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Vandna Sharma

Vandna Sharma

@drvandnasharma8596
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ये तो इंसाफ नहीं है
समानता ही रिश्ते में
नींव होती है रिश्ते की
एक भी ईंट लड़खड़ाए तो
ढह जायेगी इमारत रिश्ते की

तुम सुनाओ तो तुम सही
हम सुनाए तो हम गलत
तुम करो तो तुम सही
हम करे तो हम गलत

सच बोलना इतना ही पसंद है
तो सच सुनना भी सीखो
अपने अहं में सच से
नजरे चुराना है गलत

आईना सब सच बतलाता है
तो क्या आईना भी गलत
अपने तो अपने है, का रोना
कब तो रोओगे ए मुसाफिर
दगा गैर नहीं करते
वे होते है कुछ अपने ही गलत

भ्रम का पर्दा हटाना जरूरी है - भी गलत
कौन अपना है बताना जरूरी है - भी गलत

कब तक आस तकोगे किसी की
जिंदगी का सफर है, काँटो भरा
मंजिल को पाने, अकेले चलना जरूरी है

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रात की चांदनी हैरान है
कैसा ये व्यस्त इंसान है
तारो ने पूछा हंसकर ये
ऐ चांद आज क्यों अनजान है
लगे आज सारा जग परेशान है
इतना सुंदर है आसमान
झिलमिलाते तारे दीपमान है
नजर उठाकर देखे कोई तो
पलके बिछाए बैठा जहान है

चांद ने पूछा मानव से जब
क्यों दौड़ रहे बेचैन हो सब
एक पल ठहर कर देखो
मेरी चांदनी तारो संग वीरान है
क्यों हंसना भूल गए सब
जाने खुद से ही रूठ गए सब

रुककर बोला मानव तब
ऐ चांद ना है तेरी खता
एक मृग तृष्णा है ये जग
कौन सी दौड़ है ये, नहीं पता
यहां अपने भी सब
एक-दूजे से अनजान है

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कविता दिल खुश है अकेला
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

दिल खुश है अकेला
नहीं चाहिए कोई झमेला
जिन्हें कद्र नहीं हमारी
उनसे दूरी ही अच्छी
जो सुनना नहीं चाहते
उनके लिए चुप्पी ही अच्छी
व्यर्थ ऐसे रिश्तो के लिए
अपने शब्द, भाव देना
अपनी डायरी, कलम
ही सबसे अच्छी
ये नदिया, भी तो
बहते चुपचाप मस्त
पहाड़ भी रहते तने
रहते शांत खड़े
फूल भी देखो खिलते हैं
बिना किसी उम्मीद के
जिंदगी भले छोटी हो
जिंदगानी बड़ी जायेगी

कोई पढ़े ना पढ़े
कहानी लिखी जायेगी
बात निकली है तो
कहीं तो जरूर जायेगी
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

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क्या करूँ

क्या करूँ
मैं क्या करूँ
जन्मदिन है मेरा
पर किसी को याद नहीं,
अभी तक किसी ने नहीं दी बधाई।

क्या सबको बताऊँ
क्या शोर मचाऊँ
क्या मैं किसी के लिए खास नहीं हूँ
क्या मुझसे किसी को प्यार नहीं है?

मैं तो सबका जन्मदिन रखती हूँ याद
सबसे पहले देती हूँ बधाई,
निस्वार्थ सबकी सहायता भी करती
कभी किसी से कोई उम्मीद भी नहीं करती।

फिर क्यों ये अकेलापन है
क्यों नहीं किसी को मेरी याद आई
क्या करना होता है
सबका चहेता बनने के लिए?

