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New bites

एक धरती थी — सबकी,
अब हर टुकड़ा किसी भगवान का इलाका है।
हर भगवान के पीछे
एक भीड़ है,
हर भीड़ के पीछे
डर की कोई पुरानी कहानी।

कहते हैं — हम धर्म की रक्षा कर रहे हैं,
पर असल में
अपने भ्रम की दीवारें रंग रहे हैं
खून से।

कोई “हम” कहता है, कोई “तुम”,
कोई “सत्य” कहता है, कोई “शत्रु”।
और इस खेल में
मनुष्य गुम है —
वह अब सिर्फ़ प्रजाति है,
जिसे दूसरे प्रजाति से डर लगता है।

शहीद अब सत्य के लिए नहीं मरता,
नाम के लिए मरता है।
देश अब सीमा नहीं,
एक चौखट है डर की।

यह कलियुग नहीं,
हमारे मन का आईना है —
जहाँ इंसान बनने की हिम्मत
सबसे कठिन साधना बन गई है।
अज्ञात अज्ञानी

bhutaji

🙏🙏सुप्रभात 🙏🙏
आपका दिन मंगलमय हो

sonishakya18273gmail.com308865

Thanks to Matrubharti

kattupayas.101947

ममता गिरीश त्रिवेदी की कविताएं
कविता का शीर्षक है! संवेदना ज्ञान धारा

mamtatrivedi444291

Good morning friends have a great day

kattupayas.101947

तुमने मांगा हमने ला दिया
एक अहसान था जो चुका दिया

तुमसे नजर ना मिले अब शायद
इतना पराया हमे बना दिया

एक अहसास था तेरे होने का
नाजाने किसने भूला दिया

एक महक आयी तेरी ओर से
शायद तूने अतर बहा दिया

क्या नूर है तेरी हुस्न का
ये चांद को हरा दिया

किताबी थी खाली पन्नो की
तुमने ये क्या लिखवा दिया

हमतो बेहद समझदार थे
हमको ये कहा उलझा दिया

क्या करू तुम्हारा अब
हमको ये कहा पहुंचा दिया

कोई मजनू कहे कोई आवारा
तुमने हमको ये क्या बना दिया .

mashaallhakhan600196

“भारतीय वैश्य ग्लोबल फ़ाउंडेशन”, द्वारा आयोजित भव्य सम्मान समारोह में जाने का मौक़ा मिला.Bhartiya Vaishya

piyushgoel6666

Goodnight friends

kattupayas.101947

उस रात मैं भी वहाँ था
मैं उस रात किनारे पर था।
पत्रकार मावी ने जिस आवाज़ का ज़िक्र किया है, मैंने भी उसे सुना था।
लहरें किनारे से टकरा रही थीं, लेकिन हवा में एक सुर था — किसी औरत के गीत जैसा, दुखभरा और दूर।
लोग बोले, "हवा का खेल है", पर मैं कसम खाता हूँ, वो आवाज़ सच थी।

समंदर की सतह पर एक रोशनी चमकी।
जैसे पानी ने आग को छुपा रखा हो।
शायद वो अफ़साना था, शायद सच्चाई।
पर उस पल, सब चुप हो गए... क्योंकि समंदर भी सुन रहा था।

mavi207269

मैं हूँ पत्रकार Mavi।
मैं सच्चाई की तलाश में हूँ।
उस रात... हर रात जैसी नहीं थी।
लहरें शांत थीं, मगर उनमें कुछ जल रहा था — जैसे समंदर ने खुद साँस रोक ली हो।

हवा ने एक नाम फुसफुसाया — “जलपरी।”
लोग हँसे, मगर मैंने वो आवाज़ सुनी।

मुझे नहीं पता वो कौन थी...
पर एक दिन सब सुनेंगे।
क्योंकि कुछ सच्चाइयाँ पानी में भी जलती हैं।

mavi207269

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rajukumarchaudhary502010

✧ जब सरलता ईश्वर थी ✧

१. प्रारंभ — जब मनुष्य के पास विज्ञान नहीं था

एक समय था जब मनुष्य के पास विज्ञान नहीं था,
पर उसके भीतर एक स्वाभाविक विज्ञान था —
धर्म उसके जीवन का हिस्सा था, पर वाद नहीं।
वह आकाश को देखता और झुक जाता,
धरती को छूता और कृतज्ञ होता।
वह जानता नहीं था, पर महसूस करता था।

