकॉल की स्वीकृति को नकारा जा सकता है, जिससे रिकॉल के स्वीकृतियों के नंबर घटेंगे। डुप्लीकेट साइन करके स्वीकृतियों की संख्या बहुत बढ़ाई भी जा सकती है। इससे जनता का नुकसान होगा।
.
(05) क्या रिकॉल की स्वीकृतियां तुरंत सार्वजनिक होंगी?

Right to Recall Party : हाँ, सभी स्वीकृतियां वोट वापसी पासबुक में रजिस्टर्ड होंगी। स्वीकृतियां सार्वजनिक होने से उनमें उलट फेर नहीं किया जा सकेगा।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : नहीं, स्वीकृतियां सार्वजनिक नहीं होने से स्वीकृतियों के संख्या में उलट फेर संभव होगा।
.
(06) कानून में बदलाव कैसे होगा?

Right to Recall Party: 51% नागरिक इस कानून की कोई भी धारा संसद से निकलवा या जुड़वा सकेंगे।

Raghav Chaddhas Recall : केवल संसद हीं बदलाव कर सकते हैं!! इससे जनता का नुकसान होगा।
.
(07) स्वीकृतियों की संख्या कितनी होगी?

Right to Recall Party : MLA/MP को जितने वोट मिले हैं, उससे 1% (कुल वोटरों का) अधिक।

Raghav Chaddhas Recall : कुल वोटरों का 35 से 40%। अगर MP/MLA 25% वोट से जीते हों तो भी 35 से 40% लोगों की स्वीकृतियां चाहिए। रिकॉल बहुत कठिन होगा।
.
(08) क्या पिटीशन वेरिफाई करनी होगी?

Right to Recall Party : वोट वापसी पासबुक की प्रक्रिया में कोई (petition) जांच की आवश्यकता नहीं होगी। स्वीकृतियों की संख्या, नाम के साथ हर हफ्ते सार्वजनिक होंगी।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : सरकारी अधिकारी हस्ताक्षर और संख्या की जांच करेगा जिसमें नागरिकों का समय खराब होगा, भ्रष्टाचार होगा और रिकॉल टाला जाएगा। जनता का नुकसान होगा।
.
(09) क्या पिटीशन के बाद MLA/MP निकाले जाएंगे?

Right to Recall Party : Petition की जरूरत नहीं। रिकॉल की प्रक्रिया के बाद MP/MLA निकाले जाएंगे।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : Petition के बाद 51% वोटर वोट करके निकालने के लिए हां कहेंगे, फिर MLA/MP निकाले जाएंगे। तो फिर पिटीशन क्यों चाहिए? क्योंकि जनता का नुकसान करना है!
.
(10) रिकॉल का आधार क्या होना चाहिए?

Right to Recall Party : जनता को ठीक लगेगा तो रिकॉल कर लेगी।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : रिकॉल का आधार "सिद्ध" (proven) कदाचार, भ्रष्टाचार, हेराफेरी, गंभीर रूप से काम ना करना होना चाहिए? यह कौन तय करेगा ? कैसे होगा यह राघव जी ने बताया ही नहीं। क्योंकि जनता को मामू बनाना है!
.
(11) क्या कोई रिकॉल संभव होगा?

Right to Recall Party : नागरिक कोई भी खर्च, जोखिम, परेशानी के बगैर भ्रष्ट MLA MP की कुर्सी से बदल सकेंगे।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : 18 महीने तक कोई रिकॉल नहीं, फिर 35 से 40% नागरिकों की हस्ताक्षर की हुई पिटीशन की जांच होगी!, फिर 51% वोटर की हामी के बाद के रिकॉल होगा?। यह सब के रहते केवल हस्ताक्षर के नाम पर वसूली, भ्रष्टाचार, जाति, धर्म के नाम पर सर फोड़ना होगा। जनता का बहुत नुकसान होगा।
.
(12) जिन देशों में यह रिकॉल है वहां क्या स्थिति है ?

Right to Recall Party: अमेरिका के California राज्य में और बाकी देशों में भी ऐसे पॉजिटिव रिकॉल से वहां अच्छे से चल रहा है। इस प्रक्रिया स्थिरता आती है और भ्रष्टाचार में बहुत कमी आती है।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : Peru, Bolivia, Equador यहां पर हजारों Petition file होते रहते हैं और भयंकर अस्थिरता होती है। इस प्रक्रिया का परिणाम अस्थिरता और हजारों की संख्या में पिटीशन फाइलिंग है। जनता का बहुत नुकसान होता है!
.
(13) क्या भारत में पहले से कहीं रिकॉल लागू है?

Right to Recall Party के जैसे ड्राफ्ट वाला Right To Recall कानून: यह प्रक्रिया भारत में कहीं भी लागू नहीं है।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : ऐसी ही प्रक्रिया 10 राज्यों में अलग-अलग समय पर केवल सरपंच पर लागू हुई है। 1994 से लेकर 2025 तक, केवल 2 हीं सरपंच, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश में रिकॉल हुए हैं।

To be continued....

Read More

राइट टू रिकॉल पार्टी और राघव चड्ढा की आम आदमी पार्टी के Right To Recall कानून में क्या क्या फर्क है, और इनके द्वारा बताया गया रिकॉल प्रक्रिया कितने दिनों में शुरू होगा?
------------------------ जानने के लिए पूरा पोस्ट पढ़ें↓

(01) Right to Recall Party के कानून में Recall प्रक्रिया: चुनाव के बाद 7 दिन में शुरू होगा।

Raghav Chaddhas के कानून में Recall प्रक्रिया: 1.5 साल में! इन डेढ़ साल में कई कई गलत कानूनों को MLA/MP'S अपनी पार्टी अध्यक्ष के दबाव/लालच के कारण समर्थन कर सकता हैं। इससे जनता का नुकसान होगा!
.
(02) कितने लोग रिकॉल की प्रक्रिया की "शुरुआत" कर सकते हैं?

Right to Recall Party का Recall प्रक्रिया में: केवल 1 वोटर से शुरुआत हो सकता है।

आम आदमी पार्टी के - Raghav Chaddhas के Recall प्रक्रिया में: लोकसभा या विधानसभा के 35 से 40% वोटर,से हीं होगा! जिसके अभाव में रिकॉल शुरू हीं नहीं होगा! इससे जनता का नुकसान होगा।
.
(03) रिकॉल कैसे करेंगे ?

Right to Recall Party: पंजीकृत (रजिस्टर्ड) मोबाइल से sms, app द्वारा (घर बैठे) या सरकारी ऑफिस में जाकर रिकॉल को स्वीकृति देकर वोट वापसी पासबुक में दर्ज करा सकेंगे।

Raghav Chaddhas Recall : सरकारी ऑफिस में जाकर हस्ताक्षर करना होगा जिसके सैंपल उनके पास न होने पर सरकारी अधिकारी, आपके हस्ताक्षर को नकार सकता है।
.
(04) क्या कोई रसीद मिलेगी ?

Right to Recall Party : वोट वापसी पासबुक— जो की हर वोटर को मिलेगी, में वोटर रिकॉल की स्वीकृति दर्ज की जाएगी। यह वोट वापसी पासबुक रसीद के समान होगी।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : नहीं, जिसके अभाव में आपकी रिकॉल की स्वीकृति को नकारा जा सकता है, जिससे रिकॉल के स्वीकृतियों के नंबर घटेंगे। डुप्लीकेट साइन करके स्वीकृतियों की संख्या बहुत बढ़ाई भी जा सकती है। इससे जनता का नुकसान होगा।
.
(05) क्या रिकॉल की स्वीकृतियां तुरंत सार्वजनिक होंगी?

