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Vandna Sharma

Vandna Sharma

@drvandnasharma8596
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बैंगन राजा, सब्जियों की भीड़ में
बैठा आंसू बहाय
बोला आलू - क्यूँ भाई,
किसकी याद आई?
कैसे आज आंख भर आई
रोते-रोते बैंगन बोला,
मैं क्यूँ रहता बेगाना।
बच्चे भी मुझसे चिढ़ते,
कोई ना मुझको खाना चाहे।
सब दीवाने हैं तुम्हारे
बिन तुम्हारे किसी को स्वाद ना आए।

मेरा तो नाम ही है बे-गुण
बोला आलू - अनमोल है हर कोई
सबका है अपना-अपना महत्व।
दिल छोटा नहीं करते,
अपनी तुलना नहीं किसी से करते।
पूर्ण नहीं है कोई जग में,
सभी एक-दूजे के पूरक रहते।

खुद को ना इतना छोटा समझो,
अपनी कीमत खुद पहचानो,
डॉ वंदना शर्मा

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कभी सोचा है आपने
कविता

कभी सोचा है आपने,
आज हर कोई बीमार क्यूँ है?
शुगर, थायराइड तो नॉर्मल है,
बच्चे, बड़े सब इसकी चपेट में हैं।
जितने डॉक्टर, उससे सौ गुना मरीज,
क्योंकि आज सब जगह मिलावट है।
घी, दूध, आटा, दाल सभी अन्न
आज हुए जहर।

प्यार, भरोसा हुआ गायब,
हर रिश्ते में है स्वार्थ की मिलावट।
मीठा शुगर बढ़ाता है जैसे,
मीठा बोलने वाला जड़े काटता है वैसे।
कड़वी दवा, कड़वे लोग
फिर भी फायदा देते हैं।

अपने तो हमेशा दगा करते हैं,
दूसरों के दर्द पर हँसने वाले
कब किसी की सहायता करते हैं।
दूसरों की मौत पर वीडियो बनाने वाले,
अपने दुख पर दहाड़े मार आँसू बहाते हैं।

कैसा कलयुग है ये आज,
शुद्ध ना भाव है यहाँ,
शुद्ध ना हवा, पानी, अन्न।
शरीर की बीमारी की दवाई तो मिल भी जाए,
पर मानसिक रोगी जो खतरा है
इस जग के लिए।

उनका इलाज कैसे किया जाए,
कोई तो बताए, कोई तो बताए।

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संवेदनाएँ कहाँ खो गई आज
कविता

संवेदनाएँ कहाँ खो गई आज,
मानवता शर्मसार हो रही आज।
जिंदगी इतनी सस्ती हो गई,
काँपते नहीं हाथ, हथियारे के आज।

सहनशक्ति, धैर्य कहीं खो गए,
जरा सी बात पर युवक हिंसक हो गए।
रिश्ते सारे बेमानी हो गए,
एक-दूसरे की जान के दुश्मन हो गए।

ये आज का भारत है सोचो जरा,
हम कहाँ से कहाँ पहुँच गए।
इंसान आज इंसान से डरने लगा,
प्यार-वफा शब्द झूठा लगने लगा।

बच्चे बड़ों को आँख दिखाने लगे,
बूढ़े आज बच्चों से घबराने लगे।
ना वो रिश्ते रहे ना वो प्यार,
प्यार के नाम पर धोखा देने लगे।

भरोसा करे भी तो कैसे किसी पर,
अपने ही आज पीठ पर खंजर चलाने लगे।
तमाशा देखते रहते हैं लोग,
करते नहीं सहायता किसी की।

झूठे आँसू दिखाने लगे,
मोबाइल ने खा लिया मासूम बचपन।
बच्चे आज बदमाशी गाना गाने लगे।

--- डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली

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ये जग को क्या हो गया है
कविता

ये जग को क्या हो गया है,
हर कोई यहाँ अकेला हो गया है।
ना कोई तीज-त्योहार अब सुख देता,
वो बचपन वाला उत्साह कहीं खो गया है।

तीज के झूले खो गए,
राखी का प्यार कहां खो गया है।
रिश्तों में पैसों की दीवार आ गई,
आज तो पड़ोसी भी पराया हो गया है।

बात एक-दूसरे सेकरने में
कतराता है आदमी,
भरोसा किसी पर करना गुनाह हो गया है।
ये जग को क्या हो गया है,
भागती-दौड़ती दुनिया की भीड़ में,
आज इंसान तन्हा हो गया है।