तब कोई “धनवान” या “गरीब” सच में अलग नहीं थे —
फर्क बर्तन का था, भोजन का नहीं।
सबका चूल्हा एक ही तरह जलता था,
और जलने की गर्मी सबके चेहरों पर समान चमक देती थी।

मनुष्य के पास न स्वप्न थे, न कल्पनाएँ।
वह भविष्य में नहीं, वर्तमान में जीता था।
जो था, वही जीवन था — न कोई अमेरिका, न कोई परलोक।

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२. जब विज्ञान आया, धर्म व्यापार बन गया

विज्ञान ने बाहर का रहस्य खोला,
पर भीतर का मौन छीन लिया।
सोचना शुरू हुआ, तुलना शुरू हुई,
और साथ ही “अधिक पाने” की दौड़ भी।

अब गरीब चल रहा है,
धनवान उड़ रहा है।
पर उड़ने वाला भी चैन से नहीं सोता,
और चलने वाला भी भीतर से खाली है।

धर्म ने यह देखा और बाज़ार की भाषा सीख ली।
अब साधना भी बिकती है,
भक्ति भी पैक होकर मिलती है।
मंत्र, तंत्र, यंत्र — सब उपलब्ध हैं,
बस आत्मा अनुपलब्ध है।

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३. जब स्वप्न ने आत्मा की जगह ले ली

आज हर व्यक्ति के पास स्वप्न हैं —
अमीर बनने के, विदेश जाने के,
मशहूर होने के,
या मृत्यु के बाद किसी स्वर्ग में पहुँचने के।

अब साधना का लक्ष्य आत्मा नहीं,
स्वप्न है।
धर्म उसे बेहतर परलोक का सपना देता है,
और विज्ञान बेहतर जीवन का।
दोनों बाहर हैं —
भीतर कोई नहीं।

मन अब न रुकता है, न सुनता है।
साधना खो गई,
क्योंकि लक्ष्य खो गया।

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४. आज का धर्म — कर्मकांड की जड़ में फँसा हुआ

अब धर्म केवल कर्म में बचा है,
आत्मा उसके शब्दों में।
भक्ति अब मंच पर होती है,
साधना अब प्रदर्शन है।
लोग प्रवचन खरीदते हैं,
शांति नहीं।

नेता और अभिनेता दोनों संत बन जाते हैं,
क्योंकि जनता को अब सत्य नहीं, प्रभाव चाहिए।
विश्वास अब बुद्धि से नहीं, भीड़ से तय होता है।

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५. और तब प्रश्न उठता है —

क्या अब भी आध्यात्मिक विकास संभव है?
हाँ — पर अब यह सामूहिक नहीं होगा।
अब यह व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
सच्ची साधना अब वही कर सकता है
जो अपनी “प्राप्ति की भूख” को देख सके
और उससे परे जा सके।

अब धर्म मंदिर में नहीं,
स्वयं की ईमानदारी में है।
अब गुरु मंच पर नहीं,
अपने भीतर की दृष्टि में है।

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निष्कर्ष

धर्म कभी विधि नहीं था — वह जीवन की लय थी।
विज्ञान ने बाहरी सत्य दिया,
पर भीतर की ऊँचाई अब भी उसी मौन की प्रतीक्षा में है
जिसे पहले मनुष्य सहज जानता था।

अब प्रश्न यह नहीं कि ईश्वर है या नहीं —
प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य अब भी महसूस कर सकता है?

