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AbhiNisha

AbhiNisha

@abhinisha
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ओलविदा मेरे दोस्त



मैं एक कैंडल अपने हाथों से बनाना चाहती हूं
और उसे गिफ्ट के तौर पर
अपने दोस्त को देना चाहती हूं

जो बस इतना जानती है
कि बस दोस्ती हक जमाना है

और एक इंसान के अलावा
इसमें दूसरे इंसान की भावनाएं मायने नहीं रखती


मैं उसे बताना चाहती हूं कि जब चाहे आना
और जब चाहे चली जाना
उसकी आदतें हैं
पर अब मैं थक चुकी हूं
और मैं हमेशा के लिए
उसे अपनी लाइफ से दूरी रखना चाहती हूं


कभी ना वापस आने के लिए
हालांकि मुझे उसकी परवाह है
हद से ज्यादा


पर मैं खुद को और दर्द पहुंचने से बचना चाहती हूं
इसलिए ओलवेदा मेरे दोस्त

और शुक्रिया जितनी पल हम साथ जीऐ
हंसे गाऐ मुस्कुराए उन सबके लिए


पर अब वाहे छोड़ना जरूरी हो गई है
पर अब दूर जाना जरूरी हो गई


साइद हम हमेशा दूर रहकर ही एक दूसरे के प्रवाह करें
तो अच्छा है
शिकायत से भी दूर रहेंगे
और दर्द से भी

और यही जिंदगी है दूर रहकर भी
उनसे प्यार करते रहना
जो तुम्हारे थोड़ा कम परवाह करता है


आई लव यू
तुमसे प्यार है मुझे
पर मैं तुम्हें पसंद नहीं करती
तुम्हारे लिए रोज दुआ मांगती हूं

पर अब मैं तुम्हारी इंतजार नहीं करती
ओलविदा
मेरी जिंदगी से हमेशा के लिए जाने के लिए
और ऑल द बेस्ट
तुम्हारे आने वाली जिंदगी के लिए

हजारों शिकायते है तुमसे
पर
अब मैं सब कुछ भूल जाना चाहती हूं
यहां तक के तुम्हें भी

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हर यादें एक कहानी होतै हैं
कवीता


जिंदगी में कुछ कहानियां अक्सर पीछे छूट जाते हैं
और जो बचती है
वो सिर्फ यादें होते हैं

वो यादें जो अकसर पिछे छुट जाते हैं
उन यादों में खुशी भी होती है
और गहरा दर्द भी


जिंदगी के मुश्किलों में चलते रहना
और यादों की बोझ को ढूंढते रहना
थोड़ा सा मुश्किल लगता है



पर इस मुश्किल सफर पर चलते हुए
हम ठेहेर नहीं सकते
बस रुक कर यादों के साथ कुछ देर जी सकते हैं
और फिर अपने कदम आगे बढ़ने पर मजबूर हो जाते हैं

चलते रहना हमारे भाग्य है
और रुक जाना अंत


सारी उलझन के बाद भी हम चलते रहते हैं
तो हम जिंदा हैं
और हम जब रुक जाते हैं
तब हम मर जाते हैं
और हमारा अंत हमारा रुकना है


जब तक अंत नहीं आते तो यादें रहेंगे
आगे बढ़ गए लोगों की
या पीछे छूट गए हुए अपनों की


और हर यादें एक कहानी है
और उन कहानियों के साथ
और आगे बढ़ते रहेंगे
और जीते रहेंगे जिंदगी है

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ऐ तुम्हें देखकर अब डरने लगी हूं मैं

पर मैं हमेशा के लिए वैसी नहीं रह सकती
कविता पार्ट 3


पर
और सच यह है कि
पर मैं वैसे नहीं हूं
मैं खुद को अच्छी तरह से जानती हूं
मैं गिरूंगी तो फिर उठूंगी
मैं जानती हूं दरिंदा शायद घर के दिवारीयों में भी मिल सकता है

