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**बढ़ती उम्र का लिवास**

धीमे-धीमे घटता नहीं है जीवन का सागर,
बस बदलता है उसका रूप, उसका आकार।
सफेद होते बालों में छुपी है कहानी,
वक्त की नर्म छुअन, यादों की रवानी।
हाथों की लकीरों में लिखा अनगिनत संघर्ष,
हर लहर में है जिंदगी का एक अवलंब।
धीमी पड़ती सांसों में भी गूंजता है शोर,
फ़र्क़ बस इतना है कि अब कम है दौर।
यह उम्र नहीं है बोझ, ना कोई बंदिश,
यह एक सुकून है मन की, वक्त की गंध।
संघर्ष से परे अब मिलेगा विश्राम,
जहाँ आत्मा पाएगी अपना स्वाभिमान।
बढ़ती उम्र का यह लिवास है वरदान,
स्नेह, सम्मान और प्रेम का महान।
जो पाता इसे, वह समझता है सच,
जीवन का संगीत है, इस धीमी गति का मधुमय स्पर्श।

आर्यमौलिक

deepakbundela7179

कब्र तक पहुंच जाते जनाब,बड़ी देर करदी आने मे
वो तो हम अब तक होश मे है, बड़ी भीड़ लगी थी मयखाने मै .

कुछ कर भी नहीं सकता तेरा, तू आज भी मेरा कल भी मेरा
तुझसे जुदा मै रहे नही सकता ,तू पल भी मेरा तू भर भी मेरा .

लगी थी आग पानी में, जमाने लगे बुझाने मे
ओरो पर इतना भरोसा, बस हमसे शर्म लगी बताने मे .

mashaallhakhan600196

कुछ भी नहीं होना चाहिए
बेवजह इस जहाँ में
अरे यहाँ तो पैदाइश पर भी
सौ सवाल उठाये जाते है।

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

अध्याय 1 — सौंदर्य का जन्म ✧

✍🏻 — 🙏🌸 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲

आरंभ में कुछ नहीं था —
न रूप, न रंग, न शब्द, न ध्वनि।
बस एक मौन था,
जो स्वयं को देखना चाहता था।

देखने की उसी चाह से
सृष्टि की पहली लहर उठी।
और जब चैतन्य ने स्वयं को प्रतिबिंबित किया,
वहीं से सौंदर्य का जन्म हुआ।

सौंदर्य कोई वस्तु नहीं,
वह आत्मा की तरंग है —
जो पंचतत्व में उतरकर
रूप ले लेती है।

मिट्टी ठहरना चाहती थी,
जल बहना,
अग्नि जलना,
हवा नाचना,
आकाश सबको थामे रहना।
जब ये पाँचों तत्व
एक साथ चैतन्य के स्पर्श में आए —
तब सृष्टि मुस्कराई,
और उसी मुस्कान का नाम पड़ा — सौंदर्य।

सौंदर्य पहली दृष्टि में नहीं,
पहले अनुभव में था —
जहाँ कोई देखने वाला नहीं था,
केवल देखा जाना था।

जब देह बनी,
तो सौंदर्य सीमित हो गया।
अब वह रूप बन गया —
कभी स्त्री का, कभी पुरुष का,
कभी फूल का, कभी तारों का।
पर असल में,
हर रूप के पीछे वही चेतना थी
जो स्वयं को पहचानना चाहती थी।

स्त्री उस चेतना का ग्रहणशील भाग है,
पुरुष उसका दर्शक भाग।
एक भीतर झिलमिलाता है,
दूसरा बाहर से झांकता है।
दोनों में ही सौंदर्य है —
क्योंकि दोनों ही अधूरे हैं।

सौंदर्य पूर्णता नहीं,
अधूरापन का नृत्य है।
जहाँ एक दूसरे की ओर झुकता है,
वहाँ से अस्तित्व खिलता है।

रूप का सौंदर्य तभी तक है
जब तक भीतर की रोशनी उसे छूती रहती है।
जिस दिन चेतना पीछे हटती है,
रूप मिट्टी बन जाता है।

इसलिए जो केवल देखने में रुक जाता है,
वह सौंदर्य खो देता है।
और जो देखने के पार पहुँच जाता है,
वह स्वयं सौंदर्य बन जाता है।

क्योंकि सौंदर्य का असली जन्म
बाहर नहीं,
भीतर होता है —
जहाँ कोई “मैं” नहीं,
सिर्फ एक मौन साक्षी रह जाता है।

