Quotes by Vijay Pratap Shahi in Bitesapp read free

Vijay Pratap Shahi

Vijay Pratap Shahi

@vijaypshahi


आज का यह #लेख उन सभी जीवट योद्धाओं के नाम है जो #किडनी_रोग से ग्रसित हैं और #डायलिसिस की मशीनों और #अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच हर दिन एक नया #युद्ध लड़ रहे हैं।

मैं यह बात मैं पिछले 24 वर्षों के अपने निजी अनुभव और #संघर्ष के आधार पर कह रहा हूँ। किडनी रोग से मेरा सामना साल 2002 में शुरू हुआ था। वह एक लंबा और थका देने वाला रास्ता था, जो 2012 में अत्यंत #गंभीर स्थिति तक जा पहुँचा। साल 2014 मेरे जीवन का वह भावुक और कृतज्ञता से भरा मोड़ था, जब मेरी #जीवनसंगिनी ने अपनी #किडनी_दान देकर मुझे '#पुनर्जन्म ' दिया। आज 2023 से मैं पुनः डायलिसिस पर हूँ, लेकिन ईश्वर की कृपा और अपनो के प्रेम व #आशीर्वाद से मेरे चेहरे की यह मुस्कान और मन का #विश्वास आज भी अटूट है।

​डायलिसिस पर होने का अर्थ जीवन का रुक जाना कतई नहीं है। मैं स्वयं एक व्यवसायी हूँ और अपने #व्यवसाय को आज भी पूरा समय देता हूँ। व्यवसाय की भागदौड़ के साथ-साथ मैंने अपनी रचनात्मकता को भी जीवित रखा है और #साहित्य की सेवा के माध्यम से अपनी भावनाओं को शब्द दे रहा हूँ। मेरा मानना है कि बीमारी केवल हमारे शरीर को थका सकती है, हमारे सपनों और हमारी कर्मठता को नहीं। जब आप कर्म में डूबे रहते हैं, तो दर्द का #अहसास गौण हो जाता है।

किडनी रोग से ग्रसित एवं डायलिसिस का सामना कर रहे मेरे प्रिय साथियों, डायलिसिस #मशीन आपके रक्त को शुद्ध करती है, लेकिन आपके विचारों को शुद्ध और #सकारात्मक रखने का काम केवल आप स्वयं कर सकते हैं। जब भी आपको लगे कि आप थक रहे हैं, तो अपने #परिवार के उस त्याग को याद करें जो उन्होंने आपके लिए किया है। मेरी पत्नी का वह #त्याग मुझे हर दिन यह याद दिलाता है कि मेरा जीवन केवल मेरा नहीं है, बल्कि यह उन सब का है जो मुझसे #प्रेम करते हैं। इसलिए, हमें हारने का कोई अधिकार नहीं है।

​जीवन एक #संघर्ष तो है, और जीवन कितना लम्बा होगा यह ईश्वर के हाथ में ही है, लेकिन डायलिसिस को एक बोझ के रूप में देखने के बजाय, इसे #जीवन की एक 'रीफिलिंग प्रक्रिया' के रूप में देखें जो हमें एक और नया दिन देखने का #अवसर देती है। अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहें, अपने शौक पालें और ईश्वर पर भरोसा रखें। हम इस #बीमारी से कहीं बड़े हैं। आइए, मिलकर यह साबित करें कि एक मजबूत इच्छाशक्ति के सामने बड़ी से बड़ी व्याधि भी घुटने टेक देती है। मुस्कुराते रहिए, क्योंकि आपकी #मुस्कान ही इस बीमारी के खिलाफ आपकी सबसे बड़ी जीत है।

एक बात और कि मैं जब यह लेख लिखकर #पोस्ट कर रहा हूँ तब मैं डायलिसिस पर ही हूँ।

डाॅ.विजय प्रताप शाही, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
#साहित्य #गोरखपुर
#किडनी_रोग #डायलिसिस #संघर्ष

