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Vijay Pratap Shahi

Vijay Pratap Shahi

@vijaypshahi


बात जब जब चीख कर करता हूँ मैं,
तब बहुत छोटा नजर आता हूँ मैं ।।

मूढ़ सा मगरूर सा मजबूर सा,
आप ही में तो बड़ा बनता हूँ मैं ।।

बेवजह यूँ ही समय के चौक पर,
बस अकड़कर के खड़ा मिलता हूँ मैं ।।

सोच पर चिपकी हजारों चकतियां,
सोचता हूँ मैं बहुत उम्दा हूँ मैं ।।

यूँ उफनती हैं “विजय” की हसरतें,
खास से भी गैर सा लड़ता हूँ मैं ।।

“मैं” अरे मैं तो अहम् का बीज हूँ,
हर कहीं हर दौर में उगता हूँ मैं ।।

@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही
गोरखपुर, 9935025901,6388236360

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मुश्किलों से जूझने की  कोशिशें  लिख दूँ जरा,
और चलने की पुरानी आदतें लिख दूँ जरा ।।

धूप ओढ़े     रेत जैसी    चमचमाती    जिन्दगी,
धूल सी  यायावरी पर   बारिशें   लिख दूँ जरा ।।

आसमाँ पे  रंग मन माफिक लगाने में मिली,
पाँव के पोरों की सारी दिक्कतें  लिख दूँ जरा ।।

ज़िन्दगी की राह में काँटे मिलें ना फिर कभी,
नर्म सी तासीर की  कुछ कोपलें  लिख दूँ जरा ।।

सामने जब हो चुनौती बस "विजय" की बात हो,
हारते कदमों के हिस्से हिम्मतें लिख दूँ जरा ।।

@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही

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शिव,त्रिपुरेश्वर, शम्भु, महेश्वर, रुद्र ओंकारा,
बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।।

पाप - काम संहारक प्रभु के नेत्रों की ज्वाला,
जगहित में जगदीश्वर पी लेते हैं विष प्याला,
नीलकण्ठ की जटा से निकली गंगा की धारा,
बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।।

तन में भष्म भभूत लपेटे पहने मृगछाला,
हाथ त्रिशूल कमण्डल डमरू गले सर्प माला,
विश्वनाथ के द्वार लगाती दुनियाँ जयकारा,
बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।।

वामभाग में सदा विराजें जग की कल्यानी,
सारी दुनियाँ कहती है प्रभु को औघड़दानी,
दर्शन पाकर हो जाता सबका जीवन न्यारा,
बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।।

@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही

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आँखों में उम्मीदें पाले पलते जाना,
स्थिति चाहे जैसी भी हो ढलते जाना ।।

दुश्वारी तो सबके जीवन में आती है,
हर हालत में हिम्मत रखना ना घबराना ।।

वैसे तो सबका मालिक है ऊपर वाला,
फिर भी कोशिश हो सच्चा हो पानीदाना ।।

अपने दुख की गहराई अपने ही मापो,
दुनिया से सारी सच्चाई क्या बतलाना ।।

पत्थर होकर धीरे से मन को समझाओ,
फूलों में ही होता है खिलना मुरझाना ।।

@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही

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" अरे नकारात्मकता "
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अरे नकारात्मकता
शायद तुझको भान नहीं है,
इस जीवन में, सुन,
तेरा कोई स्थान नहीं है........।


बाग बगीचों में दिनदिन भर
ओल्हा पाती खेले,
गाँव, गली,  पौढ़ी, पगडंडी, 
काँटा, कूशा झेले,
गाय  चराए,    गोबर   फेंके,  
चारा पानी ढोए,
सिर के ऊपर, लहन लादकर, 
मुस्कुराहटें बोए,
सबको है मालूम
यहाँ कोई अनजान नहीं है....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है....।