अभी मेरी मन की स्थिति ऐसी है
मैं हमेशा इस तरह से नहीं रह सकती

मैं जानती हूं
मैं एक बार इन सब से बाहर आ चुकी हूं
और दोबारा आ जाऊंगी
अंधेरा हमेशा के लिए नहीं होता


और मैं क्यों किसी की नजरों से घबरा कर
खुद को कमरे में बंद करु

क्यों मैं समाज के सोच से डर कर
अपने पैर में बेरिया लगा लु

चाहे जो भी हो जाए
मैं सपना देखती रहूंगी
और एक आजाद आत्मा बनकर
दौड़ूंगी भागूंगी सीखुगी पढ़ूंगी जानुगी सोचूंगी

और तो और इस दुनिया को अनुभव करूंगी

मैं एक बार इन सब को झेल चुकी हूं
और बाहर आई हूं

और दोबारा भी मैं ईन सबसे बाहर आ जाऊंगी
मैं आजाद आत्मा
खुद को पूरी तरह से जंजीर मे जकरने केसे दुं


मैं औरो से
मैं थोड़ी अजीब हूं
मैं हर बार एक जगह नहीं ठेहेर सकती

मैं आजाद ख्यालों की लड़की बलखाती हवा की तरह दौड़ती मैं पिंजौर में अपनी जिंदगी कैसे बिता दूं


मैं क्यों डरूं क्यों भागूं खुद छुपाए फिरते
इस समस्या और इस समाज के नजरों से
खुद को क्यों कैद कर लूं मैं चार दिवारीयों में


गलती उन नजरों की जो मुझे बुरी नजरों से देखा है
गलती उन समाज के लोगों की जो
मुझे हर वक्त जज करता है

मेरी तो नहीं

तो मैं क्यों गिल्टी फील करूं
और हमेशा के लिए पांव में बेड़िया पहेन लू

और खुद को छुपा लूं
परदो के पीछे लंबी घूंघट टेंते हुए
यह सोचकर की यही मेरा भाग्य है

कैसे मान लो कि यह मेरा भाग्य है
जबकि यह दुर्भाग्य है

बस एक जगह ठहेर जाना
अपने सांसे गिरवी रख देना है


और मैं सूरज से निगाहें मिलाकर सूरज को तकने वाली
नजरे झुकते हुए घर के अंदर कैसे चली जाऊं


कैसे ना लड़ु में फिर से अपनी वजूद के लिए
कैसे ना जुबान खोलो मैं
अपने होने की पहचान के लिए


कैसे अपने दुर्भाग्य को अपने भाग्य बनने लु
मुझे हर वक्त मार कर बस सांस नहीं लेना है
समाज की बताई गई हिसाबसे

मुझे सांस लेते हुए जीना है
समाज की हिसाब से आगे बढ़कर

मुझे जीना भी है और खुश भी रहना है
पितृ सट्टा वाली सोच के गाल पर जोरदार समाचार मार कर

मुझे बस आगे बढ़ते रहना है
चाहे मेरी कभी-कभी चाल धीमी हो जाए

फिर भी मुझे नहीं रुकना
रुकना मेरी जिंदगी को कम करता है
और चलना मेरी जिंदगी को और लंबी


मैं अल्हड़ पुरवाई बस वेहते रहना चाहती हूं

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आज शाम तुम्हें देखकर अब डरने लगी हूं मैं
पार्ट 2
समझ में आया क्यों लोग





अब समझा क्यों लोग
अक्सर ऐसा करता है

औरतो खुद ही अपने पांव में बेरियां लगाकर
चार दिवारीयों में बंद क्यों हो जाती है

वह जानबूझकर समाज के साथ-साथ
खुद के पंख क्यों कुतर देती है

आज समझ में आया
क्यों वह दौरना भगाना गुनगुनाना जीना
सीखना पढ़ना छोड़ देती है


वह सुरक्षित रहे सके
इसलिए
वह आजादी से हर रिश्ता तोड़ लेती है
लंबी राह देख कर मुंह मोड़ लेती है
और
खुला आसमान देखकर नजरे झुका