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भोजपुरी गीत:-

बड़ा यादि आवेला, गऊवाँ जवरवा,
पिपरा के लागे ऊ खपड़वा के घरवा ।।

अँगना ओसारी बिछे खटिया बिछवना,
किस्सा आ कहानी सुनें छेटेछोटे छवना,
भरि के हुँकारी हँसें दाबि के पँजरवा ।।

होत भिनसारे बोले कगवा कोयलिया,
सोहे अनसोहे फरगुद्दिया बवलिया,
चँहके किलहटिनिं पारि के कजरवा ।।

चले पुरवाई साजि बाजि के सिवनवाँ,
होखे गुलजार बागी खेत खरिहनवाँ,
फूले फूले घूमें लागे लबरा भँवरवा ।।

धीरे से हिलोरा मारे पोखरा के पनियाँ,
पँवरे बत्तखवा के संगें बत्तखिनियाँ,
कब्बो कब्बो ऊड़े मेड़राये कबुत्तरवा ।।

कहाँ ले भुलाई मन मटिया के बतिया,
भरि भरि आँखि बऊराई दिन रतिया,
काटे खाती धाई कटि नाईं दुपहरवा ।।

बड़ा यादि आवेला, गऊवाँ जवरवा,
पिपरा के लागे ऊ खपड़वा के घरवा ।।

@ सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही,गोरखपुर

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आपका दिल गुलाब हो जाए ।
और आदत खराब हो जाए ।।

शाम को साथ बैठिए आ के ।
फिर पुरानी शराब हो जाए ।।

दिल्लगी के सवाल पर मेरे ।
आपका भी जवाब हो जाए ।।

खर्च कितना हुआ नफासत पे ।
आज इसका हिसाब हो जाए ।।

डूबकर के 'विजय' मुहब्बत में ।
बेख़बर बेहिसाब हो जाए ।।

@डाॅ.विजय प्रताप शाही

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श्री हनुमंत प्रकाश एक समीक्षात्मक आलेख
सर्वप्रथम मैं आदरणीय विजय प्रताप शाही जी गोरखपुर उत्तर प्रदेश को उनके द्वारा रचित "श्री हनुमंत प्रकाश" खंडकाव्य प्रकाशित होने पर हार्दिक बधाई देता हूँ। यह आध्यात्मिक पुस्तक मुझे कुछ दिवस पूर्व भेंट स्वरूप प्राप्त हुई थी जिसका मैंने एक-एक शब्द बड़ी श्रद्धा के साथ पढ़ा है और तब मैं आपसे इसके संबंध में अपने मन की कुछ बात कहने जा रहा हूँ। "हनुमंत प्रकाश" खंडकाव्य छ: सोरठा,इक्यावन दोहे,चार सौ चौपाइयाँ एवं हनुमान जी की स्वरचित आरती से सुसज्जित है जो निसंदेह रचनाकार की हनुमान जी के प्रति असीम श्रद्धा एवं विश्वास को दर्शाता है। प्रथम चरण में अपने गुरुदेव के अतिरिक्त भगवान श्री गणेश, वीणापाणि माँ सरस्वती, भगवान गौरी शंकर तथा भगवान श्री सीताराम की वंदना में बहुत ही सरस सोरठा का सृजन किया है।
एक वानगी देखिए
वंदउँ बारम्बार गुरु पद पारस मनहिं मन।
करहिं जगत उजियार हे सत साधक सहज बढ़ि।।
वंदउँ बारम्बार श्री गणेश विघ्नेश अब।
करहिँ नमन स्वीकार आदि पूज्य प्रथमेश पुनि।।
इस खंडकाव्य में महावीर हनुमान के जन्म प्रसंग से लेकर भगवान श्री राम के राज्याभिषेक तक का वर्णन बहुत ही रोचक एवं भावपूर्ण है।
एक वानगी कुछ इस तरह से
हे हनुमत वीर बलवंता।दानव दलन संत रिपुहंता।।
मंगल मूर्ति महा बलवाना।संकट मोचन कृपानिधाना।।
इसके मध्य में प्रसंग बस भगवान श्री राम के जन्म एवं उनके द्वारा की गई पारलौकिक लीलाओं के वर्णन के साथ-साथ रावण की राजधानी लंका का भी बड़ा मनोहरी चित्रण बन पड़ा है।
भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक का वर्णन करते हुए रचनाकार लिखते हैं कि
रामचंद्र बैठहिं सिंहासन।अति उत्तम उत्सव आयोजन।।
सियाराम की शोभा न्यारी।सुंदर सुखद सुमंगलकारी।।
मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि आदरणीय विजय प्रताप शाही जी द्वारा रचित "श्री हनुमंत प्रकाश" खंडकाव्य प्रत्येक सनातन धर्मी को प्रातः नित्य पाठ करने के लिए सर्वथा उपयुक्त है। इसके पठन पाठन से अंजनी पुत्र हनुमान जी की अवश्य कृपा प्राप्त होगी ऐसी में कामना करता हूँ साथ ही एक बार पुनः इस खंडकाव्य के रचनाकार को हार्दिक बधाई देता हूँ साथ ही आशान्वित हूँ कि भविष्य में भी इसी प्रकार के आध्यात्मिक सृजन वे करते रहेंगे और हम पाठकों को उनके सृजन को पढ़कर ज्ञान अर्जन होता रहेगा।
आपका शुभचिंतक
सुरेंद्र शर्मा सागर
श्योपुर मध्य प्रदेश

