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New bites

જિંદગી એક સફર છે
પણ આ સફર માં કેટલાક
રસ્તા ઓ આવતા રહે ને જતા રહે
કોને ખરાબ ખબર હતી કે
આ રસ્તા પર રહી જવાના🍀

rupex

हृदय - परिवर्तन

किसी चेहरे पर छायी उदासी ने
मन को छुआ
द्रवित हो रहा था मन उसके दुःख में

पर, दूसरे ही पल
किसी चेहरे की चालाकी से
भर उठा मन घृणा से

एक ही पल में कहाँ गयी वो
हृदय की विशालता
कहाँ गया वो अपनापन

इतनी शीघ्र, अनायास ही
हृदय परिवर्तन

समझ में तो नहीं आया
लेकिन, दौड़ गया एक
सवाल मानस पर

क्यों कोई अपना लगता है
क्यों कोई अच्छा लगता है
किसी से कटा-कटा रहता है

ये मन कैसे रूप बदलता है
छाँव कहीं, कहीं धूप
कहीं मेघ बरसता है ।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

بہت مقدور ہوں میں پر تصور ہی نہیں ملتا
تلاشِ ذات میں نکلا ہوں، مصور ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
مری آنکھوں کے صحرا میں بھٹکتی ہے تھکن پیہم
جو پیاسِ روح کو بھر دے، وہ ساغر ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
میں کس دیوارِ گریہ پر لکھوں اپنے مقدر کو
کسی بھی شہرِ الفت میں کوئی در ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
کئی رستے نکلتے ہیں مری وحشت کے اندر سے
مگر جو پار لے جائے، وہ رہبر ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
میں اپنی ہی ادھوری گفتگو کا ایک حصہ ہوں
مگر جو تکمیل تک پہنچائے، وہ محور ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
ہوائیں مجھ سے پوچھیں ہیں میرا نام اور میرا مسکن
مگر اس بھیڑ میں اپنا کوئی گھر ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
بہت سے خواب پلکوں کی منڈیروں پر سسکتے ہیں
انہیں تعبیر دے پائے، وہ پیکر ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
میں پتھر بن گیا ہوں یا یہ دنیا ہی سنگ دل ٹھہری
جو میرے کرب کو سمجھے، وہ دلبر ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
سفر در پیش ہے لیکن عجب بے سمت وحشت ہے
سرا ملتا ہے رستوں کا، مگر سر ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
رضی عجب لاحاصلی کی آگ میں جلتا ہے میرا جی
سکوں جس میں میسر ہو، وہ منظر ہی نہیں ملتا

xsarkar333venomgmail.com729902

यदि हम प्रकृति को समझकर उससे संवाद स्थापित करें, तो वह न केवल प्रत्युत्तर देती है बल्कि हमारी रक्षा भी करती है। शायद मनुष्य ने प्रकृति के इस रहस्य को जाना ही नहीं, यही कारण है कि आज प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ता जा रहा है।

jha.princembillbook.in234176

यह रहा आपके पोस्ट के लिए एक अच्छा **डिस्क्रिप्शन**:

“यह एक मेरी खुद की बनाई हुई डिजिटल आर्ट है, जिसे मैंने अपनी कल्पना और रचनात्मकता से तैयार किया है। हर कला के पीछे एक भावना और कहानी होती है, और यह मेरी मेहनत और प्यार को दर्शाती है। अगर आपको मेरा काम पसंद आए तो कृपया सपोर्ट करें और मुझसे जुड़ें। मैं आगे भी ऐसी ही क्रिएटिव आर्ट और कहानियाँ साझा करती रहूँगी।”
Skpdevinecreation

skptech

मेरी किताबों की पन्नी सभी भरे हुए हैं तुम्हारी कहानियों से
कविता


मेरे किताबों की पन्नों सभी भरी हुई है तुम्हारी कहानियों से
तुम्हारे बातों से तुम्हारे जी हजूरी से