वही साक्षी —
वही चैतन्य —
वही सौंदर्य।

अगला अध्याय “रूप और दृष्टि का संवाद”

bhutaji

आज के समय में शादीशुदा मर्दों को किसी और औरत से रिश्ता बनाना मुश्किल नहीं रहा।
वे जानते हैं कैसे किसी की कमजोरी, अकेलेपन या झूठे स्नेह के बहाने दिल में जगह बना लेनी है।
लेकिन असल सवाल यह है —
क्या गलती सिर्फ़ मर्दों की है?
क्योंकि दूसरी तरफ़ की औरत भी जानती है कि वह किसी की पत्नी को दुख दे रही है।
फिर भी बहुत कम ऐसी औरतें मिलती हैं, जो साफ़-साफ़ कह दें —

> “नहीं, तुम्हारी पत्नी जैसी भी है, तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।
मैं किसी के बीच नहीं आऊँगी।”



अगर हर औरत यह “ना” कह देती,
तो शायद
घर टूटने से बच जाएंगे।

archanalekhikha

have love and get life

kattupayas.101947

plans vs life

kattupayas.101947

ask help when you are in trouble

kattupayas.101947

mm let's fight

kattupayas.101947

Good evening friends..

kattupayas.101947

खोया क्या
फिर दुख कैसा..
पाकर भी तो
खोना ही है..
--#डॉ_अनामिका --
#हिंदी_का_विस्तार #हिंदीशब्द
#हिंदी_पंक्तियाँ

rsinha9090gmailcom

सुनिए प्रयाग शुक्ला की कहानी सामन जो राजेंद्र यादव के कहानी संग्रह "एक दुनिया समानांतर" में संकलित है।

https://youtu.be/B6eCiGYJ7GQ?si=j9Jf66RtTU_ejSua\

lk2433554gmail.com182641

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भारतीय भाषाओमें अनगिनत रचनाएं पढ़ें, लिखें और सुनें, बिलकुल निःशुल्क!

rajukumarchaudhary502010

कभी-कभी...
ज़िंदगी कुछ ऐसे मोड़ पर ले आती है,
जहाँ "रोकना" भी मुश्किल होता है... और "जाने देना" भी।
ऐसे ही किसी पल में... एक लफ़्ज़ दिल से निकलता है — “इजाज़त”......

ritu5403

सूत्र : धर्म और ईश्वर की भ्रांति

सारे रंग उसके हैं —
फिर भी मनुष्य नए रंग और रूप गढ़कर
अपना ईश्वर बना लेता है।

जो है, वही सब कुछ ईश्वर है —
फिर भी मनुष्य उसे बाँट देता है,
कहता है — “यह मेरा ईश्वर है।”

इस तरह वह अनगिनत जन्मों तक
ईश्वर को जान नहीं पाता।

वह स्वयं ईश्वर की लीला है,
और फिर भी अलग ईश्वर रच रहा है।
सड़कें, शहर, साधन — ये मनुष्य के हैं,
पर वृक्ष, नदियाँ, ऋतु, आकाश —
सब उसी के रंग हैं।

वह स्वयं बो रहा है,
स्वयं पाल रहा है,
स्वयं संहार कर रहा है।

फिर भी मनुष्य पूछता है —
“मेरा ईश्वर कौन है?”

शायद वह अपने को
अस्तित्व से अलग मान बैठा है,
अपना निजी अस्तित्व गढ़ना चाहता है।

यही असंभव प्रयास —
बंधन है, अंधकार है, अज्ञान है।

और इसी अंधकार का नाम तुमने धर्म रख दिया है।

— ✍🏻 𝓐𝓰𝔂𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲

bhutaji

"व्रज रज"
विष्णुजी के व्रज में कृष्ण रूप में अवतार लेने की बात जब देवताओ को पता लगी, तो सभी बाल कृष्ण की लीला के साक्षी बनने को लालायित हो गए। देवताओं ने व्रज में कोई ग्वाला, कोई गोपी, कोई गाय, कोई मोर तो कोई तोते के रूप में जन्म ले लिया। कुछ देवता और ऋषि रह गए। वे सभी ब्रह्माजी के पास आये और कहने लगे कि ब्रह्मदेव आप ने हमें व्रज में क्यों नही भेजा? आप कुछ भी करिए, किसी भी रूप में भेजिए।