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श्री हनुमंत प्रकाश हनुमान जी की महिमा का गुणगान करती एक श्रेष्ठ पुस्तक

बाबा गोरक्षनाथ की पावन कर्मभूमि गोरखपुर की पवन धारा से मूर्धन्य साहित्यकार, श्रेष्ठ लेखक, वाचस्पति सम्मान प्राप्त डॉ. विजय प्रताप शाही जी द्वारा लिखित पुस्तक श्री हनुमंत प्रकाश हाल ही में मैंने पढ़ी है। जब ईश्वर की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है तब ऐसी पुस्तक का श्रृजन संभव हो पाता है। 56 पृष्ठों से सुशोभित यह पुस्तक न सिर्फ पठनीय है वल्कि पूजा स्थल पर स्थान प्राप्त करने योग्य है।

आदरणीय डॉ विजय प्रताप शाही जी मेरे अभिन्न मित्र, शुभचिंतक व सखा हैं। आपसे मेरा व्यक्तिगत संबंध अत्यंत मधुर व प्रगाढ़ है। आप हनुमान जी के अनन्य भक्त है। हनुमंत प्रकाश आपकी हनुमान जी में भक्ति भाव को प्रतिबिंबित करती है। आपके उपर हनुमान जी की विशेष कृपा रहती है ऐसा आपका दृढ़ विश्वास है। आप जैसा धीर, गंभीर व संघर्षशील व्यक्ति विरले ही मिलेंगे।

श्री हनुमंत प्रकाश के आवरण पृष्ठ पर हनुमान जी की अभय मुद्रा की छवि मानो पाठकों को अभय प्रदान करता है। आवरण पृष्ठ का रंग संयोजन ही हृदय में भक्ति भाव का संचार करता है। श्री हनुमंत प्रकाश का लेखन चार चरणों में हुआ है। जो चार सोरठों, इक्यावन दोहों, चार सौ चौपाईयों से सुसज्जित है।

प्रथम चरण के शुरुआत में आपने अपने दोहों द्वारा अपने गुरु व ईश्वर की वंदना अत्यंत भक्ति भाव से की है। तत्पश्चात हनुमान जी के जन्म व बाल लीलाओं का वर्णन अत्यंत मनोहारी है। हनुमान जी की नटखट बाललीला व ऋषि द्वारा दिया गया श्राप वर्णित है।

द्वितीय चरण में राम जन्म, धनुष भंग, राम सीता विवाह, राम वन गमन, केवट प्रसंग, हनुमान जी द्वारा ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव की सेवा में तत्पर होने का मार्मिक चित्रण है।