उन्हें बेरिया आजादी से क्या ज्यादा प्यारी है
हां समझ में आया
क्यों वो खुद को सुरक्षित रखने के लिए
आत्मा को मार देती है


उनकी निगाहों से आज मैं खुद को दिखा
मैं ठीक हूं ऐसी हुं
जैसी इस दुनिया की हर एक आम लड़की
जो अपनी ख्वाहिश जरूरत खुशी सब छोड़ देती है
खुद को बस सुरक्षित रखने के लिए


खुद को किसी और पर निर्भर कर देती है
वह जान बूझकर चुनाव करती है
जो उसे चार दिवारीयों में कैद कर देती है



यह सोचकर की चार दिवारीयों में
शायद उसे दरिंदे नहीं मिलेंगे

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ऐ साम तुम्हें देखने से डरने लगीहूं
कविता पार्ट 1



ऐ साम तुमे देखने से अब डरने लगी हुं मैं
जाने क्यों अब अपनी ही आजादी से तकराने लगी हूं मैं

ऐ साम तुम्हें देखने से डरने लगी हूं मैं
जाने क्यों अपने ही आजादी से तकराने लगी हूं मैं


वह ख्वाब जो मैं ने देखी थी
हवा बन कर बस बेहते रहना
उस ख्वाब से मुकरने लगी हूं मैं

ऐ साम तुम्हें देखने से डर नहीं लगी हूं मैं




लगता है कि मेरे उड़ान में जंग लग गई है
उन निगाहों की जो मुझे नोच कर खा जाना चाहती है


अब लगता है कि मेरी आजाद सोच
सीकोड़ कर बंद कमरों में सिमट जाने लगी है



अब मुझे डर खुद से ज्यादा
इस समाज की दरिंदगी भरी निगाहों से
और इस पितृसत्ता वाली सोचो से लगने लगी है
और जीने से




मै डर से बेरिया पहनकर बंद कमरों में कैद हो जाना चाहती हूं
मैं छोड़ देना चाहती हूं
अपनी चाहते अपने जीद्द अपने सपनों को
और खुद के अंदर खुद को दफना कर
मुर्दा बन जाना चाहती हूं



ऐ रात अब खोप खाने लगे हु
ं तुमसे नजरे मिलाने से


मेरी वह आज़ाद ख्याल
फिर से उस बचपन में लौट गई है
जब मैं डर से घबरा कर
आंखें बंद कर लेना चाहती थी
और चाहती थी यह समय बित जाऐ



अब मुझ में बेवाकी नहीं रही
अब लोगों की बातें मुझे खुद में डालने लगी है
पहले की तरह मैं फिर से खुद को खो रही हूं
मैं खुद में कैद होने लगी हूं
मैं मुझे भुल चुकी हूं
आखिर मुझे मे वो बेबाकी कैसा थी
और मैं हूं कौन


एक लड़की जो हमेशा समाज की दवाऊ में आकर
खुद को मार कर
अपने पांव में बेरिया पहन लेती है
और कैद हो जाती है घर की चार दिवारीयों में



यह एक आजाद आत्मा
जो हमेशा उड़ जाना चाहती है
भगाना चाहती है
जीना चाहती है
सुनना चाहती है सोचना चाहती है
सीखना चाहती है पढ़ना चाहते हैं
और इस दुनिया को अनुभव करना चाहती है




पर जो मैं आजकल अनुभव कर रही हूं
वह डरावना ख्वाब से काम नहीं
पर यह हकीकत है
और यह मुझे अंदर से मार रही है




