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*काश हम रोक पाते* काश हम रोक पाते उम्र को बढ़ने से जवानी को ढलने से बुढ़ापे को चेहरे पे आने से कितना मुश्किल होता है स्वीकार करना बढ़ती उम्र को चेहरे की झुर्रियों को टूटते रिश्तों को, दूर होते अपनों को क्यों इतनी तेजी से बढ़ता समय सबके चेहरे बेनकाब करता आईना भी जब सवाल करता है कौन मेरा अपना यहां किसका हूं मैं इंतजार करता बीतता समय जब डराने लगे अपना चेहरा भी अनजाना लगे आईना भी जब बेगाना लगे दो शब्द प्रशंसा की चाह में खोया ये सारा जमाना लगे तब संभल जा ए दिल सत्य को झुठला नहीं सकते जिंदगी की सांसे भले कम हों उन्हें रोकर यूं बिता नहीं सकते प्रकृति से सीखो खिलना और मुरझाना दो पल की जिंदगी, जग को महका जाना डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
शब्द खामोश क्यों हो जाते हैं एक उम्र पर आकर शब्द खामोश क्यों हो जाते हैं अक्सर बहुत बोलने वाले मौन क्यों हो जाते हैं आसमां वही है, वही है धरती मौसम के मायने बदल क्यों जाते हैं जिसको पाने की जिद में उम्र गुजारी उसको पाकर भी हाथ खाली रह जाते हैं खुशी एक छलावा है क्षणिक पल भर का वो पल बीतते ही भाव खुशी के नीरस हो जाते हैं जाने किस अंधी दौड़ में दौड़ रही है दुनिया सारी जब सब कुछ खो जाए कुछ पाने के अर्थ व्यर्थ हो जाते हैं कभी जिससे बात करने को तरसता था मन सारे दिन सामने पाकर उसे अपने लब खामोश क्यों हो जाते हैं चारों तरफ मेला है भीड़ का फिर भी क्यों हम खुद को भरे मेले में अकेला पाते हैं गलत कहते हैं लोग अक्सर अज्ञानता दुख का कारण है मैंने तो देखा है अक्सर सब जानकर रिश्ते टूट जाते हैं। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
*"सावन में"* हो रही बरसात सुबह से सावन में आ गई हरियाली तीज सावन में रच गई मेहंदी, किया सोलह श्रृंगार सज गई महफिलें सखियों की सावन में हरी-हरी चूड़ियां बज रही कलाईयां पायल भी मचाने लगी शोर सावन में झूम झूम के काले काले बदरा आए गाए पपीहा कोयल संग शोर मचाए भीग गई गौरी की चुनरिया सावन में पानी की बूंदे पत्तों पे आ ऐसी ठहरी मोतियों की कोई झड़ी लगाए सावन में पड़ गए झूले अमिया की डाल पे सखियां पेंग बढ़ाए, गाए गीत सावन में सज रही कांवर सज रही झांकी महादेव भ्रमण को आए सावन में गरम-गरम पकौड़ी संग चाय बनाए मम्मी पापा बच्चे सब खाए सावन में छम छम करता आया सावन, सबको बुलाए छोड़ो काम सखी आओ थोड़ा गुनगुनाए कुछ सुने, कुछ सुनाए सावन में कोई गाए गीत मिलन के विरह का सावन भी कहीं सताए बारिश की बूंदें जब तन को छू जाए याद किसी की बहुत सताए सावन में --- डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
*कविता* *"मेरे महाकाल की कृपा बरस रही है"* मेरे महाकाल की कृपा बरस रही है मन शांत होने लगा, बेचैनी पिघल रही है सावन में हर जगह गूंज भोले की हो रही है कण-कण महक रहा धरती का प्रकृति नव श्रृंगार कर रही है बिन मांगे सब देते महादेव मेरी आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है दूर हुए दोगले रिश्ते, आंख मेरी खुल रही है जब से लिया भोले ने शरण अपनी मेरी हस्ती नित चमक रही है मेरे महाकाल की कृपा बरस रही है अब कुछ और ना मुझको भाए रटूं सारे दिन ॐ नमः शिवाय तेरा नाम ना मुझसे बिसरे भोले भले ही ये दुनिया मुझसे रूठ रही है पकड़ा है हाथ तुमने जबसे चिन्ता हो गई दूर सब, नई ज्योति चमक रही है गिरने ना दिया बाबा तुमने हर मोड़ पर मुझको संभाल लिया है देख भोले का चमत्कार, ये दुनिया मुझसे जल रही है महाकाल की बेटी हूं, शिव मेरे आराध्य कृपा से उनकी जिंदगी बढ़िया गुजर रही है मेरे महाकाल की कृपा बरस रही है। // जय महाकाल // डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