Right to Recall Party : हाँ, सभी स्वीकृतियां वोट वापसी पासबुक में रजिस्टर्ड होंगी। स्वीकृतियां सार्वजनिक होने से उनमें उलट फेर नहीं किया जा सकेगा।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : नहीं, स्वीकृतियां सार्वजनिक नहीं होने से स्वीकृतियों के संख्या में उलट फेर संभव होगा।
.
(06) कानून में बदलाव कैसे होगा?

Right to Recall Party: 51% नागरिक इस कानून की कोई भी धारा संसद से निकलवा या जुड़वा सकेंगे।

Raghav Chaddhas Recall : केवल संसद हीं बदलाव कर सकते हैं!! इससे जनता का नुकसान होगा।
.
(07) स्वीकृतियों की संख्या कितनी होगी?

Right to Recall Party : MLA/MP को जितने वोट मिले हैं, उससे 1% (कुल वोटरों का) अधिक।

Raghav Chaddhas Recall : कुल वोटरों का 35 से 40%। अगर MP/MLA 25% वोट से जीते हों तो भी 35 से 40% लोगों की स्वीकृतियां चाहिए। रिकॉल बहुत कठिन होगा।
.
(08) क्या पिटीशन वेरिफाई करनी होगी?

Right to Recall Party : वोट वापसी पासबुक की प्रक्रिया में कोई (petition) जांच की आवश्यकता नहीं होगी। स्वीकृतियों की संख्या, नाम के साथ हर हफ्ते सार्वजनिक होंगी।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : सरकारी अधिकारी हस्ताक्षर और संख्या की जांच करेगा जिसमें नागरिकों का समय खराब होगा, भ्रष्टाचार होगा और रिकॉल टाला जाएगा। जनता का नुकसान होगा।
.
(09) क्या पिटीशन के बाद MLA/MP निकाले जाएंगे?

Right to Recall Party : Petition की जरूरत नहीं। रिकॉल की प्रक्रिया के बाद MP/MLA निकाले जाएंगे।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : Petition के बाद 51% वोटर वोट करके निकालने के लिए हां कहेंगे, फिर MLA/MP निकाले जाएंगे। तो फिर पिटीशन क्यों चाहिए? क्योंकि जनता का नुकसान करना है!
.
(10) रिकॉल का आधार क्या होना चाहिए?

Right to Recall Party : जनता को ठीक लगेगा तो रिकॉल कर लेगी।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : रिकॉल का आधार "सिद्ध" (proven) कदाचार, भ्रष्टाचार, हेराफेरी, गंभीर रूप से काम ना करना होना चाहिए? यह कौन तय करेगा ? कैसे होगा यह राघव जी ने बताया ही नहीं। क्योंकि जनता को मामू बनाना है!
.
(11) क्या कोई रिकॉल संभव होगा?

Right to Recall Party : नागरिक कोई भी खर्च, जोखिम, परेशानी के बगैर भ्रष्ट MLA MP की कुर्सी से बदल सकेंगे।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : 18 महीने तक कोई रिकॉल नहीं, फिर 35 से 40% नागरिकों की हस्ताक्षर की हुई पिटीशन की जांच होगी!, फिर 51% वोटर की हामी के बाद के रिकॉल होगा?। यह सब के रहते केवल हस्ताक्षर के नाम पर वसूली, भ्रष्टाचार, जाति, धर्म के नाम पर सर फोड़ना होगा। जनता का बहुत नुकसान होगा।
.
(12) जिन देशों में यह रिकॉल है वहां क्या स्थिति है ?

Right to Recall Party: अमेरिका के California राज्य में और बाकी देशों में भी ऐसे पॉजिटिव रिकॉल से वहां अच्छे से चल रहा है। इस प्रक्रिया स्थिरता आती है और भ्रष्टाचार में बहुत कमी आती है।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : Peru, Bolivia, Equador यहां पर हजारों Petition file होते रहते हैं और भयंकर अस्थिरता होती है। इस प्रक्रिया का परिणाम अस्थिरता और हजारों की संख्या में पिटीशन फाइलिंग है। जनता का बहुत नुकसान होता है!
.
(13) क्या भारत में पहले से कहीं रिकॉल लागू है?

Right to Recall Party के जैसे ड्राफ्ट वाला Right To Recall कानून: यह प्रक्रिया भारत में कहीं भी लागू नहीं है।

AAP- Raghav Chaddhas Recall : ऐसी ही प्रक्रिया 10 राज्यों में अलग-अलग समय पर केवल सरपंच पर लागू हुई है। 1994 से लेकर 2025 तक, केवल 2 हीं सरपंच, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश में रिकॉल हुए हैं।

To be continued....

Read More

#1 खनिज मुनाफा बँटवारा

(खनिज मुनाफा सीधे नागरिको के खातों में भेजने का प्रस्ताव )

यह कानून खनिजो की लूट रोकने के लिए लिखा गया है। इस प्रस्तावित क़ानून को देश में लागू करने के लिए संसद से पास करने की जरूरत नही है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। इस प्रस्तावित क़ानून में कुल 22 धाराएं है। निचे इस प्रस्तावित क़ानून के मुख्य बिंदु दिए गए है। हेश कोड़: #KhamBa #खम्बा

(1)

इस क़ानून के गेजेट में छपने के बाद देश के समस्त खनिज एवं सरकारी भूमि से प्राप्त होने वाली रॉयल्टी /मुनाफा एवं किराया 135 करोड़ भारतीयों का संयुक्त खाता नामक बैंक खाते में जमा होगा। इकट्ठा हुयी इस राशि का 65% हिस्सा सभी भारतीयों में बराबर बॅटेगा और 35% सेना को मजबूत बनाने में खर्च होगा।

इस समय खनिज रॉयल्टी का पैसा सरकार के पास जाता है, और सरकार इसे अपने विवेक से खर्च करती है। खनिज, भूमि एवं प्राकृतिक संसाधन देश के नागरिको की संपत्ति है, न कि सरकार की। सरकार की आय टेक्स है और सरकार को अपना खर्चा सिर्फ टेक्स से निकालना चाहिए। अतः देश के खनिजों की बिक्री से आने बाल पैसा हर महीने सभी नागरिको में बराबर बांटा जाना चाहिए।

(2)

खनिजो की नीलामी करके पैसा इकठ्ठा करने वाला राष्ट्रिय खनिज रॉयल्टी अधिकारी बोट वापसी पासबुक के दायरे में होगा। यदि खनिज अधिकारी ठीक से काम नहीं कर रहा है तो नागरिक बोट वापसी पासबुक का प्रयोग करके उसे बदलने के लिए स्वीकृति दे सकेंगे।

मौजूदा व्यवस्था में खनिज अधिकारी की नियुक्ति एवं निष्कासन सरकार के हाथ में होने के कारण खनन माफिया सत्ताधारी नेताओं एवं अधिकारीयों के साथ गठजोड़ बनाकर खनिजों को बड़े पैमाने पर लूट रहे है। दरअसल खोदे जा रहे खनिज का लगभग 20% हिस्सा ही रिकॉर्ड पर आता है, एवं शेष 80% उपरोक्त गठजोड़ द्वारा अवैध खनन के रूप में लूट लिया जाता है। इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए खनिज अधिकारी को वोट वापसी पासबुक के दायरे में किया गया है।

