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Deepak Bundela Arymoulik

Deepak Bundela Arymoulik Matrubharti Verified

@deepakbundela7179
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जिन्दा

जिस्म से जिन्दा, रूह से मरे हुए हैं,
साँसें चलती हैं, मगर ज़मीर ठहरे हुए हैं।
आईनों में रोज देखते हैं चेहरा अपना,
पर सच के सामने की नजरों में झुके हुए हैं।

कब्र में लेटे मुर्दा भी इंसान से डरे हुए हैं,
क्योंकि यहाँ जीते लोग ही कातिल ठहरे हुए हैं।
हाथों में ताज, होंठों पर झूठ की हँसी,
दिलों में बस खंजर, इरादे ज़हरीले भरे हुए हैं।

बोलते बहुत हैं, पर सच की जुबाँ गूँगी है,
हर आवाज बिकाऊ, हर ख़ामोशी सस्ती है।
इंसानियत को हमने बोझ समझकर उतार दिया,
अब हैरानी है कि फ़िजा इतनी बदहवास क्यों सी है।

जो जिन्दा हैं, वही ज़्यादा ख़ौफ फैलाते हैं,
मुर्दे तो चुप हैं, वो किसी का क्या बिगाड़ते हैं।
यह दौर गवाही माँगता है, चरित्र की नहीं,
यहाँ तो साए भी अब हथियार उठाते हैं।

अगर रूह को जिन्दा करने की चाह बची हो कहीं,
तो पहले इंसान बनना सीखना होगा यहीं।
वरना इतिहास लिखेगा तंज के हर पन्ने पर—
कब्रें महफूज थीं, ख़तरा जिन्दा लोगों से ही था यहीं।

आर्यमौलिक

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मोहब्बत

मोहब्बत सच में होती है, इसमें कोई झूठ नहीं,
झूठ तब पैदा होता है, जब उम्मीदों का कद सच से ऊँचा हो जाए।

न मिली तो उसे धोखा कह देना आसान है,
पर हर अधूरी कहानी में बेईमानी ज़रूरी नहीं होती।

कुछ लोग दिल से मोहब्बत करते हैं,
और जब मुक़द्दर साथ न दे,
तो अपने नसीब की हार को
दूसरे की नीयत का गुनाह बना देते हैं।

मोहब्बत का न मिलना विफलता हो सकता है,
पर हर विफलता धोखा नहीं होती,
कभी-कभी दो सच्चे रास्ते
बस एक ही मोड़ पर खत्म हो जाते हैं।

आज के वक़्त में मोहब्बत से पहले
दिल नहीं, दिमाग़ का पका होना ज़रूरी है,
इतना ज्ञानी कि
चंद मुलाक़ातों में इंसान को पढ़ सको।

बातों के मिठास में छुपे ज़हर को पहचान सको,
नज़रों की सच्चाई और आदतों की चालाकी को
अलग-अलग देख सको।

क्योंकि आज मोहब्बत अंधी नहीं,
लोग नक़ाब पहन कर प्यार करते हैं,
और गिरने के बाद होश आने से बेहतर है
चलने से पहले रास्ता पहचान लेना।

इसलिए मोहब्बत करो,
पर आँखें खोल कर,
दिल दो, पर पहले इंसान को समझ कर,
ताकि न मोहब्बत बदनाम हो
और न हर अधूरी कहानी को
धोखे का नाम देना पड़े।

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प्यार तब महसूस हुआ, जब शब्द मौन हो गए,
और कोई चुपचाप मेरे पास आकर बैठ गया।

ना सवाल थे, ना सलाहों की भीड़,
बस मेरी ख़ामोशी को किसी ने समझ लिया।

वो साथ, जो बिना माँगे मिल गया,
वो हाथ, जो मुश्किल में थाम लिया।

तभी जाना मैंने—प्यार दिखावा नहीं,
किसी के दर्द को अपना मान लेना ही प्यार है।

#आर्यमौलिक

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गवाही

अगर आँखों की गवाही सच की राह दिखाती है,
तो खामोशी भी कई बार इक सच्ची ज़बानी होती है।
लफ़्ज़ मुकर जाएँ तो क्या, एहसास कहाँ मुकरते हैं,
दिल की हर एक धड़कन अपनी ही कहानी होती है।
मोहब्बत में तबाही को तुम सच कह गए हो लेकिन,
कभी-कभी इसी राख से ही नई ज़िंदगानी होती है।
किताबों से जो न समझ आए, वो तजुर्बे सिखा देते हैं,
ज़िंदगी की पाठशाला बड़ी पुरानी होती है।
हया की ओट में लिपटी गुनाही सच सही मगर,
कभी उसी पर्देदारी में इज़्ज़त की निशानी होती है।
सुकूँ लफ़्ज़ों में उतरे ये भी तो मुमकिन नहीं,
जो साथ गुज़र जाए बस वही असल रवानी होती है।

आर्यमौलिक

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पैसा आया तो धैर्य ने चुपचाप
अपने जूते दरवाज़े पर छोड़ दिए,
संवेदनाएँ बोलीं— अब यहाँ जगह कम
है,


और सहनशीलता ने सिर झुका कर विदा ले ली।
अहंकार सिंहासन पर बैठा मुस्कराया,
बोला— अब मैं ही घर का मालिक हूँ,
जहाँ पहले इंसान बसता था,
अब सिर्फ़ दामों में तौला हुआ घमंड रहता है।

