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Vandna Sharma

Vandna Sharma

@drvandnasharma8596
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दीप से दीप जलाए जा,
अंधेरा तू मिटाए जा।
हो सबके घर रोशन,
आंगन द्वार सजाए जा।

हो खत्म सबका इंतजार
मिलें गले सब दिल में हो प्यार।
किसी की आँख में न आँसू आए,
महंगाई न किसी को रुलाए।

भूले-बिसरे सब घर को आए,
हर चौखट पर दिया जगमगाए।
मन से बैर मिटाए जा,
दीप से दीप जलाए जा।

छोड़ सारे गिले-शिकवे,
आज तू मुस्कुराए जा।
हैप्पी दीवाली गाए जा,
आ गई दीपावली अब तो
जग से सारा अंधियारा जा।

जय श्री राम, जय श्री राम,
राम आगमन की खुशी मनाए जा।

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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कविता - दीपावली

आओ करें कुछ खास,इस बार
हर घर दीप जले,
हो खुशियों की फौहार।
अपना घर भी रोशन हो,
सजे पड़ोसी का भी द्वार।

महंगे मॉल न जाए इस बार,
करें खरीददारी लोकल बाजार।
किसी की उम्मीद का दिया बुझने न पाए,
माँ लक्ष्मी सबके घर आए।

सजे सभी के घर आंगन द्वार,
मिटे दिलों का बैर इस बार।
सबको गले लगाकर मनाओ त्योहार,
मेरी तुम्हारी हो सबकी दीवाली।

खत्म हो सबका इंतजार,
सभी पाठकों को मेरी ओर से
दिल से हार्दिक बधाई बारम्बार।
आओ करें कुछ खास इस बार,
सबके घर हो खुशियों की फौहार।
शुभ दीपावली, शुभ हो सबका त्योहार।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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दिल वाले

सबसे खतरनाक पता कौन होते हैं
जो जज्बाती होते हैं
जो दिल की सुनते हैं

दिमाग से खेलने वाले
कभी हरा नहीं सकते दिल वालों को
दिमाग तो गुणा-भाग में
उलझा रह जायेगा
दिल वाले कर गुजर जायेंगे

मेरे देश की जनता
अब जाग गई है
देशद्रोही को पहचान गई है
अब नहीं झांसे में आने वाली

सबसे पहले वतन है अपना
इसके लिए जान भी हाजिर
महंगाई भी सह लेंगे हम
देश नहीं बटने देंगे

जवान खड़े हैं सीमा पर
अपना सीना ताने
हम देश के साथ खड़े
देशप्रेम में हम दीवाने

जाति-धर्म में नहीं बटेंगे
देशद्रोह अब नहीं सहेंगे
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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सबसे खतरनाक कौन होते हैं
जो जज्बाती होते हैं
जो दिल की सुनते हैं
दिमाग से खेलने वाले
कभी हरा नहीं सकते दिल वालों को
दिमाग तो गुणा-भाग में
उलझा रह जायेगा
दिल वाले कर गुजर जायेंगे

मेरे देश की जनता
अब जाग गई है
देशद्रोही को पहचान गई है
अब नहीं झांसे में आने वाली
सबसे पहले वतन है अपना
इसके लिए जान भी हाजिर
महंगाई भी सह लेंगे हम
देश नहीं बटने देंगे

जवान खड़े हैं सीमा पर
अपना सीना ताने
हम देश के साथ खड़े
देशप्रेम में हम दीवाने
जाति-धर्म में नहीं बंटेंगे
देशद्रोह अब नहीं सहेंगे


डॉ वंदना शर्मा

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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
जल्दबाजी

मुझे बहुत जल्दबाजी रहती है
सब काम करने की,
किसी भी कार्य का तनाव
सहन नहीं कर पाती।
कल पर टालना भी
अच्छा नहीं लगता,
त्वरित प्रतिक्रिया देना
मेरा दोष है।

पर सोचती हूँ,
मरने में भी कहीं
जल्दबाजी की मैंने,
तो कई काम छूट जाएंगे करने से,
कुछ रूठ जाएंगे।

क्या ईश्वर देंगे
अनुमति मुझे,
रुके हुए कार्य
पूर्ण करने की?
गिनती की सांसें हैं,
जिम्मेदारियां अधिक,
और पूरे करने हैं
कुछ सपने।

जिम्मेदारियों और कर्तव्य के बीच
थोड़ा समय निकालती हूँ
अपने सपनों के लिए,
शायद इसीलिए
हड़बड़ी करती रहती हूँ कि
कोई अपना न छूट जाए,
कोई सपना न टूट जाए।

सबकी आस लगी होती है,
किसी की आस न टूट जाए,
दूसरों के आंसू पोंछते
खुद के गम भूल जाती हूँ।
कोई मुस्कराए मेरी वजह से,
बस इतना ही तो चाहती हूँ।
बस यही दोष है मेरा
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
Vandna.reporter@gmail.com