(3)

यदि खनिज अधिकारी या उसके स्टाफ के खिलाफ घपले आदि की कोई शिकायत आती है तो सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति सरकार के आदमी (जज आदि) के पास न होकर नागरिक समूह (जूरी मंडल) के पास रहेगी। जूरी मंडल में 12 से 1500 तक जूरी सदस्य हो सकेंगे। प्रत्येक मामले के लिए अलग जूरी होगी और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जायेगी। जूरी सिस्टम खनन माफिया एवं जजों के गठजोड़ को तोड़ देगा।

खनन के मौजूदा आंकड़ो के अनुसार प्रत्येक भारतीय को प्रति माह लगभग 3000 रू तक राशि प्राप्त हो सकती है। खनिजों एवं जमीनों का बाजार भाव बढ़ने या घटने के साथ यह राशि घट या बढ़ सकती है। जूरी मंडल कैसे काम करेगा एवं वोट वापसी की प्रक्रिया क्या होगी आदि के विवरण के लिए खनिज मुनाफा बँटवारा क़ानून का पूरा ड्राफ्ट दिए गए QR कोड़ से डाउनलोड करें या इस लिंक पर जाएं Tinyurl.com/Khamba2

राजवर्ग प्रजा के अधीन रहना चाहिए, वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा - अथर्ववेद

Read More

क्या भारत में सैन्य विद्रोह द्वारा तख्तापलट हो सकता है ?

बिलकुल हो सकता है। पुलिस के अलावा भारत के किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संगठन के पास या नागरिको के पास सेना को रोकने के लिए हथियार नहीं है !!

वास्तविक अर्थो में भारत में सबसे ताकतवर संस्था सेना है। सेना के पास हथियार है, हथियार चलाने का प्रशिक्षण है, आदेशो का पालन करवाने और आदेश देने के लिए पद सोपान प्रक्रिया है और वांछित अनुशासन है। दुसरे नंबर पर सबसे शक्तिशाली संस्था पुलिस है। किन्तु भारत की पुलिस के पास सेना की तुलना में नगण्य हथियार है, अतः यदि सेना टेक ओवर करती है, और पुलिस सेना का विरोध करती है तो पुलिस सेना के सामने कुछ घंटें भी नहीं टिकेगी।

भारत की सेना जनरल के कंट्रोल में है, और जनरल पीएम से आदेश लेता है। यदि सेना के कनिष्ठ अधिकारी यह मानने लगते है कि भारत का प्रधानमन्त्री भ्रष्ट या निकम्मा है और देश को गड्ढे में धकेल रहा है. या फिर उन्हें यह लगने लगता है कि पीएम को हटा दिया जाना चाहिए, और यदि ऐसे में जनरल अपने कुछ बरिष्ठ अधिकारियो के साथ मिलकर तख्ता पलट की योजना बनाता है तो जनरल भारत में तख्ता पलट करने में सफल हो सकता है। या मान लो कि जनरल का मूड बन जाता है और यदि जनरल अपने अधीनस्थ अधिकारियो के साथ तख्ता पलट की कोशिश करता है तो उसे रोकने वाला कोई नहीं है है !!

ऐसी स्थिति में सेना को सिर्फ भारत के नागरिक ही रोक सकते है, किन्तु भारत के नागरिक हथियार विहीन है, अतः यदि भारत की सेना विद्रोह कर देती है, तो भारत के नागरिको को फौजी शासन स्वीकार करना होगा। यदि नागरिक सेना के खिलाफ छुट पुट प्रदर्शन करते है तो सेना फायरिंग खोल कर उन्हें आसानी से दबा सकती है। 100-200 नागरिको के गोलियां लगने के बाद नागरिक समझ लेंगे कि प्रदर्शन करने से कोई फायदा नहीं है। और तब सेना खुद को राष्ट्रवादी और प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र विरोधी बता कर मामला रफा दफा कर सकता है।

भारत में निरंतर चुनाव होने, जनता का लोकतंत्र में विश्वास होने और सैनिको का सरकार पर भरोसा होने के कारण अब तक कभी तख्ता पलट नहीं हुआ है। क्योंकि जनरल को यह संदेह रहता है कि तख्ता पलट में कनिष्ठ अधिकारी एवं सैनिक जनरल का साथ देंगे या नहीं। किन्तु यदि कोई विदेशी ताकत जैसे अमेरिका आदि भारत में तख्ता पलट करवाना चाहते है तो वे कुछ ही महीनो में गृह युद्ध छिडवाकर, बड़े पैमाने पर आतंकवादी हमले करवाकर, असुरक्षा का भाव उत्पन्न करके एवं राजनैतिक विकल्प हीनता दर्शा कर ऐसे हालात पैदा कर सकते है कि जनरल आसानी से तख्ता पलट कर सकेगा।

जिस देश में राजनेता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको के नियंत्रण से बाहर होने लगते है और वे नेताओं को काबू नहीं कर पाते तो ऐसे हालात में विदेशी ताकतें (विशेष तौर पर अमेरिका) देश को कंट्रोल में लेने के लिए सेना का इस्तेमाल करती है। भारत में फिलहाल ऐसा कोई खतरा मौजूद नहीं है क्योंकि भारत की सभी राजनैतिक पार्टियों के सभी नेता पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथो बिके हुए है अतः उन्हें अपना एजेंडा भारत में लागू करने के लिए सेना की जरूरत नहीं है।

हालांकि भारत में दो बार ऐसे हालात बने थे जब सेना द्वारा तख्ता पलट की कमजोर सम्भावना होने के संकेत मिलते है।

1) जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने बड़े पैमाने पर हथियारों का उत्पादन शुरू किया, बैंको का राष्ट्रीयकरण कर दिया, पाकिस्तान के दो टुकड़े किये और अमेरिका के आगे झुकने से इनकार कर दिया तो अमेरिका ने पहले उन्हें भ्रष्ट जजों (इलाहाबाद का हाई कोर्ट जज जगमोहन लाल सिन्हा) के माध्यम से गिराने की कोशिश की। जब इंदिरा जी ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पर ताले लगवा दिए तो उन्होंने इंदिरा जी का तख्ता पलटने के लिए सेना को एप्रोच करना शुरू किया था। तब जेपी ने दो बार सार्वजनिक रूप से ऐसी अपील की थी कि यदि इंदिरा गांधी सेना को कोई गलत आदेश देती है तो सेना को उसका पालन करने से मना कर देना चाहिए। और जब पानी सर से ऊपर निकल गया तो इंदिरा जी ने आपातकाल लगाकर पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया था।

2) जब देश मनमोहन सिंह से उकताया हुआ था तब. 2012 में जनरल वी के सिंह के कार्यकाल के दौरान हिसार में तैनात "33 आई रेजिमेंट" एवं आगरा की "50 पैरा ब्रिगेड" ने दिल्ली की और कूच किया था। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे रिपोर्ट किया था. घटना उस दिन से एक दिन पहले की है जब वी के सिंह को अपने जन्म प्रमाण पत्र से सम्बन्धित मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेश होना था। सरकार को, रक्षा मंत्रालय को और गृह मंत्री को इस मोबिलाईजेशन की कोई जानकारी नहीं थी। लगभग 18 घंटे तक सरकार असमंजस में बनी रही। प्रोटोकोल के अनुसार बिना रक्षा मंत्री की अनुमति के सेना की कोई भी टुकड़ी दिल्ली की और नहीं बढ़ सकती। बाद में सेना ने स्पष्टीकरण दिया कि यह एक रूटीन एवं औचक प्रोसीजर था। सरकार ने यह बात मानी कि उन्हें नोटिफाईड नहीं किया गया था. किन्तु सरकार ने किसी भी प्रकार के कू (coup) की सम्भावना को सिरे से नकारा।

https://zeenews.india.com/news/nation/army-moved-two-units-towards-delhi-report 768126.html

