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AbhiNisha

AbhiNisha

@abhinisha
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अंतहीन अकेलापन
कविता


अंतहीन अकेलापन
परी सुखा और बंजर जमीन
और आसमान में करारे के धूप
दूर दूर तक कोई हरियाली नहीं
कोई समुद्र नहीं
ना बारिश आने की कोई उम्मीद है

ऐसा लग रहा है कि रेगिस्तान में
भुखे प्यास गिरते पड़ते मुसाफिर चल रहा है
बिना कोई आश के
बस उम्मीद लिए

कही बंजर जमीन खत्म हो जाए
और हरियाली दिखे
कहीं रेत के किनारा मिले
और समुद्र देखें
कहीं मौसम बदले कढ़ी धूप को बादल ढक ले
और बारिश हो जाए

और इस बेजान शरीर में जाना आऐ गे
कहीं तो अनाज का एक निवाला भी
एक टुकड़ा भी मरते हुए आत्मा को नसीब हो

इस अंतहीन अकेलेपन में बस चलते रहना उम्मीद किए हुए डरावना लगता है
और इस डरावनी सफर से गुजरना नामुमकिन है

फिर भी यह जिंदगी है
बस नामुमकिन सफर पर चलते रहना
मंजिल का कोई ना किनारा पाना
बस अकेले अपने दर्द गम तन्हाई की बोझ को ढोते रहना

सबसे बड़ी नाइंसाफी है
जिंदगी मिलने के बाद एक प्राणी के लिए


फिर भी कुदरत अपनी फितरत नहीं बदलते
ना हीं किसी पे रेहेम दिखाते हैं
और हम बस जीते रहते हैं
इस अंतहीन आस लिए
जिसका कोई मतलब ही नहीं

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किस्मत से मिलते हैं पार्ट 2
जो भी यहां मिलते हैं




दयावान वो किस्मत नहीं
जो किसी पे रेहमत बरसाए


ताकतवर वह लोग हैं
जो किस्मत को अपने मेहरून बनाए



झूठ है यह कहने को किस्मत से ही मिलता है
जो भी यहां मिलता है

किस्मत बस एक नाम है
अपने कायरता और नाकामयाबी को छुपाने के लिए


और यही तो है धर्म का धंधा
नाकामयाबी हर दुखी मन का फंडा


किस्मत को कोश कोश के बैठे
फिर लग जाते हैं
अंधविश्वास को भगवान बनाने
किसी सत्याग्रह के मूल्य धूप सुनने
किसी इंसान को भगवान बनाकर कर पूजने


या दिल के जज्बाते
गहरी जन्नत दिखा दे
और फिर नर्क में ले जाते हैं



नहीं पता क्यों दिल लगा के सब खाया
हम अपना भी ना कभी हो सका



मूल्य धूप सुनते त्याग दी मोह माया
वह मोह माया जिसमें बंध के कर्मकांड हमारे थे बढे

जब से छोड़ा मोह माया
करम कांड है
पर फिर भी हम दासी भगवान के



और बढ़ते क्रम कांड
और हम यह हमारे अभियान के


स्वयं भक्त हम महाकाल के
आचरन हमारे कितने भी हो मेले


हमने जब पहने हैं सफेद कपड़े की
चांद की मखमली जैसी रोशन कपड़े

दाग है यह वेदाग है
हम पुण्य आत्मा
हमारे लिए सब जायज है



किस्मत के भरोसे हम भी उनके रखते हैं
जो खुद से डरते ही रहते हैं

जो लाचार परे बेवस
हम उनकी भावनाओं की कीमत
खुद को ईशवर बात कर लगाते हैं



क्या पाप क्या पुण्य
पाप भी हमारे लिए पुण्य बन जाते हैं



और इससे सत्याग्रह में
झूठ को ही हम सच बताते हैं


नहीं बताते हम इंसान की डर है भरम
और हम उनके डर की ही फायदा उठाते हैं

नहीं बताते हम उनकी कमजोरी ही उनको खा जाता है
और उनकी कमजोरी ही हमे भगवान बनाते हैं