घर आज फ्लैट हो गया,
संयुक्त परिवार अब एकल हो गया है।
खेलों की जगह मोबाइल ने ली,
आज बचपन कितना बूढ़ा हो गया है।

जाने किसकी नजर लगी रिश्तों को,
हर कोई आज अकेला हो गया है।
ये जग को क्या हो गया है।

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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi

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दृष्टिकोण  
कविता  

गाँव में एक हाथी आया,  
सब जगह शोर मच गया।  
'हाथी आया, हाथी आया',  
उस भीड़ में छः अंधे  
भी देखने आए।  

किसी ने सिर्फ पूँछ पकड़ी,  
किसी ने सिर्फ सूँड पकड़ी,  
किसी के हाथ आया कान।  
तो सबने की अलग व्याख्या  
हाथी कैसा, समझा जिसने जैसा।  

हमारी दुनिया भी ऐसी है,  
कुछ गलत या सही हो,  
वही एक के लिए गलत,  
दूसरे के लिए सही हो।  

जहाँ आज सब व्यस्त हैं  
एक-दूसरे की चुगली में -  
सास-बहू की, बहू-सास की,  
ननद-भाभी की, भाई-भाई की।  

जिसकी जैसी सोच, उसे  
वैसी ही दुनिया दिखती है।  
स्वार्थ के आगे अंधे हैं यहाँ,  
किसी को खूबी कहाँ दिखती है?  

बस जरा सी सोच बड़ी करने से  
दुनिया सुंदर बन सकती है।  

---dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi

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जरूरत बड़ी होती है

कड़वा सच ये है दुनिया का,
'जरूरत' ही सबसे बड़ी होती है।
मतलब निकलने पर भुला देते हैं लोग,
सर्दी में धूप अच्छी लगती है,
यही धूप गर्मी में बड़ी चुभती है है।
सर्दी में पंखों को कोई नहीं पूछता,
गर्मी होते ही इनकी याद आ जाती है।
भरा हो पेट तो पकवान भी अच्छे नहीं लगते,
भूख जब सताए तो
सूखी रोटी भी बड़ा स्वाद देती है।
गुणों की नहीं, धन की कदर होती है यहाँ,
गरीब की तो किसी को याद नहीं आती है।
कौन दोस्त, कैसे रिश्ते, सब दिखावा है,
हो जरूरत तभी किसी की याद आती है।
जो समय पर ना मिले, व्यर्थ है,
समय बीत जाने पर
अनमोल चीज भी बेकार होती है।
जब तक स्वास्थ्य अच्छा है,
दुनिया घूम लीजिए।
लाठी हाथ में लेकर थके शरीर से,
कहाँ दुनिया की सैर होती है?
छोड़ कर, सभी गिले शिकवे,
जिंदगी जी लीजिए
हर किसी को कहाँ,
जिंदगी आसान होती है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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सुनो दोस्तो एक दिन क्या हुआ  
एक दिन की मैं सुनाऊं दास्ताँ  
जब हम पांचवी में पढ़ते थे  
स्कूल से घर आ रहे थे  
रस्ते में दिखे दो गधे  
सामने से चले आ रहे थे  
भाई बोला कैसे गधे हैं ये  
रास्ता रोके जा रहे थे  
मैं बोली भाई गधे सुनते ही नहीं  
शायद गधों के कान नहीं होते  
गधे ने सुन ली मेरी बात  
गधे तो बुरा मान गए  
और सुनो लो कर लो बात  
गधे ने हमें सबक सिखाने की सोची  
चुपके से जाकर अपने दोस्तों को बुला लाए  
फंस गए हम चौराहे पर  
जिधर देखे उधर गधे  
सोचे हम किधर जाएं  
इधर जाएं उधर जाएं  
गधे ने दुलत्ती मारी तो  
सीधे स्वर्ग ना पहुंच जाएं  
अब कैसे अपनी जान बचाएं  
भाई गधे कर दो माफ  
घर जाने का रास्ता कर दो साफ  
किस्मत अच्छी थी, बात सच्ची थी

दया गधे को आई  
थोड़ी सी दी जगह दिखाई  
भागे घर को  
हम दोनों बहन भाई  
और इस तरह अपनी जान बचाई  
कर ली तौबा, अब ना कहेंगे  
गधे को ना दे सुनाई
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
22/6/26

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मुझे हारने ना देना भगवान
प्रार्थना

