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AbhiNisha

AbhiNisha

@abhinisha
(340)

जिने की तमन्ना में मार बैठे
कविता



जीने की तमन्ना में मर बैठे
जब से तुमसे प्यार हुआ हम हार बैठे


क्या करूं मैं इस दिल का
जो तुम पर मरने लगा है
हर वक्त बातें तुम्हारे करने लगा है


होठ खामोश है दिल दर्द से भरा
तुम्हें सामने पा कर भी
तुम्हें पाने का ख्वाब
दिल में हर पल रहता है


तो
चाहा आज तुम सामने हो
तो क्यों ना
मैं तुम्हारे और पास आऊ
और कहूं
दिल में जो है
कहूं मैं तुम्हें



जीने की तमन्ना में हम मर बैठे
जब से तुमसे प्यार हम हार बैठे


कहां मैं तुम्हें मैं
हार गया अपने दिल से
जब से तुम मेरे दिल में आए


कहो मैं तुम्हें
मैं जीना चाहती हूं
पर तुम्हारे साथ जीने की तमन्ना में
मैं मर रही हूं




और
पूछूं मैं तुम्हें क्या तुम भी मुझसे प्यार करोगे
और
पूछो मैं तुम्हें क्या मैं तुम्हें कभी पसंद आई




पर मैं तुम्हारे सामने आकर
यह नहीं कह पाए

कि मैं तुमसे प्यार करती हूं
मुझ में हिम्मत नहीं
अपनी इश्क को जाहिर करने की



और यह दर्द गहरा है
कहां हूं मैं तुम्हें कभी मेरी चमकती हुई
आंखें क्या देखा है
जो तुम्हें देखकर ही चमकता है



कहूं मैं तुम्हें क्या तुमने मेरी रोती हुई
आंखों देखा है
जो तुमसे रूबरू ना होने के गम में बहता है


और पूछो मैं तुम्हें क्या
तुमने कभी मेरी मुरझाई हुई चेहरा देखा है
तुम्हें अपना मान के भी
तुम्हें अपना ना कहने के दर्द में
मेरे चेहरे से रौनक उतर गई है



पर मुझ में हिम्मत नहीं
तुम्हारे पास जाओ
और कहूं दिल की बात अपने




पर मैंने हमेशा देखा है
तुम्हें तुम्हारी जिंदगी जीते हुए
तुम्हारी तनहाई को तुम्हारी सादगी को
तुम्हारे दर्द को तुम्हारे अकेलेपन को



तुम्हारे हंसते हुए चेहरा
तुम्हारी मुरझाए से चेहरा
मैं ने हर बार देखा है

तुम्हारे गमों को मैंने खामोशी से अपने अंदर पना दिया है




अगर यह कविता आपसे लगे तो
आगे पढ़ते रहि
मैं आपके प्रिय लेखक अभी निशा ❤️🦋💯

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मैं नारी हूं
कविता



पाप की जमीन पर कहां मेरे घर
मैं नारी हूं
अकेली परी राह पर बिचारी हूं


कब तलक चलु मैं
दूसरों के बोल पर


घुट घुट कर जी रही हूं
बिना कर्ज लिए
मैं अपनि सांस गिरवी रख चुकी हूं



पाप की जमीन पर कहां मेरा घर
बताओ बंधु कहां मेरा घर



मेरे अपने नाम की है जो
मेरे अपने वह कभी ना हुए





मेरे अपनों के होने पर भी
मैं अकेली परी राहों पर
जो रहा पत्थर और कांटों से भरा हुआ है



