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कविता - स्वतंत्रता दिवस आजादी का गलत अर्थ निकाल रहे युवा आजादी के नाम पर उपद्रव मचा रहे युवा क्या यही सपना देखा था वीर भगत सिंह ने आजादी का क्यों पथ भ्रष्ट हो रहे युवा तोड़-फोड़, आगजनी कर रहे युवा छोड़ पढ़ाई आंदोलन कर रहे युवा खो गई नैतिकता व संवेदनाएं खो गया देशप्रेम कहीं जनता का अपने ही देश को बेच रहे युवा सोशल मीडिया के दलदल में फंस खुद को बर्बाद कर रहे युवा ये वो विवेकानंद का देश नहीं ये वो भगतसिंह का देश नहीं जिसका सपना देखा था वीर अमर बलिदानों ने स्वतंत्रता दिवस को आज बस एक छुट्टी मान रहे युवा डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
वो बचपन कितना प्यारा था वे चारों हमेशा साथ रहते खाना भी ना खाते, एक-दूजे के बिना बीती कितनी मस्ती भरी दोपहरियां सोय बिना चोट एक को लगती थी, दर्द सभी को होता था शाम को अंताक्षरी सजती थी जीतने के लिए शब्दकोश रटते थे दिन भर कैरम, लूडो भैया ने सिखाए खूब चाट पकौड़ी भैया ने खिलाए अपने हिस्से का भी दीदी मुझे खिलाती थी नींद खराब कर अपनी रात को रोज पढ़ाती थी जब मम्मी बाजार जाती थी ऊधम बहुत मचाते थे तोड़-फोड़ कर घर की चीजें भोले बन पढ़ने बैठ जाते थे पापा जब घर आते थे बहुत सारी चीजें लाते थे दिनभर की आपबीती सुनाते थे वो बचपन कितना प्यारा था हम एक साथ रहते थे क्यूं हम इतने बड़े हो गए एक-दूजे के लिए मेहमान हो गए अब तो राखी पर भी नहीं मिलते सब अपनी जिंदगी जीते भाई बहन चारों जुदा हो गए ---dr वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
सावन दस्तक देने लगा है सावन दस्तक देने लगा है मौसम अब बरसने लगा है कितनी ही आंखें राह देखती सावन में ही मायके की देहरी मिलती अपनों से मिलन की आस में आंखों से सावन झरने लगा है महादेव की मस्ती में दीवाने भक्त कावर सजाने लगे हैं फसलों को लहराता देख किसान भी सपने सजाने लगे हैं धरती हरा-हरा श्रृंगार किए बैठी है दूर देश से पंछी भी अब आने लगे हैं सावन अब दस्तक देने लगा है जिंदगी की तपिश में, उम्र की दुपहरी में बारिश की बूंदें, जख्म सहलाने लगी हैं सबकी आस अपनी है सावन से सावन सबको भाने लगा है सावन की मस्ती संग है लाती तीज का मनुहार, राखी का प्यार अमिया के झूले, मन करे बेक़रार सबको रहता इसका इंतज़ार सावन दस्तक देने लगा है रिमझिम सावन बरसने लगा है --- डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
कविता: भगत सिंह का सपना एक सपना देखा था भगत सिंह ने अपने आजाद भारत का, विकसित भारत का जहाँ फैली हो चारों तरफ हरियाली लहराती हों फसलें, हंसता रहे किसान समानता हो जन-जन में, ना रहे पीड़ित कोई शिक्षा, अन्न हो सबके लिए भूखा न सोए कोई अनुशासित और कर्मठ हो मेरे देश के युवा सांप्रदायिक आग में न जले कोई खूब तरक्की करे मेरा भारत शत्रु ना हो इसका कोई पराधीनता खत्म हो जाए मेरे शरीर के साथ ही स्वाधीन भारत में खुशहाली हो देशप्रेम को जिए हर कोई देख आज के हालात और भ्रष्टाचार रोती होगी आत्मा उनकी क्या यही है उनके सपनों का आजाद भारत, विकसित भारत जहाँ रील बनाए युवा, रहे हरदम मस्ती में न देशप्रेम, न अनुशासन, रहे नशे में चाहे आग लगे बस्ती में जागो मेरे देश के युवा, साकार करो सपना मेरे आजाद भारत का बन जाओ तुम विश्व शक्ति लहराओ तिरंगा आजादी का जय हिंद जय भारत डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली ---
चालीस पार की सभी महिलाओं को समर्पित कविता: जाने क्यूं ये मन उदास है जाने क्यूं ये मन उदास है ना जाने क्यूं आज मन उदास है जुलाई के उमस भरे मौसम में चालीस पार के पतझड़ में रिश्तों की करमकश में अब कुछ नहीं मन को भाता है न संवरने का मन, आज बिखरना ही क्यूं आज भाता है जाने क्यूं मन उदास है ये डिप्रेशन है या थायराइड का असर बिना बात आंखें नम बढ़ता वजन है या अनिंद्रा का असर विटामिन्स की कमी या मूड का असर मेरी खुशी क्यूं मुझसे नाराज है जाने क्यूं मन आज उदास है पहले बातें खत्म नहीं होती थी अब खामोशी ही भाती है मुस्कराना क्या इतना कठिन है दिल पर क्यूं उदासी का असर है ये उम्र की दोपहर है चुभती बहुत है, जीवन की गति, तेज बहुत है बारिश के इंतजार में पतझड़ उदास है। ---dr वंदना शर्मा नई दिल्ली