आर्यमौलिक

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कुछ बातें

कुछ बातें ऐसी हैं,
जो शब्दों में ढाली नहीं जातीं,
ख़ामोशी की दहलीज़ पर
बस ठहर कर रह जातीं।

कुछ एहसास ऐसे होते हैं,
जो आँखों से उतर जाते हैं,
ज़ुबान तक आते-आते
ख़ुद ही बिखर जाते हैं।

समझदार को हर बात
समझाई नहीं जाती,
उसकी चुप्पी में ही
पूरी कहानी समा जाती।

जो सच दिल में उतर जाए,
उसे तर्क की ज़रूरत क्या,
जहाँ महसूस होना काफ़ी हो,
वहाँ दलीलें बोली नहीं जातीं।

कुछ रिश्ते, कुछ दर्द,
बस समझे जाते हैं,
कहने की ज़िद में अक्सर
अपने ही टूट जाते हैं।

आर्यमौलिक

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जूते

साथ सब ने छोड़ दिया,
वक़्त ने भी मुँह मोड़ लिया,
भीड़ में रहकर भी
मैंने खुद को अकेला छोड़ लिया।

जो अपने थे,
ज़रूरत बनते ही पराए हो गए,
कंधे जिन पर भरोसा था,
वो अचानक बोझ से घबरा गए।

लेकिन—
फटे, टूटे जूते आज भी
मेरे साथ हैं,
हर पत्थरीली राह पर
मेरी तक़दीर के गवाह हैं।

जब पाँव छिले,
तो इन्होंने शिकायत नहीं की,
जब लोग हँसे,
तो इन्होंने शर्म महसूस नहीं की।

हर गिरावट में
मुझे उठना सिखाया इन्होंने,
हर मंज़िल से पहले
संघर्ष का मतलब बताया इन्होंने।

लोग साथ छोड़ गए
मेरी हैसियत देखकर,
जूते साथ निभा गए
मेरी हालत देखकर।

शायद इसलिए आज भी
सर उठाकर चलता हूँ मैं,
क्योंकि वफ़ा का मतलब
फटे, टूटे जूतों से सीखा है मैंने।

आर्यमौलिक

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कलम की पुकार

मैं लिखते-लिखते थक चुका हूँ,
उँगलियाँ बोझिल, शब्द भी चुप हैं।
कलम मुस्कुराई, धीरे से बोली—
“रुक क्यों गए? अभी तो सफ़र बाकी है।”

“मैं तो सदियों से लिखती आई हूँ,
हर अँधेरे में दीप जलाती रही।
इस आस में—आज नहीं तो कल,
कोई तो नींद से जागेगा सही।”

मैंने कहा—“रात बहुत हो चुकी है,
थकान ने मेरे हौसले तोड़ दिए।”
वो हँस पड़ी, स्याही चमक उठी—
“अँधेरा ही तो है, लिखने के लिए।”

“चल उठ और लिख उन ख़्वाबों के नाम,
जो दिन में सोए, रात में रोते हैं।
तेरे शब्द ही दस्तक देंगे,
जहाँ ज़मीर अब भी सोते हैं।”

मैंने फिर कलम को थाम लिया,
थकान कहीं पीछे छूट गई।
क्योंकि लिखना सिर्फ़ शब्द नहीं,
जागते रहना भी एक जिम्मेदारी हुई।

आर्यमौलिक

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मेरी मां

जैसे तुम्हारी भाषा तुम्हारी माँ है,
वैसे ही हिंदी भाषा मेरी माँ है।

जिसकी गोद में मैंने पहला शब्द बोला,
जिसके आँचल ने हर भाव को खोला।

उसके अक्षर मेरी साँसों में बसे हैं,
मेरे सपनों, विश्वासों में बसे हैं।

जब मन टूटा, तो उसी ने सहलाया,
जब मैं चुप रहा, उसी ने बुलवाया।

उसकी लोरी में संस्कारों की गंध है,
उसकी वाणी में मिट्टी की सुगंध है।

मेरा गर्व, मेरी पहचान वही है,
मेरी हर मुस्कान की जान वही है।

तुम अपनी भाषा से रखो प्रेम अपार,
मुझे हिंदी से है माँ जैसा ही प्यार।

क्योंकि जैसे माँ से बढ़कर कुछ नहीं,
वैसे हिंदी से बढ़कर मेरी दुनिया नहीं।

आर्यमौलिक

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तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ

तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ,
हर शब्द में छुपा एक एहसास पकड़ता रहूँ।
तुम्हारी कलम जब भी ख़ामोशियाँ तोड़े,
मैं उन ख़ामोशियों की आवाज़ बनता रहूँ।

मैं लिखता रहूँ, तुम पढ़ते रहो,
मेरे जज़्बातों का मतलब समझते रहो।
जो कह न सका मैं आँखों से कभी,
तुम अक्षरों में उसे महसूस करते रहो।

तुम्हारे लिखे हर लफ़्ज़ में मैं मिल जाऊँ,
मेरे लिखे हर सच में तुम झलक जाओ।
ना मिलना हो तो भी क्या ग़म है यहाँ,
हम लिखने-पढ़ने में ही रोज़ मिल जाएँ।

तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ,
वक़्त की धूप में भी साया करता रहूँ।
मैं लिखता रहूँ, तुम पढ़ते रहो,
यही रिश्ता रहे—कलम और दिल का रहे।

आर्यमौलिक

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