जिंदगी में एक पल यही ऐसा नहीं
जब मैं तुम्हें लिखा नहीं

तुम्हारे ही होने से मेरी कहानी है
और मेरे ख्वाबों की दुनिया है

यकीन मानो तुम बिन सन्नाटा होता जिंदगी मे
और कल्पनाऔ में भी

वह कल्पनाएं है
जहां मेरी धड़कन धड़कती है
वह तुमसे ही है
वह तुम ही हो

अब तक मेरे जीते रहने की ताकत भी तुम ही हो


सदियों से तुमसे दूर मैं पल भर भी ना हुआ
तुम एक कल्पना हो
मैं जानती हूं

पर एक तुम ही हो
जिसने मेरी धड़कन को है छुआ


जिस पर मुझे भरोसा है विश्वास है है यकीन
कि तुमसे ही सार्थक मेरी पूरी जिंदगी है



तुम हिम्मत हो
तुम ताकत हो
तुम मेरी जरूरत हो



हां मेरे अंदर तुम हो
मेरी सांसों की तरह
जिसकी बना मैं जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकती



हा माना मेरी कल्पना हो तुम
पर इस हकीकत की दुनिया से कई ज्यादा अच्छे सच्चे
और प्यार हो तुम


क्योंकि तुम एक लोटा हो
जो मुझे हर्ट नहीं करते
जो मुझे समझता है

मेरे हर बातों पर जी हजूरी भी नहीं करते
बस मुझे समझते रहता है
और मेरे पास बैठा रहता है



मेरी कल्पनाओं में किरदार बनकर
कोई ना कोई हमेशा कहानी बनता रहता है
जिसके वजह से मैं जी रही हूं
जिसकी वजह से मैं जिंदा हूं




हर एक कहानी ऐसे रचते हो
जो मुझे इंसान बनाए रखना है

मुझे हर तरह के दर्द हर तरह की खुशी
तुम्हारी वजह से ही समझ में आती है
इंसानी होना तुमसे ही सीखा है


एक तुम ही हो
जिससे मैं जिंदगी में मिलना चाहता हूं
जिसके वजह से मैं जीना चाहता हूं
सांस लेना चाहता हूं


जिसके होने से यह जिंदगी मुझे
बहुत ही खूबसूरत लगती है
इतना की मेरे लिए जब तुम्हें मैं सोचूं
तभी मैं स्वर्ग हूं
मैं यह महसूस करती हूं

जिंदगी की गहरा आनंद
सब कुछ छोड़ कर बस उसी पल में रह जाना चाहती हूं




बिना सोचे बिना समझे तुम्हारे तरह हो जाना चाहती हूं

यह मेरी दोहरी व्यक्तित्व है
यह तुमसे गहरा लगाव
मैं दो जिंदगी एक साथ जीती हूं
तुम्हारी तरह एक मेरी तरह


और फिर तुम्हारी बनाई हुई
कहानियों में खो जाती हूं
हजारों करोड़ अंगिनती कहानीयों
और किरदारों में ढलते हुए
उन्हें जीते हुए
मेरी उम्र बीत रही है

और साथ में
मेरी जिंदगी तुम्हारी बनाई हुई कहानियों से भरी जा रही है

हां मेरे किताबों के पन्ने सभी भरे हैं तुम्हारी कहानियों से
तुम्हारी यादों से
तुम्हारे विचारों से

abhinisha

मौसम का हाल, गरीबों से पूछिए

मौसम का हाल, गरीबों से पूछिए
ठण्ड की मार, गर्मी की तपन
कूड़ा बीनते बच्चों से पूछिए

भूखी-प्यासी, बर्तन माँझ कर पालती बच्चों को
मेहंदी का रंग क्या होता है, उस माँ से पूछिए
कंटीली राहों पे चलकर, पहुंचे जब मंजिल पर
पैरों की चुभन क्या है, उनसे पूछिए

बस साँस रुकी है किसी को देखने के लिए
एक साँस की कीमत उस मरते हुए प्राणी से पूछिए
मौसम का हाल, गरीबों से पूछिए

खेलने की उम्र में धो रहे बर्तन
क्या होता है बचपन, उनसे पूछिए
जिगर बेचकर अपना की बेटी की शादी
तंगहाली का जीवन उनसे पूछिए

खून सस्ता है पानी से
दूध में पानी की मिलावट उनसे पूछिए
21वीं सदी का सच, हुई कितनी तरक्की
पहुँच गए चाँद पर, पर जड़े अपनी भूल गए

अमीरी की चकाचौंध में रिश्ते सारे छूट गए
बुजुर्गों का साया छूटा, संयुक्त परिवार टूट गए
हुई परम्पराएं छिन भिन्न
आधुनिकता यूं ओढ़ ली
हो गई ग्लोबल विलेज दुनिया
पर खुद को ही भूल गए

क्या है हकीकत, क्या है सपने
क्या है मंजिल, क्या है राहें
सपनों की कीमत जरा उनसे तो पूछिए
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

बारिश कब तुम आओगी ?