जरूरत बनना पड़ता है
जरूरत पड़ने पर ही
याद आती हूँ सबको।

इतना बुरा भी नहीं है अकेलापन
खुश हूँ मैं अपनी दुनिया में
ये प्रकृति साथ है
मेरे महादेव मेरे साथ हैं
मेरे सपने साथ हैं।

झूठे रिश्तों की राह तकनी ही क्यों
किसी से कोई उम्मीद रखनी ही क्यों
मैं और मेरे सपनों की दुनिया
काफी हैं खुश रहने के लिए

मैं खुश हूँ।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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कविता आया शुभ दिन आया
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

आया शुभ दिन आया
गणेश चतुर्थी का दिन आया
बड़े प्यार से इस दिन
अपने घर बुलाते हैं बप्पा को
ढोल नगाड़े बजा होकर मगन
चहुं दिशा गूंजे नाचे गगन

फिर क्यूं करते हो विदा घर से
रहने दो घर में ही, सेवा करो दिल से

विघ्न हर्ता हरेंगे सारे क्लेश
पहले दिल से दो सम्मान उन्हें
मत करो विसर्जन
मत बनो भीड़ का हिस्सा

जहां गणपति रहते हैं
बिगड़े काम भी बन जाते हैं
सबके कष्ट वे हर लेते
रिद्धि सिद्धि सबको देते
भर देते धन धान्य से
सबके घर-भंडार

प्रथम पूज्यते गणेश
रहते जिस घर द्वार
धन धान्य की कमी न हो
सुखी रहे वो परिवार
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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कविता कैसे बदल जाते हैं रिश्ते
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

कैसे बदल जाते हैं रिश्ते
गैरों में कब बदल जाते हैं रिश्ते
क्या जरूरत ही किसी
रिश्ते की नींव होती है

एक मां अपने नवजात शिशु के लिए
रातों को जागती है
अपने शरीर को अनदेखा करती है
खुद का निवाला भी
पहले बच्चे को खिलाती है
चोट उसे लगती है
दर्द मां को होता है

वही बच्चा बड़ा होने पर
मां को बोझ समझता है
आजादी में बाधा समझता है
मां का बोलना
अब चुभने लगता है
मां का साथ अब पराया लगता है

जो बेटा रो पड़ता था
एक पल को जो न दिखाई दे मां
उसे बरसों हो जाते हैं
मां से बोले
मां भी धैर्य रख लेती है
बेटे की खुशी में चुप्पी रख लेती है

क्यों मां-बेटे का रिश्ता
एक उम्र के बाद अनजाना हो जाता है
मां का दर्द नाटक
मां का प्यार पराया हो जाता है
क्यों होता है ऐसा

जिस शिद्दत से
पालते हैं औलाद को मां-बाप
बेटे क्यों नहीं रह पाते
साथ उनके उसी प्यार से

जिंदगी की मजबूरियां है ये
या फर्ज से लापरवाही
संवेदनहीनता है ये
या आंखों पर पड़ा पर्दा

मां-बाप का दर्द नहीं दिखता
बस उनका पैसा ही दिखता
संतान क्या सिर्फ लेने के लिए है
बुढ़ापे में देखभाल की उम्मीद
करना क्या बेईमानी है

क्यूं होता है ऐसा
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

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कविता सत्यम शिवम सुंदरम
कवयित्री डॉ.वंदना शर्मा

सच कड़वा होता है
वीभत्स, कुरूप
जब सामने आ जाए
सुन्दर होता है
तभी तक
जब तक पर्दे में रहता है

सच देखना
और भी मुश्किल
स्वीकारना तो
और भी मुश्किल
बोलना कभी-कभी
आसान लगता है
लेकिन सच सुनना
और भी मुश्किल

फिर क्यों कहा गया
सत्यं शिवं सुन्दरम्
सच तो अकेला
कर देता है
सबके मुखौटे
उतार देता है

सच बोलने वाला ही
सबको बुरा लगता है
झूठ कितना सुंदर होता है
बचे रहते हैं रिश्ते
झूठ के कारण
खुशी का भ्रम रहता है
झूठ के कारण
सारी खुशियां झूठ का पर्दा
हटते ही गायब हो जाती हैं

कलयुग है ये जनाब
सच अकेला मिलता है
झूठ के साथ मेला चलता है

जो हितकर है
कल्याणकारी है जो सबके लिए
वो झूठ भी सुंदर होता है
जनहिताय बोला गया
झूठ जब सत्य बन जाए
तब ही सत्यं शिवं सुंदरम् होता है।
डॉ. वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com
6/9/26