मैं अबला नारी बिचारी
लहू से भरी पाऊ
राहों पर रखते आगे बढ़ते रही


ना कोई ठिकाना मिला
राहों पर ठहरने के लिए


मैं नारी जात
मेरी राह बस मायके से ससुराल तक
बद से बद हाल तक


मैं और कहां ठहेरती
दर्द से मैं चिकती रही चिल्लाती रही


ना मेरी दर्द मेरी माईके वाले की कानों तक पहुंच
ना ससुराल वाले ने समझा


देता रहा यातनाएं कई नारी होने के नाम पर
मैं जीती रही गुमनाम जिंदगी


कभी पिता के नाम से
कभी भाई के नाम से

कभी पति के नाम से
तो तेरी बेटे के नाम से
मेरा नाम किसी को नहीं पता


मैं नारी जात अबला बिचारी
बताओ बंधु कहां मेरे नाम है क्या



नारी होने पर
बाप की जायदाद में हिस्सा नहीं

और ससुराल की जायदाद पर उम्मीद रखता नहीं


जहां पैदा हुई वह मेरा घर था
पर कभी मेरा घर हुआ ही नहीं



जहां वीहा दी गई वह मेरा घर है
पर
उस घर को अपने
कहने का मेरा अधिकार नहीं



कभी-कभी लगता है
नारी इंसान नहीं बस कठपुतली है
जो चाहे अपने इशारों पर न चले


जैसे चाहे वैसे अपने रंग में डाल ले
मेरी कोई पहचान नहीं
मेरी कोई रंग नहीं


मैं बेरंगहिना
सबके रंग में ढल गई
मेरी पहचान वक्त पे वक्त बदलती रही


मैं नारी अबला बेचारी
कभी खुद की हुई ही नहीं


बस नारी होने का सजा मिल
जिम्मेदारी और उम्मीद की
बोझ कि तले मैं दबा दी गई


मैं नारी अपनी घर और पहचान ढूंढते हुए ही मर गई
और खुद को हमेशा के लिए खो दिया


और
अब कोई पूछता है
तुम कौन हो तुम्हारा घर
तो मैं बताती हूं


मैं एक चलता फिरता मुर्दा हूं
होठों की मुस्कान है
सांसे चल रही है

और तो और
गहनों से लधी हुए मेरी किया है
अपनी पसंद की मैंने पहनी साड़ी है
फिर भी दूसरों के उपेक्षा पर जीती हूं


बाप की बेटी हूं
भाई की बहन हूं
ससुर की बहू
पति की बीवी हूं
बेटे की मां हूं

और नहीं पता मैं कौन और क्या हूं
और नहीं पता मेरा घर कहां

बस एक घर है जहां मैं रहती हूं
सब की उम्मीद की बोझ लिए
सच कहूं तो उस घर की मैं नौकरानी हूं


मैं नारी अबला बिचारी
पाप के जहां में मेरा घर कहां
नहीं पता




अगर ऐ कविता सबको अच्छी लगेगी तो
आगे पढ़ते रहिए
मैं आपके प्रिय लेखक अभिनिशा❤️🦋💯

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तुम पर ही मरना मेरी किस्मत बन गई है
कविता




तुम्हें देख कर आहें भरना
और तुम पर ही मरना
मेरी किस्मत बन गई है




और ऐ किस्मत
मेरी नींद से भरी आंखें है
जो कभी खोलती नहीं


बस बंद रहना चाहता है
इसलिए कि वह तुम्हें चोबिसो घंटे
अपने सामने देख सके



आंखें खोलने पर ख्वाब टूट जाते हैं
और ख्वाब का टूटना
हमें गवारा नहीं


क्योंकि ख्वाब में ही तुम आते हो
ख्वाब में ही तुम अपने बन जाते हो
और ख्वाब के बिना
तुम मेरी दुनिया में कहीं भी नहीं


भला मैं कैसे ना चाहूं
हमेशा आंखें बंद करके रखना



क्या तुम्हें मेरी दर्द का पता है
शायद नहीं
क्योंकि तुम एक ख्वाब हो



और ख्वाब से उम्मीद रखना
की असल में
वह हमारे दर्द को समझे यह बेकार है




फिर भी ऐ बेकार पना में
मैं जिंदा हूं
सांस ले रहा हूं
और तुम्हें चाहा रहा हूं




इस उम्मीद में कि
शायद तुम कभी हकीकत बन के सामने आ जाओ गे


पर सच तो यह है
उम्मीद नहीं फिर भी इंतजार कर रही हूं
एक उम्मीद लिए की कोई है
जिससे मैं प्यार कर रही हूं




भला वो एक ख्वाब ही क्यों ना हो
हकीकत में ना ही क्यों ना हो




किसी को हर वक्त चाहते रहना
खुशी देती है



पर ना मिलने वाले इंसान को
हर वक्त चाहते रहना
दर्दनाक है
और मौत से भी बत्तर जिंदगी
और यह बत्तर जिंदगी ही मेरी किस्मत बन गई है