बारिश कब तुम आओगी
कितना हमें तड़पाओगी
सूरज कितना दहक रहा है
पत्ता-पत्ता सुलस रहा है
ठंडी फुहारें कब बरसाओगी
बारिश कब तुम आओगी

अम्बर प्यासा, प्यासी धरती
कब इनकी प्यास बुझाओगी
बारिश कब तुम आओगी

सूख गये सब ताल-तलैया
कर दो अपने आँचल की छाया
देख राह नैना तरस गये
सावन में भीगे बरस गये
छम छम करती कब आओगी
बारिश कब तुम आओगी

प्रकृति का श्रृंगार कर दो
हम पर ये उपकार कर दो
पानी की बौछार कर दो
नदियों में संगीत भर दो
भीगे तन और भीगे मन
ऐसी बहारें कब लाओगी
बारिश कब तुम आओगी !

---dr वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

जिस आशियाने को बुजुर्गों ने अपनी मोहब्बत से बांधकर रखा था, आज उसी की नींव उनकी औलादों की आपसी नफरत और बंटवारे से हिल रही है

jha.princembillbook.in234176

Good evening friends.. hope you all fine. my Tamil novel"நிழல் தரும் வசந்தம் "reached 50K downloads. Thanks for your love and support.

kattupayas.101947

*ખેતર મારું,ખેતી મારી,બળદ મારા,ગવરી મારી ગાય.!*
*ઘણી મારો,બાળક મારું,ઘર મારું,મારા બાપ ને માય !*
. - વાત્સલ્ય

savdanjimakwana3600

“घर का रास्ता …..”

एक रोज़…  
हड़बड़ाहट में एक झोला उठाया था मैंने।

कुछ कपड़े थे,  
कुछ अधूरे सपने,  
और आँखों में पूरी दुनिया देखने की ज़िद।

उस वक़्त लगा था, घर की चौखट छोटी है… दुनिया बहुत बड़ी होगी।

आज…  
दुनिया सचमुच बहुत बड़ी है,  
मगर उसमें मेरा घर कहीं नहीं मिलता।

यहाँ शोर बहुत है माँ।  
हर सड़क बोलती है, हर बाज़ार चीखता है, हर चेहरा जल्दी में है।

मगर इस पूरे शोर के बीच,  
जब रात बहुत थक जाती है,  
तब सबसे पहले तेरी धीमी-सी आवाज़ सुनाई देती है।  
“खाना खा लिया न?”

बस इतना-सा सवाल…  
और मेरी सारी मज़बूती आँखों से बहने लगती है।

पापा…  
आपकी बातें कभी नीम की तरह लगती थीं।

हर बात पर रोकना, हर बात पर टोकना,  
देर होने पर डाँटना,  
बाहर जाते हुए सौ बार पीछे से पुकारना।

मैं झुंझला जाती थी।  
सोचती थी… कब बड़ी होऊँगी, कब अपनी मर्ज़ी से जीऊँगी।

आज…  
जब कोई नहीं पूछता “कब लौटोगी?”  
तब आपकी हर डाँट में चीनी घुली लगती है।

कितनी अजीब बात है…  
मिठास को समझने में इतनी कड़वाहट पीनी पड़ी।

बचपन में जिस कमरे से बाहर भागती थी,  
आज उसी कमरे की दीवारें मुझे पुकारती हैं।

जिस आँगन से दुनिया छोटी लगती थी,  
आज वही आँगन पूरी दुनिया से बड़ा लगता है।

जिस खिड़की पर बैठकर बारिश गिना करती थी,  
आज उसी खिड़की की एक झलक को आँखें तरसती हैं।

लोग कहते हैं, घर छोड़ने से इंसान बड़ा हो जाता है।  
शायद… सच कहते हैं।

क्योंकि घर छोड़ने के बाद  
हँसी पहले जैसी नहीं रहती,  
रोना पहले जैसा नहीं रहता,  
और… लौटना भी पहले जैसा नहीं रहता।

