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Parmar Mayur

Parmar Mayur

@parmarmayur6557


इंसान कोई भी विषय में उसका का 'मत और मंतव्य' कैसे देता है,

उससे ही उस इंसान की 'विवेक बुद्धि' की पहचान हो जाती है।

- Parmar Mayur

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एक सवाल बार-बार दिल को दर्द दे जाता है।

जो किस्मत में हे वो तो मिल ही जाता है,

सब कहते हैं,

पर उनका क्या?जो एक-दूजे के दिलों में रहते हुए भी पास रहे नहीं।

- Parmar Mayur

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एक लड़की ने कहां; चिड़िया को पूरा आसमान दिखाकर,
उनके पंख काटने नहीं चाहिए।

किसी का असली चेहरा देखकर भी तुम 'नफरत' ना कर पाए,

तुम चिंतीत मत हो तुमने उसे नहीं उसने तुम्हें 'खो' दिया।

- Parmar Mayur

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हमारे जीवन के प्रत्येक पल बहुत कीमती है।
फिर उन लम्हों को ऐसे ही क्यूं बर्बाद करना चाहिए?

समय का रिवर्स गियर नहीं होता है,
तो फिर जिंदगी मिलेंगी ना दोबारा।

प्रत्येक पलों को हंसी खुशी से बिताना चाहिए।
जो सच्चे,बच्चे और बूढ़े हैं,
उनके साथ थोड़ा वक्त बिताना चाहिए।

खुशीयों अपने-आप दुगुनी होगी।

किसी के दर्द को सुनकर सच्चे अर्थ में,
दवाई बनना चाहिए।

किसी के दुःखों के कारण नहीं,
किन्तु दर्द निवारक बनाना चाहिए।

जिंदगी का हर एक लम्हा एक उत्सव की तरह लगेगा,
जब हमारे हृदय में निस्वार्थ, ईर्षा रहित खुशी जन्म लेंगी।

बस जिंदगी को कुछ इस तरह जीना चाहिए।

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यदि किसी की जिंदगी से 'दूर जाना' पड़े तो 'अफसोस' होना चाहिए,

हमसे ज्यादा उन्हें।

- Parmar Mayur

कुछ शब्दों, विचारों या व्यक्ति,
सुर्य के भांति होते हैं।

जैसे सुर्य के उजाले से पुरी धरती पर,
प्रकाश फैलता है।
नवजीवन का संचार होता है।

बस उसी तरह कुछ शब्द, विचार या व्यक्ति,
मन भीतर के अंधकार को दूर करके नवचेतना का संचार करते हैं।

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अभी के दौर में ऐसा है कि अपने धर्म को माननेवाले लोग 'अपने धर्म को ही श्रेष्ठ' मानते हैं।

यह मानना भी चाहिए
कोई ग़लत बात नहीं है।

किन्तु मेरा 'धर्म ही श्रेष्ठ' है, यह साबित करने में 'अधर्म करना' सबसे बुरी बात है।

अपने धर्म के प्रति प्रेम रखना और मानना चाहिए ।
ऐसे ही अन्य धर्मों के प्रति आदर भाव भी व्यक्त करना चाहिए।

हमारी जो यह सोच है तो एक अच्छे धर्म को माननेवाले अच्छे व्यक्ति में हमारी गणना सत्य के साथ संपादित होगी।

मानवता ही सभी धर्मों का मुख्य सार है।

बस इतना जान लेने वाला इंसान किसी भी धर्म का हो उसका धर्म अपने-आप श्रेष्ठ हो जाता है।

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जिंदगी में भावनाएं वहां इन्वेस्टमेंट करनी चाहिए,
जहां हमें कोई पसंद है।
यह थोड़ा एक नजरिए से गलत है,

उससे बेहतर यह है कि 'भावनात्मक इन्वेस्टमेंट' वहां करना चाहिए जहां सामनेवाले इंसान भी हम से लगाव हो।

कोई व्यक्ति हमें अच्छा लगता है और हम उस पर सब न्योछावर कर दे या उसे ही सबकुछ समझने लगे तो यह सब व्यर्थ है।

क्यूं व्यर्थ है?

क्यूंकि क्या वह व्यक्ति हमे पसंद करता है?

हमारी कद्र करता है ?
हमारी भावनाएं समझता है?

जो इन प्रश्नों का उत्तर हां मिले तो हम सही राह पर है।
नहीं तो फिर हमारी 'भावनाओं का मूल्य' कुछ भी रहेगा नहीं।

हमें समझना उसी को चाहिए जो हमें "समझता हो" नहीं की 'हमें बार-बार समझा जाता' हो।

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ईश्वर का स्मरण यानी हर एक दुःख के लिए हमें मिलानेवाला आश्वासन और सुख के लिए किया जानेवाला धन्यवाद।

- Parmar Mayur

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