लोकतंत्र की जननी हथियारबंद नागरिक समाज है। जिस देश के नागरिको की शक्ति उस देश की सेना से अधिक बढ़ जाती है. वहां किसी भी स्थिति में लोकतंत्र का निलम्बन नहीं किया जा सकता। भारत के नागरिक हथियार विहीन है, और यदि सेना विद्रोह कर देती है तो नागरिको के पास उन्हें रोकने के लिए चाकू और नेल क़टर ही है। ब्रिटिश ने सिर्फ । लाख बन्दुक धारियों के माध्यम से भारत के 40 करोड़ नागरिको को 200 सालो तक अपने कंट्रोल में रखा। भारत में 17 लाख की सेना है और सभी हथियारों से लेस है। तो मुकाबले की बात तो भूल ही जाइए। अतः भारत में यदि सेना तख्ता पलट नहीं कर रही है, तो यह केवल चांस की बात है। यदि सेना तख्ता पलट कर देती है तो हम नागरिक "लोकतंत्र वापिस लाओ" के नारे लगाने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

https://www.facebook.com/share/p/1C1XiG4uRM/

#वोट_वापसी_पासबुक

Read More

#14 भारतीय राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्टर

NRCI - National Register for Citizenship of India

विभिन्न सरकारी एजेंसियों के अनुसार भारत में 2 करोड़ के लगभग अवैध आर्थिक विदेशी (illegal economic imigrant) रह रहे है। असम, बंगाल, पूर्वोत्तर के अलावा ये पूरे भारत में फैले हुए है। इन अवैध विदेशियों में प्रताड़ित शरणार्थी भी है, और आर्थिक अवसरों की तलाश में आये विदेशी (illegal economic migrant) भी है। इनकी वजह से भारत के संसाधनों पर भार बढ़ रहा है, और ये हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इन अवैध विदेशी निवासीयों में से कई समूह हिंसक अपराधो एवं तस्करी आदि में भी लिप्त है। यदि पाकिस्तान एवं चीन इन्हें बंगलादेशी सीमा के माध्यम से हथियार भेजना शुरु कर देते है तो ये अवैध विदेशी निवासी भारत में एक हिंसक गृह युद्ध शुरू कर सकते है।

गृह मंत्री श्री अमित शाह ने सन 2019 में संसद में भरोसा दिलाया था कि जल्दी ही वे देश व्यापी NRC का ड्राफ्ट लायेंगे। किन्तु सरकार ने अभी तक NRC का ड्राफ्ट तक सामने नहीं रखा है। असम में NRC का जो ड्राफ्ट लागू किया गया था, उसमें गंभीर विसंगितियों एवं कमियां थी। उदाहरण के लिए असम का NRC न तो अवैध रूप से रह रहे आर्थिक विदेशियों को चिन्हित करता है, और न ही उन्हें डिपोर्ट करने की कोई व्यवस्था देता है। दुसरे शब्दों में, CAA एवं असम में किये गए NRC ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है, बल्कि इस तरह की प्रोपेगेंडा खड़ा कर दिया है कि इस समस्या को सुलझा लिया गया है। हमारे द्वारा प्रस्तावित NRCI में इस तरह के प्रावधान किये गए है कि यह कानून आने के 1 वर्ष के भीतर सभी अवैध आर्थिक विदेशी या तो डिपोर्ट कर दिए जायेंगे या फिर स्वयं ही अपने मुल्कों में लौट जायेंगे।

प्रस्तावित NRCI क़ानून में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (National Register for Citizens of India) बनाने की प्रक्रिया दी गयी है। गेजेट में प्रकाशित होने के साथ ही नागरिकता रजिस्टर बनने की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। इस क़ानून को मनी बिल / धन विधेयक के रूप में लोकसभा से पास करके गेजेट में छापा जा सकता है। नागरिकता रजिस्टर बनाने की पूरी प्रक्रिया देखने के लिए पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें Tinyurl.com/Nrcindia

1. यह क़ानून निम्नलिखित कार्य करेगा :

a. अवैध विदेशीयों को (illegal immigrant) भारत से निष्कासित करेगा।

b. प्रताड़ित शर्णार्थियो (persecuted refugee) को शरण देगा।

c. नागरिकता रजिस्टर (national citizenship register) बनाएगा।

2. प्रस्तावित NRCI क़ानून के अनुसार, ऐसे विवाद की स्थिति में कि कौन अवैध आर्थिक विदेशी है और कौन प्रताड़ित शरणार्थी है, का अंतिम फैसला नागरिको की जूरी करेगी, जज नहीं।

3. प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्ट्रार (NCRO) की नियुक्ति करेंगे। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार सभी राज्यों में राज्य नागरिकता रजिस्ट्रारों एवं जिला रजिस्ट्रारो की नियुक्ति करेगा। राष्ट्रिय रजिस्ट्रार प्रधानमंत्री की अनुमति से जिला कलेक्टरों को जिला रजिस्ट्रार के रूप में नियुक्त कर सकता है, या इच्छित जिलो में अलग से जिला रजिस्ट्रारो की नियुक्ति भी कर सकता है।

4. राष्ट्रीय रजिस्ट्रार एवं उसका स्टाफ वोट वापसी पासबुक एवं जूरी मंडल के दायरे में रहेगा। ताकि यदि राष्ट्रिय रजिस्ट्रार अपना काम त्वरित एवं निष्पक्ष ढंग से नहीं कर रहा है तो नागरिक वोट वापसी पासबुक का इस्तेमाल करके उसे बदल सके।

राजवर्ग प्रजा के अधीन रहना चाहिए, वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होग

Read More

#VoteVapsiPassBook

प्रश्न : मैं राईट टू रिकॉल पार्टी से वोट वापसी पासबुक के मुद्दे पर चुनाव क्यों लड़ रहा और क्यों युवाओं को अधिक से अधिक राजनीति के क्षेत्र में जाना चाहिए?

उत्तर :
स्थापित राजनैतिक पार्टियाँ चाहती है कि कम से कम युवा चुनावों में हिस्सा ले। यदि ज्यादा लोग चुनावों में आयेंगे तो इनमे ईमानदार / समर्पित / काबिल लोग भी होंगे, और धीरे धीरे मतदाताओ के विकल्प बढ़ने लगेंगे। और विकल्प बढ़ने से बदतर लोगो को चुनौती मिलेगी। पूरी राजनीती कार्यकर्ताओ का टाइम पास करने और उन्हें विकल्प मुहैया नहीं कराने पर चलती है। यदि लोगो को अच्छे विकल्प मिलने लगेंगे तो धीरे धीरे वे या तो बुरे उम्मीदवारों को मैदान से बाहर कर देंगे, या फिर उन्हें जनहित के मुद्दों की और धकेलने में कामयाब हो जायेंगे।

.
इसे फिर से पढ़े : या फिर उन्हें जनहित के मुद्दों की और धकेलने में कामयाब हो जायेंगे।

.

कैसे ?