भले नियति ने हमें,  हमेशा,
नंगे पाँव चलाया,
भले, चटकती दोपहरी ने, 
नंगी पीठ जलाया,
अरे,  भले ही अपने हिस्से,
सूखे मौसम आए, 
रोटी चटनी, गुण,अचार सब
चटखारे से खाए,
इन सब बातों में अपना
कोई अपमान नहीं है.....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है......।


बदरी बरखा शीत घाम सब
सम स्वभाव से काटे
दुख  विपत्ति भी,  हँसते हँसते, 
हाथों हाथों बाँटे
अपनी  जिद है,  चुनौतियों से,
टकराते रहने की,
कठिनाई को सोच समझकर
सुलझाने,सहने की,
यहाँ तनिक भी कुंठा का
आदान-प्रदान नहीं है....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है.......।

@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही

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वो ज़रा मौजुआ जमाना था,
चार आना बड़ा खजाना था ।।

टाॅफियाँ सिर्फ पाँच पैसे में,
बीस पैसे में चाट खाना था ।।

खेलना खूब मस्तियाँ करना,
घूमना और दिन बिताना था ।।

काम कुछ और कहाँ था केवल,
एक गइया जिसे चराना था ।।

और ले कर 'विजय' भरा बस्ता,
पाठशाला सहर्ष जाना था ।।

@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही

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सुरमई निगाहों में अधखिली कली होगी
दिलजलों को लूटने कोई चंचला चली होगी ।

सुरमई निगाहों में झील सी लहर होगी
बूँद बूँद पीने वास्ते प्यास उम्र भर होगी ।

सुरमई निगाहों में प्यार का नशा होगा
चाहतों के साये में इक शहर बसा होगा ।

सुरमई निगाहों में आपका करम होगा
मुस्कुरा के यूँ न देखिए प्यार का भरम होगा ।


@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही

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रामायण और गीता जैसी, माता, सहज सुनीता जैसी ।
जीवन दात्री निर्झरिणी सी, पावन और पुनीता जैसी ।।

कर्तव्यों की गाथा जैसी, भू पर भाग्य विधाता जैसी ।
वात्सल्य के पुष्पगुच्छ सी, भाव भरी संगीता जैसी ।।

सम्बन्धों में आला जैसी, सत की सुन्दर माला जैसी ।
कोमलमन निर्मलमन वाली, सरिता तीर शिवाला जैसी ।।

वाणी से शीतल जल जैसी, जीवन में अमृतफल जैसी ।
हर दिन आती नेह लुटाती, वह शीतल गंगाजल जैसी ।।

माँ बिल्कुल साधारण जैसी, संकट बीच निवारण जैसी ।
पल भर में पीड़ा हर लेती, मंत्रों के उच्चारण जैसी ।।

@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही

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माँ वो माँ जिसने इस जग में मुझको जन्म दिया है,
माँ वो माँ जिसने लालन-पालन का कर्म किया है,
माँ वो माँ जिसकी गोंदी में खेले, खाये, सोये,
माँ वो माँ जिसने आँखों में स्वर्णिम सपने बोये,
माँ वो माँ जिसने मुश्किल में दर - दर मंन्नत माँगी,
माँ वो माँ जो रात - रात भर मेरे खातिर जागी,
माँ वो माँ जिसने भूखे रह कर बचपन को पाला,
माँ वो माँ जिसने हर मौसम खातिर मुझको ढाला,
माँ वो माँ जिसकी आँचल में डर कर छुप जाते थे,
माँ वो माँ जिसकी गोदी में हँसते - मुस्काते थे,
माँ वो माँ जो मेरे माथे काला टीका देती,
माँ वो माँ जो थपकी देकर सारे दुख हर लेती,
माँ वो माँ जिसके पीछे मैं हिन हिन करते घूमा,
माँ वो माँ जिसने गिरने पर मेरा माथा चूमा,
माँ वो माँ जो मेरी खातिर गीले में सोती थी,
माँ वो माँ जो मुझको काँटे लगने पर रोती थी,
माँ वो माँ जिसने मुझको बचपन मे है नहलाया,
माँ वो माँ जिसने मेरे घावों को है सहलाया,

