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भोजपुरी गीत:-

बड़ा यादि आवेला, गऊवाँ जवरवा,
पिपरा के लागे ऊ खपड़वा के घरवा ।।

अँगना ओसारी बिछे खटिया बिछवना,
किस्सा आ कहानी सुनें छेटेछोटे छवना,
भरि के हुँकारी हँसें दाबि के पँजरवा ।।

होत भिनसारे बोले कगवा कोयलिया,
सोहे अनसोहे फरगुद्दिया बवलिया,
चँहके किलहटिनिं पारि के कजरवा ।।

चले पुरवाई साजि बाजि के सिवनवाँ,
होखे गुलजार बागी खेत खरिहनवाँ,
फूले फूले घूमें लागे लबरा भँवरवा ।।

धीरे से हिलोरा मारे पोखरा के पनियाँ,
पँवरे बत्तखवा के संगें बत्तखिनियाँ,
कब्बो कब्बो ऊड़े मेड़राये कबुत्तरवा ।।

कहाँ ले भुलाई मन मटिया के बतिया,
भरि भरि आँखि बऊराई दिन रतिया,
काटे खाती धाई कटि नाईं दुपहरवा ।।

बड़ा यादि आवेला, गऊवाँ जवरवा,
पिपरा के लागे ऊ खपड़वा के घरवा ।।

@ सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही,गोरखपुर

vijaypshahi

હું તું અને આપણે બન્ને
શું વાત કરું જયારે મળીએ ત્રણેય.
થોડો અહમ, થોડો પ્રેમ,
બાકી બચતી લાગણી બંનેમાં સેમ.

મારી હા તારી ના , તારી હા મારી ના,
બાકી થાતું બધું એડજસ્ટમેન્ટ અપણામાં.
તારી પૂજા ને મારી ઓફીસ જવાની ઝટપટ,
બાકી થતી આપણી આંખો અને ઈશારામાં રમઝટ.

મારો ગુસ્સો ને તારી હડતાલ,
એમાં લાગતી ઉપવાસોની વણજાર.
મારી ભૂલો ને તારા ગોટાળા,
એમાંથી નીકળતા હાસ્ય ના ફુવારા.

ચિંતા તારી કે હોય દુ:ખ મારું,
ભુજા પર ઢળતું એકબીજાનું માથું.
મારો પુરષાર્થ ને તારી મમતા,
કુટુંબ નો આધારસ્તંભ બંને રચતા ....

હું તું અને આપણે બન્ને
શું વાત કરું જયારે મળીએ ત્રણેય.

:- જીગર અશોક પંડ્યા

pandyajigar

" રાખમાંથી બેઠું થતું જીવન "

પળભર પહેલાં કંઈ ન હતું પળમાં ધરા ધ્રુજી ગઈ,
ઉછળતી-કૂદતી જિંદગી એ ક્ષણમાં જ થીજી ગઈ.

અસ્તવ્યસ્ત કરી નાખ્યું જીવન, એક ગોઝારા ભૂકંપે,
ઢોર ને ઢાંખર મર્યાં, માનવની જાન અને પૂંજી ગઈ.

પડ્યા ઉપર જ પાટું માર્યું આ કોરોના મહામારીએ,
થપાટ ના જાણે આ કેવી કુદરત જોરથી વીંઝી ગઈ.

ખોવાયા હસતા ચહેરા ને થઈ સુમસામ આખી વસ્તી,
કુદરતની આ આફત સામે, વિજ્ઞાનની પણ કૂંજી ગઈ.

રાખમાંથી બેઠા થવાની તાકાત દુનિયાની જોઈ "વ્યોમ",
જીવનના ઘડતર કાજે, આફતની આગ ખુદ બૂઝી ગઈ.

✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી), મુ. રાપર

omjay818

मेरा भारत

ashuashu858439

me aap jese banuga sir

virdeepsinh

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dadabhagwan1150

🙏🙏हर बार हम ही 'सच' नहीं होते,

कभी कभी किसी ओर की दिखाई दे रही 'गलती' उसकी 'मजबूरी' भी हो सकती है।🦚🦚

parmarmayur6557

बुद्धि भ्रष्ट

माधव की बुआ के समय बीता हुआ शिशु हुआ।
सब खुशियां मनाए रहे पर जब देखा पहली बार शिशु को सब संकोच उठाए रहे।
चार भुजा तीन नेत्र देखकर सब घबराए रहे।
माता-पिता चले त्यागने शिशु को दूर कर रहे।
हुई आकाशवाणी जब फिर परमात्मा समझाए रहे।
मत त्यागो पुत्र को जिसकी गोद में खेल के यह ठीक होगा।
वही पुत्र का अंत करेगा।
अब बारी माधव की थी।
लेत गोद में जब शिशु को झड़ गए सभी अंग बन गया सामान्य शिशु को देखकर खुशी बना रहे।
याद आई बुआ को बात फिर क्या था?
मांगने लगी माधव से वचन तुम 100 गलती भी क्षमा करो।
वचन दो माधव मुझको दिया वचन माधव ने मैं 100 गलती क्षमा करूं।
101 गलती पर अंत करूं।
सुन वचन बुआ माधव के अब कुछ संतुष्टि पाई शिशु बड़ा होने लगा।
नाम शिशुपाल कहलाने लगा।
माधव को बैरी मान रहा।
अब उनकी निंदा कर रहा।
यज्ञ कराया पांडव ने सबको न्योता आया।
भारी भरी सभा में माधव को उत्तम पुरुष माना।
यही नहीं सह पाया निंदक फिर क्या होना था?
लगा बोलने माधव को छलिया ग्वाला अनगिनत नाम लगे माधव करने गिनती अब हुई 99 गलती।
फिर माधव ने सोच चेत किया।
आखिरी गाली मत करना।
फिर उसको समझाया है पुत्र मेरी बुआ का गलत लगता मेरा भाई है।
मान जा गलती मत करना।
यही सीख समझाई है।
जब अकल पर पत्थर पड़ जाएं कुछ नजर नहीं आता है।
आखिर उसने फिर माधव का अपमान किया।
लिया सुदर्शन चक्र बुलाए फिर उसका अंत किया।

vanshsingh118873

જીવનમાં ગમે તેટલી મુશ્કેલીઓ, અવરોધો કે બંધનો આવે, છતાં આ જીવે હાર માન્યા વગર પોતાની મહેનત અને હિંમતથી આગળ વધવાની પ્રતિજ્ઞા કરવી જોઈએ.

જેમ નાનુ બીજ કઠણ પથ્થરની તિરાડમાંથી પણ બહાર નીકળીને સૂર્યપ્રકાશ તરફ આગળ વધે છે, તેમ માણસે પણ મુશ્કેલ પરિસ્થિતિઓને હરાવીને પોતાના સપનાઓ સુધી પહોંચવાનો પ્રયત્ન કરવો જોઈએ.

મુશ્કેલીઓ કેટલીય મોટી હોય, પરંતુ જો જીવવાની જીદ અને આત્મવિશ્વાસ હોય તો રસ્તો જરૂર બની જાય છે.

જીવન જીવવાની મેં જીદ પકડી છે,
આમ પથ્થર તોડી બહાર થોડો નીકળું.