.
मान लीजिये कि, भारत में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बैंको का एनपीए, सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल की समस्या है और कोई भी पार्टी इसे मुख्य मुद्दा बनाने को तैयार नहीं है। मान लीजिये कि किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते है और इन मुद्दों को अपने घोषणापत्र में शामिल करते हुए किसी विधानसभा से 20 छोटे उम्मीदवार नामंकन दाखिल करते है। तो उस विधानसभा क्षेत्र में चुनावों के दौरान गरीबी / भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुखता से छा जाएगा और बड़ी पार्टी के उम्मीदवार पर चुनाव प्रचार के दौरान यह दबाव बनेगा कि वह इस पर कोई स्टेंड ले।

.

यदि वह कोई स्टेंड नहीं लेता है तो जनता के सामने वह एक्सपोज होने लगेगा और जनता देखेगी कि बड़ी पार्टियो के उम्मीदवार इन पर बोल नहीं रहे है। इससे उस पर दबाव बनेगा और बड़ी पार्टी के उम्मीदवार को इस मुद्दे को एड्रेस करना पड़ेगा। और जैसे ही एक बड़ी पार्टी का उम्मीदवार इसे एड्रेस करता है, वैसे ही अन्य बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों को भी इसे एड्रेस करना पड़ेगा। और इस तरह यह मुद्दा उभरकर आ जाएगा। और अब इसे पेड मीडिया को भी रिपोर्ट करना पड़ेगा !!

.

और यदि ऐसा 50 विधानसभाओ में होता है तो ये मुद्दे पूरे राज्य में उछलकर आ जायेंगे। लेकिन यदि कोई भी उम्मीदवार इन मुद्दों को लेकर चुनाव में नहीं आएगा तो जनता के पास सिर्फ बड़ी पार्टियों के रूप में 2–3 विकल्प रहेंगे। अत: उनमे से कोई भी इन मुद्दों पर नहीं बोलेगा, और वे पब्लिक का खून गरम करने वाले भाषण देंगे, और सभी बड़ी पार्टियों के उम्मीदवार ऐसा ही करेंगे। इस तरह जब चुनाव में कम विकल्प होते है, तो जनता असहाय हो जाती है। लेकिन यदि कई छोटे छोटे कार्यकर्ता सही मुद्दों पर चुनावों में आ जाते है तो बड़ी पार्टियों को सही मुद्दों को उठाने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

.

क्योंकि नेता आपकी बात सिर्फ चुनाव में ही सुनता है, इसके अलावा अगले 5 साल तक कुछ भी बोलते रहिये, वह सुनने का सिर्फ नाटक करता है, लेकिन सुनता नहीं है। लेकिन चुनावों के दौरान नेताओं के कान निकल आते है, और वे सुनना शुरू करते है। तो यदि आप नेता की तवज्जो चाहते है तो आपको चुनाव के दिनों में ही अपनी बात कहनी चाहिए। और चुनावो के दौरान जनता इस मोड में रहती है कि उन्हें सिर्फ उम्मीदवार को ही सुनना होता है। ऐसे में यदि आप उम्मीदवार है, तो जनता भी आपको सुनेगी और नेता भी सुनेगा !!

.

मेरा अब तक जो अनुभव रहा है उस आधार पर मैं कह सकता हूँ कि, भारत में दो काम करना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यो की श्रेणी में आते है :

खुद के कमाए गए पैसे से जमीन खरीदकर बिना किसी लोन के छोटी मोटी मनुफेक्चरिंग यूनिट लगाना
किसी छोटी पार्टी से या निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सांसद / विधायक का चुनाव लड़ना।
युद्ध (War) सबसे बेहतर शिक्षक है। युद्ध जो चीजे सिखाता है, उसे दुनिया में और किसी भी तरह से सीखा नहीं जा सकता। इस तरह युद्ध सबसे बेहतरीन शिक्षक है। युद्ध के बाद शांति काल के सबसे बेहतर 2 शिक्षक ऊपर दिए गए है। ये तीनो शिक्षक सबसे श्रेष्ठ इसीलिए है, क्योंकि इसे किताबों को पढ़कर सीखा नहीं जा सकता। इसके लिए मैदान में उतरना पड़ता है।

.

——————

.

(A)

.

अच्छे और काबिल लोग चुनावों में हिस्सा ना ले और राजनीती से दूर रहे इसके लिए उन्होंने कितने सारे गलत क़ानून छापें हुए है, इस विषय पर मैं 100 पेज की पोस्ट लिखूंगा तो भी यह विषय पूरी तरह कवर नहीं कर पाऊंगा। लेकिन राजनीती को जितना मैंने अब तक समझा है उसका पूरा निचोड़ मुझसे पुछा जाए तो मैं कहूँगा कि पूरी राजनीती के डिजाइन का केन्द्रीय उद्देश्य यह है कि - युवाओं को राजनीती में आने से हतोत्साहित किया जाए !!

.

वे सिर्फ वोटर चाहते है, राजनैतिक कार्यकर्ता नहीं। एक वोटर वह है जो व्यवस्था में वांछित बदलाव के लिए नेता से उम्मीद करता है। जबकि एक कार्यकर्ता वह है जो अमुक आवश्यक बदलाव के लिए तब स्वयं चुनावों में हिस्सा लेता है, जब अन्य कोई व्यक्ति अमुक मुद्दे पर मैदान में आने को तैयार न हो।

.

युवाओं को राजनीति में आने से रोकने के लिए पेड मीडिया निरंतर काम करता है। और वह यह कैसे करता है, इसे समझाने का मेरे पास कोई शोर्ट कट नहीं है। इसे समझने का तरीका सिर्फ यह है कि, आप खुद चुनाव लड़ें। जब तक आप चुनाव नहीं लड़ते तब तक आप इस बात को कभी भी समझ नहीं पायेंगे कि उन्होंने कैसे आपको चुनाव लड़ने से रोका हुआ है। दरअसल चुनाव लड़ने में सबसे बड़ी बाधा वास्तविक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक है।

.

पेड मीडियाकर्मियों ने चुनाव लड़ने वालो के खिलाफ समाज में किस तरह का जहर घोला हुआ है, इसका पता आपको तब चलता है, जब आप चुनाव लड़ने का फैसला करते है। और जैसे ही आप यह फैसला लेते है आपके परिवार वालो से लेकर मित्र, रिश्तेदार, अड़ोसी-पडौसी आपको ऐसी नजरो से देखने लगते है जैसे आप कोई निहायत ही फालतू / निकृष्ट / अनुत्पादक कर्म करने जा रहे है।

.

ज्यादातर लोग आपका मजाक उड़ायेंगे, ताने कसेंगे और तरह तरह के तंज सुनाकर आपको हतोत्साहित करेंगे। हालांकि उन्हें आपको रोकने से कोई जाती फायदा नहीं होने वाला है। लेकिन पेड मीडिया ने सब तरफ से माहौल ही इस तरह का बनाया हुआ है कि ज्यादातर लोग इसी तरह से पेश आते है। तो सबसे पहले आपको इस मनोवैज्ञानिक लड़ाई से पार पाना होता है, और पिछले 5 साल में मेरा अनुभव है कि 99.9999% लोग इस पहली बाधा को ही पार नहीं कर पाते।

.