किस्मत की भरोसे उन्हें रखते हैं
हम अपने झूठ के ही भरोसे ही
दुनिया को खोखली कर जाते हैं



हां यह जानते हैं हम
हम जान किसी के लेकर
हम अजेय हो जाएं गे


अजय हो जाते हैं
अंतहीन समय के लिए
हम उनके लिए देवता बन जाते हैं


और उन्हें हम बताते हैं
यही किस्मत है
और हमें पूजना तुम्हारे धर्म है


और इस धर्म का पालन करो हमारे सुमीरन करो
हम तुम्हारे इशवर जसे ही पूजनेय हैं



हां हम तुम्हारे पूजनेय हैं

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किस्मत से ही मिलता है
कविता पार्ट 1। गीत


किस्मत से ही मिलता है
जो भी यहां मिलता है

और हम किस्मत के मारे हैं
तन्हा परे दिल बेचारे हैं

हां हम किस्मत के मारे हैं
तन्हा परे दिल बेचारे हैं


दिल की खाता है जो दिल लगाया तुमसे
दिल की खाता है जो दीवाना बन गया मैं तेरे


किस्मत से ही मिलता है
जो भी यहां मिलता है
पर हम किस्मत के मारे हैं
तन्हा परें बेचारे हैं




दिल को दो सजा
हमको छोड़ो दिल की गलती है

इस दिल के वजह से हम हार गए
आके तुम्हारे प्यार में हम मर गए

हा इस दिल की वजह से हम हार गए
तुम्हारे प्यार में हम मर गए

मरना हमारा तय हुआ
दिल दगाबाज तुमसे दिल लगा के अजय हुआ



हा मारना हमारा तेय हुआ
दिल दगाबाज तुमसे दिल लगा के अजय हुआ



हम तो फिरते फिरते सफर पे
कुछ ना हाथ मेरे आया

तुम्हारे डगर पर हम इतनी बेबस हो गए
इंतजार में तुम्हारे खुद को खो गए

ऐ किस्मत कैसा है
कौन जाने

मेरे लिए कभी अपना ना हुआ
मेरे दिल मुझे अपना ना पहेचाने

हा हु हू हू हु हा हा हा

हु हु हू




वो गेरत यह दुनिया भी मुझको अकेला छोड़ गया
हर घड़ी
और अकेलेपन से हम डरते हैं

और सभी को यह पता है
इसीलिए हमको सभी दर्द देते हैं

अकेलेपन में है दर्द गम तन्हाई बेचैनी
इस दर्द गम तन्हाई बेचैनी को संभल ना सकते हैं

और यह दिलबर भी अच्छी तरह जानते हैं
तभी तो दिल लेकर जिसमें पे सित्तम ढाते हैं




दुनिया कितना जल्दी बदल गया
हमें अपने भी पीछे छोड़ कर आगे बढ़ गया

अकेले तनहाई की सफर है
मुश्किल होता है डगर पे चलने में

चलते चलते तक थक गए
अब चैन आए जलने में




जाने वह कैसे लोग हैं
जिस पर किस्मत मेहरबान है


जब सर उठा कर आसमान की तरफ देख तो लगता है
हम बरी नादान है

दयावान वो किस्मत नहीं
जो किसी पे रेहमत बरसाए

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श्याम पिया ठंडी हवा
कविता


शाम कि यह ठंडी हवा
जादू की पिटारें के खुलने के जैसा एहसास दिलाता है
दिन भर के थकावट के बावजूद में शाम के वक्त
खुले आसमान के नीचे बैठने का आनंद जन्नत से कम नहीं

जो ठंडी ठंडी हवा जैसे-जैसे गालों को छु
और बालों को उरा जाती है
ऐसा लगता है कि सारे दर्द और शिकायत ही मिट गया हो

इस ठंडी हवा को महसूस करके
और कुछ महसूस ही नहीं होता

और जैसे-जैसे शाम गुजरते जाती है
और रात आती जाती है
वैसे-वैसे आसमान में तारे खील खिलाने लगते हैं
और इस जगमांगते हुए तारे
हीलते हुए पेढ़ पैधो के पत्तियां
चलते हुए हवा सुकून से भर देती है
और इस पल में इंसान को कुछ और नहीं चाहिए