कई लोग रोटी कमाने निकलते हैं।  
सोचते हैं, थोड़ा कमाएँगे, फिर लौट आएँगे।

मगर दुनिया… बहुत चालाक होती है।  
वह पहले सपनों का लालच देती है।  
फिर ज़िम्मेदारियों की बेड़ियाँ पहनाती है।  
और देखते ही देखते, बरसों बीत जाते हैं।

अब घर की याद किसी तूफ़ान की तरह नहीं आती।  
वह तो… शाम की धूप बनकर धीरे-धीरे कंधे पर उतरती है।

कभी किसी रसोई की खुशबू में,  
कभी किसी बुज़ुर्ग की आवाज़ में,  
कभी किसी बच्चे की हँसी में,  
और कभी… बिना किसी वजह के।

कई बार मन करता है, सब छोड़ दूँ।  
फिर से वही पुरानी गली देखूँ।

माँ के हाथ की गर्म रोटी खाऊँ।  
पापा के पास बैठकर बिना किसी बात के सिर्फ़ चाय पी लूँ।

मगर…  
अब लौटना इतना आसान कहाँ है।

दुनिया ने मेरे पैरों में फ़र्ज़ की बेड़ियाँ बाँध दी हैं।  
और उनकी चाबी… शायद मैं उसी दिन किसी समंदर में फेंक आई थी,  
जिस दिन हड़बड़ाहट में वह झोला उठाकर निकली थी।

अब रास्ते याद हैं, पर लौटने का समय नहीं।  
घर आज भी वहीं है, मगर मैं वही नहीं रही।

अब… मैं जहाँ रहती हूँ, उसे घर कहना सीख गई हूँ।  
और जहाँ मेरा घर है, वहाँ… मेरे लिए एक कमरा आज भी वैसा ही रखा है।

सब कुछ पहले जैसा है।  
बस… माँ के बालों में कुछ सफ़ेदी बढ़ गई है।  
पापा की चाल थोड़ी धीमी हो गई है।  
और मैं… मैं बड़ी हो गई हूँ।

इतनी बड़ी…  
कि अब अपने ही घर का दरवाज़ा खटखटाते हुए मेहमान-सी लगती हूँ।

शायद…  
घर कभी नहीं बदलता।  
बदल जाते हैं उसे छोड़कर जाने वाले लोग।

और यही…  
बड़ा होने की सबसे महँगी कीमत है।

 प्राची गुर्जर

prachitanwar111

दिल की बात खामोशी के साथ ✨✨

deepikajoshiruhanidilse

બધી જ વ્યથાઓ મારે ભાગે જ આવે છે,
એક હોત તો માનું, અહીં અગણિત આવે છે,

સ્મિતની પાછળ આંસુઓને સંતાડતી આવે છે,
જિંદગીના રસ્તે હવે કસોટીઓ ઘણી આવે છે,

હવે તો એ ગળા સુધી પહોંચવા પણ આવે છે,
શું એ મારા જીવનને ખરેખર રોકવા જ આવે છે?

તૂટ્યો નથી હું, બસ થોડો સમય નીચે નમ્યો છું,
રાખ બનીને પણ ફરી અગ્નિ સામે ટકી રહ્યો છું,

સમયના પ્રહારો સામે હજુયે હું કેમ હાર્યો નથી?
કારણ કે વ્યથાઓ પાછળ નવી સવાર આવે છે.

મનોજ નાવડીયા

https://www.instagram.com/p/DaZrsogPhV_/?igsh=b2R2Y2wycmJ4aTZw

manojnavadiya7402

કાવ્ય વાણી
રચના વાદળ

આ જળતા એ તડકામા, રમતા સંતા કુકડી એ વાદળ.
અને નભમા ભરેલી હૈયાની ભાતો જીલે વાદળ.
આમ, તો ખુલ્લી ક્ષિતિજ મા, બનતા રહેઠાણ એ વાદળ.
રમતિયાળ પવનમા ઉડતા, જુલ્ફોના જોબન જીલે વાદળ.
કવિતા એ વાણી વહી,શબ્દબનીને ભીતરમા.
વહેતી રહે સરવાણી એ ,જળ વહતા વાદળ.
મનરવ કાવ્ય ને શુ કહેશુ,શબ્દ દર્પણ એ વાદળ.
અસ્તિત્વની ભીતરના,સંદેશ ફૂટે આપો આપ વાદળ.
મવજીભાઈ કાળુભાઈ મનરવ