जो लोग यह सलाह देते है कि युवाओं को राजनीती में नहीं जाना चाहिए, मैं उनसे कहता हूँ कि यदि राजनीती गटर है तो आप वोट क्यों करते है, राजनीती पर टिप्पणियाँ एवं विमर्श क्यों करते है !! मतलब राजनीती पर बहस करना, राजनैतिक टिप्पणियाँ करना, नीतियों पर बहस करना, विभिन्न समस्याओ के लिए राजनेताओ को कोसना और सोशल मीडिया पर राजनीती पर बवाल काटना एक रचनात्मक काम है, लेकिन चुनाव लड़ना एक बदतर गतिविधि है !!

.

और यदि राजनीती गन्दी है तो इसकी वजह यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को राजनीती में जाने से हतोत्साहित किया जाता है। इससे जनता के पास बेहद बेहद सीमित विकल्प रह जाते है, और उन्हें उन बदतर विकल्पों में से ही किसी को चुनना होता है !! और फिर यही लोग कहते है कि राजनीती में अच्छे लोगो की कमी है। यह एकदम सीधी बात है कि, यदि आप लोगो को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करोगे तभी तो ज्यादा लोग राजनीती में आयेंगे, और जब ज्यादा लोग राजनीती में आयेंगे तो उनमे अच्छे लोग भी होंगे।

.

टीवी चेनल्स पर या अखबारों में आपने कई बार इस आशय की बात पढ़ी-सुनी-देखी होगी जिसमें यह बार बार दोहराया जाता है कि एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपको वोट करना चाहिए, और सोच समझकर वोट करना चाहिए।

.

लेकिन क्या आपने अख़बार-टीवी पर कितने बुद्धिजीवियों को यह कहते सुना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को चुनाव लड़ना चाहिए ताकि मतदाताओ के पास ज्यादा विकल्प हो ? शायद आज तक आपने ऐसा वाक्य कभी भी पेड मिडिया में नहीं सुना होगा !! वे कभी कभार यह कह देंगे कि अच्छे लोगो को आगे आना चाहिए, राजनीती में रुचि लेनी चाहिए, अच्छे उम्मीदवारों को वोट करना चाहिए आदि आदि। लेकिन यह बात कभी भी नहीं कहेंगे कि - यदि आपको राजनीति में सुधार लाना है तो ज्यादा से ज्यादा लोगो को अच्छे मुद्दों को उठाने के लिए चुनाव लड़ने चाहिए !!

.

वे कहेंगे राजनीती गटर है, और इससे दूर रहो !! बस !! सोशल मीडिया पर बामा बूम करो, यू ट्यूब पर वीडियो बनाकर अपलोड करो, धरने दो, विरोध करो, समर्थन करो और राजनीति के नाम पर जो मर्जी करो पर चुनाव मत लड़ो !!

.

——————-

.

(B)
.

चुनाव लड़ना राजनीती में सबसे ज्यादा गंभीर गतिविधि है, और एक्टिविज्म में मेरा एक मुख्य लक्ष्य भारत के ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओ को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करना है। और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है। मैं बस उन तक यह बात पहुंचा देना चाहता हूँ कि यदि वे वाकयी व्यवस्था में बेहतर बदलाव चाहते है तो जब तक वे चुनावो में नहीं आते तब तक बात बनने वाली नहीं है। कृपया इस बात को नोट करें कि मेरा यह कहना नागरिको से नहीं बल्कि राजनैतिक कार्यकर्ताओ से है। राजनैतिक कार्यकर्ता वे है जो राजनैतिक विषयों पर टीका करते है, जिनके विमर्श में राजनैतिक दृष्टिकोण प्रकट होता है।

.

मैं बहुधा जूरी कोर्ट के बारे में लिखता हूँ। जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढने में व्यक्ति को 2 -3 घंटे का समय लगता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति आकर मुझसे कहता है कि वह देश के लिए राजनैतिक सन्दर्भ में 3 घंटे काम करने के लिए उपलब्ध है, तो मैं उससे जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढने के लिए नहीं कहूँगा। मैं उससे कहूँगा कि वह चुनाव आयोग की वेबसाईट पर जाकर विधायक का फॉर्म डाउलोड करे और इस डमी फॉर्म को भरे। और फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति चुनाव लड़ता है या नहीं।

.

क्योंकि मेरे मानने में चुनाव का फॉर्म भरना भी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण गतिविधि है। और यह इतनी महत्त्वपूर्ण है कि मैं इसे ड्राफ्ट पढने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। और चुनाव लड़ना तो खैर सबसे महत्त्वपूर्ण है ही।

.

यदि आप चुनाव लड़ने इच्छुक है और इसमें आपको यदि किसी भी प्रकार की जानकारी या सहयोग चाहिए तो मुझसे राब्ता कर सकते है। अपनी तमाम व्यस्तताओ के बावजूद मैं आपको यथा शक्ति सहयोग करूँगा। और कृपया इस बात को नोट करें कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप मेरे द्वारा सुझाए गए मुद्दों पर चुनाव लड़ते है या खुद के मुद्दों पर चुनाव लड़ते है। आप चुनाव लड़ रहे है, यह भी अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है। तो आप किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ें या निर्दलीय भी चुनाव लड़ रहे तो मुझे सहयोग करने में ख़ुशी होगी।

.
मैंने अब तब दो चुनाव लड़े है। एक बार विधायक का और एक बार सांसद का।
.

चुनाव का बजट - विधायक का चुनाव 20 हजार के बजट में आसानी से लड़ा जा सकता है। पाठक ध्यान दें कि चुनाव जीतने के लिए आपको कम से 25-30 करोड़ की जरूरत होती है। लेकिन मैं यहाँ चुनाव लड़ने की बात कर रहा हूँ, चुनाव जीतने की नहीं। तो यदि आप 20 हजार रुपया वहन कर सकते है तो चुनाव लड़ने का प्रयास अवश्य करें। इसके लिए आपको एक सहयोगी की भी जरूरत होगी, ताकि पर्चे छपवाने, फ़ार्म भरने आदि में वो आपका सहयोग कर सके। तो यदि आपका साथ देने के लिए 1 भी आदमी तैयार है तो आप चुनाव लड़ सकते है।

.

———————-
.
(C)

.

चुनाव लड़ने से सम्बंधित कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी :

.

