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New bites

હોઠો પર છલકતું સ્મિત
ખીલી ઊઠ્યું સુમન બની…
-કામિની

kamini6601

गणेशजी का दिल से स्मरण,
करे विपरीत बुद्धि का हरण!

इस गणेश चतुर्थी के पर्व पर जानिए अधिक मूर्तिपूजा का महत्त्व: https://dbf.adalaj.org/zwiv97Pl

#GaneshChaturthi #Ganeshutsav #Ganeshji #LordGanesha #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

Today's lesson forever

kattupayas.101947

आत्मनिर्भर : एक व्यंग्य

देश में आत्मनिर्भरता की हवा चल रही है। कोई कह रहा है अपने पैर पर खड़े हो जाओ, कोई कह रहा है ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ मत समझो और कोई बता रहा है कि अब विदेशी चीज़ों का मोह त्यागकर स्वदेशी अपनाओ।

लेकिन इस सबके बीच, आत्मनिर्भरता का सबसे मजेदार नमूना वे लोग हैं जो दिन-रात आत्मनिर्भरता का मजाक उड़ाने में ही आत्मनिर्भर हैं।

पूरा व्यंग शिध्र ही मातृभारती पर प्रकाशित होगा जरूर पढ़े 🙏

deepakbundela7179

विद्यार्थी जीवन के लिए सफलता सूत्र

jakhar

वो सफ़र पे निकला था, लौट कर आना था,
मगर हादसे ने हमें रुलाना था।


2. सड़कों पे बिखरा लहू और ख़्वाबों का रंग,
किस्मत ने लिख दिया दर्द निभाना था।


3. जिसको दुआओं से मैंने सँभाल रखा,
उसको कफ़न में ही अब सजाना था।


4. आईने में चेहरा भी रो पड़ा मेरा,
हर बार तेरी झलक ही दिखाना था।


5. तेरे बिना अब दिल को चैन कहाँ,
ज़ख़्मों को बस अश्कों से भिगोना था।


6. कब्र पर तेरी फूल रखे हैं मैंने,
इन गुलों से तेरा हाल बताना था।


7. ज़िंदगी का रंग अब फीका पड़ गया,
तेरे बिना सब जहाँ वीराना था।


8. रुक गई घड़ी उसी मोड़ पर आकर,
जिस मोड़ से तेरा गुज़र जाना था।


9. मेरे सवालों का जवाब न मिला,
क्यों तेरा नसीब यूँ मिट जाना था।


10. हर शेर में तेरा ज़िक्र आता है,
ग़ज़ल में तेरा ही अफ़साना था।


11. लोगों ने पूछा, "अब भी इंतज़ार है?"
मैंने कहा, "दिल को धोखा खिलाना था।"


12. ख़्वाबों में तेरा चेहरा मुस्कुराता है,
हक़ीक़त में तो बस ख़ामोशी पाना था।


13. सड़क पे बिछ गए अधूरे क़िस्से,
मुझे अकेले ही अब निभाना था।


14. काश उस रोज़ मैं रोक लेता तुझे,
पर लिखा क़िस्मत में ठहर जाना था।


15. इश्क़ ने दी है मुझे ये तन्हाई,
अब "क़बीर" हर शेर से ग़म सुनाना था।

kabirwrites

बात दोनों की होगी पति हो चाहे पत्नी

archanalekhikha

पत्नी ने कभी किसी का प्रेमी नहीं छीना,
वह तो खुद बंध गई समाज और रिश्तों की ज़ंजीरों में।

प्रेमिका कहती है — उसने मेरा प्रेम छीन लिया,
पर सच तो यह है — छीनने वाला वही पुरुष है,
जो दो नावों पर सवारी करता है।

सिंगल लड़कियों से पूछो,
उनका पति कौन चुरा ले गया?
किसने रोक दिया उनके हिस्से का प्रेम?
उत्तर वही होगा —
या तो समाज ने,
या उस पुरुष की स्वार्थी चाह ने।