तृतीय चरण में सूर्पनखा प्रसंग, खर दूषण बध, मारीच प्रसंग, सीता हरण, शबरी मिलन व सीता जी की तलाश में भटकते श्री राम लक्ष्मण का हनुमान जी से मिलन, हनुमान जी द्वारा माता सीता की खोज में दक्षिण दिशा में प्रस्थान करना, समुद्र लंघन, सीता मिलन व लंका दहन का मार्मिक वर्णन है।

चतुर्थ चरण में हनुमान जी के पराक्रम, बुद्धि व चातुर्य का मनोहारी वर्णन है। श्री राम द्वारा लंका पर चढ़ाई करना, राम रावण युद्ध, अहिरावण द्वारा श्री राम लक्ष्मण का हरण करके पाताल लोक ले जाना व हनुमान जी द्वारा श्री राम लक्ष्मण को पाताल लोक से सकुशल वापस लाना, श्री राम लक्ष्मण को गरूड़ द्वारा नागपाश से मुक्त कराना, लक्ष्मण मूर्छा के दौरान सुषेण वैद्य को लंका से लाना, हिमालय से पवन वेग से बूटी लाकर लक्ष्मण की प्राण रक्षा करने का प्रसंग अत्यंत मार्मिक है।

मात्र 56 पृष्ठ में हनुमान जी की महिमा का गुणगान करना गागर में सागर भरने के समान है और यह कार्य डॉ विजय प्रताप शाही जी ने अत्यंत कुशलता से किया है। शब्द संयोजन व भक्ति भाव का अभूतपूर्व संगम है श्री हनुमंत प्रकाश। सबसे बड़ी बात है कि जब आप एक बार श्री हनुमंत प्रकाश पढ़ना शुरू करते हैं तो मन हनुमान जी व श्री राम की लीलाओं में रम जाता है और पुस्तक कब समाप्त हो जाती है पता ही नहीं लगता है। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते आप कहीं भी बोझिल महसूस नहीं करते हैं। यह एक कुशल साहित्यकार के कलम का जादू है। इसके लिए आदरणीय डॉ विजय प्रताप शाही जी बधाई के पात्र हैं। श्री हनुमंत प्रकाश हनुमान जी की महिमा का गुणगान करती एक श्रेष्ठ पुस्तक है।

डॉ. राजीव रंजन मिश्र, एडवोकेट
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

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भक्ति एवं आध्यात्म के अजस्र प्रकाश से जनमानस को आलोकित करती दिव्य कृति 'श्री हनुमंत प्रकाश'*