चुनाव लड़ने में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम है नामांकन भरना। और यह बहुत बहुत महत्त्वपूर्ण काम है। यदि आपने सही तरीके से अपना नामांकन भर दिया तो समझिये आधी लड़ाई जीत ली है। तो यदि आप भविष्य में कभी भी चुनाव लड़ना चाहते है तो सबसे पहला काम यह है कि आप तुरंत चुनाव आयोग की वेबसाईट पर जाकर फॉर्म डाउनलोड करें, और इसे भरकर अपने पास रख ले।
मान लीजिये कि आपको 2 साल बाद आने वाला चुनाव लड़ना है। तो भी 2 साल पहले ही नामांकन भर कर रख ले। नामांकन भरने के कोई पैसे नहीं लगते है। यह मुफ्त में डाउनलोड होता है। अत: आप इसका प्रिंट आउट ले ले और भरकर अपने पास रख ले। जब चुनाव आयेंगे तब इस बारे में अंतिम फैसला करें कि आपको चुनाव लड़ना है या नहीं। यदि नहीं लड़ना है तब भी नामांकन तो भर कर रख ले। और फिर जब चुनावी अधिसूचना निकलेगी तब आपको यदि चुनाव लड़ना है तो चुनाव आयोग में जाकर ओरिजिनल फॉर्म ले आये और पहले से भर कर रखे गए अपने फॉर्म से नकल कर ले।
नामांकन फॉर्म बहुत ही जटिल होता है। मैंने अपने जीवन में इतना जटिल दस्तावेज दूसरा नहीं देखा है। और इसे जानबूझकर बहुत जटिल बनाया गया है। ज्यादातर लोग इसे गलत भर देते है और उनका फॉर्म रिजेक्ट हो जाता है। मुझे इसे भरने में पूरे 7 दिन लगे थे, और फॉर्म आने और इसे जमा करने के लिए सिर्फ 7 दिन की टाइम विंडो ही मिलती है। इस तरह मैंने अंतिम दिन के अंतिम दिन घंटे में अपना फॉर्म जमा कराया।
यदि आपने पहले से नामांकन फॉर्म नहीं भरा है तो आपको वकील के पास दौड़ लगानी होगी। वकील आपको सीधे 25 हजार की फ़ीस सुनाएगा, और इस तरह आपका 25 हजार वेस्ट हो जाएगा। बड़ी पार्टियों के फॉर्म पेशेवर वकील भरते है। लेकिन हम छोटे उम्मीदवार है, अत: हमें अपना फॉर्म खुद ही भरना पड़ेगा, और इसीलिए हमें ज्यादा वक्त चाहिए। इसीलिए मैं कहता हूँ कि पहला स्टेप है डमी फॉर्म भरकर अपने पास रखना। और इस बात का फैसला बाद में करें कि आपको चुनाव लड़ना है या नहीं।
मेरे चुनाव प्रचार में सिर्फ पेम्पलेट होता है। न कोई कार्यालय, न कोई टेम्पू, न बैनर, न विज्ञापन। मैं बस पेम्पलेट छपवाकर बाँट देता हूँ। आप भी ऐसा ही कर सकते है। 1 दिन पेम्पलेट छपाने में लगेगा, और 2 दिन बांटने में। बस और कुछ नहीं करना है। ज्यादा लोड लेना हो तो आपकी इच्छा है। मेरे हिसाब से इतना करना काफी होता है। 1 दिन नामांकन भरने में और 3 दिन पेम्पलेट के। आपको 4 दिन चाहिए होते है। यदि आपके साथ कोई सहयोगी है तो पेम्पलेट का काम 1 दिन में भी हो सकता है। इस तरह आप 2 दिन और 20 हजार खर्च करके चुनाव लड़ सकते है।
यदि आप महाराष्ट्र एवं हरियाणा के निवासी है तो मालूम हो कि 4 अक्टूबर नामांकन भरने की अंतिम तिथि है। अत: आप यह चुनाव भी लड़ सकते है। यदि आप अन्य राज्यों के निवासी है तो भी नामांकन भरकर रखे ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में आप चुनाव लड़ सके।

.

राजनीति को देखने के दो दृष्टीकोण है :

वोटर का दृष्टिकोण , और
उम्मीदवार का दृष्टिकोण।
यदि आप चुनाव लड़ लेते है तो आपको राजनीति को समझने का एक और दृष्टिकोण मिलेगा। और यह दृष्टिकोण वाकयी महत्त्वपूर्ण है। अत: मेरा मानना है कि एक राजनैतिक कार्यकर्ता को विधायक या सांसद का चुनाव लड़ने का प्रयास अवश्य चाहिए, ताकि वह राजनीति के उन पहलूओ को देख सके, जिसे ज्यादातर लोग नहीं देख पाते। और इस बात से कभी फर्क नहीं पड़ता कि आपको कितने वोट मिले है।

.

——————
.
(D)

.

गैर राजनेतिक संगठन बनाकर राजनैतिक मुद्दों पर काम करना दुनिया की सबसे गन्दे किस्म की राजनीति है ।

.

राजनीति को सत्ता के लालच से जोड़ कर देखा जाता है, इसीलिए अपना नैतिक मापदंड बनाए रखने के लिए कई संघठन गैर राजनेतिक गतिविधियाँ संचालित करते है, लेकिन उनके लक्ष्य हमेशा राजनेतिक होते है । अवाम में राजनेतिक विवेक पनपने से राजनेतिक सत्ताओ को चुनोती मिल सकती है, इसलिए कार्यकर्ताओं का टाइम पास करने के लिए उन्हें निस्वार्थ सेवा के ऊँचे आदर्श में उलझा दिया जाता है ।

.

राजनेतिक दल पेड मीडिया, पेड बुद्धिजीवीयों, पेड स्तंभकारो, पेड पाठ्य पुस्तक लेखको की सहायता से आम जन के राजनेतिक विवेक को परिपक्व करने वाली सूचनाओं को बाधित कर देते है। इससे शासको के लिए शासन करना आसान हो जाता है ।

.

उदाहरण 1 : जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के बाद देश की अवाम में भारी असंतोष पनपने लगा था। महात्मा लाला लाजपत राय, और महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल के नेतृत्व में महात्मा भगत सिंह, महात्मा चन्द्र शेखर आज़ाद, महात्मा बटुकेश्वर दत्त तथा महात्मा राजगुरु जैसे हज़ारो युवाओ का मोहन गांधी से मोहभंग हुआ, और युवा राजनेतिक गतिविधियों में रूचि लेने लगे । ये क्रांतिकारी राईट टू रिकाल कानूनों और पूर्ण स्वराज्य की मांग कर रहे थे । इनकी बढ़ती लोकप्रियता लाखो युवाओं में राजनेतिक विवेक का संचार कर सकती थी ।

निदान : अंग्रेजो के निर्देश पर जवाहर लाल और मोहन गांधी ने 1924 में 'सेवा दल' की स्थापना की । इस दल के कार्यकर्ताओं को राजनेतिक गतिविधियों में भाग न लेने की शपथ दिलाई गयी ।
सेवा दल ने लाखो कार्यकर्ताओं को सुबह व्यायाम करने, जन जागरण और समाज सेवा जैसे अनुपयोगी कार्यो में इसीलिए उलझा दिया ताकि, कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट हो जाए, और पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले क्रान्तिकारियो को कार्यकर्ता नही मिल सके ।

.

उदाहरण 2 : 1922, तुर्की के खिलाफत आन्दोलन के दौरान मोहन गांधी आज़ादी की लड़ाई को हाशिये पर धकेल कर खिलाफत आन्दोलन में कूद गए थे । यह वाकयी में एक अजीब स्थिति थी। मोहन के इस कदम से हिन्दू नाराज हुए और हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण होने लगा ।

इसी दौरान अखिल भारतीय हिन्दू महासभा नामक राजनेतिक संघठन खड़ा हो रहा था और उनके एजेंडे में चुनाव लड़ना भी शामिल था। यदि ऐसा होता तो मोहन गांधी और जवाहर लाल का युवाओं को चरखे, बकरी का दूध, खादी, भजन, अनशन और साफ़ सफाई में उलझाए रखने का कार्यक्रम खटाई में पड़ सकता था, जिस से ब्रिटिश साम्राज्य को नुकसान होता। ब्रिटिश भारत के युवाओं को सक्रीय राजनीती में नही आने देना चाहते थे।

निदान : अंग्रेजो की अनुमति से सिंधिया राजवंश ने एक छद्म हिन्दू वादी अराजनेतिक संगठन 'X' को खड़ा करने के लिए धन मुहैया कराया, ताकि हिन्दू महासभा को तोड़ा जा सके ।
संघठन X ने सिंधिया तथा अन्य देशी राजाओं से प्राप्त चंदो से लाखो हिन्दू कार्यकर्ताओं को खींच कर परेड करने, लाठी चलाना सीखने , राष्ट्र भक्ति के गीत गाने, ध्वज वंदन करने और नारे लगाने जैसे अनुपयोगी और अराजनैतिक कार्यो में उलझा लिया। हिन्दू महासभा को कार्यकर्ता और चंदे मिलने बंद हो गए, और यह संघठन टूट गया। चूंकि हिन्दू महासभा राजनेतिक लक्ष्यों के लिए नागरिको को संघठित कर रही थी, इसलिए इनके नेता हमेशा अंग्रेजो के निशाने पर रहे ।

.