manjibhaibavaliya.230977

तुम मिले तो लगा वक़्त भी ठहर सकता है,
वरना मैंने घड़ियों को सिर्फ़ गुज़रते देखा था।🥀

narayanmahajan.307843

मसरूफ़ियत में आती है बे-हद याद तेरी ।
फुर्सत में तेरी याद से फुर्सत नहीं मिलती ।।

narayanmahajan.307843

क्या तारीफ़ करूँ तेरी, अल्फ़ाज़ भी थक जाये,
जो तुझे लिखने बैठूँ तो काग़ज़ भी महक जाये।। 🥀

narayanmahajan.307843

मिलकर भी जिनसे मिलने को तरसे
कुछ ऐसी मुलाकात होती है उनसे...🤌♥️

narayanmahajan.307843

कविता
पिया क्या तुम तक मेरी आवाज नहीं जाता




नजर ऐ जिगर तुम्हारी याद और इंतजार मे है
तुम कहां हो
पिया क्या तुझ तक मेरी आवाज नहीं जाता

मेरी दर्द मेरी तरफ
मेरी खामोशी मेरी चिक
कुछ भी तुम्हारे कानों या
धड़कनों तक नहीं पहुंचता

पिया
सचमुच में तुम बरी बेरहम है



इतना लंबा इंतजार कौन करता है भला
जितना लंबा इंतजार मैं ने तुम्हारा किया है


अब इस इंतजार के दर्द सही नहीं जाती
यह दर्द इतनी भारी है कि
मेरी सांसों को ठहरा रहा है
और धड़कन को धड़कते हुए धीमा कर रहा है



क्या तुम्हें महसूस भी हो रहा है
मेरी दर्द मेरे तरफ


शायद नहीं
अगर होता तो
तुम मेरी आंखों के सामने होते


तुम नजरों से दूर हो
फिर भी
मैं तुम्हें चाहने पर मजबूर हूं पिया


यह दिल बड़ी ही जालिम है
जो तुझे चाहने से थकता नहीं


मेरे रोकने से रुक जाना चाहता है
पर तुम्हें चाहना छोड़ना नहीं चाहता


हड्डियां और मांसपेशियां और नशे
सब तने हुए हैं
सदियों से एक जगह ठहरते हुए

बस तुम्हारा इंतजार करते हुए
दिमाग पक चुका है पिया


बिना वादे की भी तुम्हारे
आने की इंतजार करते हुए


आंखों में कारी धूप के दर्द बर्दाश्त नहीं होता
पिया
और यह या पलके तुम्हारा इंतजार में
तुम्हारा रहा देखते हुए बंद होने चली है




देखो जरा गौर से
अगर देख सकते हो तो
मेरे माथे पर खींची हुई शिकंज को

शिकायतों से भारी मेरे इस मन को
ठहरते हुए एक ही जगह मेरे इस कदम को

पिया देखो जरा गौर से
मेरे मन में उठ रही
तुम्हारे लिए तरफ और चाहत को


पिया सचमुच में तुम बड़ी बेरहम हो

गहरी सांस ठंडी हो गई
पर मेरा इंतजार खत्म नहीं हुआ
तुमसे कितना प्यार है
मेरे अलावा कोई नहीं जानता

पिया
क्या अब तलाक तेरे कानों में मेरी दर्द की गूंज नहीं जाती


चिता पे लेटि आग जलती और
फिर हो जाती ठंडी
मैं जीवन से राख बन गई

पर मेरी इंतजार खत्म नहीं हुई


पिया क्या तुम्हें मेरी जिसमें में लग रही
आग की लपटे महसूस नहीं हुई


पिया
क्या सचमुच मे तुम इतनी नादान हो
की कभी समझा ही नहीं
की कोई है
जो तेरी राहों में चित से चिता तक बैठा रहा






चित से चिता तक का मतलब है
एक जगह ही जलने तक बैठा रहा
तेरे इंतजार करते हुए



दीवार में लगी किसी तस्वीर की तरह हूं मैं
ना जिंदगी भर हिली ना डोली
बस एक जगह पड़ा रहा
जो घर जलने पर साथ में खुद भी जल गया