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पर्व विजयदशमी का (29/9/26)

पर्व विजयदशमी का
जीत सत्य की असत्य पर
जीत अच्छाई की बुराई पर
होता है मंचन रामलीला का
सदियों से चली आ रही परंपरा
लगते हैं मेले शाम को
खुश होते हैं बच्चे
पीटते हैं ताली

पर क्या हम सिखा पाए
अपने बच्चों को
कैसे प्राप्त करते हैं
विजय दस इंद्रियों पर
दस विकारों पर
क्या हम मार पाए
अपने अंदर का रावण
कर पाए किसी स्त्री की रक्षा
करना नारी का सम्मान
पर स्त्री है मां समान
है सार्थक तभी कोई परंपरा
जब जिएं आदर्शों को
उतारें व्यवहार में
वाणी-कर्म से दे सबको सम्मान
तभी होगी विजय धर्म की अधर्म पर
तभी होगा असली
पर्व विजयदशमी का
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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मैं अलबेली

मैं अलबेली
रहती अकेली
कुछ न कुछ लिखती हूँ
मन की बात कहती हूँ
मेरी कलम है मेरी सहेली
ये दुनिया है एक पहेली

छोटी-छोटी खुशियाँ मेरी
छोटी सी है दुनिया मेरी
ये प्रकृति है मेरी साथी
चुपके से पढ़ लेती है
मेरे मन की पाती

किसे सुनाऊँ अपनी कहानी
सब हैं व्यस्त, मैं बेली
मैं अलबेली
रहती अकेली

नन्हीं चिड़िया तुम दूर देश को जाना
मेरी व्यथा सुनाना
क्या तुम भी
नहीं बनोगी मेरी सहेली
मैं अलबेली
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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कविता - मेरा गम

क्यों मेरे हिस्से में दुःख ही आया
क्यों भीड़ में भी खुद को तन्हा पाया
मेरी जिजीविषा तो देखो, जनाब
हर जहर पीकर खड़ी हो गई
मुश्किलें सहते-सहते बड़ी हो गई

जिंदगी के थपेड़ों ने छीन ली मुस्कान मेरी
कब मेरी राह, मेरी मंजिल से बड़ी हो गई
जब भी सुनाना चाहा हाल-ए-दिल
कोई ना मिला, दुनिया बेगानी हो गई
कि कलम से दोस्ती जब, लिख डाला
दर्द-ए-बयां जिंदगी सब, वाह-वाह

क्या लिखा है, क्या लिखा है
गम भी मेरा शायरी बना डाला
उसे भी जमाने ने कसौटी पर कसा है
आंसुओं की नदियों का हाथ है
मुझे पत्थर बनाने में
सभी दुःख दर्द का धन्यवाद है
मुझे मजबूत बनाने में

सही है इतनी बेरुखी दुनिया की
अब मैं खुश हूँ अपनी तन्हाई में
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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ये तो इंसाफ नहीं है
समानता ही रिश्ते में
नींव होती है रिश्ते की
एक भी ईंट लड़खड़ाए तो
ढह जायेगी इमारत रिश्ते की

तुम सुनाओ तो तुम सही
हम सुनाए तो हम गलत
तुम करो तो तुम सही
हम करे तो हम गलत

सच बोलना इतना ही पसंद है
तो सच सुनना भी सीखो
अपने अहं में सच से
नजरे चुराना है गलत

आईना सब सच बतलाता है
तो क्या आईना भी गलत
अपने तो अपने है, का रोना
कब तो रोओगे ए मुसाफिर
दगा गैर नहीं करते
वे होते है कुछ अपने ही गलत

भ्रम का पर्दा हटाना जरूरी है - भी गलत
कौन अपना है बताना जरूरी है - भी गलत

कब तक आस तकोगे किसी की
जिंदगी का सफर है, काँटो भरा
मंजिल को पाने, अकेले चलना जरूरी है

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रात की चांदनी हैरान है
कैसा ये व्यस्त इंसान है
तारो ने पूछा हंसकर ये
ऐ चांद आज क्यों अनजान है
लगे आज सारा जग परेशान है
इतना सुंदर है आसमान
झिलमिलाते तारे दीपमान है
नजर उठाकर देखे कोई तो
पलके बिछाए बैठा जहान है

चांद ने पूछा मानव से जब
क्यों दौड़ रहे बेचैन हो सब
एक पल ठहर कर देखो
मेरी चांदनी तारो संग वीरान है
क्यों हंसना भूल गए सब
जाने खुद से ही रूठ गए सब

रुककर बोला मानव तब
ऐ चांद ना है तेरी खता
एक मृग तृष्णा है ये जग
कौन सी दौड़ है ये, नहीं पता
यहां अपने भी सब
एक-दूजे से अनजान है

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