इस समय भारत एक अजीब स्थिति से गुजर रहा था, जिसमे एक और मोहन और जवाहर युवाओं को अनशन और चरखे से जबकि X परेड और लाठियों से आज़ादी लाने का विश्वास दिला रहे थे ( और दिला भी चुके थे), वही दूसरी और देश में कार्यकर्ताओं के अभाव से जूझ रहे राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस देश से बाहर जाकर कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा कर के दुनिया की सबसे ताकतवर सेना से लड़ने के लिए फ़ौज खड़ी कर रहे थे।

.

उदाहरण 3 : आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रणेता महात्मा राजीव भाई दिक्षित 1985 से ही स्वदेशी का प्रचार कर रहे थे । पिछले 70 वर्ष में वो अकेले शख्स है जिन्होंने लाखों कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण सूचनाएं दी । व्यवस्था परिवर्तन के तथा विदेशी शासको से भारत की मुक्ति के लिए वो पूरे देश में घूम घूम कर 25 वर्ष तक राजनेतिक जन आन्दोलन की जमीन तैयार करते रहे । उन्होंने लाखों नागरिको को FDI के दुष्प्रभाव से परिचित कराया कि, कैसे FDI जनित विकास भारत को फिर से ग़ुलाम बना देगा ।

निदान : चूंकि राजीव भाई राजनेतिक आन्दोलन खड़ा कर रहे थे, अत: इसे तोड़ने के लिए आरएसएस ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की। आरएसएस, बीजेपी और धनिको से प्राप्त सरंक्षण और अनुदान से स्वदेशी जागरण मंच ने लाखों कार्यकर्ताओं को अपनी और खींचा और बीजेपी को सत्ता हासिल हुयी, 1999 में सत्ता में आते ही बीजेपी ने स्वदेशी के मुद्दों को दरकिनार कर दिया ।
ज़्यादातर बड़े समाज सेवी संघठन सत्ता में सेंध लगाने का ही कार्य करते है । यह कोयले की दलाली के बावजूद हाथ काले न होने देने का एक पैंतरा है । ये भारी भरकम गैर राजनेतिक संघठन समाज सेवा के नाम पर लाखो करोड़ो कार्यकर्ताओं को आकर्षित करते है, तथा उनकी मदद से परोक्ष राजनेतिक ताकत हासिल करते है । इसमें फायदा यह होता है, कि राजनेतिक दल इन अराजनेतिक संघठनो के भ्रमित कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेह नही रहता, तथा इन संघठनो के पास हमेशा बच निकलने की यह पतली गली रहती है कि अमुक राजनेतिक दल उनकी उम्मीदों पर खरा नही उतरा। इस प्रकार ये अराजनैतिक संघठन अमरये बकरे बने रहते है ।

.

बड़े संघठनो के अलावा इसी तासीर के हज़ारो अराजनैतिक संघठन देश में संचालित है, जिनका एकनिष्ठ उद्धेश्य नागरिको या धनिको से चंदा लेकर कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करना होता है, ताकि उन्हें सक्रीय राजनीति में आने से रोका जा सके। आपको किसी भी जिले में इस तबियत के सैंकड़ो छोटे मोटे संगठन मिल जायेंगे जिनका मॉडल कुछ इस तरह का होता है :

इनकी जिले स्तर पर एक कार्यकारिणी होती है, जिसमे 10-20 सदस्य/पदाधिकारी होते है।
इन अध्यक्षों / उपाध्यक्षो/ सचिवो / कोषाध्यक्षो आदि नामधन्य पदाधिकारियों के हाथ जोड़ते हुए से फोटो वगेरह आप अखबारों और शहर के मुख्य चौराहों पर चस्पां हुए देख सकते है।
वक्त जरुरत इन पदाधिकारियो द्वारा कार्यकर्ताओं का टाइम खपाने एवं संघठन से चिपकाये रखने के लिए एक सभा रखी जाती है, जिसके प्रारम्भ मालाएं और साफे पहनाने तथा समापन संघठन में ही शक्ति है टाइप के नारो से होती है। अमूमन सभा के मध्य में चाय, बिस्किट, समोसो आदि के सिवाय कोई तार्किक एजेंडा नही होता, अत: गाहे बगाहे समस्या के समाधान सुझाने की जगह सिद्धांतो की रूटीन भाषण बाज़ी कर इति कर ली जाती है ।
कार्यकर्ताओं को व्यस्त रखने के लिए ये संगठन रक्तदान शिविर लगाना, भोजन वगेरह बांटना, पेड़ लगाना, जयंतिया मनाना, प्याऊ चलवाना, नये मेंबर बनवाना, भभका पैदा करने के लिए नारों के साथ जुलुस और वाहन रेली निकालना आदि तथा इसी तरह की फौरी गतिविधियाँ संचालित करते है ।
अमूमन इस प्रकार के सभी संगठन कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सूचनाये नही देते, और उन्हें राजनीती से दूर रहने की घुट्टी देते रहते है।

इनका मुख्य डायलॉग होता है, यहाँ राजनीती मत करो, राजनीती गन्दी चीज है, आदि आदि !!

पेड मीडिया में इस तरह के बड़े अराजनैतिक संगठन चलाने वालो को काफी सकारात्मक कवरेज दिया जाता है, और उनके इस अराजनैतिक पने को एक खासियत की तरह उभारा जाता है कि, देखो ये लोग कितने निस्वार्थ है कि राजनीति की गंदगी से दूर रहकर सेवा का कार्य कर रहे है !!

.

कुल मिलाकर, उन्होंने लोगो को राजनीति में जाने से रोकने के लिए काफी अच्छा सेट अप लगाया हुआ है !!

मैं यह लेख पढ़ने वाले से पूछना चाहता हूं की क्या आप भारत देश की समस्याओं को सुलझाने में देश की उन्नति में अपना योगदान देना चाहते हैं तो कृपया आप अपनी बात राजनीति में सक्रिय योगदान देकर अपनी बात जनता के सम्मुख प्रमुखता से रखें बहुत सी राजनीतिक पार्टियों हैं आप उन पार्टियों से टिकट लेकर या निर्दलीय चुनाव लड़े अगर आप एक मंच चाहते हैं और चुनाव लड़ना चाहते हैं तो कृपया निम्नलिखित नंबरों पर व्हाट्सएप करें हम आपको टिकट भी देंगे आपका नामांकन फार्म भी भरवाने में मदद करेंगे और अपनी क्षमता अनुसार फाइनेंशियल सहयोग भी प्रदान करेंगे आने वाले विधानसभा चुनाव असम बंगाल तथा कई छोटे राज्यों में 2026 में चुनाव होने की प्रबल संभावना है इच्छुक कार्यकर्ता देशहित में चुनाव लड़ने के लिए संपर्क कर सकते हैं.

शिव प्रसाद गुप्ता 7007184869
महावीर प्रसाद कुमावत 9887742837

Read More