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आज का यह #लेख उन सभी जीवट योद्धाओं के नाम है जो #किडनी_रोग से ग्रसित हैं और #डायलिसिस की मशीनों और #अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच हर दिन एक नया #युद्ध लड़ रहे हैं।

मैं यह बात मैं पिछले 24 वर्षों के अपने निजी अनुभव और #संघर्ष के आधार पर कह रहा हूँ। किडनी रोग से मेरा सामना साल 2002 में शुरू हुआ था। वह एक लंबा और थका देने वाला रास्ता था, जो 2012 में अत्यंत #गंभीर स्थिति तक जा पहुँचा। साल 2014 मेरे जीवन का वह भावुक और कृतज्ञता से भरा मोड़ था, जब मेरी #जीवनसंगिनी ने अपनी #किडनी_दान देकर मुझे '#पुनर्जन्म ' दिया। आज 2023 से मैं पुनः डायलिसिस पर हूँ, लेकिन ईश्वर की कृपा और अपनो के प्रेम व #आशीर्वाद से मेरे चेहरे की यह मुस्कान और मन का #विश्वास आज भी अटूट है।

​डायलिसिस पर होने का अर्थ जीवन का रुक जाना कतई नहीं है। मैं स्वयं एक व्यवसायी हूँ और अपने #व्यवसाय को आज भी पूरा समय देता हूँ। व्यवसाय की भागदौड़ के साथ-साथ मैंने अपनी रचनात्मकता को भी जीवित रखा है और #साहित्य की सेवा के माध्यम से अपनी भावनाओं को शब्द दे रहा हूँ। मेरा मानना है कि बीमारी केवल हमारे शरीर को थका सकती है, हमारे सपनों और हमारी कर्मठता को नहीं। जब आप कर्म में डूबे रहते हैं, तो दर्द का #अहसास गौण हो जाता है।

किडनी रोग से ग्रसित एवं डायलिसिस का सामना कर रहे मेरे प्रिय साथियों, डायलिसिस #मशीन आपके रक्त को शुद्ध करती है, लेकिन आपके विचारों को शुद्ध और #सकारात्मक रखने का काम केवल आप स्वयं कर सकते हैं। जब भी आपको लगे कि आप थक रहे हैं, तो अपने #परिवार के उस त्याग को याद करें जो उन्होंने आपके लिए किया है। मेरी पत्नी का वह #त्याग मुझे हर दिन यह याद दिलाता है कि मेरा जीवन केवल मेरा नहीं है, बल्कि यह उन सब का है जो मुझसे #प्रेम करते हैं। इसलिए, हमें हारने का कोई अधिकार नहीं है।

​जीवन एक #संघर्ष तो है, और जीवन कितना लम्बा होगा यह ईश्वर के हाथ में ही है, लेकिन डायलिसिस को एक बोझ के रूप में देखने के बजाय, इसे #जीवन की एक 'रीफिलिंग प्रक्रिया' के रूप में देखें जो हमें एक और नया दिन देखने का #अवसर देती है। अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहें, अपने शौक पालें और ईश्वर पर भरोसा रखें। हम इस #बीमारी से कहीं बड़े हैं। आइए, मिलकर यह साबित करें कि एक मजबूत इच्छाशक्ति के सामने बड़ी से बड़ी व्याधि भी घुटने टेक देती है। मुस्कुराते रहिए, क्योंकि आपकी #मुस्कान ही इस बीमारी के खिलाफ आपकी सबसे बड़ी जीत है।

एक बात और कि मैं जब यह लेख लिखकर #पोस्ट कर रहा हूँ तब मैं डायलिसिस पर ही हूँ।

डाॅ.विजय प्रताप शाही, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
#साहित्य #गोरखपुर
#किडनी_रोग #डायलिसिस #संघर्ष

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