ना पत्नी चुराती है,
ना प्रेमिका हारती है,
हारता है सिर्फ़ प्रेम...
जब रिश्तों में सच्चाई और ईमानदारी नहीं होती।"**
प्रेमिका से सवाल सच-सच बताना
मुझे तो यह कंपेयर और तुलना करना मूर्खता लगता है

archanalekhikha

Be fearless

kattupayas.101947

Iam careless quotes

kattupayas.101947

Good morning Friends .Have a great day

kattupayas.101947

हर मत मानो,,,

drbhattdamayntih1903

સાચો મિત્ર,,,,

drbhattdamayntih1903

સર્વેને સરવણસરી મહાપર્વની હાર્દિક શુભેચ્છાઓ 🌹🌹 મિચ્છામી દુક્કડમ 🌹🙏💐

drbhattdamayntih1903

Goodnight friends

kattupayas.101947

Read It Twice .....

mayankbhandari84gmail.com090614

रिमझिम बरसात में
बैठ कर आपके साथ में।
आंखों में आंखे डालकर

जब पीते हैं आप के हाथ की
बनी हुई चाय जनाब ...
नशा करती है ऐसा जैसे हो शराब ।
Bitu.....

bita

हमें पता है तुम कहीं और मुकम्मल हो,
हमारी किस्मत में बस यही एक शिकवा है।

​तुम्हारी राह में कांटे बिछाए नहीं हमने,
बस अपनी ही राहों में फूल बोए हैं।

​तेरी आँखों में अब वो नूर नहीं,
शायद तेरी दुनिया में कोई और है।

​तेरी खामोशी में एक अजीब सा दर्द है,
लगता है तेरी जुबां पर कोई और नाम है।

​हमारा प्यार तो एक फकीर की दुआ है,
तू तो एक शहजादे हों , किसी और की दुनिया के।

palewaleawantikagmail.com200557

Bapreee Rongtee Khade Kar Diye Yaar Is Line Ne To 🔥🔥🔥🔥🔥

mayankbhandari84gmail.com090614

“कभी किसी को लिखते-लिखते खुद को पा लिया है?
ये कविता सिर्फ़ शब्द नहीं… ये दिल की धड़कन है, मोहब्बत की आवाज़ है।
हर मुस्कुराहट, हर खामोशी और हर ख्वाब का रंग… इन लफ़्ज़ों में छिपा है।
अगर आपने भी कभी प्यार को महसूस किया है, तो ये कविता आपकी है ❤️
एक बार पढ़ो, फिर शायद हर बार खुद को इसमें ढूँढोगे।
#कविता #प्यार #धड़कन




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dhirendra342gmailcom

rgposhiya2919

भक्ति प्रार्थना 🌸

जैसे एक छोटा बच्चा चलता है,
ठोकर खाता है, गिरता है,
तो माता-पिता दौड़कर आते हैं,
उसे गोद में भर लेते हैं, सहला देते हैं—
"डर मत, हम हैं न!"

वैसे ही, हे शिव–शक्ति,
मैं भी आपकी नन्ही बच्ची हूँ।
बहुत थक गई हूँ इस जीवन-पथ पर,
गिरते-संभलते अब और नहीं चल पा रही।

मेरे छोटे-से हाथ को पकड़ लीजिए,
एक हाथ बाबा भोलेनाथ का,
दूसरा हाथ जगतजननी माँ का—
और बीच में मैं, आपकी लाड़ली।

जैसे माता-पिता थाम लेते हैं अपने बच्चे को,
वैसे ही आप दोनों मेरे हाथ थाम लीजिए।
मेरी थकान हर लीजिए,
मेरे आँसू पोंछ दीजिए।

प्रभु, मैं बस आपकी शरण में नन्हीं बच्ची हूँ,
ना कुछ जानती, ना कुछ समझती।
बस इतना भरोसा है—
जब आप दोनों साथ हैं,
तो कोई गिरावट मुझे तोड़ नहीं सकती।


---

archanalekhikha

भाग 1 : परिचय

अध्याय 1 : गाँव और मासूमियत

प्रतापपुर गाँव की सुबह किसी पुराने भजन जैसी होती थी—धीमी, मधुर और आत्मा को छू लेने वाली। जब पूर्व दिशा से सूरज की लालिमा आसमान पर बिखरती, तो ऐसा लगता मानो धरती ने सुनहरा आँचल ओढ़ लिया हो। खेतों में ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमकतीं और हवा में मिट्टी की खुशबू घुल जाती।

