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Nandini Agarwal Apne Kalam Sein

Nandini Agarwal Apne Kalam Sein

@nandiniagarwal835328
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एक जमाना था। औरत को उसके पति के पद का सम्मान दिया जाता था। मास्टर की बीबी मास्टरनी ' डॉक्टर की बीबी डॉक्टरनी , सेठ जी की सेठानी पंडित जी की पंडतानी पर अब ऐसा नही । अब डॉक्टर बीवी डॉक्टरनी ही मिलेगी अन्य पद पर कोई पुरुष उसकी बीबी जो होगी उसी पद अनुसार बुलाया जाता है । अन्यथा सभी गृहणी ही बुलाया जाता है । गृहणी होने पर उसे कोई भी सम्मान की नजरो से नही देखा जाता है।

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मेरा भारत महान ' मेरी संस्कृति मेरी धरोहर । क्या अब भी नियन्त्रण चल रहा है। मेरे ख्याल से नहीं। शॉपिंग के लिए जाओ। कपड़े खरीदने जाओ और "मै ' साडी मे सादा सिम्पल सरल स्वभाव तो बाहर से ही शोरूम मे जाने से पहले गार्ड कह देता है। मेम यहाँ वेस्टन कपड़े मिलते है। घुमते - घूममे बहुत देर हो गयी तेज बारिश होने लगी। "तो मन आया पास मे रेस्टोरेंट मे कुछ खा लेते हैं। वहां हम चेयर पर बैठे ही थे। वेटर बोला चाइनीज फूड ही मिलेगा । हम यू ही आ गये। ऐसा नही लग रहा था । हम अपनी देशी धरोहर में ही है। आते - आते रात हो गयी । काफी देर होने के बाद खाने का टाइम हो गया होटल मे खाने की टेवल पर बैठे । मैनयू कार्ड देखा सब कार्डी मांसाहारी व्यंजनों से भरा हुआ था। फिर तो वहाँ होटल मे पानी भी गले से नही उतरा । जो कि हमारे घर में प्याज लहसुन तक नही खाया जाता । वहाँ अण्डा , मांस तो एक हत्या पाप के बराबर है। ( कहाँ गया हमारा धर्म) ? जब बच्चो के स्कूल मे पेरेन्ट्स मिटिंग में जाती हूं। क्यास टीचर का व्यवहार जिस बच्चे की मम्मी स्टाइलिस्ट लुक दो चार वर्ल्ड इंगलिश में बोल दिया या फिर नौकरी पेशा वाली गाडी खुद ड्राइविंग कर के आयी तो उसकी बातो को ध्यानपूर्वक सुन कर मुस्कुरा कर जबाब दिया जा रहा था। और मैं सीधे स्वाभाव से पूछा मेरा बच्चा क्लास मे व्यवहार - पढाई ने कैसा चल रहा है ? तो मेरे बच्चे मे चार कमी निकाल कर जबाब दिया जाता है। जब कि हमारे हिसाब से हमारा बच्चा सही है। क्या व्यक्ति की पहचान दिखावे से होने लगी है। मन की सरलता अपनी पहचान सादगी से नही सोचो अभी ही हाल है। हिन्दू शासन मे साधे का परिणाम कितना घातक होगा।

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तस्वीर

घर में ' दीवाली कीथा सफाई करते - करते एक पुरानी तस्वीर हाथ लग गयी। वो तस्वीर में मुस्कुराती ' आँखो में सपने लिय कोई राजकुमार ' सालीनता , चहकता चेहरा कितनी खूबसूरत व सादगी भरा ' उस तस्वीर मे मैं जैसे खो सी गयी। क्या' दौर हुआ करता था। कितनी मधुरता हुआ करती थी ' रिश्तों में । कोई' भेद-भाव तुलनात्मक जीवन नहीं था। जो जैसा है। वैसा सही है। आस -पास
जात - पात ऊँच - नीच काम-काज में कोई भी नजरिया अलग नहीं था। उसी पर व्यक्ति धेर्य बांध कर जीता था।
डिप्रेशन नाम की कोई चीज नहीं थी। जिस लड़के के साथ विवाह कर दिया । उसी को अपना फर्ज अपना कर निभा लिया करती थी। (करते थे) दो समय की रोटी,
दो जोड़ी कपड़े ' सर के नीचे छत पर खुश रहता था।
ताजी हवा पानी का तो क्या कहना, रगो मे मिट्टी की खुशब कही भी बैठ जाओ। धरती माँ का एहसास होता । बस यू कहां जाये प्रकृति से जुड़ा हुआ हर व्यक्ति जो एक हिन्दूतानी होने पर गर्व महसूस करता था। तभी शकुनतला " की कोहनी से आईना नीचे गिर टूट गया।
शकुनतला की चेतना जागी ' मैं भी कहां खो गयी। आईने के टुकड़ों मे अपने आप को देखा , जितने आईने के  टुकड़े हर एक टुकड़ा कुछ कहता था। जीवन मे तरह -तरह के रिश्ते निभाये ' तस्वीर से आईने मे झांका और देखा वही लड़की । जिसका चेहरा झाइयों से घिर गया। हर एक झाई में जीवन का तर्जुवा था। परिवार को पचास पचपन साल दिये । अन्त में वही आ गयी जहाँ से शुरू किया। मैं और मेरे पति महोदय । सालो साल हो जाते है। बेटे-बहू पोते पोती के मुँह देखे बिना विदेश मे नौकरी करने से ' लोगो की मानसिक सोच है। कामयाबी '
बेटी मेरी सोन चिड़ियां पंक्षी की तरह उड़ गयी। अपनी गृहस्थी से जब समय होता है। तब आना ' सारा घर काटने को दौड़ता है। अरे भाग्यवान आओ साथ मे खाना खाते हैं। मैने आलू पराठा बना लिया और साथ मे दही
जब तक श्वांस है तब तक तो साथ है। पति - शकुनतला अब थोड़ा मुस्कुरा दो, जिस मुस्कान पर मैं फिद हूं।