भक्ति, वैराग्य एवं आध्यात्म की प्रमुख धारा नाथ पंथ की पुण्य भूमि, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के जाने- माने कवि, लेखक, परम सुहृदयी डॉ विजय प्रताप शाही जी से वैश्विक विभीषिका कोविड के दौरान, बहुधा मेरे संचालन में, विविध ऑनलाइन साहित्यिक पटलों पर आयोजित कवि गोष्ठियों में, साहित्यिक परिचय एवं संवाद स्थापित हुआ। कालांतर में दो-तीन बार, गोरखपुर में आयोजित मंचीय साहित्यिक कार्यक्रमों में उनका स्वल्पावधि साक्षात दर्शन एवं कतिपय विमर्श भी हुआ। प्रतीत हुआ कि, आप भी मेरी तरह जीवन के द्वितीय अंश में, एक शौक़ की तरह साहित्य को जीवन में गंभीरता पूर्वक उतारने के लिए संघर्षरत हैं। पारस्परिक स्नेह सूत्र मजबूत होते गये। आज उनकी सक्षम लेखनी से भारतीय जनमानस के आराध्य, अनन्य राम भक्त, पवन पुत्र हनुमान जी के जीवन वृत्त पर चौपाई, दोहा, सोरठा छंदाधारित, समग्र समर्पण भाव से नि:सृत काव्य कृति *श्री हनुमंत प्रकाश* रजिस्टर्ड पोस्ट से प्राप्त हुई। अकादमी प्रेस, दारागंज, प्रयागराज से मुद्रित छप्पन पृष्ठों, चार सर्गों का यह लघु खंडकाव्य अति विशिष्ट बन पड़ा है। अपनी बात लिखते हुए कवि ने लोकमंगल की कामना को ही इस आध्यात्मिक कृति का हेतु बताया है। प्रथम सर्ग में, मंगलाचरण के रूप में प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश, ज्ञान मूर्ति सदगुरु, मां बागेश्वरी, भगवान गौरी शंकर, कलयुग आधार प्रभु श्री सीताराम व पुस्तक के प्रतिपाद्य पवनसुत की अप्रतिम अलौकिक आराधना, एक-एक पृथक सोरठा छंद के माध्यम से की गयी है। इनका अवगाहन करते ही विषय वस्तु की सार्वभौमिकता, कवि की प्रखर भक्ति भावना, कथ्य की प्राजंलता, शिल्प का सौष्ठव, सब कुछ दर्पण की तरह स्पष्ट झलकने लगता है। हृदय स्वत: श्रद्धा एवं साहित्य के आगामी सिंधु में गोते लगाने के लिए आतुर हो उठता है। एक झलक आपके लिए..
*वंदहुं बारंबार, गुरु पद पारस मनहिं मन,*
*करहिं जगत उजियार, हे सत साधक सहज बढ़ि।।*

पुस्तक में चार चौपाइयों के पश्चात एक दोहे का क्रम चार चरणों एवं 51 दोहों तक विस्तारित है, जिसका हनुमत भक्त जनमानस, पूजा करते समय, एक घंटे की अवधि में सहज ही पठन, अवगाहन कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है। लोक जीवन में प्रयुक्त अवधी भाषा में रचित यह कृति, संप्रेषणीयता की दृष्टि से अत्यंत सरल, सरस एवं प्रवाहमान है। कहीं-कहीं तो इसके अंग- उपांग तुलसीकृत श्री रामचरितमानस के ही अंश प्रतिबिंबित होते हैं यथा
*दिन दिन बढ़ै, तेज बल दूना, बुद्धि और कौशल चौगूना* *करै बाल कपि कौतुक ऐसे फूंकि पहाड़ उड़ावहिं जैसे।।*
प्रथम चरण में पिता केसरी व मां अंजनी के आंगन में पवन पुत्र के जन्म एवं बाल लीला का दिव्य वर्णन अभूतपूर्व बन पड़ा है।

*चैत्र शुक्ल, शुभ पूर्णिमा, मंगल प्रातः काल,*
*मेष लग्न चित्रा नखत, प्रगटहिं अंजनि लाल!*

इसी प्रकार फल समझ कर भगवान भानु भास्कर को ग्रास बनाने की कथा भी अत्यंत रुचिकर बन पड़ी है। बाल्य काल में बड़े-बड़े कौतुक करने वाले कपि की बाल सुलभ चेष्टाएं भी कवि की पैनी दृष्टि से ओझल नहीं हो सकी।

*गदा विश्वकर्मा से पावा,*
*यह उपहार अधिक मन भावा।।*

द्वितीय चरण में कवि अपने आराध्य के आराध्य, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम जी के, जन्म से लेकर, भार्या जानकी जी एवं अनुज लक्ष्मण के साथ वनवास में चित्रकूट निवास तक तथा हनुमान जी की, वानर राज सुग्रीव की रक्षार्थ ऋष्यमूक पर्वत पर आगमन की कथा का समुचित, सुघड़ वर्णन किया गया है। जिस प्रकार ऐसे श्रेष्ठ सृजन सदैव लोकमंगल की कामना से रचे जाते हैं उसी प्रकार विविध देश काल परिस्थितियों में, भगवान के धरा पर अभ्युदय का लक्ष्य इन पंक्तियों में पढ़कर सृजन की सार्थकता पर विश्वास सहज ही सुदृढ़ हो जाता है।