एक चेतना के अंदर डरना मतलब
उसके अस्तित्व खो जाना
उसका मर जाना
और मैं अपने अस्तित्व खो रही हूं
मैं अंदर से मार रही हूं

ऐ सुवा मुझे चेतावनी देने लगे हैं
अपनी कदम आगे बढ़ने से
मजबूर कर देती है
वही कदम ठहरने से

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जो आंखों पढ़ लेते हैं
कविता

ऐ आंखें बहुत प्यारे होते हैं
बिना बोले बहुत कुछ कहे देता है
इन आंखों का भाषा

जो जल्दी समझ लेते हैं
उसे आखिर में सबसे ज्यादा तकलीफ होते हैं


किसी मीठी बातों के पीछे की जहर
किसी के दिखावे के पीछे मतलब
किसी के प्यार के पीछे वो राज


किसी के हंसी के पीछे के दर्द
किसी शांत चेहरे के पीछे की हलचल




हजारो दर्द हजारो सिकायते
हजारों मतलब हजारों इरादे
और हजारों राज जो लोगों के अंदर दफन होती है


हंसते और खामोश आंखें
शांत चेहरे देखकर
जो इंसान दिल और दिमाग को पढ़ सकते हैं
वो इनसान
जिंदगी में कभी खुश रहे ही नहीं पाते



यह सच बड़ी दर्दनाक है
पर यही तो सच्चाई है
जो हर आंखों से छुप जाती है

पर एक आंखें जो नोटिस करती है
वह अंदर से टूट जाती है


मतलब से भरी दुनिया स्वार्थी लोग
जैसे हम अपने कहते हैं
वह सब हमारी जिंदगी में जुड़े होते हैं
हर वक्त हमारे बनकर


और हम उनके साथ खुश रहना चाहते हैं

पर जो किसी की चुप्पी को भी पढ़ सकता है
वह चाह कर भी खुश नहीं रह पाते






लोगों की झूठ फरेव इन आंखों में साफ दिखता है
चाहे लोग
जिस हद तक छुपाने की कोशिश करें

बरसों से दिल में छुपाए हुए बैठे रहे

और वही ऐसे लोगों से नहीं छिपती
जो लोग
आंखें देख कर तबरीयत जान लेते हैं
तो यह दुनिया उनके लिए अनजान कैसे होंगे



और ऐसे लोग जल्दी थकते हैं
रिश्तो से लोगों से दुनिया से
और हद से ज्यादा खुद से भी


और तो और यहां तक
हद से ज्यादा सावधान रहते हैं
और डरते भी हैं
इस दुनिया से इस दुनिया की सच्चाई
और शायद खुद से भी

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मैं कहना चाहती हूं
कविता

मेरा दुनिया इस दुनिया से अलग है
और मेरी कहानी उसी दुनिया से आती है
जो मेरी दुनिया है


खामोशियों से पलते हुए
ख्वाबों में जीते हुए
अंन देखा एहसास के साथ


जहां मुलाकात नहीं होती
कोई बात नहीं होती
फिर भी कहानी होती है


उन दिनों की जो बीत गए
उन दिनों की जो कभी आए ही नहीं
उन दिनों की जो कभी आ भी नहीं सकता
उन दिनों की जिसे कलपना में ही जीया जा सकता है


हकीकत में दूर-दूर इसका कोई वास्ता नहीं
पर वह कल्पना भी हकीकत होते हैं


उन सब की दिलों की जो दर्द खा कर
अपने हॉठ सील लेते हैं


बताना मुश्किल है और छुपाना आसान
पर मैं केहना चाहती हूं
जो मेरे दिल में है
छुपाने की जगह