મનોજ નાવડીયા

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manojnavadiya7402

आपका दिल गुलाब हो जाए ।
और आदत खराब हो जाए ।।

शाम को साथ बैठिए आ के ।
फिर पुरानी शराब हो जाए ।।

दिल्लगी के सवाल पर मेरे ।
आपका भी जवाब हो जाए ।।

खर्च कितना हुआ नफासत पे ।
आज इसका हिसाब हो जाए ।।

डूबकर के 'विजय' मुहब्बत में ।
बेख़बर बेहिसाब हो जाए ।।

@डाॅ.विजय प्रताप शाही

vijaypshahi

श्री हनुमंत प्रकाश एक समीक्षात्मक आलेख
सर्वप्रथम मैं आदरणीय विजय प्रताप शाही जी गोरखपुर उत्तर प्रदेश को उनके द्वारा रचित "श्री हनुमंत प्रकाश" खंडकाव्य प्रकाशित होने पर हार्दिक बधाई देता हूँ। यह आध्यात्मिक पुस्तक मुझे कुछ दिवस पूर्व भेंट स्वरूप प्राप्त हुई थी जिसका मैंने एक-एक शब्द बड़ी श्रद्धा के साथ पढ़ा है और तब मैं आपसे इसके संबंध में अपने मन की कुछ बात कहने जा रहा हूँ। "हनुमंत प्रकाश" खंडकाव्य छ: सोरठा,इक्यावन दोहे,चार सौ चौपाइयाँ एवं हनुमान जी की स्वरचित आरती से सुसज्जित है जो निसंदेह रचनाकार की हनुमान जी के प्रति असीम श्रद्धा एवं विश्वास को दर्शाता है। प्रथम चरण में अपने गुरुदेव के अतिरिक्त भगवान श्री गणेश, वीणापाणि माँ सरस्वती, भगवान गौरी शंकर तथा भगवान श्री सीताराम की वंदना में बहुत ही सरस सोरठा का सृजन किया है।
एक वानगी देखिए
वंदउँ बारम्बार गुरु पद पारस मनहिं मन।
करहिं जगत उजियार हे सत साधक सहज बढ़ि।।
वंदउँ बारम्बार श्री गणेश विघ्नेश अब।
करहिँ नमन स्वीकार आदि पूज्य प्रथमेश पुनि।।
इस खंडकाव्य में महावीर हनुमान के जन्म प्रसंग से लेकर भगवान श्री राम के राज्याभिषेक तक का वर्णन बहुत ही रोचक एवं भावपूर्ण है।
एक वानगी कुछ इस तरह से
हे हनुमत वीर बलवंता।दानव दलन संत रिपुहंता।।
मंगल मूर्ति महा बलवाना।संकट मोचन कृपानिधाना।।
इसके मध्य में प्रसंग बस भगवान श्री राम के जन्म एवं उनके द्वारा की गई पारलौकिक लीलाओं के वर्णन के साथ-साथ रावण की राजधानी लंका का भी बड़ा मनोहरी चित्रण बन पड़ा है।
भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक का वर्णन करते हुए रचनाकार लिखते हैं कि
रामचंद्र बैठहिं सिंहासन।अति उत्तम उत्सव आयोजन।।
सियाराम की शोभा न्यारी।सुंदर सुखद सुमंगलकारी।।
मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि आदरणीय विजय प्रताप शाही जी द्वारा रचित "श्री हनुमंत प्रकाश" खंडकाव्य प्रत्येक सनातन धर्मी को प्रातः नित्य पाठ करने के लिए सर्वथा उपयुक्त है। इसके पठन पाठन से अंजनी पुत्र हनुमान जी की अवश्य कृपा प्राप्त होगी ऐसी में कामना करता हूँ साथ ही एक बार पुनः इस खंडकाव्य के रचनाकार को हार्दिक बधाई देता हूँ साथ ही आशान्वित हूँ कि भविष्य में भी इसी प्रकार के आध्यात्मिक सृजन वे करते रहेंगे और हम पाठकों को उनके सृजन को पढ़कर ज्ञान अर्जन होता रहेगा।
आपका शुभचिंतक
सुरेंद्र शर्मा सागर
श्योपुर मध्य प्रदेश

vijaypshahi

दरियाँ के दो किनारे होते हैं।
बागों से हीं तो बहारें होती हैं
ढूंडते हैं हम ख़ुशी को हरतरफ़
दरअसल पास हमारे होती हैं।

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

મિત્રો,
ફરી હાજર છું એક નવી રચના સાથે આશા છે આપ સહુ ને પસંદ આવશે.

|| અશક્ય મિલન ||

મારો મારા ખુદ પર ચાલતો નથી કાબૂ કોઈ,
તમારી આંખો ના કામણના જાદુ ચાલશે કેમ?

અમારા માટે અમારી ખુમારી જીવનતત્વથી કિંમતી,
તો પછી આ મસ્તક તમારા ચરણોમાં ઝૂકશે કેમ?

નિજ મન-ઉપવનમાં ખુદની શોધમાં મગ્ન છું,
મારી સૂની આંખોમાં તમારી છબી મળશે કેમ?

સંસાર ના બજારમાં અમારી કોડીની કિંમત નથી,
મારાથી તમારા જેવું મોંઘામૂલું રતન વહોરાશે કેમ?

હાથની લકીરોમાં ક્યાંય તમારો ઉલ્લેખ નથી,
તો પછી નસીબ આપણને મેળવશે કેમ?

આમ પણ દુનિયાના બંધનો નડે છે ડગલે ને પગલે,
આ રીત-રિવાજો આપણો સાથ સ્વીકારશે કેમ?

અમારી ખુદની કોઈ ઓળખાણ મળતી નથી,
તમારું નામ અમારાથી અમારી સાથે જોડાશે કેમ?

આમ જોવો તો એ જ ફર્ક છે જીવવાની રીતમાં બંનેની પ્રિય,
તમે વિચારીને જીવો છો, મારા થી જીવ્યા પહેલાં વિચારાશે કેમ?

jiteshdattani024052

प्रकृति की पाठशाला ममता गिरीश त्रिवेदी ✍️

mamtagirishtrivedi740648

જય શ્રી રાધેકૃષ્ણ 🙏🏻

falgunidostgmailcom

"शुरुवात"

कुछ ख़त्म करने के लिए,
पहले एक शुरुआत ज़रूरी है।

और अगर शुरुआत ही न हो,
तो क्या कोई अंत...
दर्दनाक हो पाएगा?
सुखद हो पाएगा?
या ख़ूबसूरत भी हो पाएगा?