तुम्हें सोचना तुम्हें चाहते रहना
चोविसो घंटे दर्द भी देती है
और खुशी भी



और मैं क्या कर सकती हूं
नहीं पता


तुम्हें सोचते हुए
अंदर कुछ फील हो रहा है
सीने के अंदर अजीब सी बेचैनी उठ रही है

एक ऐसी बेचैनी जो
मुझे जीने भी नहीं देती
और मरने भी नहीं


और जीने मरने के बीच वाली
जिंदगी मेरी किस्मत बन गई है
और बेचैन सांसों लेना मेरी जरूरत बन गई है






अगर यह कविता आप सबको पसंद आए तो
आगे पढ़ते रहेंगे
मैं आपके प्रिय लेखक अभी निशा❤️🦋💯

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थक चुकी हूं सोना चाहती हूं। थकावट
कविता





क्या आज रहने दोगी
अगर कुछ ना लिखोगी तो चलेगा
क्या आज रहने दोगी
अगर कुछ ना सोचो कि तो चलेगा



क्या आज रहने दोगी
आज आराम करोगी तो चलेगा
आज थोड़ा जल्दी सो जाओगी तो चलेगा
क्या चलेगा तुम्हें आज दिन का बेवजह जाना




क्या चलेगा तुम्हें
खुद को आज बस आराम देना
क्या चलेगा तुम्हें
आज कुछ भी ना सोचना



क्या चलेगा तुम्हें
आज लिखने का बोझ अपने सर पर ना लेना
बताओ क्या चलेगा तुम्हें
थोड़ा खुला महसूस करना



हां तो आज रहने दो
बस आंखें बंद करो
और सो जाओ


आज कुछ न करने से
दुनिया खत्म नहीं हो जाएगी तुम्हारी
आज कुछ ना सोचने से
वजूद मिट नहीं जाएगी तुम्हारी


बस रहने दो
इस पल को
यही छोड़ दो
और दूसरे पल में आराम करो


मत सोचो कि सब कुछ छूट गया
आज का दिन बेकार गया
मत सोचो कि तुमने कुछ नहीं किया


मत सोचो कि तुम्हें बहुत कुछ करना था
मत सोचो कि
तुम्हें बहुत कुछ करना है



बस सोचो आज आराम करना है
और कल के कल देखेंगे


बस सोचो कि आज थक चुकी हो
और अब सोना है



और दूसरी सुबह जागाने के बाद
सुबह क्या करना है
ये सुबह देखेंगे


अभी आंखें बंद करनी है
बस आंखें बंद करनी है



और लंबी नींद के साथ लंबी सपनों में जानी है
कोई मीठी सपनों में
जाकर खो जानी है


और उन सपनों के ही
आज रात भर बनके रह जानी है


फिर सुबह के सुबह देखेंगे
खुद के थोड़े हो लेंगे
और फिर जि में जो आऐ वही करेंगे



आराम चाहिए
थकी पलकों को सपनों के नाम चाहिए
और थकी जिस्म को ठंडक



बस अब रहने दो
और नहीं आज कुछ कर पाओगी तो चलेगा ना
बस कहाँ चलेगा


मैं सच में पलके को बंद करना चाहती हूं
मैं सचमुच में आराम करना चाहती हूं
थक चुकी हूं सोना चाहती हूं






अगर यह कविता आप सबको अच्छे लगे तो
आगे पढ़ते रहिए
मैं आपके प्रिय लेखक अभिनिशा❤️🦋💯

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सब कुछ खत्म होने से अच्छा है
कि इंतजार रहे
कविता


सब कुछ खत्म होने से अच्छा है
कि इंतजार रहे

आने वाले कल की
अच्छे दिनों की
पूरे होने वाले सपनों की


सब कुछ खत्म होने से अच्छा है
कि इंतजा रहे



तुम्हारे तुम्हारे साथ रहने की
तुमसे प्यार करने की



सब कुछ खत्म होने से अच्छा है
कि इंतजार रहे


वह इंतजार झूठी ही सही
पर उस झूठे इंतजार पर एतबार रहे


बस यही एक जीने का तरीका है
सच से अगर कभी हुई मैं रूबरू
शायद खत्म कर लु मैं खुद को