इन सारे जज्बातों को लिख देना चाहती हूं

जो कभी सुनी नहीं गई
जो कभी जाहिर नहीं हुई


वो मेरा दर्द है
और मेरे जैसे हजारों व्यक्ति की
जिसने कभी जाहिर ही नहीं किया


और आखिरी सांस तक बस जीते रहे
जिंदा लाश बनकर


सांस लेते हुए बस चलते रहे
उन सफर पर जिन्हें हमेशा दूसरों ने तय किया



पर मैं चलते रहने के साथ-साथ
खुद अपना सफर चुनना चाहती हूं



चाहे फिर मुझे बाद में पछतावा ही क्यों ना हो
उस सफल पर चलने की
जो मैंने खुद तय किया



पर तसल्ली होगी
कि मैं बस चलते रहने से अच्छा
मैं ने चलने का रहा का चुनाव किया




शायद मुझे देखकर
कोई और भी
अपने खामोशियों से थक जाए
और बोल उठे जी उठे
और अपने रहा ढूंढने के लिए अपने कदमे को आगे बढ़ा ले


शायद कोई बस जीते ना रहे

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बस जीते रहना गुनाह है
कविता; भाग 2


अगर वक्त कुछ नहीं करने की है
तो थोड़ा वक्त खुद को सोचने के लिए निकालो
क्या तुम्हारे पास खुद के लिए भी वक्त नहीं है


अगर तुम्हारे पास खुद के लिए भी वक्त नहीं है
तो जरा सोचो
तुम क्या हो


एक इंसान यहां एक मशीन
जिसके पास खुद की इच्छा ही नहीं है
खुद की जज्बात नहीं है
खुद की दुनिया नहीं है
खुद का ख्याल नहीं है


जरा सोचो तुम वो जो कहते हो
तुम खुद से और दूसरों से भी प्यार है
जरा सोचो तुम खुद से कितना प्यार करती हो

क्या इतना प्यार करती हो
जो खुला आसमान देखकर उड़ जाए
बिना कतराऐ बिना सोचे अंजाम का



या फिर वेरिया पहन लेती हो
यह सोचकर
की
तुम सुरक्षित हो
मंदिर जैसे मुर्दा घरो में



जरा सोचो जहां तुम रहती हो
क्या वह जगह सचमुच में स्वर्ग है

अगर वह स्वर्ग है तो
तुमने उस स्वर्ग में रहने के लिए कीमत क्या चुकाया है


जरा सोचो
संने जैसी वरिया पावं में होगा
जिम्मेदारी जैसे हतकीयां हाथों में होगा


जरा सोचो तुम जैसे मोहब्बत कहती हो
क्या वह तुम्हें खुद से मोहब्बत करने देता है


जरा सोचो जिसे तुम जिम्मेदारी कहती हो
क्या वह जिम्मेदारी सच में तुम्हारी है


जरा सोच के देखो
क्यों कि
बस मोहब्बत करते रहना गुनाह है
बस जिम्मेदारी निभाना गुनाह है



और यह गुनाह तुम हर रोज कर रही हो
क्या आगे भी करते रहना चाहती हो
अगर करते रहना चाहती हो

तो ठेहरो
और जरा सोचो

तुम्हारी बाद नई जिंदगी की
क्या तुम चाहती हो कि वह भी
जिंदगी को बोझ समझ कर इन्हें डोते रहे
जीने की वजह

जरा सोचो
अपनी भावनाओं को अनदेखा करना गुनाह है
और तुम हर बार यही करते हो


तुम हर वक्त सोचती रहती हो कि
तुम खुश हो
पर क्या तुम खुश हो
जरा सोचो


खुद से झूठी बातें करना गुनाह है

और यह गुनाह भी तुम हर रोज करते हो



तो अब समहलो और आओ बोलो बदलो
थोड़ी खुद के लिए
और ज्यादा आने वाली जिंदगी के लिए

अगर तुम सोचना शुरू करोगी तो
शुक्रगुजा होंगे तुम्हारे आने वाले पीढ़ियां


हां तुम्हें कोशने की वजह
तुम्हारे शुक्रगुजार रहेंगे तुम्हारी आने वाली पिड़या

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बस जीते रहना गुनाह है
कविता पार्ट1

