Quotes by bhagwat singh naruka in Bitesapp read free

bhagwat singh naruka

bhagwat singh naruka

@mystory021699
(758)

लाख कोशिश करके देख लिया तुमने,
लेकिन हम गिरे नहीं।
आँधियाँ बहुत आईं हमारी राह में,
मगर हमारे इरादे
कभी झुके नहीं।
ताने, साज़िशें, और चालें भी कम न थीं,
फिर भी अपने वजूद से
हम डिगे नहीं।
आज खामोश हैं तो इसे कमज़ोरी मत समझना,
वक़्त आने पर साबित करेंगे —
हम टूट सकते हैं,
पर कभी गिरे नहीं।

writer bhagwat singhnaruka

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कसूर तुम्हारा नहीं, ये तो वक़्त का ही खेल था,
शिकायत तुमसे नहीं,
अपने आप से है जो सच समझने में देर हो गई।
तुम वही थे जो पहले दिन थे,
बस मेरी नज़र को पहचानने में
थोड़ी देर हो गई।
मैं हालात को दोष देता रहा उम्र भर,
और भूल गया कि
कई बार गलतियाँ
ख़ामोशी से खुद से भी हो जाती हैं।
आज समझ आया है सब कुछ,
पर अफ़सोस यही है कि
समझ आने तक
कई अपने दूर हो गए।
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बदन मेरा मिट्टी का, साँस मेरी उधर है,
जहाँ जीवन थमता है
और मृत्यु का अर्थ उभरता है।
मृत्यु अंत नहीं, एक ठहराव है बस,
जहाँ थकी हुई आत्मा
अपने बोझ उतारती है।
जीवन ने जो सवाल दिए,
मृत्यु उन पर विराम लगाती है,
ना जीत, ना हार —
बस एक पूर्णता सिखाती है।
आज जी रहा हूँ तो सीखने के लिए,
कल जाऊँगा तो
मिट्टी में मिलकर
फिर से सृजन बन जाने के लिए।
क्योंकि
जीवन यात्रा है,
और मृत्यु घर वापसी।

writer bhagwat singhnaruka

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मृत्यु घर वापसी है,
जहाँ कोई सवाल नहीं, कोई बोझ नहीं।
जहाँ नाम, पहचान, हार–जीत
सब यहीं छूट जाते हैं।
वहाँ न कोई शिकायत रहती है,
न किसी से कोई गिला,
बस एक गहरी ख़ामोशी होती है
जो हर थकान को सुला देती है।
जीवन में जो अधूरा रह गया,
मृत्यु उसे पूरा नहीं करती,
बस स्वीकार करना सिखा देती है
कि सब कुछ यहीं समाप्त नहीं होता।
मिट्टी से आए थे,
मिट्टी में मिल जाएँगे,
पर इस बीच जो प्रेम,
जो करुणा, जो स्मृति छोड़ जाएँ—
वही हमारी सच्ची साँस बनकर
ज़िंदा रह जाती है।

writer bhagwat singhnaruka

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अपने दिमाग़ से ये फ़ितूर निकाल देना,
तुम साथ ना दो तो
हम कदम उठा ना सकेंगे —
ये वहम निकाल देना।
हमने रास्ते खुद बनाए हैं
तन्हाइयों के जंगल में,
किसी के सहारे चलना
हमारी आदत नहीं।
तुम साथ थे तो अच्छा था,
नहीं हो तो भी चल लेंगे,
हौसला उधार नहीं लिया जाता
ये बात समझ लेना।
हम रुकते नहीं किसी के इंतज़ार में,
बस रिश्तों को ज़बरदस्ती
घसीटना छोड़ देना।

writer bhagwat singhnaruka

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बहुत सजाया-सँवारा करता था इस बदन को,
कपड़े, ख़ुशबू, आईना — सब अपना लगता था।
जब ये राख हुआ तो समझ आया,
कि जो अपना समझते थे,
वो सब यहीं रह गया।
ना साथ गया हुस्न, ना नाम की पहचान,
मिट्टी ने बस मिट्टी को अपनाया
और हर गुमान यहीं रह गया।
ज़िंदगी भर जिस देह को
सब कुछ समझते रहे,
अंत में वही देह
एक मुट्ठी राख बनकर
इस संसार में ही रह गया।
यही सच है —
हम नहीं रहते,
बस हमारे निशान
कुछ देर तक
यहीं रह जाते हैं।

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आज तेरा मेरे ख़्वाबों में फिर से आना हुआ,
ना सोचा था, ना चाहा था,
फिर भी तेरा सामना हुआ।
क्यों आती हो तब,
जब याद भी नहीं करता,
जब दिल ने ज़िद छोड़ दी हो
और ज़ख़्मों ने सोना सीखा हो।
दिन में तो संभाल लेता हूँ खुद को किसी तरह,
पर रात की ख़ामोशी में
तुम्हारा यूँ लौट आना
हर सब्र को तोड़ जाता है।
अगर जाना ही था तो
ख़्वाबों तक क्यों चली आती हो,
या फिर बता दो —
क्या सच में कोई रिश्ता
कभी पूरी तरह ख़त्म हो पाता है?

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एक दिन दर्द ओर दौलत में बहस हो गई ।
दर्द ने कहा तुम खुशनसीब हो तुम्हे पाने के लिए कितनी चाहत रखते है ।
लेकिन दौलत ने कहा , खुशनसीब तुम हो जिसके कारण लोग अपने अपनो को याद तो कर लेते है ,,मेरा क्या है मुझे पाने के बाद तो लोग अपने खून के रिश्तों को भूल जाते है अपनो का कत्ल कर देते है ✅✅✅✅✅✅

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ओर क्या चाहती है गर्दिश _ए _आयाम की हम अपना घर भुल गए ओर उनकी गली भूल गए ✅✅ उम्र भर मिलने नहीं देती है अब तो रंजिशे वक्त हम से रूट जाने की अदा तक ले गया,,,,,,,,,,,✅✅✅✅


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लेखक भगवत सिंह नरूका ✍️✍️

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गुलाब देने से ही अगर मोहब्बत होती तो ,आज माली पूरे शहर का महबूब होता ।।😃😃📚📚📚📚✍️✍️✍️

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