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यदि हम प्रकृति को समझकर उससे संवाद स्थापित करें, तो वह न केवल प्रत्युत्तर देती है बल्कि हमारी रक्षा भी करती है। शायद मनुष्य ने प्रकृति के इस रहस्य को जाना ही नहीं, यही कारण है कि आज प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ता जा रहा है।
रिश्तों के अधूरे पन्ने कुछ लोगों के हिस्से में माँ का प्यार नहीं आया, तो किसी के सर पर कभी पिता का साया नहीं आया। कोई महरूम रहा दोनों से, कोई अपनों को तरसता रहा, कोई उम्र भर बस एक अदद प्यार को तरसता रहा। कोई बिना मिले ही अपनों से, इस महफ़िल से लौट गया, कोई पास तो बैठा रहा मगर, भीतर से दूर बहुत गया। कोई खामोशी की ज़ुबान में, सब कुछ समझता जाता है, कोई चीख-चीख कर हार गया, पर कोई समझ ना पाता है।कोई साथ रहकर भी साथ का, वो अहसास ना दे पाया, कोई मीलों दूर रहकर भी, हर एक फ़र्ज़ निभा आया।
जिस आशियाने को बुजुर्गों ने अपनी मोहब्बत से बांधकर रखा था, आज उसी की नींव उनकी औलादों की आपसी नफरत और बंटवारे से हिल रही है
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