कविता: स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं दुकानों से कमीशन खाने लगे हैं किताब, कॉपी, जूते, जुराब, बैग यहां तक की ड्रेस भी बिकवाने लगे हैं बच्चे को पढ़ाना संघर्ष हो गया है रोज स्कूल की फीस बढ़ाने लगे हैं स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं अनुशासन अब मिलता नहीं देखने को बच्चे आज के गुरु को आंख दिखाने लगे हैं तरह-तरह के चार्ज लगाने लगे हैं एडमिशन फीस, हर साल बढ़ाने लगे हैं बिल्डिंग फीस, ट्रांसपोर्ट फीस जाने क्या-क्या लगाने लगे हैं सिलेबस पूरा बस कराने लगे हैं बच्चे पढ़े ना पढ़े, फेल हो या पास अपनी जेबें भराने लगे हैं स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं आजकल तो होमवर्क करते हैं पैरेंट्स बच्चे तो नखरे दिखाने लगे हैं बोलना भले ही न आए ठीक से अब तो ढाई साल के बच्चे भी स्कूल जाने लगे हैं। वो गुरु-शिष्य परंपरा तो जाने कहां खो गई अब तो बच्चे गुरु को डराने लगे हैं। स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं। ---dr वंदना शर्मा नई दिल्ली
कहानी नेट बनाम धड़कन सोहन आज सुबह से परेशान था। बार-बार अपना मोबाइल चेक कर रहा था। शायद कुछ जरूरी मेल आने वाला था। दो दिन से हल्की बारिश हो रही थी। खराब सिग्नल आ रहे थे, नेट काम नहीं कर रहा था। ऑफिस में एक प्रोजेक्ट जमा किया था। उसका परिणाम मेल पर आना था। बार-बार अपना फोन चेक कर रहा था। पर कोई मेल नहीं दिखाई दिया। उसे झुंझलाहट होने लगी। वो सिर पकड़कर चिल्लाने लगा - "क्या हो गया इस नेट को, चल क्यों नहीं रहा। इतनी देर से बफरिंग हो रही है। सिम भी दोबारा निकालकर डाल दिया। इतना जरूरी मेल आना है। और ये फोन। मन करता है इसे उठाकर फेंक दूं।" उसकी पत्नी मीना इतनी देर से उसकी हरकतें दूर से देख रही थी। मीना रसोई में कॉफी बना रही थी लेकिन नजर सोहन पर ही थी। उसकी ऐसी बेचैनी देख मीना उसके पास आई। एक कप कॉफी पकड़ाते हुए बोली - "शांत रहो सोहन। शांत हो जाओ। गहरी सांस लो। अब इतने चिल्लाने से समस्या तो ठीक नहीं होगी। कुछ तकनीकी खराबी होगी, कई दिन से मौसम भी खराब है। सोचो यदि किसी ने समुद्र में नेट की वायर काट दी। या कोई व्हेल मछली आ जाए और तार काट दे। या कोई दुश्मन ही नेट की सप्लाई बंद कर दे। सोचो सोहन, सोचो तुम्हारा क्या होगा।" अब तुम्हारी तो धड़कन ही रुक जाएगी। बिना फोन के तुम कैसे रहोगे ।जो सारे दिन फोन में आंखें गड़ाए रहते हो फिर अगर नेट ही नहीं होगा तो तुम्हारा फोन तो डिब्बा है डिब्बा। सोहन चिल्लाते हुए कहता है - "क्या बकवास कर रही हो मीना। तुम्हें पता है क्या बोल रही हो। अगर नेट बंद हो गया न एक दिन के लिए भी तो करोड़ों का नुकसान हो जाएगा। सारा व्यापार रुक जाएगा। ओह गॉड ऐसा कभी न हो।" सोहन की पत्नी मीना कहती है "ये स्मार्ट फोन तो अभी आए हैं कोई दस साल पहले। इससे पहले भी तो लोग जिंदा थे। व्यापार होता था। सब काम होते थे। आज इंसान फोन पर निर्भर पर हो गया है इतना कि बिना नेट के बिना फोन के पागल हो जाता है। लाइफ रुक जाती है। देखो सोहन किसी भी चीज की अति बुरी होती है। और तकनीकी डिवाइस पर इतना निर्भर नहीं होना चाहिए। कुछ दिमाग चलाओ। नेट ही तो नहीं चल रहा। कॉल तो हो सकती है। अरे कॉल करके पूछ लो। कौन सी बड़ी बात है। गुस्से में इंसान छोटी-छोटी बातें भी सोचना भूल जाता है।" सोहन सिर खुजाते हुए कहता है - "हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं। कॉल भी तो कर सकता हूं।" मीना कहती है - "सोहन समस्या इतनी बड़ी नहीं होती, जितना हम उसे बना देते हैं। बिना फोन के कुछ दिन गुजार कर देखो, जिंदगी बहुत सुंदर है।" --- समाप्त डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
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