इस सबसे अच्छा है कि
झूठ पर ही गुजार लु मैं अपनी जिंदगी


हां तकलीफ होगी
पर शायद मैं झूठी सहारे के साभ जिंदा रह लूंगी


सच हमेशा आईने की तरह साफ रहा मेरे सामने
फिर भी मैंने झूठ को चुना
सांस लेने के लिए
वह झूठ जो मुझे बचाए रखा



मुझ में हिम्मत नहीं थी
सच को स्वीकार करने की
ऐसा कुछ भी नहीं था


बस मुझ में ताकत नहीं थी
इस झूठ से लड़ने की
इसीलिए सच के आगे मोटी परते बिछा दी झूठ की


कि सच मुझे कभी ना दिखे
ना मैं खुद से सवाल करूं
कि तू झूठ को अपनी सांस बना ली है




सब कुछ खत्म होने से अच्छा हो
की उम्मीद रहे
शगुन से सांसे लेने की
बिना दर्द के जीने की
जो चाहे जी करने की


सब कुछ खत्म होने से अच्छा है
कि इंतजार रहे
अच्छे दिनों की




अगर एक कविता अच्छी लगे तो आगेपढ़ते रहिए
मैं आपकी प्रिय लेखक अभिनिशा ❤️🦋💯

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जो बस मेरी हिस्से मेंथी
कविता


सुबह की नींद हल्की थी

सोना चाहती थी
पर ख्वाब जगी थी
बस जिज्ञासा था
सोचने की
और यही सोच मुझे सोने नहीं दी


फिर उठी आंख खोली
एक लंबी सी नींद से राहत पाई



उगते सूरज के साथ
बढ़ती हुई उम्र थी
और उठती हुई जिज्ञासा




खुद के लिए फिर तिखी चाय बनाई
और फिर एनर्जी को
खुद के अंदर भरने के लिए
कोई गीता सुना
जो मन को भाया



मैं ने फिर खुद के लिए कुछ तीखा बनाया
अपने हाथों की बनाई हुई
तीखे खाना को खाकर
मुझे थोड़ा और जीने की चाहत हुई



और फिर एक्साइटमेंट हुई
कि मैं कहीं जाऊं




ऐसा लगा कि हवाओं से बात करू
हवाओं के साथ बहे जाने के लिए


एक ठंडी शगुन थी आंखों में
हां मैं कहीं घूमने गई थी



कड़ी धूप थी
और भीड़ भाड़ वाली जगह
फिर भी मैं हर चीज महसूस कर पा रही थी



मैं ने खुद के लिए कुछ खरीदा
और वह मेरी खुशी थी
और फिर घर वापस आई



हवाओं से फिर बात करते हुए
अपने होने की एहसास खुद को दिलाते हुए



और फिर मैं आज अपनी सहेली से मिली
बहुत देर तक मैंने उससे बात की
जो दिल में था
जो राज थी वह भी खोला
जी चाहे जो बोला



और फिर शाम हुई
चांदनी मेरे हाथों पर थी
और लग रही थी
चांद को मैं हाथों में लेकर बैठू
फिर धीरे-धीरे मैंने चांद से
पास अपना हाथों को हटा ली



यह कहकर की
किसी को मुझे कैद करना पसंद नहीं
नहीं ऐ अच्छी बातें हैं



और जितनी चांदनी रात खूबसूरत है
इतनी खूबसूरत मुझे मेरी आजादी है
और ये आजादी मेरी चांदनी रात है


मैंने आज फिर एक दिन
दिल को शगुन पहुंचने के लिए जिया
वह आजादी महसूस कीई
जो बस मेरी हिस्से में थी



हां यह आजादी मेरे लिए काफी नहीं थी
पर कुछ ऐसी थी
जेसे घायल परी नन्ही सी
परिंदा के निकलती हुई
पहली पड़




यह कविता आप सबको पसंद आए तो
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मैं आपकी प्रिय लेखक अभिनिशा❤️🦋💯

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तुम महारानी हो इस जहां की
कविता



इतना ना सोचो
जरा थम कर सांस लो
धरती और आसमान तेरे लिए है
ऐ चारों जहां तेरे खिदमत के लिए बने हैं



इतना ना सोचो जरा थम कर शगुन के सांस ले
ऐ धरती आसमान तेरे लिए है
ऐ चारों जहां तेरे खिदमत के लिए बने हैं




फिर रिग्रेट किस बात का
वक्त बीते तो बीते
वक्त की कारवां तुम्हारे लिए ठहर जाते हैं