बस छत के दीवारों पर बैठे रहना
अपने पैरों को नीचे करते हुए
इस हवा को महसूस करते हुए
आसमान को देखते रहना
जले हुए धड़कन को ठंडक से भर देती है
और ऐ ठंडक सदीयो के दुआ से कम नहीं है


और मुझे कुछ देर ऐसे ही बैठे रहना है
इन हवाओं के साथ इन लम्हों में सारे गमों को भुलाकर
इन्हें महसूस करते हुए जीते रहना है

थकावटों से निकली हुई दुआओं को
कबूल होते देखते रहना है
और महसूस करना है
इन लम्हों को
और इन पलो में ठहेर जाना है

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उम्मीद से भरा हुआ जिंदगी
कविता



उम्मीद से भरा हुआ जिंदगी
जो कभी खत्म नहीं होती

इन उम्मीद में खत्म हो जाती है बस जीने की चाहत
चाहत बस बचती है दिल में जी उठने की



आंखें खाली है
और सपनों में दोहरापन है
उन दिनों की जो कभी आया ही नहीं



खुली आंखों राहा तकती है
मेरे अपनों की
पर आंखों को इस भीड़ में कभी कोई अपना दिखाई नहीं


मेरी जान को तरसती है
एक बार मेरे अपनों को गले लगाने को
पर राह में मेरे अकेलापन के अलावा कुछ मिला ही नहीं


बस उम्मीदों से भरी जिंदगी में
जिंदा रहना कोई सजा से काम नहीं

और सजा काटने के लिए ही इंसान जन्म लेते हैं
जीने के लिए काम
और इन गमों को संभालने के लिए ज्यादा


इन दाहोरापन जिंदगी में कुछ भी नया नहीं है
खामोशी है दोहराया गया
दर्द है सदियों पहले अपनाया गया



अकेलापन है अपनों को छोड़ा गया
खुशियां नहीं है
और यह ढूंढने से भी मिलता नहीं है


बस जो है वह है गहरी उदासी
जो कभी समझा ही ना गया

उम्मीद से भरी जिंदगी में
बस आधी जिंदा लाश राहों पर चल रहा है
हजारों शिकायते पीछे छोड़कर

खामोश होंठ लिए
राहों पे आंखें बिछाए हुए
किसी अपनो की इंतजार करते हुए

उम्र बिता रही कभी ना पूरी होने वाली
सपनों पे भरोसा किया हुए

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मेरे अंदर दो रूहानी ताकत रहता है
कविता


एक रूहानी ख्वाब मेरे
एक साए हैं साथ मेरे

जो मुझे हिम्मत देता है
मुझे अक्सर जगाता है

मैं रानी ख्वाबों की
मलिका वो मुझे बनता है


एक सोच जिसे कह सकती हूं
निडर जो मुझे रखता है

भैय नहीं मेरे अंदर खुद के लिए
इतना अभिमानी वो मुझे बनता है



जब दुखी हो जाऊं तो सपने दिखा कर हंसता है
और जब खुश रहो तो अनजान दिखा कर दोहलता है


मैं नहीं मेरे अंदर दो रूहानी ताकत रहता है

एक मुझे जिंदा दिल बनता है
और दूसरा मौत की नजरों से देखा है


मुझे खुद से नफरत हो जाए
कुछ ऐसा कर जाता है

सब पर आक्रोश दिखा कर भी पछताते नहीं
स्वार्थी इतना है कि गुमान
मौत पर तांडव करती है


और एक दरिया दिली मुझे बनता है
अपने कर्मों पर पछताते है

स्वाभिमानी मुझ में दिखलाता है
बस प्यार से जीना चाहता है

जानता है दोनों
क्या सही है क्या सही नहीं है

एक सर झुका कर गलतियां मान लेती है
तो एक नाकारता है अपनी गलतियों को

अहंकार में आक्रोश बन जाता है
जब उसे अपनी उसकी गलतियां बताओ
तो सर उठाकर आंखें दिखाई है