ब्रह्मा जी बोले व्रज में जितने लोगों को भेजना संभव था उतने लोगों को भेज दिया है। अब व्रज में कोई भी जगह खाली नहीं बची है। देवताओं ने अनुरोध किया प्रभु आप हमें ग्वाले ही बना दें। ब्रह्माजी बोले जितने लोगों को बनाना था उतनों को बना दिया। और ग्वाले नहीं बना सकते। देवता बोले प्रभु ग्वाले नहीं बना सकते तो हमें बरसाने को गोपियाँ ही बना दें। ब्रह्माजी बोले, अब गोपियों की भी जगह खाली नही है। देवता बोले गोपी नहीं बना सकते, ग्वाला नहीं बना सकते तो आप हमें गायें ही बना दें। ब्रह्माजी बोले गाएँ भी खूब बना दी हैं। अकेले नन्द बाबा के पास नौ लाख गाएँ हैं। अब और गाएँ नहीं बना सकते। देवता बोले प्रभु चलो मोर ही बना दें। नाच-नाच कर कान्हा को रिझाया करेंगे। ब्रह्माजी बोले मोर भी खूब बना दिए। इतने मोर बना दिए की व्रज में समा नहीं पा रहे। उनके लिए अलग से मोर कुटी बनानी पड़ी। देवता बोले तो कोई तोता, मैना, चिड़िया, कबूतर, बंदर कुछ भी बना दीजिए। ब्रह्माजी बोले वो भी खूब बना दिए। पुरे पेड़ भरे हुए हैं पक्षियों से। देवता बोले तो कोई पेड़-पौधा, लता-पता ही बना दें। ब्रह्मा जी बोले पेड़-पौधे, लता-पता भी मैंने इतने बना दिए कि सूर्यदेव मुझसे रुष्ट हैं। उनकी किरनें भी बड़ी कठिनाई से व्रज की धरती को स्पर्श करती हैं। देवता बोले प्रभु कोई तो जगह दें। हमें भी व्रज में भेजिए। ब्रह्मा जी बोले कोई जगह खाली नही है। तब देवताओ ने हाथ जोड़ कर ब्रह्माजी से कहा प्रभु अगर हम कोई जगह अपने लिए ढूँढ़ के ले आएँ तो आप हम को व्रज में भेज देंगे? ब्रह्मा जी बोले हाँ तुम अपने लिए कोई जगह ढूँढ़ के ले आओगे तो मैं तुम्हें व्रज में भेज दूंगा। देवताओ ने कहा धूल और रेत कणों की तो कोई सीमा नहीं हो सकती। और कुछ नहीं तो बालकृष्ण लल्ला के चरण पड़ने से ही हमारा कल्याण हो जाएगा। हम को व्रज में धूल रेत ही बना दें।
ब्रह्मा जी ने उनकी बात मान ली। इसलिए जब भी व्रज जाये तो धूल और रेत से क्षमा मांग कर अपना पैर धरती पर रखें। क्योंकि व्रज की रेत भी सामान्य नही है। वो रज तो देवी देवता, ऋषि-मुनि हैं।

NkB
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deepakbundela7179

Good morning friends have a great Sunday

kattupayas.101947

बड़े सपनों की कीमत, बड़ी मेहनत से चुकाई जाती है


MIT AI Lab के सह-संस्थापक, और मानव दिमाग की नकल करने वाले मशीन मॉडल पर शोध किया।

4. 👦 सिद्धार्थ नंदयाला —
नई पीढ़ी के नवाचार का उदाहरण हैं — उनका “Circadian AI” ऐप स्वास्थ्य क्षेत्र में AI के व्यावहारिक उपयोग को दिखाता

rajukumarchaudhary502010

The cat from the Hat is out. Good morning 🌄

kabirwrites

ममता गिरीश त्रिवेदी की कविताएं
कविता का शीर्षक है 🌹 सीप के मोती

mamtatrivedi444291

वाणी मैं भी अजीब शक्ति होती है,
कड़वा बोलने वाले का शहद भी नहीं बिकता और मीठा बोलने वाले की मिर्ची भी बिक जाती है... 🙏सुप्रभात 🙏

sonishakya18273gmail.com308865

🌟 దీపావళి కథ – చీకట్లపై వెలుగుల జయగాథ

ఏదో ఒకప్పుడు, అంధకారంతో నిండిన లోకంలో ప్రజలు భయంతో జీవించేవారు. రాక్షసులు, అన్యాయం, అజ్ఞానం పెరిగి, సత్యం కూలిపోతుండేది. ఆ సమయంలో ధర్మం నిలబెట్టడానికి, చెడును నాశనం చేయడానికి భగవంతుడు అవతరించాడు.