*जब-जब होहिं विलोपित धर्मा, छीजहिं संस्कार सत्कर्मा।।*
*अत्याचार अधर्म अनीती, कुत्सित कृत्य कुबुद्धि कुरीती।।*

अनुपम प्रकृति चित्रण भी देखते ही बनता है।

*खेत खेत हर्षित हरियाली, सरसों पीत बिछावन वाली*

प्रभु श्री राम के जन्म की शुभ बेला का वर्णन भी उतना ही मनोहारी बन पड़ा है।

*चैत्र शुक्ल नवमी तिथि, नखत पुनर्वस काल।*
*कर्क लग्न मध्याह्न शुभ, आवहिं दीनदयाल।।*

धनुष भंग में असफल राजाओं को जनक राज द्वारा धिक्कारे जाने पर, लखन लाल की गर्वोक्ति सहज ही चित्ताकर्षित कर लेती है।

*जहां एक रघुवंशी होई, अनुचित बात करै नहिं कोई।।*

पुस्तक का तृतीय चरण भी प्रथम दो चरणों के अनुरूप ही रमणीयता एवं भाव प्रवणता से आकंठ आपूरित है। पवनसुत की उनके आराध्य से भेंट, उभय के साथ-साथ पाठकों को भी भाव विह्वल करने वाली है।

*हनुमत अति विह्वल भयो, रघुपति भाव विभोर।*
*अंकवारी भरि भरि नयन, हिरदय करहिं ॲंजोर।।*

लंका दहन पर बजरंगी का रौद्र रूप भी दृष्टव्य है।

*लाल लपट विकराल विशाला, अट्टालिका जरावहिं ज्वाला।*

चतुर्थ चरण माता जानकी का पता लगाकर लौटी वानरटोली व प्रभु श्री राम के मिलन से लेकर लंका विजय के पश्चात भगवान के राज्याभिषेक तक विस्तृत है। शिल्प की दृष्टि से यह संपूर्ण काव्य अत्यंत समृद्ध प्रतीत होता है। यथोचित स्थलों पर समस्त नौ रसों का समुचित समाहार है। अनुप्रास, उपमा, रूपक व अन्य शब्दार्थालंकारों का सहज प्रयोग परिलक्षित होता है। प्रयोग की दृष्टि में कहीं भी अनावश्यक चेष्टा नहीं दिखायी पड़ती।

*अति अद्भुत अति अद्वितीय, बिपुल बीर बलवान।*
*मांगि अशीष गिरीश पुनि, करहुं हेतु प्रस्थान।‌।*

शक्ति से मूर्छित लक्ष्मण हेतु संजीवनी लाने गये बजरंगबली के विलंबित होने पर व्याकुल रघुनाथ की दशा हृदय को द्रवित कर जाती है। यहां भी आनुप्रासिक छटा शिखर छू लेती है।

*विपत्ति विचारि विचारि विलंबा, रक्ष रक्ष जगती जगदंबा।*

*लगहिं शक्ति सौमित्र हिय, कपिदल अबल अधीर।*
*दौड़हिं विलखि विक्षिप्त मति, गिरत परत रघुवीर।।*

मर्माहत करने वाली उपरोक्त पंक्तियाॅं प्रस्तर हृदय को भी विचलित करने का सामर्थ्य रखती हैं। राम रावण युद्ध के समय भाषा, भाव, भंगिमा सब परिवर्तित हो जाती है।

*लड़हिं धुरंधर रूप प्रचंडा, डोलहिं धरा फटहिं ब्रह्माण्डा।*
*युद्ध भयंकर अति घनघोरा, गगनहिं होहिं ॲंन्हार ॲंजोरा।*

अंत में मारुति नंदन का आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति समग्र समर्पण, पुस्तक को संपूर्णता के साथ-साथ सार्थकता से संपृक्त कर जाता है।