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जो व्यपार जमाता है
उसे कमाऊ पुत्र कहते है ।
जिसे जमा हुआ मिलता है
उसे विरासत मे मिला कहते है ॥

लाइफ में, कुछ तो, सिक्रेट होना चाहिये ।
वरना लोग हमारी, व्येलू करना छोड देते हैं।।

अरे . बहु जी ' बर्तन साफ होने में नही आ रहे है।
गर्म पानी दे जाओ ' प्रेमवती अपनी सेठानी को आवाज लगाती है। ' और सेठानी गर्म पानी लेकर बुढी ' अम्मा को पानी देती है। लो . अम्मा जी पानी अब साफ होंग बर्तन '
तभी प्रेमवती घूरते हुए। जै का सेठानी कटोरा भरकर झूठन इसे कूड़े मे डालोगी ' सेठानी हां अम्मा जी '
प्रेमवती अरे हम वार ' की बात कहो तो साची है।
पड़ी लिखी हो कर घर का आधा खाना बचा हुआ कुड़ेदान की जगह सड़क पर घूम रहे पशु पक्षी को डाल दो तो किसी का भला हो। सेठानी चौकते हुए हां अम्मा जी सही बोले है।
सेठानी को प्रेमवती के कहा बुरा न लगा। एक बर्तन मे झूठन ' व खराब खाना सब्जियो फल के छिलके बर्तन में इक्कट्ठे किये ' और बाहर सड़क के पशु को डालना शुरू कर दिया ।
सेठनी सोचने लगी जो बाते ' मोबाइल पर पढ़ती थी, मैसैस ' . कूड़ेदान मे मुंह डाल कर खाने से ' पशुओ को कितनी चोट लगती है। जो बात हर समय हाथ मे लगा, मोबाइल न समझा सका वो बात बूढी अम्मा ने सिखा दी।

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सच्चे रिश्ते कुछ नहीं मांगते,
शिवाय वक्त और इज्जत के।

सपनों में भी तुम्हारे सिवा किसी और का ख्याल नहीं, आता । वे हिसाब प्यार करते है हम।
ख्वाबों मे भी तुम्हारा साथ निभाते है हम ,
तुम हो कि हर पल ठुकराते हों  हमे,
हर पल तुम्हारे आने की आहट दरवाजे पर महसूस करते हैं हम ।
तमन्ना कभी पूरी नहीं हुई , ' 
फिर भी तेरी आंखें मे अपनी पूरी दुनिया देखते है हम ।
तुम से प्यारा कोई लगता नहीं  हमे,
तुम्हारी आदत हो गयी है ,
कैसे जुदा हो कर - रहे हम।
एक पल तुम्हारी अवाज न सुने पल भर का समय सौ बर्ष के बराबर बीताते हम वही शादी से पहले वाली चाहत बन जाये हम।
हर पल सांसो पर तुम्हारा नाम हर संगीत मे गुनगुनाते है हम ,
सोलह श्रृंगार मेरे तेरे लिए जैसे भी हैं साजन की सजनी है आखिर हम ,
गिला शिकवा दुर करके तो देखो चाहत मे नजर फिर भी आयेगे हम ,
रूठो न हम से ऐसे फिर कभी लौट कर न आये हम।
अगले जन्म का वादा नही करते दुसरे घर से ढोली आयी , इस चौखट से अर्थी पर ही जाऊँगी मै ,
ज्यादा देर न हो जाये हमारी वफा को पहचान लो कदर , समझो बीच मंझधार मे न वि छडेगे हम।

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क्यों समाज तूने यह रीत बनाई है
अपनी बिटिया हुई पराई है
न तू सीता है, न तू राधा है
त्याग की मूरत ऐसी बनाई है,
कितने बने महल-द्वारे
घर की चारदीवारी
चौखट बनी लक्ष्मण रेखा है,
देश को आजादी मिली
पर तू कभी आजाद न हुई है ,
गली-गली चौबारे पर बैठा बहरूपिया है
मौसम की तरह दुनिया रंग बदलती है
नारी तेरा रंग बदलना
दुनिया को रास न आया है,
अपनों को भूल न सके
पराए को अपनाया, समझ न सके
ऐसे भंवर में फंसी न रह सके
न निकल सके,
दिन गुजरे महीने बीते
दुखों की गिनती सालों में हो जाती है,
ऐसी रहती तू जैसे पंख काट दिए पंछी के,
क्यों जुर्म करें नारी पर ये लक्ष्मी है,
सरस्वती है,
जब अति हो जाए मां दुर्गा का अवतार है
औरत ही नानी, औरत ही दादी
औरत ही मां, बुआ, मौसी है
औरत न हो तो ये दुनिया अधूरी है।

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