దీపావళి పండుగ అనేక కథలతో అనుసంధానమై ఉంది — ప్రతి ప్రాంతం, ప్రతి సంప్రదాయానికి ఒక ప్రత్యేక అర్థం ఉంది. ఇప్పుడు వాటిని ఒక కొత్తగా, సమగ్రంగా చూద్దాం 👇


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🪔 1. శ్రీరాముని అయోధ్యకు తిరిగి రాక

రామాయణ కాలంలో, రాముడు రావణుడిని సంహరించి సీతాదేవిని రక్షించి, లంకను జయించి, 14 సంవత్సరాల వనవాసం అనంతరం అయోధ్యకు తిరిగి వచ్చాడు.
ఆయన తిరిగి వస్తున్నప్పుడు అయోధ్య ప్రజలు ఆనందంతో నిండిపోయారు. రాముని స్వాగతించేందుకు వారు వేలాది దీపాలను వెలిగించారు.

అలా మొదలైంది దీపాల పండుగ — “దీపావళి”.
దీపాలు వెలిగించడం అంటే చీకట్లపై వెలుగుల జయాన్ని సూచిస్తుంది — అంటే అజ్ఞానంపై జ్ఞానం, చెడుపై మంచితనం, దుఃఖంపై ఆనందం విజయం.


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⚔️ 2. శ్రీకృష్ణుడు మరియు నరకాసురుని కథ

ఇంకో ప్రాచుర్యం పొందిన కథ ప్రకారం, దీపావళి రోజున భగవంతుడు శ్రీకృష్ణుడు భూమాత పుత్రుడు అయిన నరకాసురుడు అనే రాక్షసుడిని సంహరించాడు.
నరకాసురుడు 16,000 దేవకన్యలను బంధించి ఉంచాడు. శ్రీకృష్ణుడు సత్యభామతో కలిసి అతనిని యుద్ధంలో జయించాడు.
అతడు చనిపోయే ముందు ఒక వరం కోరాడు — “నా మరణదినం ప్రజలందరికీ ఆనందదినంగా ఉండాలి” అని.

అదే రోజు నరక చతుర్దశి, దీపావళి పండుగకు పూర్వదినం.
ఇది చెడుపై ధర్మం విజయాన్ని గుర్తుచేస్తుంది.


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💰 3. లక్ష్మీదేవి అవతరణ

సముద్ర మథన సమయంలో, దేవతలు-దానవులు సముద్రాన్ని కలుపుతుండగా, క్షీరసాగర మథనం నుండి మహాలక్ష్మీదేవి అవతరించింది.
ఆ రోజు కార్తీక అమావాస్య. అందుకే ఆ రాత్రి ప్రజలు లక్ష్మీదేవిని ఆరాధిస్తారు.
ఆమె ఇంటికి అడుగు పెడితే సంపద, సౌభాగ్యం, సంతోషం నిండుతుందని నమ్మకం.

అందుకే దీపావళి రోజున ఇళ్లు శుభ్రం చేసి, కొత్త బట్టలు ధరించి, వెలుగులు వెలిగించి, లక్ష్మీదేవిని పూజిస్తారు.


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🔥 4. మహాకాళీ మరియు రక్తబీజుడు

దక్షిణ భారతదేశంలో దీపావళిని కాళీ పూజతో కూడా అనుసంధానిస్తారు.
మహాకాళీ దేవి రక్తబీజుడు అనే రాక్షసుడిని సంహరించి భూమిని రక్షించింది.
ఆమె కోపం తర్వాత ప్రపంచాన్ని కాపాడే శక్తిగా మారింది — స్త్రీశక్తికి ఇది ప్రతీక.


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🌸 పండుగ సారాంశం

దీపావళి అంటే కేవలం దీపాలు వెలిగించడం కాదు —
ఇది మన హృదయంలోని చీకట్లను తొలగించి,
వెలుగులు, ప్రేమ, ధర్మం, జ్ఞానం, శాంతి నింపే పండుగ.

దీపావళి మనకు నేర్పేది:

> “మనసులోని చెడును జయించి, వెలుగును నింపితేనే నిజమైన దీపావళి.”




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🌼 పండుగ ఆచారాలు

ఇల్లు శుభ్రం చేసి అలంకరించడం

నూనె దీపాలు వెలిగించడం

లక్ష్మీ పూజ

కొత్త బట్టలు ధరించడం

పంచదీపాలు, పంచపాకాలు, పంచభక్ష్యాలు వంటివి సిద్ధం చేయడం

కుటుంబసభ్యులతో ఆనందంగా సమయం గడపడం

పేదవారికి సహాయం చేయడం



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🌟 దీపావళి – వెలుగుల ఉత్సవం

దీపావళి మనసులో వెలుగులు నింపే ఆధ్యాత్మిక పండుగ.
ఇది మనలోని చెడును తొలగించి, మనుషుల మధ్య ప్రేమ, స్నేహం, ఆనందం పంచే సమయం.




The End

Thank you

sriniha1234