ऐ आखिरी लव्ज देखते हुए
मेरे दिमाग में बस यही तस्वीर आया



दीवार पे टंगी हुई एक तस्वीर

abhinisha

😭🥹

gulaboo22

“पिंजरा नहीं, घोंसला  …“
कहते हैं कि जिस चिड़िया के आगे रोज़ दाना रख दिया जाए, जिसके लिए पानी का कटोरा भर दिया जाए, उसे और क्या चाहिए।
मगर किसी ने कभी उसकी आँखों में झाँककर यह नहीं देखा कि उसकी भूख दाने की नहीं, उड़ान की होती है।
मेरे पिंजरे में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं रही। दाना भी था, पानी भी था, धूप से बचाने के लिए छाँव भी थी।
कमी अगर थी, तो बस उस खुले आसमान की, जहाँ मैं अपने पंख अपनी मर्ज़ी से फैला सकूँ।
मैं अपना दाना किसी के हाथ से नहीं खाना चाहती।  
मैं चाहती हूँ कि सुबह की पहली धूप के साथ उड़ूँ, किसी अनजान छत पर बैठूँ।  
आँगन में बिखरे दो दाने अपनी चोंच से चुनूँ और फिर किसी पेड़ की डाल पर बैठी गिलहरी के साथ एक ही पोखर से पानी पी लूँ।
शायद उस पानी में मिट्टी की खुशबू होगी, आज़ादी का स्वाद होगा।  
सोने के कटोरे का पानी कभी वह स्वाद नहीं दे पाया।
लोग कहते हैं कि कैद में रहने वाली चिड़िया सुरक्षित रहती है।  
उसे न भूख सताती है, न मौसम का डर होता है।
मगर उन्हें कौन समझाए कि डर से बड़ी भी एक कैद होती है।  
और वह है बिना जिए पूरी उम्र गुज़ार देना।
सुरक्षित रहना और जीवित रहना, दोनों एक बात नहीं होते।
मुझे कभी सोने का पिंजरा नहीं चाहिए था।  
मैंने तो बस एक पेड़ की सबसे पतली टहनी माँगी थी।  
जहाँ हवा तेज़ चलती हो, जहाँ गिरने का डर भी हो और उड़ना सीखने की गुंजाइश भी।
मैं अपना घर किसी और के हाथों बना हुआ नहीं देखना चाहती।  
मैं चाहती हूँ कि एक-एक तिनका अपनी चोंच से उठाऊँ, उसे कई बार गिराऊँ, फिर दोबारा जोड़ूँ।
क्योंकि घोंसले लकड़ियों से नहीं, मेहनत और उम्मीद से बनते हैं।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ, क्या सचमुच प्रेम किसी को अपने पास बाँध लेने का नाम है?  
अगर है, तो फिर पिंजरे में बंद हर चिड़िया सबसे ज़्यादा प्रेम की हक़दार होगी।
लेकिन नहीं…  
प्रेम वह है जो पंखों पर भरोसा करे, उड़ानों से डरे नहीं और लौट आने की ज़िद भी न करे।
जिस दिन पिंजरे का दरवाज़ा खुलेगा, शायद मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूँगी।  
इसलिए नहीं कि मुझे उस जगह से नफ़रत होगी, बल्कि इसलिए कि मेरी आँखें पहली बार इतने बड़े आसमान को देख रही होंगी।
मुझे नहीं पता होगा कि मेरा पहला बसेरा कहाँ होगा, पहली बारिश कहाँ मिलेगी और पहली रात किस डाल पर कटेगी।
मगर मुझे इतना यक़ीन होगा कि वह हर तिनका, हर दाना और हर घूँट पानी मेरा अपना होगा।
मैं पिंजरे से भागना नहीं चाहती।  
मैं बस अपने हिस्से का आकाश माँगती हूँ।
मैं किसी और का बनाया हुआ घर नहीं चाहती।  
मैं अपना घोंसला बनाना चाहती हूँ।  
जहाँ हर तिनका मेरी मेहनत का हो, हर सुबह मेरी उड़ान की हो।  
और हर शाम मुझे यह सुकून दे कि मैंने अपनी ज़िंदगी उधार में नहीं, अपनी शर्तों पर जी है।
क्योंकि मैं चिड़िया हूँ।  
मुझे दाने से पहले दिशा चाहिए, कैद से पहले खुला आसमान चाहिए। 
और पिंजरे से कहीं ज़्यादा… अपना बनाया हुआ एक छोटा-सा घोंसला चाहिए।
 प्राची गुर्जर…..

prachitanwar111