पता नहीं मुझ पर कौन कब हावी होता है

जो अच्छा है उसे बुराई डराता है
उबर नहीं पाती मुझ में अच्छाई मेरे
इतना डर वह मुझे दिखता है


अकसर आच्छाई उसके सामने घुटने टेक देता है

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आज रात किसी तरह सो जाएं
कविता



अंदर खालीपन है
नहीं पता क्यों
बस सन्नाटा ही सन्नाटा है
सांसे चल रही है जिंदा हूं
आंखें खुली है जाग रहा हूं

और यह दुनिया भी देख रही हूं
फिर भी सामने अंधेरा ही अंधेरा है
जैसे मेरे लिए कुछ है ही नहीं
बस अकेलापन गहरा अकेलापन है
ऐसा लग रहा है कि
मेरी कोई इस दुनिया में है ही नहीं


दिल पर चोट लगी है
इसलिए एसा लग रहा है
या ऐ डिप्रेशन है

नहीं पता मुझे समझ में नहीं आ रहा
मेरे भावनाएं बस अकेलापन से भरा हुआ है


बस बेवजह की काम कीई जा रही हूं
बिना प्रणाम जान
ऐसा लग रहा है कि
खुद को थका ही नहीं रही
बल्कि सजा भी दे रही हूं
इस दुनिया में होने की


मेरा होना सही है या गलत
नहीं पता
पर अभी लग रहा है
मुझे होना ही नहीं चाहिए इस दुनिया में


मुझे वहा अकेलापन और खालीपन महसूस हो रहा है
जिसमें दम घुस रहा है
खुद की जान लेने का मन कर रहा है


फिर भी खुद को उलझाना चाहती हूं
पूरी तरह से थकना चाहती
समझ में नहीं आ रहा है कुछ
पर खुद को समझना चाहती हूं
कि आज रात किसी तरह सो जाए

बस आज दिन गुजरे
शायद कल यह अकेलापन यह बेचैनी खत्म हो जाए
इस आस से
खुद को कुछ और देर थामे रहने के लिए मजबूर कर रहा हूं

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तू एक हवा है
कविता




मैं जानती हूं खुद को
फिर भी चाहती हूं तुझको
मुझे पता है तू एक हवा है


फिर ही बावरी मैं
तेरे पीछे भाग रही हूं


बिना सोचे कि तुम मेरे हाथ ना आओगे
फिर भी बावड़ी में तेरे पीछे भाग रही हूं


मेरी दुनिया का
मेरी दुनिया में तू है मेरा रांझा


फिर तू क्यों नहीं आता
आके मुझे समझाजा
कुछ इस तरह हवाओं से दिलगी अच्छी नहीं बताता



मुरझाऐ हुए फुल की तरह मुरझा गई हुं मै
बेचैन बेताव तन्हा हो गई हूं मैं


तुम्हारा इंतजार करते हुए
तुम्हारे राहों में ही मैं सो गई हूं



इस आस में ऐ हवा
दौड़ती हुए तुम अचानक ठहरते
और नज़रें फेर कर मुझे एक नजर भर देखते



पर कभी तुम्हारे कदमें ठहरे ही नहीं
अपनी राहों पर चलते हुए
तुम कभी मुरे ही नहीं



मुझे देखने के लिए


मैं जानती हूं तुझ को
फिर भी चाहती हूं तुम्हें

मुझे पता है तू एक हवा है
और यह हवा मेरी सांसों के लिए जरूरी है




चाहे वह ठहरे न ठहरे
मैं ठहर गई तुम्हारी राहों पर
तुम्हारे कदमों की आहट सुनने के लिए

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तुम पर मैं मार जाऊंगी
कविता



अब गलतियां कर जाऊंगी
तुम पर मैं मर जाऊंगी
तुम्हारे लिए मेरी जिंदगी रश्मि है
और इस रेशम की डोरी से बंधी हुई इकश मेरी है




अब कहे दूंगी दिल में जो मेरी है
अब छिपाना मुश्किल है
दिल लगा कर
और बहान लगाना मुश्किल है




