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Deepak Bundela Arymoulik

Deepak Bundela Arymoulik Matrubharti Verified

@deepakbundela7179
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तेरी यादें तुझसे मिलने को मजबूर करती हैं... I
मेरी हसरते देहलीज पर तेरी रोज मरती हैं... II

मांगना ही छोड़ दिया हमनें वक्त किसी से,
क्या पता उनके पास इनकार का भी वक्त न हो!!

परवाज़

मैंने ज़मीन से नहीं,
अपने डर से विदा ली थी
जब पहली बार
ख़्वाबों ने
परवाज़ माँगी।

पंख काग़ज़ के थे
आसमान तंज़ करता था,
हवा कहती थी—
अभी ठहर जाओ,
मगर दिल को
रुकना नहीं आता था।

हर गिरना
एक सबक़ बना,
हर चोट ने
ऊँचाई का पता दिया—
मैं समझ गया
उड़ना हुनर नहीं,
हिम्मत की आदत है।

आज भी
उड़ान पूरी नहीं,
पर यक़ीन पूरा है—
जो ख़ुद पर भरोसा कर ले
उसे परवाज़
इजाज़त नहीं,
रास्ता देती है।

आर्यमौलिक

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ये मोहब्बत थी
या किसी तन्हा शाम की आदत,
जो धीरे-धीरे
मेरे कमरे में फैल गई।
तुम आईं
और शब्दों को कम बोलना सिखा गईं,
मैंने ख़ामोशी को
तुम्हारा जवाब समझ लिया।
मैं हर रोज़
अपने हिस्से का सच
तुम्हारे नाम लिखता रहा,
तुम हर बार
उसे पढ़े बिना
मोड़कर रख देती रहीं।
कभी-कभी सोचता हूँ—
इश्क़ वो नहीं होता
जो मिल जाए,
इश्क़ शायद वो होता है
जो आदमी को
थोड़ा और अकेला कर दे।
आज भी
तुम्हारी याद
किसी पुराने खत की तरह है—
ना फाड़ सकता हूँ,
ना दोबारा पढ़ने की हिम्मत है।

आर्यमौलिक

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ये सफ़र उनका है जो चल न सके,
ये शहर उनका है जो संभल न सके।
हमने तो ठहर कर भी हार मान ली,
वो गिर-गिर कर भी खुद को बदल न सके।

आर्यमौलिक

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जो चलना छोड़ दे, वो साँस लेता हुआ भी
धीरे-धीरे थक जाता है,
जो सवाल नहीं करता,
उसका जवाब समय खुद लिख जाता है।

रास्ते अगर पैरों से नहीं गुजरें,
तो सपने आँखों में सड़ने लगते हैं,
किताबें अगर हाथ न छुएँ,
तो शब्द भी चुप्पी सीख लेते हैं।

ज़िंदगी अगर सुनी न जाए,
तो शोर भी बेआवाज़ हो जाता है,
और जब कोई नाराज़ न हो आपसे,
तो समझो आपसे कुछ छूट जाता है।

यात्रा, किताब, ध्वनि और टकराव—
यही तो जीवन की धड़कन हैं,
इनसे दूर रहकर जीना
असल में धीरे-धीरे मर जाना है।

आर्यमौलिक

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ईश्वर ने परिंदों को ही
आसमान और ज़मीन के बीच
संतुलन की आज़ादी दी है,
पंख भी दिए,
और लौट आने की समझ भी।
इंसान को ज़मीन दी गई थी
चलने के लिए,
और आसमान
देखने के लिए—
पर उसने
देखने की जगह
हड़पने की चाह रख ली।
वो उड़ना चाहता है
बिना पंखों के,
ऊँचाई चाहता है
बिना विनम्रता के,
और ईश्वर बनना चाहता है
बिना इंसान बने।
परिंदे जानते हैं
कब उड़ना है,
कब बैठ जाना है,
इंसान यही भूल जाता है—
इसी भूल में
वो अक्सर
ओंधे मुँह ज़मीन से टकराता है।
क्योंकि
आसमान छूने के लिए
पंख नहीं,
मर्यादा चाहिए।