*चंचल चित सुवीर बजरंगी, रहहिं सदा रघुपति अनुषंगी।*

*भय विपत्ति बाधा हरहिं, राम नाम सत्संग।*
*करहिं मनोरथ पूर्ण सब, महावीर बजरंग।।*

मेरी दृष्टि में श्री रामचरितमानस की तरह, यह लघु ग्रंथ भी धर्मोपासकों, अध्येताओं, एवं साधकों के समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला, समुचित शांति एवं सद्गति प्रदान करने वाला है।

अंतिम पृष्ठ पर रामदूत के प्रति चार पंक्तियों का अनुपम छांदस मुक्तक, भक्ति एवं समर्पण से परिपूर्ण, पूजा में प्रतिदिन उपयोज्य दोनों आरतियां भी विलक्षण हैं।
समग्र भक्तिभाव एवं साधना से समृद्ध कवि श्री विजय प्रताप शाही जी की समर्थ लेखनी से नि:सृत इस दैवीय लघु ग्रंथ को साहित्य एवं आध्यात्म में सर्वोच्च स्थान की कामना करता हुआ, सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश से यह अकिंचन हरि नाथ शुक्ल 'हरि' गौरवान्वित एवं सम्मानित अनुभव कर रहा है। श्री हनुमंत प्रकाश का प्रकाश चतुर्दिक प्रकीर्णित हो। जय श्री हनुमान। जय जय श्री हनुमंत प्रकाश 🌹

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जीवन का दूसरा नाम ही #संघर्ष है, जहाँ कठिनाइयाँ बिना किसी पूर्व सूचना के दस्तक देती हैं। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि कोई भी मार्ग पूरी तरह निष्कंटक नहीं होता। कठिनाइयाँ अक्सर हमें कमजोर करने नहीं, बल्कि हमारी #आंतरिक_शक्ति और क्षमताओं को निखारने आती हैं। जब हम किसी बड़ी बाधा का सामना करते हैं, तो प्रारंभिक प्रतिक्रिया भय या हताशा की हो सकती है, लेकिन यही वह क्षण होता है जहाँ हमारे चरित्र की #परीक्षा शुरू होती है। समस्याएँ दरअसल वे पत्थर हैं जिनसे हम या तो दीवार खड़ी कर लेते हैं या फिर अपनी सफलता के लिए पुल का निर्माण करते हैं।
​इन चुनौतियों से पार पाने का सबसे पहला उपाय है अपनी #सोच में बदलाव लाना। जब हम समस्या को 'अंत' के बजाय एक '#अवसर ' के रूप में देखना शुरू करते हैं, तो समाधान के रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं। मानसिक स्पष्टता के लिए यह जरूरी है कि हम पूरी #समस्या को एक साथ देखकर घबराने के बजाय, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट लें। जब हम एक-एक कदम आगे बढ़ाते हैं, तो वह पहाड़ जैसी कठिनाई भी धीरे-धीरे छोटी लगने लगती है। धैर्य और निरंतरता वे दो अस्त्र हैं, जो सबसे कठिन समय में भी व्यक्ति को टूटने नहीं देते।
​इसके साथ ही, #कठिनाई के समय स्वयं पर #विश्वास बनाए रखना अनिवार्य है। अक्सर बाहरी बाधाओं से ज्यादा हमारी आंतरिक शंकाएँ हमें नुकसान पहुँचाती हैं। अपनी पिछली सफलताओं को याद करना और खुद को यह समझाना कि "यह समय भी बीत जाएगा", मन को #शांति प्रदान करता है। #सहायता माँगने में संकोच न करना भी एक बुद्धिमानी भरा कदम है; कभी-कभी दूसरों का #नजरिया हमें वह समाधान दिखा देता है जिसे हम तनाव में देख नहीं पा रहे थे। अंततः, कठिनाइयों से पार पाने का अर्थ केवल समस्या का #समाधान करना नहीं है, बल्कि उस प्रक्रिया में एक बेहतर और अधिक अनुभवी #इंसान बनकर उभरना है।