बस जीते रहना गुनाह है
बिना अर्थ के
बस सांस लेना गुनाह है
बिना वजह से

बस चलते रहना गुनाह है
बिना राहा के

बस तुम भटक जाओगे बिना चाहा के

मंजिल नहीं पता मान
सफर के बारे में कुछ नहीं जानते जाना

बस जिना क्यों है यह सोचो
सांस लेना क्यों यह सोचो
चलना क्यों है यह सोचो

किसी और की बताई हुई सफर पर चलने से अच्छा है
तुम जरा थम कर
सांस लो और सोचो

सोचो तुम तुम्हारे पास क्या है
और तुम्हें दूसरों से क्या मिला है

और अगर तुम्हारे पास सब कुछ है
और सब कुछ तुम्हें दूसरों ने दिया है
तो

फिर भी सोचो
तुम तुम्हारे पास ऐसा क्या है
जो बस तुम्हारा है

पलके खोलो और जरा गौर से सोचो तुम


बिना सोचे जिंदगी गुजार देना गुनाह है
और इस गुनाहों से बचो तुम



भलो तुम्हें लगता होगा कि
तुम्हें दर्द नहीं हो रहा
यूं ही जीने से

पर यकीन मानो तुम्हें दर्द हो रहा है
और तुम्हारे दर्द तुम्हारी तक सीमित नहीं रहेंगे
वह दूसरों को भी दर्द देंगे


इसीलिए जीने की वजह ढूंढो तुम
बिना अर्थ के जीना
बस जिंदा रहना है
सांस लेना है
जिंदा दिली भरी जिंदगी नहीं



तुम दूसरों को दर्द दो
अपने साथ-साथ उन्हें भी पछतावे में डालो
इससे अच्छा है कि तुम खुद को संभालो
और सोचो

क्या सच में तुम्हें यही जिंदगी चाहिए



हां तुम वक्त निकाले और सोचो
क्या तुम अपने साथ-साथ
अपने आने वाले पिड़यो को
भी बस सांस लेना सीखना चाहती हो



जरा सोचो तुम खुद के लिए क्या हो

माना कि तुम राजा हो अपने घर के लाडला बेटा
माना कि तुम महारानी हो अपने ससुराल के


पर जरा सोचो तुम खुद क्या हो


क्या वह हो तुम जो खुद से बिना शर्म के
हर वक्त नज़रे मिलाकर गर्भ से कह सकता है
या मैं हूं

क्या तुमने खुद कुछ ऐसा काम क्या है
जिसे अपने सीने से लगाते हुए तुम यह कह सकते हो
यह मेरी अपनी है
और इस पर किसी दूसरे का हक नहीं



जरा सोचो अपने दिन को ऐसे ही व्यर्थ करना गुनाह है

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वो अल्हड़ पुरवाई जैसी
कविता


वो अल्हड़ पुरवाई जैसी है
बेरियां उसके पांव में कैसे भाऐगे

उसके फितरत कुछ ऐसी है
वह हर जंजीर तोड़कर उड़ जाएंगे

वह हवा के झोका
आसमान में ऊंची उड़ने वाला परिंदा
बस जमीन को अपनी दुनिया कैसे बनाएंगे


उड़ान बिना पंछी खुद ही मर जाएंगे
उसकी ऊर्जा ही उड़ाना है
उसका जीना ही बेहना है

फिर वह कैसे रुक जाएंगे

50 100 गज जमीन पर दो कमरे के
बंधे हुए घर में
कैसे वो रह पाएंगे
कैसे दरवाजा वह लागे ना
कैसे ठेहेर जाए
खुद को अंदर से मार के

वह अल्हड़ पुरवाई जैसे बहेने वाली
उसकी पावं बंद कमरे में
जंजीर में बंध कर कैसे रह जाएंगे

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