अब तुम्हारे पास आना चाहती हूं
तुम्हारी बाहों में सोना चाहती हूं



अब तुमसे दूर रहना मुश्किल है
दुनिया जो कहे अब मुझे परवाह नहीं


बहुत छुपा ली दिल की बातें
इस दुनिया से
अब यह दुनिया खफा हुए तो हुए

मुझे अब इश्क को जाहिर करना है
तुम्हारे पास आना है
तुमसे दिल लगाना है




अब और मुश्किल लगता है
तुम्हें देखकर ही दिन गुजरा
अब और मुश्किल लगता है
तुमसे मिलकर भी दूर रहना



अब मुझे दिल की बातें अपनी तुमसे कहना है
कहना है मुझे
जो दिल में मेरी है


सुनने के बाद शायद तुम इनकार कर दो
पर मुझे एक बार इतनी हिम्मत तो लानी है
दुनिया की परवा छोड़कर
तुम्हारे कदमों साथ अपनी कदम बढ़ाना है


अब छोड़ देनी है वो धागे अपने हाथों से
जो मुझे हाया में बांधे रखता है
अब लज्जा की चुनरी अपने सर से हटाकर
अपने हाथ तुम्हारे हथेली की तरफ बढ़ाना है

मुझे यह गलती करनी है
उसके बाद इस इश्क की
परिणाम भी स्वीकार होगी मुझे


तुम्हारा हां भी और ना भी स्वीकार होगी मुझे

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जिने की तमन्ना में मार बैठे
कविता



जीने की तमन्ना में मर बैठे
जब से तुमसे प्यार हुआ हम हार बैठे


क्या करूं मैं इस दिल का
जो तुम पर मरने लगा है
हर वक्त बातें तुम्हारे करने लगा है


होठ खामोश है दिल दर्द से भरा
तुम्हें सामने पा कर भी
तुम्हें पाने का ख्वाब
दिल में हर पल रहता है


तो
चाहा आज तुम सामने हो
तो क्यों ना
मैं तुम्हारे और पास आऊ
और कहूं
दिल में जो है
कहूं मैं तुम्हें



जीने की तमन्ना में हम मर बैठे
जब से तुमसे प्यार हम हार बैठे


कहां मैं तुम्हें मैं
हार गया अपने दिल से
जब से तुम मेरे दिल में आए


कहो मैं तुम्हें
मैं जीना चाहती हूं
पर तुम्हारे साथ जीने की तमन्ना में
मैं मर रही हूं




और
पूछूं मैं तुम्हें क्या तुम भी मुझसे प्यार करोगे
और
पूछो मैं तुम्हें क्या मैं तुम्हें कभी पसंद आई




पर मैं तुम्हारे सामने आकर
यह नहीं कह पाए

कि मैं तुमसे प्यार करती हूं
मुझ में हिम्मत नहीं
अपनी इश्क को जाहिर करने की



और यह दर्द गहरा है
कहां हूं मैं तुम्हें कभी मेरी चमकती हुई
आंखें क्या देखा है
जो तुम्हें देखकर ही चमकता है



कहूं मैं तुम्हें क्या तुमने मेरी रोती हुई
आंखों देखा है
जो तुमसे रूबरू ना होने के गम में बहता है


और पूछो मैं तुम्हें क्या
तुमने कभी मेरी मुरझाई हुई चेहरा देखा है
तुम्हें अपना मान के भी
तुम्हें अपना ना कहने के दर्द में
मेरे चेहरे से रौनक उतर गई है



पर मुझ में हिम्मत नहीं
तुम्हारे पास जाओ
और कहूं दिल की बात अपने




पर मैंने हमेशा देखा है
तुम्हें तुम्हारी जिंदगी जीते हुए
तुम्हारी तनहाई को तुम्हारी सादगी को
तुम्हारे दर्द को तुम्हारे अकेलेपन को



तुम्हारे हंसते हुए चेहरा
तुम्हारी मुरझाए से चेहरा
मैं ने हर बार देखा है

तुम्हारे गमों को मैंने खामोशी से अपने अंदर पना दिया है




अगर यह कविता आपसे लगे तो
आगे पढ़ते रहि
मैं आपके प्रिय लेखक अभी निशा ❤️🦋💯

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