गाँव का जीवन सरल था। लोग सूर्योदय से पहले उठते, पशुओं की देखभाल करते और फिर खेतों में जुट जाते। औरतें कुएँ से पानी भरतीं, आँगन लीपतीं और लोकगीत गातीं। बच्चे स्कूल जाने से पहले नदी किनारे नहाने जाते और फिर खेलकूद में खो जाते।

उसी गाँव में अर्जुन रहता था। वह पंद्रह साल का था—दुबला-पतला, गेहुँआ रंग, आँखों में गहरी चमक। पिता गरीब किसान थे, माँ गृहिणी। आर्थिक स्थिति कमजोर थी, मगर अर्जुन का मन पढ़ाई और सपनों में डूबा रहता। उसके अंदर कुछ बनने की लगन थी, और सबसे बड़ी बात—दिल बहुत साफ़ था।

सावित्री, दूसरी ओर, गाँव के ज़मींदार ठाकुर साहब की इकलौती बेटी थी। उसके घर की हवेली ऊँची दीवारों और नीले दरवाज़ों से घिरी थी। लोग कहते थे कि सावित्री राजकुमारी जैसी है—नाज़ुक, सुंदर और पढ़ी-लिखी। मगर उसकी सादगी उसे सबसे अलग बनाती थी।

उनकी पहली मुलाक़ात गाँव के मेले में नहीं, बल्कि बरसात के दिन नदी किनारे हुई थी। सावित्री खेलते-खेलते फिसल गई और उसके पाँव में चोट लग गई। भीड़ में से अर्जुन ही था जिसने उसकी मदद की। उसने अपनी गमछा फाड़कर पट्टी बाँधी और कहा—
“अब ठीक है। डरने की ज़रूरत नहीं।”

सावित्री ने उस दिन पहली बार उसे गौर से देखा। उसकी आँखों में ईमानदारी थी और आवाज़ में अपनापन।

यहीं से उनकी दोस्ती शुरू हुई।

धीरे-धीरे यह दोस्ती गहरी होती गई। स्कूल में सावित्री अक्सर गणित और हिंदी में कमजोर पड़ जाती, तो अर्जुन उसकी मदद करता। बदले में सावित्री उसके लिए अपनी हवेली से कभी किताब, कभी मिठाई चुपके से लाती। दोनों को लगता था जैसे वे एक-दूसरे की कमी पूरी कर रहे हों।

गाँव के बच्चे जब खेलते, तो अर्जुन और सावित्री भी शामिल होते। कभी कंचों में अर्जुन जीत जाता, तो सावित्री मुँह फुला लेती। अर्जुन हँसकर कहता—
“अगली बार तुम जीतोगी, वादा।”

सावित्री खिलखिलाकर हँस देती और उसका हँसना पूरे माहौल को रोशन कर देता।

लेकिन गाँव की चौकस निगाहें इस दोस्ती को मासूम नहीं मानती थीं। लोग कानाफूसी करने लगे। बुज़ुर्ग कहते—
“किसान का बेटा और ज़मींदार की बेटी? यह दोस्ती ज़्यादा दिन नहीं चलेगी।”

पर अर्जुन और सावित्री इन बातों से बेपरवाह थे। उनके लिए यह बंधन दुनिया से ऊपर था।

एक दिन शाम को, जब आसमान लाल हो रहा था और पक्षियों के झुंड लौट रहे थे, सावित्री ने अचानक पूछा—
“अर्जुन, क्या तुम सोचते हो कि हम हमेशा ऐसे ही मिलते रहेंगे?”

अर्जुन मुस्कुराया और बोला—
“हाँ, क्यों नहीं? दोस्ती कभी नहीं टूटती।”

सावित्री ने धीमी आवाज़ में कहा—
“पर अगर लोग हमें रोकें तो?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए उत्तर दिया—
“फिर भी मैं तेरे साथ रहूँगा।”

उसे कहाँ पता था कि यह मासूम वादा एक दिन उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगा।

rajukumarchaudhary502010

भाग 1 : परिचय

अध्याय 1 : गाँव और मासूमियत

प्रतापपुर गाँव की सुबह किसी पुराने भजन जैसी होती थी—धीमी, मधुर और आत्मा को छू लेने वाली। जब पूर्व दिशा से सूरज की लालिमा आसमान पर बिखरती, तो ऐसा लगता मानो धरती ने सुनहरा आँचल ओढ़ लिया हो। खेतों में ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमकतीं और हवा में मिट्टी की खुशबू घुल जाती।