तुम जहां आह भर्ती हो
वही तो सवेरा है
तुम जहां से मुड़ती है
वही तो अंधेरा है




वक्त की कारवां तुम्हारे कदमों तले हैं



फिर क्यों सोचना सांस जाय है
जाया जा रहा है
तो जाने दे इस सांसों का क्या है



फिर नहीं उम्र मिलेंगे नहीं नई ऐ कारवा है



तुम्हारे ही जरूर से बनी ये जहां है
फिर क्यों आह भरना
फिर क्यों पछताना है
जो करना है
खुल जा और कर ले
जो चाहे अपने मन मे वो कर




ऐ ब्रह्मांड है चलता तुम्हारे इशारों पर
तुम शौर्य से भर जा जरा और



तुम जो चाहे वह कर सकती हो
तुम आसमां तक सीरिया लगा सकती हो
तुम्हारी जिंदगी की हर मुश्किल कारवा
आसान तुम बन सकती हो



सरगम को कहे दे वो ठहेर
अपनी आंखें से रहा को निहार
तुम्हें क्या लगता है
ऐ रहा उलझी है
आलसी है



तो क्या तुम कहां से उलझी हो
तुम्हारे लिए ऐ जहां ऐ दुनिया है
फिर सोचती क्यों


जरा थम चैन के सांस ले
ऐ जालिम समा तेरे लिए ही बना है
ऐ चलती हुई
हवाएं तुम्हारे इशारों पर ही नाचता है


फिर हुकुम कर
सारे बिछरे हुए एसांसों को छोड़कर
तुम इस हवां को एहसास कर



कुछ देर प्रकृति में बैठ
और खुद को आराम दे



देख बहारों की खूबसूरती को
देख नदियों के लहरों को
सन हवा के धुन को
ऐ सब तेरे लिए ही यहा है



तुम्हारी बेचैन मन को शांति देने के लिए
तुम्हें एक सुकून से भरी हुई
तितली बनाने के लिए




ऐ बाहरे ऐ मौसम ऐ बारिश के बंदे
ऐ नदिया ऐ हवा ऐ नदिया की किनारे
सब तुम्हारे लिए बना है



ऐ पहाड़ ऐ फूल कलियां
ऐ हरी भरी दुनिया तुम्हारे लिए बना है



तुम महारानी हो
इस जहां की इस प्रकृति की इस हवा की


फिर डर कर कदम पीछे क्यों लेना
जरा थम और शगुन के सांसें ले
और फिर जोश से भर
और अपने जोश से भरी कदम आगे बढ़ा



ऐ जमीन ऐ आसमां तुम्हारे लिए बना है
ऐ चारों जहां तुम्हारे खिदमत के लिए बना है




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होठों पे गहरी खामोशी
कविता


किसी इंसान के अंदर से
शिकायत और उम्मीद दोनों खतम हो जाना
मतलब


इन आंखों ने बहुत कुछ
ऐसे देख चुके हैं
जिसे इस आंखों को कभी देखना नहीं चाहिए था



बड़ें दिल रख कर सब कुछ छोड़कर आगे बढ़ जाना
मतलब
या नहीं कि वह सब कुछ भूल चुका है



दिल को हर एक समय याद है
जब इसे चोट पहुंचा था
आंखों ने हर एक झुटी चेहरे देखा है
जो अपनों के लिबास में अपने साथ है




होठों पे गेहरी खामोशी
और चेहरे पर शांति


तब आता है
जब लोग दुनिया को नहीं
खुद को पूरी तरह से जान लेते हैं





दुनिया को हद से ज्यादा जाना
दर्दनाक है
और सब कुछ जानकार
खामोशी रखते हुए आगे बढ़ जाना
उस इंसान की शांति का पहला कदम

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हां हम बड़े हो गए
कविता के भाग 2

हां हमें बड़े होने दो
कविता


पर क्या हम बढ़े हैं



हमें बड़े होने दो
हमें रोने दो हमें जी भर हंसने दो
हमें हमारी राह चुन्नी दो
हमें हमारे पसंद के कपड़े पहने दो
हां हमें हमारे पसंद के जीवन साथी खुद ही ढूंढने दो




