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अभी के दौर में ऐसा है कि अपने धर्म को माननेवाले लोग 'अपने धर्म को ही श्रेष्ठ' मानते हैं। यह मानना भी चाहिए कोई ग़लत बात नहीं है। किन्तु मेरा 'धर्म ही श्रेष्ठ' है, यह साबित करने में 'अधर्म करना' सबसे बुरी बात है। अपने धर्म के प्रति प्रेम रखना और मानना चाहिए । ऐसे ही अन्य धर्मों के प्रति आदर भाव भी व्यक्त करना चाहिए। हमारी जो यह सोच है तो एक अच्छे धर्म को माननेवाले अच्छे व्यक्ति में हमारी गणना सत्य के साथ संपादित होगी। मानवता ही सभी धर्मों का मुख्य सार है। बस इतना जान लेने वाला इंसान किसी भी धर्म का हो उसका धर्म अपने-आप श्रेष्ठ हो जाता है।
जिंदगी में भावनाएं वहां इन्वेस्टमेंट करनी चाहिए, जहां हमें कोई पसंद है। यह थोड़ा एक नजरिए से गलत है, उससे बेहतर यह है कि 'भावनात्मक इन्वेस्टमेंट' वहां करना चाहिए जहां सामनेवाले इंसान भी हम से लगाव हो। कोई व्यक्ति हमें अच्छा लगता है और हम उस पर सब न्योछावर कर दे या उसे ही सबकुछ समझने लगे तो यह सब व्यर्थ है। क्यूं व्यर्थ है? क्यूंकि क्या वह व्यक्ति हमे पसंद करता है? हमारी कद्र करता है ? हमारी भावनाएं समझता है? जो इन प्रश्नों का उत्तर हां मिले तो हम सही राह पर है। नहीं तो फिर हमारी 'भावनाओं का मूल्य' कुछ भी रहेगा नहीं। हमें समझना उसी को चाहिए जो हमें "समझता हो" नहीं की 'हमें बार-बार समझा जाता' हो।
ईश्वर का स्मरण यानी हर एक दुःख के लिए हमें मिलानेवाला आश्वासन और सुख के लिए किया जानेवाला धन्यवाद। - Parmar Mayur
वो फटी- तूटी पतंगें, जर्मी पर 'बिखरकर' गिरी पड़ी थी, या कोई जगह लटकी हुई थी। जिंदगी में 'किसी की खुशी के लिए', खुद का बलिदान देना पड़े तो कैसे देना, वह कितना सरल और सहज, तरीके से 'समझाकर' चली गई।
आसमान में उड़ रही पतंग को, आसमां में है, इसका अभिमान आया। बस फिर क्या? खूब जोर करने लगी। छोड़ दी हाथों में पकड़ रखीं दौर को, सीधी जमीं पर आकर गिर पड़ी।
किसी की पतंग 'कटे या खुद की कट' जाए, दोनों तरफ़ तैयारी 'खुशी से पतंगबाजी'की हो, बस फिर क्या? पतंगबाजी में वो पतंग, उत्साह, उमंग और एकता में निर्मित बनता है।
अब धीरे धीरे ठंड का मौसम जाएगा। और जाना भी चाहिए। शास्वत कुछ भी नहीं है इस संसार में, समय की गति में रुकना मना है। लोहड़ी के त्योहार के बाद प्रकृति अपना मिजाज थोडा बदलती है, जीवन के लिए। अब सूरज भी धीरे धीरे गर्म होगा, धरती को कूच गर्माहट झेलनी पड़ेगी, तभी तो बारिश की ठंडी बूंदों से खेत-खलिहानो में हरियाली वापस जिवंत करेंगी। थोडा कष्ट झेलना पड़ता है, सुख का सही आनंद तभी तो पा सकते हैं। अरे पा तो सकते हैं पर आनंद क्या है उसकी सची व्याख्या 'कष्ट' ही समझता है। थोड़ा संघर्ष करके कुछ मिले तो प्राप्त करनेवाले, इंसान को सही उसकी "कद्र" होती है।
हमें जो स्वस्थ यौवन मिला है तो ईश्वर की 'श्रेष्ठ कृपा' है। ये यौवन किसी इंसान को काम आता है, तो यौवन सही अर्थ में 'सक्षम' है। जो बच्चों को अपनी बाहुओं से उठाकर 'ख़ुश' कर सकें, वो यौवन 'ममता का पर्याय' बन सकता हैं। कोई स्त्री जब हो संकट में और उसकी रक्षा कर सकें, सही में तब यह यौवन 'रक्षक' कहलाता है। किसी वृद्ध के 'बुढ़ापे का सहारा' बन सके, वो यौवन सही अर्थ में 'दयावान' है।
हमें कुछ ऐसे इंसानों को, समझना चाहिए। जिनकी वजह से हमारे जीवन में, कुछ अच्छा बदलाव आया हो। जिन्होंने हमारी जिंदगी को संवारने, में बदलने में एक 'अहम् योगदान' दिया हो। हम जब भी निराश हो, तब हमारा होंसला बढ़ानेवाले लोगों। हमें जो ऐसे लोग मिले हैं तो पहले हमें ईश्वर का भी हृदय से धन्यवाद करना चाहिए। बाद में ऐसे सभी लोगों को हृदय से एकबार "धन्यवाद या thank you" कहना चाहिए। कुछ अल्फाज रिश्तों में जान भरते हैं, मेरा लिखा हुआ पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏🙏
हिंदी सभी धर्मों को जोड़ के एक रखनेवाली 'भारत की भाषा' है। हिंदुस्तान की 'शान' हिंदी, हिंन्दु और आपस में भाईचारा है। - Parmar Mayur
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