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Soni shakya

Soni shakya

@sonishakya18273gmail.com308865


आज फिर बादल छाए ,
पानी भी बरसा झुम कर
पर...न जाने क्यों
मेरा आंगन सुखा सा‌ लगता है!!
- Soni shakya

मैं.. अल्हड़, मदमस्त, महकती,बहकती
चंचल, अविरल प्रेम की धारा,
मुझे कहां पता था कोई किनारा।
तेरी ज्ञानी दुनिया के सागर ने मुझे,
‌ " विलुप्त"कर डाला ...!!

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बहुत शिकायत थी..
इस दुनिया कि भीड से ,
उस वक्त सब खत्म हो गई
जब तुम्हें उस भीड़ में खड़े पाया....!!

"वक्त तो होता ही है...
बदलने के लिए,
ठहरते तो सिर्फ... लम्हे हैं !!

ख़ामोशी.. तुम समझ नहीं रहे
और अल्फाज़ अब बचे नहीं...!!

" मुझे मन्जिल का ज्ञान था
उसे रास्ते का ,
वो मन्जिल पर पहुंच गए
और मैं... रास्ते में भटक गई !!!

"मन" क्या चाहता है,
बस इतना कि...
चांद भी पुरा रहे और
......रात भी न हो !!

adhura hi sahi per....Maine tumhe pura paya he