मुझे हारने ना देना भगवान
लोग मेरी हार का इंतजार किए बैठे हैं
बस तेरा ही एक सहारा है
रिश्तेदार तो सारे किनारा किए बैठे हैं

बिखरी तो जरूर, लेकिन टूटी नहीं मैं
मुझे टूटा देखने के लिए पत्थर दिल बैठे हैं
अपनों की भीड़ में भी तन्हा हूँ महादेव
मेरे अपनों को खुश रखना, जो
मेरे आँसू देखने को बेताब बैठे हैं

जिसकी किस्मत आपने स्वयं लिखी हो
उसे हारा देखने के लिए नजरें गड़ाए बैठे हैं |

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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi

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-- खिचड़ी की राम कथा
हास्य कविता

एक विदेशी आया घूमने यू पी
देख हमारा यूपी हुआ गदगद
पहुँचा एक मित्र के यहाँ
बनी थी जहाँ भोजन में खिचड़ी

भा गई उसे बहुत , बोला
क्या नाम है इसका, इसमें स्वाद बड़ा
सुनकर नाम, खुशी से बोला खिचड़ी
यही रटता जा रहा था रास्ते में
खिचड़ी खिचड़ी खिचड़ी

लगी ठोकर गिरा नीचे
जब तक सँभला नाम भूला
रटने लगा अब नया मिसरा
खा चिड़ी, खा चिड़ी, खा चिड़ी

मिला राह में एक ग्रामीण
उड़ा रहा अपनी फसलो से चिड़िया
दिया पीट उसे कसकर, बोला
उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी रटा कर
उड़ चिड़ी, करता जो आगे बढ़ा

एक शिकारी ने धो डाला
जो बैठा था जाल बिछाए
उसे कुछ ना समझ आया, बोला शिकारी
आते जाओ फँसते जाओ
यही अब रटते जाओ

बेचारा यात्री यही रटता
जा रहा था

कुछ दूर ही चला था,
कुछ चोरों ने पीटा बहुत बोले
लाते जाओ रखते जाओ
ऐसा बोलो चलते जाओ
घबराया यात्री | यही लगा रटने

दूसरे गाँव पहुँचा ही था मिली एक अर्थी रास्ते में
वहाँ ग्रामीणों ने धो डाला
क्या दिमाग नहीं है लाला
कुछ तो अच्छा बोलो, सोच समझकर मुँह खोलो
बोलो ऐसा किसी का ना हो

ऐसा किसी का ना हो रटे जा रहा था
सामने से आई बारात,
बारात ने धो डाला, बड़ा मारा
बोला, ऐसा सबका हो, ऐसा सबका हो
ऐसा सबका हो कहते-कहते पहुँचा
अगले गाँव जहाँ लगी थी
एक झोपड़ में आग, वहाँ भी
लोगों ने उसका बजाया बाजा

बेचारा रोते-रोते पहुँचा घर
पिट-पिट कर हुआ बेहाल
लगी थी भूख जोरों की
जैसी ही उसके बच्चे ने पूछा
क्या खाओगे, सारा गुस्सा उगला उस पर
ये मारा वो मारा, देखकर उसके
ऐसे ढंग देखी बोली बीबी
क्या खिचड़ी बनाओगे बच्चे की

खुशी से दो फुट उछला
चिल्लाया हाँ याद आया
खाऊँगा मैं खिचड़ी
खिचड़ी की राम कथा सम्पूर्ण
तो बोलो जय श्री राम |

---dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi

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खिचड़ी  
यू.पी. का प्रिय भोजन  
पूछो तो क्या है  
खिचड़ी खिचड़ी खिचड़ी  

महिलाओं का प्रिय भी  
झट से बन जाए, स्वाद भी आए  
कम समय में बन जाए  
बच्चे, बड़े सभी को भाए  
ना हो दाँत किसी के  
वो भी आराम से खाए  

हो कोई बीमार तो वो भी शौक से खाए  
नाम है खिचड़ी पर कई रूपों में जाना जाए  
काली दाल की खिचड़ी  
मूँग दाल की खिचड़ी  
ताहरी और बिरयानी  
या कहो पुलाव  

नाम सुनते ही जी ललचाए  
बच्चे बूढ़े सभी को भाए  
अमीर हो या गरीब  
हर कोई खाए  
खिचड़ी को यू.पी. का  
राष्ट्रीय भोजन क्यूँ ना बना दिया जाए  

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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi

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