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शिक्षक दिवस पर कविता

गुरु वो जो सन्मार्ग दिखाए
सिर्फ सिलेबस ही न पूरा कराए
छात्र का सर्वांगीण विकास कराए
देशप्रेम, और नैतिकता सिखाए
मन की सारी गांठे खोले
कानों में मिश्री सी घोले
करे चरित्र निर्माण, मानवता सिखाए
जिसके सानिध्य में आकर
मन गंगा सा निर्मल हो जाए
शिष्य बिना संकोच मन की बात कह पाए
करे हमेशा प्रोत्साहित और हौसला बढ़ाए
ऐसे गुरु अगर मिल जाए
जीवन अपना धन्य हो जाए
ऐसी गुरु-शिष्य परंपरा कहाँ से लाए
गुरु भक्त अरुणि, एकलव्य याद आएं
ना वो गुरु रहे, ना वो शिष्य
बेशर्मी की हद तो देखो
शिष्य आज का गुरु को आंख दिखाए
जब सम्मान ही नहीं गुरु का मन में
तो ऐसे बच्चे ज्ञान कहाँ से पाए
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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कविता - श्राद्ध पक्ष
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

आता है हर वर्ष क्वार में,
पूर्वजों के तर्पण के लिए श्राद्ध पक्ष,
महिमा बड़ी है इन 16 दिनों की,
सोलह तिथियाँ सभी पूजी जातीं।

सबका सम्मान करें, सब है समान,
सनातन धर्म यही सिखलाता,
न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
सबका अपना महत्व,
सबको पूजा जाता,
यह हमारे सनातन की परंपरा है,
नदी, पर्वत, अग्नि या हो धरा,
सबके प्रति कृतज्ञता, धन्यवाद करो।

शायद इसीलिए ऋषि मुनियों ने,
सोलह तिथियों के निमित्त,
बनाए दान-तर्पण के पर्व।

बिना श्रद्धा के किया तो सब व्यर्थ,
करने से पहले जानो इनका अर्थ,
कुछ मूर्ख अभिमानी करते हैं दिखावा,
जीवित माँ-बाप को पूछते नहीं,
मरने के बाद दान कर छुपाए कर्म,
पाप कर्म जो कभी छिपता नहीं,
सत्य कभी झुकता नहीं।

समय रहते कर लो,
सेवा अपने मां-बाप की,
ले लो दुआएं मां-बाप की,
इहलोक भी सुधरेगा,
और परलोक भी।

है सार्थक तभी दान-तर्पण,
जब मां-बाप खुश हैं इस धरा पर,
करो पूर्वजों का आभार,
जिनके वंशज हो तुम,
मिलेगी मुक्ति उनको,
और सुख शांति तुमको भी।

उड़ो चाहे कितना भी,
छू लो तुम सारा आकाश,
पर मत भूलो जड़ों को अपनी,
यही है जीवन का आधार।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

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कविता -हिंदी को संपर्क भाषा बनाते हैं
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली


आओ एक संकल्प लेते हैं
हिंदी को सम्पर्क भाषा बनाते हैं
विश्व में सभी से हिंदी में बतियाते हैं
हिंदी की मिठास से, जग को मिलवाते हैं

गर्व करे अपनी भाषा पर हम
गर्व से बोले हिंदी और
हिंदी को वैश्विक भाषा बनाते हैं

बच्चों को संस्कार सिखाए हिंदी
अपनापन बढ़ाए हिंदी
आओ देवनागरी लिखना सिखाते हैं

रिश्तों का अटूट बंधन है हिंदी
बड़ों का सम्मान, छोटों का दुलार हिंदी
ऊर्जा का संचार है इसमें
ध्वनि नाद ब्रह्माण्ड का इसमें

आओ जन-जन तक हिंदी पहुंचाते हैं
छोड़ मतभेद भाषा के सारे
हिंदी को जनभाषा बनाते हैं
हिंदी को सम्पर्क भाषा बनाते हैं।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

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