पूछो उस बारिश की बूंद से,
जो आज समंदर बनकर बह रही है।

कैसे बादलों की कोख में छटपटाई होगी,
गिरने से पहले कितनी बार डरी होगी।
कैसे कतरा-कतरा,
ज़मीन की ठोकरें खाकर,
धूल में लोटकर,
फिर भी बहती रही होगी।

और एक दिन,
खुद को खोकर ही,
उसने समंदर में नई शुरुआत पाई होगी।

हम भी वही बूंद हैं।
जब तक बादल में हैं, सुरक्षित हैं।
जब तक रास्ते का पत्थर हैं, इस्तेमाल हो रहे हैं।

पर असली चमक,
असली मुकाम,
असली अंत...
तभी आता है
जब हम गिरने की हिम्मत करते हैं।

इसलिए डरो मत।
शुरुआत करो।
क्योंकि हर ख़ूबसूरत अंत की,
पहली सीढ़ी...
एक डरती हुई शुरुआत ही होती है।
प्राची गुर्जर……

prachitanwar111

आज के नवभारत प्लस मेें मेरी रचना को प्रकाशित करने के लिए नवभारत टीम का हार्दिक धन्यवाद 🙏🏻
20-7-2026
सोमवार

daveabha6

नमस्कार मित्र हो -

arunvdeshpande

जीवन का दूसरा नाम ही #संघर्ष है, जहाँ कठिनाइयाँ बिना किसी पूर्व सूचना के दस्तक देती हैं। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि कोई भी मार्ग पूरी तरह निष्कंटक नहीं होता। कठिनाइयाँ अक्सर हमें कमजोर करने नहीं, बल्कि हमारी #आंतरिक_शक्ति और क्षमताओं को निखारने आती हैं। जब हम किसी बड़ी बाधा का सामना करते हैं, तो प्रारंभिक प्रतिक्रिया भय या हताशा की हो सकती है, लेकिन यही वह क्षण होता है जहाँ हमारे चरित्र की #परीक्षा शुरू होती है। समस्याएँ दरअसल वे पत्थर हैं जिनसे हम या तो दीवार खड़ी कर लेते हैं या फिर अपनी सफलता के लिए पुल का निर्माण करते हैं।
​इन चुनौतियों से पार पाने का सबसे पहला उपाय है अपनी #सोच में बदलाव लाना। जब हम समस्या को 'अंत' के बजाय एक '#अवसर ' के रूप में देखना शुरू करते हैं, तो समाधान के रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं। मानसिक स्पष्टता के लिए यह जरूरी है कि हम पूरी #समस्या को एक साथ देखकर घबराने के बजाय, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट लें। जब हम एक-एक कदम आगे बढ़ाते हैं, तो वह पहाड़ जैसी कठिनाई भी धीरे-धीरे छोटी लगने लगती है। धैर्य और निरंतरता वे दो अस्त्र हैं, जो सबसे कठिन समय में भी व्यक्ति को टूटने नहीं देते।
​इसके साथ ही, #कठिनाई के समय स्वयं पर #विश्वास बनाए रखना अनिवार्य है। अक्सर बाहरी बाधाओं से ज्यादा हमारी आंतरिक शंकाएँ हमें नुकसान पहुँचाती हैं। अपनी पिछली सफलताओं को याद करना और खुद को यह समझाना कि "यह समय भी बीत जाएगा", मन को #शांति प्रदान करता है। #सहायता माँगने में संकोच न करना भी एक बुद्धिमानी भरा कदम है; कभी-कभी दूसरों का #नजरिया हमें वह समाधान दिखा देता है जिसे हम तनाव में देख नहीं पा रहे थे। अंततः, कठिनाइयों से पार पाने का अर्थ केवल समस्या का #समाधान करना नहीं है, बल्कि उस प्रक्रिया में एक बेहतर और अधिक अनुभवी #इंसान बनकर उभरना है।

@ डाॅ.विजय प्रताप शाही विशेन

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vijaypshahi

Do you know that you should not allow the mind to work in such a way that it holds the reins over you? You should make the mind go according to what you want. The mind is inanimate.

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dadabhagwan1150

Miloge kya
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अगर कहूँ उदास हु |
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@ajay_sharmaa_2

sharmaa2