@ डाॅ.विजय प्रताप शाही विशेन

#जय_श्रीराम #लेख #भक्तिभाव #गोरखपुर #गुरु_गोरक्षनाथ

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गाँव :-
#गाँव की #कहानी दरअसल #समय के उस पुल की तरह है जिसके एक छोर पर कच्ची पगडंडियाँ हैं और दूसरे छोर पर बदलती #आधुनिकता की पदचाप। अतीत का वह गाँव जहाँ शाम होते ही ढिबरी की मद्धम #रोशनी में बच्चे पहाड़े याद करते थे और जहाँ पूरा गाँव एक ही कुएं के ठंडे पानी से अपनी #प्यास बुझाता था, आज वह यादों के झरोखे से निकलकर एक नई शक्ल अख्तियार कर चुका है। पहले जहाँ सूचनाओं का माध्यम केवल डाकिए का थैला हुआ करता था और अपनों की खबर पाने के लिए हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था, आज उसी गाँव की #चौपाल पर बैठे बुजुर्ग के हाथ में #स्मार्टफोन है जो वीडियो कॉल के जरिए सात #समंदर पार बैठे अपने पोते से सीधे जुड़ा हुआ है। यह #अतीत और #वर्तमान का वह संगम है जहाँ बैलगाड़ियों की जगह ट्रैक्टरों ने ले ली है और खपरैल के छप्पर अब #कंक्रीट की छतों में तब्दील हो गए हैं।
​अतीत के उस दौर में #खेती सिर्फ एक #व्यवसाय नहीं बल्कि #जीवन जीने की एक पद्धति थी, जहाँ हल की मुठिया थामे #किसान बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर खुश हो जाता था। आज वर्तमान के दौर में खेती में आधुनिक तकनीक और मशीनों का प्रवेश हो गया है, जिससे #मेहनत भले ही कम हुई हो, लेकिन वह सामुदायिक #श्रम की मिठास कहीं ओझल सी होने लगी है। पहले #फसल कटने पर पूरा गाँव एक-दूसरे की मदद के लिए उमड़ पड़ता था, जबकि आज #हार्वेस्टर मशीनों के शोर में वह आपसी मेल-जोल थोड़ा सिमट गया है। फिर भी, बदलाव के इस झंझावात में गाँव की #आत्मा ने खुद को बचाए रखा है। आज भी जब #शहर की भागदौड़ से थककर कोई #युवा अपने पैतृक घर लौटता है, तो उसे वही पुरानी #नीम की #छाँव मिलती है जो कल भी वैसी ही #शीतल थी और आज भी वैसी ही है।
​वर्तमान का गाँव अब शिक्षा और सुविधाओं की ओर कदम बढ़ा रहा है; जहाँ पहले #बेटियाँ सिर्फ चौके-चूल्हे तक सीमित थीं, वहीं आज वे गाँव की पक्की सड़कों पर #साइकिल दौड़ाकर स्कूल जा रही हैं और देश के #भविष्य की इबारत लिख रही हैं। पहले जो बीमारियाँ #अभिशाप मानी जाती थीं, अब उनके लिए गाँव में ही छोटे #अस्पताल मौजूद हैं । जहाँ अंधेरी गलियों की जगह #बिजली से जगमगाती गलियों ने ले ली है । अतीत की वह #मासूमियत और वर्तमान की यह सुगमता मिलकर एक ऐसे 'नए गाँव' का #निर्माण कर रही हैं जहाँ जड़ें पुरानी हैं लेकिन टहनियाँ नए #आसमान को छूने की हसरत रखती हैं। यह सफर बदलाव का है, प्रगति का है, पर सबसे बढ़कर यह उस निरंतरता का है जो हमें याद दिलाती है कि हम चाहे कितनी भी ऊँची इमारतें खड़ी कर लें, हमारा सुकून आज भी उसी मिट्टी की सोंधी महक में बसा है जिसे हम 'गाँव' कहते हैं ।

@ डाॅ.विजय प्रताप शाही

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