हमें अकेला चलना है
हमें सचमुच में बड़े होना है



हां हमें बड़े होने दो
हमें दुनिया से पहले खुद को संभालने दो
हां हमें बड़े होने दो
सचमुच में बड़े होने दो




बड़े होने का मतलब समाज में
बस हाइट बढ़ाना है उम्र बढ़ाना है



पर हमारे लिए हमारी हाइट
हमारी उम्र
हमारे बढ़ाने की कोई एविडेंस नहीं है


बस थोड़ी बढ़ी बात है
हम हाइट और उम्र में बड़े हो गए
पर हम अंदर से अभी बच्चे होते हैं




हमारे सर पर आप अपने ख्वाइओ की बोझ मत डालो
हमें अपने भाढ़ पहले संभालने दो
हम खुद को नहीं संभाल सकते
अभी तक


और आप अपनी दुनिया के सारे भारी भर्कभ बोझ
हमारे आंचल में लाकर रख देते हैं
हां हम अभी बड़े नहीं हुए



हमें पहले अपने पैर बढ़कर
कुछ कदम खुद तो चलने दो
हमें गिरकर
खुद संभालने तो दो
हां मैं बड़े होने तो दो



हम अभी तक बढ़े नहीं हैं
हम खुद को संभाले नहीं सकते हैं
बस सब कुछ संभालते हुए
अंदर से टूट चुके हैं



हम सब संभालते हुए
शरीर से जिंदा है
पर अंदर से मर चुके हैं




उस मासूम बच्ची को
जिसे बड़े होने चाहिए था
उसे अंदर ही दफना चुके हैं



जो दुनिया देखना चाहता था
जो खुलकर जीना चाहता था
जो हमेशा हवाओं की तरह बेहकना चाहता था



वह ख्वाहिश सबके ख्वाहिशों में आकर
दम तोड़ दिया
हां वह मासूम बच्ची
कभी बढ़ी हुई ही नहीं




बस चुप रह गई
बड़े होने कि हुड़ में
समाज के दबाव में
अपनों की उम्मीद में


बस कहीं पीछे छूट गई अपने
ख्वाहिशों के गला दबाते हुए




हां उस बच्चों को भी बड़े होने दो
उसे भी समाज में जिंदा होकर
जीने की आजादी दो
हां उन्हें बड़े होने दो





अगर यह कविता आप सबको पसंद आए तो
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मैं आपकी प्रिय लेखकअभिनिशा❤️🦋💯

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हां हम बड़े हो गए पार्ट 1

कविता

हां हम बड़े हो गए



स्कूल छुट्टी कॉलेज खत्म हो गई
हां हम बड़े हो गए


हाथों से खिलौने छोटे
किताबें साइड में रह गए


हाथों में बस झाड़ू पोछा रहेगी
और दिमाग में गरस्ती का जिम्मेदारी
हां हम बड़े हो गए



उम्र में
सच में
पर हम बड़े नहीं हुए कभी
खुद के भावनाओं को संभालने के लिए



हां हम बड़े रहे हमेशा
खुद की भावनाओं को छुपाने के लिए
पर हम बड़े हुए ही नहीं
राहों पर कभी अकेले चलने के लिए




पर हम बढ़े रहे सबको संभालने के लिए
भलो हम खुद को ना संभाल सके
अपनी भावनाओं को ना सामान सके



पर हम जिम्मेदारियां को संभाल सकते हैं
क्योंकि जिम्मेदारियां के लिए
हम बड़े होते हैं
खुद के लिए नहीं



खुद के फैसले लेने के लिए नहीं
क्या करना है हमें
यह फैसला लेने के लिए नहीं
कहां जाना है क्या पहना है
और क्या खाना है
यह डिसाइड करने के लिए
हम कभी बड़े हुई ही नहीं




बस बड़े हो गए हैं
समाज की तरफ से
हम बच्चे नहीं रहे



हम रो नहीं सकते
जब हमें तकलीफ हो
हम जोर-जोर से हंस नहीं सकते
जब हम खुश हो
हम शिकायत भी नहीं कर सकते
जब हमें दर्द हो



हम किसी को ना भी नही कहे सकते
चाहे हम किसी के हमी में खुद को
कुर्बान ही क्यों नाकर दे
इस हद तक हम बढ़े हैं





अगर कविता आप सबको पसंद आए तो
आगे बढ़ते रही
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