—ख़ुद से रिहाई—
बिखर जाने दे मुझे, अब यूँ ना समेट,
बड़ी मुश्किल से खुद को खुद से छुड़ाया है मैंने।
रही होगी ज़िंदगी दूसरों के लिए हसीन,
मगर अपने ही फ़ैसलों से खुद को रुलाया है मैंने।
मत बढ़ा हाथ कि अब संभलने की चाह नहीं,
इस तन्हाई से गहरा रिश्ता बनाया है मैंने।
जो टूटे हैं ख़्वाब, तो उन्हें ख़ाक होने दे,
बड़ी मुश्किल से इस मलबे में जीना सीखा है मैंने।
-MASHAALLHA