आर्यमौलिक

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आज़ादी या अंधापन?
कल तक मर्द की शान कहलाती थी
कई देहों की गिनती,
रिश्तों पर रखी गई धूल,
और वासना का खुला जुलूस।
आज वही भूख
दूसरे चेहरे पहनकर चल रही है,
घर के खाने से ऊबी ज़बानें
अब रिश्तों को बेस्वाद बताने लगी हैं।
फर्क बस इतना है—
पुरुष डरता था,
संतुलन साधता था,
दो नावों पर पैर रख
डूबने से बचने की जुगत करता था।
और आज—
कुछ स्त्रियाँ प्रेम नहीं,
सत्ता खोज रही हैं,
झूठे मुक़दमे को ढाल,
और क़ानून को हथियार बना रही हैं।
प्यार के नाम पर
ख़ून की साज़िश,
साथ के नाम पर
मौत की योजना—
यह कैसी मुक्ति है बहन?
क़ानून ने रास्ता दिया था
सम्मान से जीने का,
न कि किसी के घर का
दीपक बुझाने का।
अगर जाना ही था
तो खुली हवा थी,
क़ानून की छाया थी—
फिर ये जेल की सलाखें
क्यों चुनीं?
माता-पिता की लाज,
सीधे-सादे पति की साँसें,
और समाज की नींव—
सब कुछ गिरवी रख
बस एक रात की कीमत पर?
यह कविता आरोप नहीं,
आइना है—
उन सबके लिए
जो सुरक्षा को
स्वेच्छाचार समझ बैठे हैं।
सोचो,
क़ानून अगर कमज़ोर हुआ
तो सबसे पहले
औरत ही असुरक्षित होगी।
आज़ादी जिम्मेदारी माँगती है,
और न्याय विवेक।
जय हिंद 🇮🇳

☀️आर्यमौलिक

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सर्दियों में दो फांक हो जाती हैं…
एक ओर
कश्मीर फिरन की नरमी है,
पश्मीना ओढ़े
कॉफी के प्याले में
भाप उठती है,
हीटर की गर्म साँसों के बीच
हम शहर की हवा पर
बहस करते हैं।
दूसरी ओर
फुटपाथ है—
जहाँ शहर अपनी नज़रें
जानबूझकर गिरा देता है।
वहाँ ठंड मौसम नहीं,
सज़ा बनकर उतरती है।
वे महंगे कपड़े
शौक से नहीं पहनते,
कभी मिल जाएँ तो—
सिर्फ इसलिए
कि बदन में
थोड़ी-सी जान बची रहे।
उनके लिए सर्दी में
सूप कोई स्वाद नहीं,
एक सपना है।
भरपेट खाना—
किसी त्योहार से कम नहीं।
सर्दियों में
सब काँपते हैं…
पर फर्क बस इतना है—
कुछ ठंड से,
और कुछ
भूख से।

आर्यमौलिक

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हर रास्ता मंज़िल तक नहीं जाता,
कुछ रास्ते
सिर्फ़ यह सिखाने आते हैं
कि लौटना भी एक कला है।
हर सवाल जवाब नहीं माँगता,
कुछ सवाल
अंदर बैठकर
हमें चुप रहना सिखाते हैं।
जो बहुत साफ़ दिखता है
वही सबसे पहले
धोखा देता है,
और जो धुंधला है
वही अक्सर
सच की तरफ़ इशारा करता है।
हर जीत
ताली की आवाज़ नहीं होती,
कुछ जीतें
अकेले कमरे में
आँखें बंद कर
महसूस की जाती हैं।
समय
जब जवाब नहीं देता
तो समझ लो—
वह हमें
ख़ुद से मिलाने में
लगा हुआ है।

आर्यमौलिक

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