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Nirbhay Shukla

Nirbhay Shukla

@nirbhayshuklanashukla.146950
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दादी,
आपके बिना ये घर–घर नहीं लगता

आज आँगन सूना लगता है,
आपकी हँसी बिना सब अधूरा लगता है।
हर दिन अब कुछ ज़्यादा ही भारी लगता है।
आपके बिना जीना भी अब थोड़ा मुश्किल लगता है।
आपके साथ वो आंगन में बैठना अब भी याद है मुझे

अब आप नहीं तो ये आँगन भी आज पराया लगता है।

और सच कहूं तो
दादी,
आपके बिना ये घर–घर नहीं लगता
- Nirbhay Shukla

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दादी,
आपके बिना ये घर–घर नहीं लगता

आज आँगन सूना लगता है,
आपकी हँसी बिना सब अधूरा लगता है।
हर दिन अब कुछ ज़्यादा ही भारी लगता है।
आपके बिना जीना भी अब थोड़ा मुश्किल लगता है।
आपके साथ वो आंगन में बैठना अब भी याद है मुझे

अब आप नहीं तो ये आँगन भी आज पराया लगता है।

और सच कहूं तो
दादी,
आपके बिना ये घर–घर नहीं लगता

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Writer Nirbhay Shukla
"न तू ज़मीं के लिए है,
न आसमान के लिए है…
जो जहाँ है, वो सिर्फ़ तेरे लिए है,
पर तू बना ही नहीं इस जहाँ के लिए…" 💓

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Writer Nirbhay Shukla

कुछ मौसम लौट आते हैं
सिर्फ यह देखने कि दरवाज़ा अब भी उसी तरफ खुलता है।तेरे चुने फूलों की पंखुड़ियाँ
मेरी डायरी में आज भी तारीख़ें बनकर गिरती हैं।अक्टूबर समझाता है हर साल
कि यादें भी रुतों की तरह अपनी बारी से आती हैं।अधूरा मैं, अधूरा तू—
मिलें तो पूरा, वरना इंतज़ार की ही परिभाषा हैं

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Writer Nirbhay Shukla

कुछ तो है.....

@nirbhay_shukla_

मासूम बचपन....गुमराह जवानी...
मोहताज बुढ़ापा....
बेरहम मौत...

वक्त तय है..... जगह तय है.....घटना तय है....
घटित होना तय है.....🌎

शीर्षक: परछाइयों का नामकौन हो तुम?
ना देह का चेहरा,
ना रिश्तों का चश्मा,
ना भीड़ में गूँज,
बस हवा में एक धीमा सा कम्पन।कौन हो तुम?
ना धूप बताते,
ना छाँव बताते,
ना समय की घड़ी,
बस पलकों पर टिके दो कतरन सपने।कहाँ से आते हो?
स्वर बिना साज़,
अक्षर बिना आँच,
लफ्ज़ों से परे एक चलती हुई ख़ामोशी।कहाँ खो जाते हो?
रात की मोड़ पर,
नींद की सीवन में,
दिल के तहख़ाने में रखी चुप्पियों के पास।क्या कहते हो?
ना कोई फ़तवा,
ना कोई आदेश,
बस इतना—“अपने भीतर की देहलीज़ पार कर।”क्या चाहते हो?
ना मेरा नाम,
ना मेरी जीत,
बस आँख का दरवाज़ा खुला रहे उजाले की ओर।मैं कौन हूँ फिर?
ना कवि, ना साधक,
ना तिलिस्म, ना दावेदार—
मैं तो अपने ही प्रश्नों का अनकहा अनुनाद हूँ।और तुम?
शायद वही जो हर दहलीज़ पर दस्तक है,
हर कदम के नीचे अदृश्य पुल,
हर टूटन में बचा हुआ एक साबुत राग।चलो, समझौता करते हैं—
तुम नाम मत बताना,
मैं मानी नहीं पूछूँगा,
हम दोनों मिलकर इस अनाम रोशनी को पहन लेंगे।जब भी भटकूँ—
तुम हवा बन जाना,
मैं दीया बन जाऊँगा,
और रात के काले जल में अपना आकाश लिख दूँगा।

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