गाँव का जीवन सरल था। लोग सूर्योदय से पहले उठते, पशुओं की देखभाल करते और फिर खेतों में जुट जाते। औरतें कुएँ से पानी भरतीं, आँगन लीपतीं और लोकगीत गातीं। बच्चे स्कूल जाने से पहले नदी किनारे नहाने जाते और फिर खेलकूद में खो जाते।

उसी गाँव में अर्जुन रहता था। वह पंद्रह साल का था—दुबला-पतला, गेहुँआ रंग, आँखों में गहरी चमक। पिता गरीब किसान थे, माँ गृहिणी। आर्थिक स्थिति कमजोर थी, मगर अर्जुन का मन पढ़ाई और सपनों में डूबा रहता। उसके अंदर कुछ बनने की लगन थी, और सबसे बड़ी बात—दिल बहुत साफ़ था।

सावित्री, दूसरी ओर, गाँव के ज़मींदार ठाकुर साहब की इकलौती बेटी थी। उसके घर की हवेली ऊँची दीवारों और नीले दरवाज़ों से घिरी थी। लोग कहते थे कि सावित्री राजकुमारी जैसी है—नाज़ुक, सुंदर और पढ़ी-लिखी। मगर उसकी सादगी उसे सबसे अलग बनाती थी।

उनकी पहली मुलाक़ात गाँव के मेले में नहीं, बल्कि बरसात के दिन नदी किनारे हुई थी। सावित्री खेलते-खेलते फिसल गई और उसके पाँव में चोट लग गई। भीड़ में से अर्जुन ही था जिसने उसकी मदद की। उसने अपनी गमछा फाड़कर पट्टी बाँधी और कहा—
“अब ठीक है। डरने की ज़रूरत नहीं।”

सावित्री ने उस दिन पहली बार उसे गौर से देखा। उसकी आँखों में ईमानदारी थी और आवाज़ में अपनापन।

यहीं से उनकी दोस्ती शुरू हुई।

धीरे-धीरे यह दोस्ती गहरी होती गई। स्कूल में सावित्री अक्सर गणित और हिंदी में कमजोर पड़ जाती, तो अर्जुन उसकी मदद करता। बदले में सावित्री उसके लिए अपनी हवेली से कभी किताब, कभी मिठाई चुपके से लाती। दोनों को लगता था जैसे वे एक-दूसरे की कमी पूरी कर रहे हों।

गाँव के बच्चे जब खेलते, तो अर्जुन और सावित्री भी शामिल होते। कभी कंचों में अर्जुन जीत जाता, तो सावित्री मुँह फुला लेती। अर्जुन हँसकर कहता—
“अगली बार तुम जीतोगी, वादा।”

सावित्री खिलखिलाकर हँस देती और उसका हँसना पूरे माहौल को रोशन कर देता।

लेकिन गाँव की चौकस निगाहें इस दोस्ती को मासूम नहीं मानती थीं। लोग कानाफूसी करने लगे। बुज़ुर्ग कहते—
“किसान का बेटा और ज़मींदार की बेटी? यह दोस्ती ज़्यादा दिन नहीं चलेगी।”

पर अर्जुन और सावित्री इन बातों से बेपरवाह थे। उनके लिए यह बंधन दुनिया से ऊपर था।

एक दिन शाम को, जब आसमान लाल हो रहा था और पक्षियों के झुंड लौट रहे थे, सावित्री ने अचानक पूछा—
“अर्जुन, क्या तुम सोचते हो कि हम हमेशा ऐसे ही मिलते रहेंगे?”

अर्जुन मुस्कुराया और बोला—
“हाँ, क्यों नहीं? दोस्ती कभी नहीं टूटती।”

सावित्री ने धीमी आवाज़ में कहा—
“पर अगर लोग हमें रोकें तो?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए उत्तर दिया—
“फिर भी मैं तेरे साथ रहूँगा।”

उसे कहाँ पता था कि यह मासूम वादा एक दिन उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगा।

rajukumarchaudhary502010