हम शर्मिंदा हैं ऐसी युवा पीढ़ी पर एजुकेशन सिस्टम भी सही करना होगा मां-बाप भी जिम्मेदार हैं जो देशप्रेम नहीं सिखा सकते संस्कार नहीं सिखा सकते कर दो बैन सोशल मीडिया छीन लो मोबाइल बच्चों से अपराधी ना बनाओ इनको भविष्य ना बिगाड़ो इनका बच्चों को संस्कार सिखाओ कुछ तो देशप्रेम सिखाओ कुछ याद उन्हें भी कर लो जो खा रहे थे गालियां दुखी थे मेरे देश के जवान इन बेशर्म बच्चों के लिए जिनकी खातिर छोड़ परिवार को रात-दिन खड़े खड़े खाई सीने पर गोली वो भी किसी के बेटे, भाई और पति हैं वो देश की सीमा की रक्षा कर रहे हैं तभी आज तुम उन्हें गाली दे रहे हो कश्मीर फाइल भूल गए क्या पुलवामा भूल गए, पहलगाम भूल गए क्या कारगिल तो याद होगा जब पाक सेना चढ़ आई थी अरे सेना का मनोबल मत तोड़ो सोच समझ कर मुंह खोलो क्यों अपने माँ-बाप की परवरिश पर प्रश्नचिन्ह लगाते हो धिक्कार तुम्हें जो देश को गाली देते हो माँ तो माँ होती है, चाहे किसी की हो जो अब इस दुनिया में भी नहीं उस पुण्य आत्मा को गाली देते हो तुम्हें लोकतंत्र रास नहीं आया आजादी का मजाक उड़ाया देशद्रोही का साथ निभाया तुम्हारे लिए राजतंत्र ही ठीक है होते और किसी देश में तो अब तक ज्ञात गया होता देशद्रोह करने पर जान से मार दिया होता डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
सावन का आना जैसे धरती का श्रृंगार करना नारी का खुद से प्यार करना मायके से मिलन की आस जगाना झूले की पेंगें बढ़ाना घेवर की खुशबू से बाजार का महकना सावन का आना जैसे गर्मी से राहत मिल जाना बगिया में फूलों का आना कोयल का मीठा गाना हरी चूड़ियां, हरी चुन्नरियां पहन गौरी का इतराना प्रेम की लहरों का ईठलाना सावन का आना जैसे बादल का घिर आना बारिश का संगीत बजाना मन की तपिश घुल जाना कितना सुंदर है देखो सावन का आना कांवर की मस्ती भोले की भक्ति बम भोले सबका गाना मनोहारी है सावन का आना डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
आया जन्मदिन आया, सबने लड्डू खाया नंद लाला का जन्मदिन आया झूम रही है मथुरा, झूम रहा वृंदावन गा रही है गोकुल नगरी बरसाना नृत्य करे होकर मगन मेरे कान्हा का जन्मदिन आया मुरलीवाले का जन्मदिन आया प्रभु ने अमृत बरसाया सज रहे मंदिर, सज रहे चौबारे सज रही गलियां, सज रहे द्वारे बन रही मिठाइयां, बज रही बधाइयां, जन्माष्टमी का शुभ दिन आया कान्हा ने प्यार लुटाया आया जन्मदिन आया मेरे कान्हा का जन्मदिन आया --- डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
--- ये हरी कांच की हरी-हरी चूड़ियां मन को भाय ये हरी हरी चूड़ियां आया सावन, बड़ा मनभावन रिमझिम बूंदे बरस रही हैं डाली-डाली झूम रही है काले-काले बदरा छाए रे मन होकर मगन, झूमे गगन गीत कोई प्रेम का गाए रे हरी-हरी चूड़ियां देख गौरी का मन ललचाए रे हरी साड़ी, हरी चूड़ियां हरी बिंदी, हरी चुनरिया धरती हरी, काली बदरिया झूम-झूम देखो ये सारी बगिया शोर मचाए रे सर-सर पत्ते झूम रहे कू-कू पपीहा गूंज रहे मन भी बहका-बहका जाए रे चूड़ी हरी मन को भाने लगी याद पिता की आने लगी रिमझिम रिमझिम ये बारिश मुझे यूं चिढ़ाने लगी झर-झर झरता ये सावन सखी झरता जाए रे चूड़ी हरी मन को भाए रे --- डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
कविता - स्वतंत्रता दिवस आजादी का गलत अर्थ निकाल रहे युवा आजादी के नाम पर उपद्रव मचा रहे युवा क्या यही सपना देखा था वीर भगत सिंह ने आजादी का क्यों पथ भ्रष्ट हो रहे युवा तोड़-फोड़, आगजनी कर रहे युवा छोड़ पढ़ाई आंदोलन कर रहे युवा खो गई नैतिकता व संवेदनाएं खो गया देशप्रेम कहीं जनता का अपने ही देश को बेच रहे युवा सोशल मीडिया के दलदल में फंस खुद को बर्बाद कर रहे युवा ये वो विवेकानंद का देश नहीं ये वो भगतसिंह का देश नहीं जिसका सपना देखा था वीर अमर बलिदानों ने स्वतंत्रता दिवस को आज बस एक छुट्टी मान रहे युवा डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
वो बचपन कितना प्यारा था वे चारों हमेशा साथ रहते खाना भी ना खाते, एक-दूजे के बिना बीती कितनी मस्ती भरी दोपहरियां सोय बिना चोट एक को लगती थी, दर्द सभी को होता था शाम को अंताक्षरी सजती थी जीतने के लिए शब्दकोश रटते थे दिन भर कैरम, लूडो भैया ने सिखाए खूब चाट पकौड़ी भैया ने खिलाए अपने हिस्से का भी दीदी मुझे खिलाती थी नींद खराब कर अपनी रात को रोज पढ़ाती थी जब मम्मी बाजार जाती थी ऊधम बहुत मचाते थे तोड़-फोड़ कर घर की चीजें भोले बन पढ़ने बैठ जाते थे पापा जब घर आते थे बहुत सारी चीजें लाते थे दिनभर की आपबीती सुनाते थे वो बचपन कितना प्यारा था हम एक साथ रहते थे क्यूं हम इतने बड़े हो गए एक-दूजे के लिए मेहमान हो गए अब तो राखी पर भी नहीं मिलते सब अपनी जिंदगी जीते भाई बहन चारों जुदा हो गए ---dr वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
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