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✍🏻 🙏🌸 — 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲

bhutaji

Good evening friends

kattupayas.101947

मै चला था उस मंजिल की तरफ जहां मेरी सब को जरूरत थी ।लेकिन जब अपने ही मेरे दुश्मन बने तो वापिस कदम जन्म देने वाली मां की तरफ लौट आए, ।
करता भी क्या मै , जुल्म जो मेरी मेरी मां पर हो रहे थे ।इस लिए बड़े भाइयों ने कहा जा यहां हम है ना, जिसने 9 महीने पेट में रखा तुझे आज उस पर आंच आई है ।
मेरे पास शब्द नहीं थे उन मां के लालों के लिए जिन्होंने मुझे मां के आंचल में वापिस भेज दिया और खुद रह गए , तिरंगे की शान में ।

जय हिंद,

mystory021699

jab ajay ne se pucha
vidyut se ki kaisi
dikhti hai meri
bhabhi?

tab vidyut ne muskurate hue kaha

Jise dekh ke aakhe moh
Gayi
awaj sunn
Dil ki dhadkan
Badh jaati hai
Nazar voh jisse
Dekh duniya ruk
Gayi
Tu voh yaad
Hai jisne iss
Yaad kar dil
Tham jaata hai

Tu woh hai
Jisne har pal
Bin na bole
Saath diya
Tu hai toh
Aasu kya hota
Hai bhul jaati hai

Bhale hi tujhe
Mein yaad nhi
Raghav yaad nhi
Par iss vidyut ne
To tujh mein hi
Apni duniya basa
Rakhi hai

Kyuki to koi kahani
Nhi ek sach hai
Mera sach
Meri sanghavi
meri poori kahani
hai teri bhabhi
meri sanghavi


poem by- gunjangayatri

gunjangayatri949036

বাস্তব জীবন

বিতান

নদীর বুকে পিউ পিউ করে পাখি ডাকে,
শন শন বাতাসে যেন আঁকড়ে ধরে রাখে।
বিকেলের মিষ্টি আবহাওয়া,
নদীর স্রোতে ভেসে যাওয়া জীব—
নতুন দিনের সৃষ্টির জীব।

নদীর বুক থেকে শোনা যাচ্ছে
মানব সভ্যতার গান।
তাইতো আমরা সিন্ধু নদীর তীর থেকে
পেয়েছি হিন্দুস্থান;
তাইতো ভারতবর্ষের আরেক নাম হিন্দুস্থান।

পড়ে যাক আমার লেখা—
থাকবে চিরকাল।

bitanmondal119526

✍️❤️

muskanbohra.650058

*"बहुत याद आते हैं बचपन के दिन"*

बहुत याद आते हैं बचपन के दिन,
वो काग़ज़ की कश्ती बना के पानी में बहाना,
बेमौसम बारिश में भीग जाना,
और फिर मम्मी की डांट से मुस्कुराना।

वो रंग-बिरंगे पतंग खुद से बनाना,
धागों में मनझा लगाकर छत पर चढ़ जाना,
"वो काटा!" की आवाज़ में जीत का जोश,
हर आसमान अपना लगता था उस दोपहर।

बहुत याद आते हैं बचपन के दिन…

वो लट्टू को घुमा-घुमा कर देखना,
काँच के कंचों में सारी दुनिया समेट लेना,
नीम के पेड़ पर झूला डालकर,
हवा से बातें करना, सपने बुन लेना।

ना कोई फ़िक्र थी, ना कोई हिसाब,
हर दिन ईद, हर रात ख़्वाब।

बहुत याद आते हैं वो बचपन के दिन…
सच कहूं,
वक़्त तो बड़ा हो गया,
पर दिल… अब भी छोटा ही है कहीं।

*— Naina*

nainakhan1201

🌸 માતા – ઈશ્વરનો સર્વશ્રેષ્ઠ ઉપહાર 🌸
એક દિવસ 4 વર્ષનો બાળક પોતાની મમ્મી સાથે બજારમાં જતો હતો.
રસ્તા પર ચાલતો ચાલતો તે શરારત કરતો, વારંવાર મમ્મીનો હાથ છોડતો.

મમ્મીએ પ્રેમથી કહ્યું –
“બેટા, હાથ ન છોડ, પડી જાશે.”

ત્યારે નિર્દોષ બાળક તરત જ બોલ્યો –
“મમ્મી, હું નહીં પડું… કારણ કે તું છે ને!
તું મને ક્યારેય પડવા નહીં દે.”

nensivithalani.210365

मेरे खामोश और तन्हा रहने का मतलब ये नही
कि मे हकीकत से अनजान हूँ
बस हर किसी से रूबरू होना मेरी फितरत नही .

mashaallhakhan600196

👌✍️👌

monaghelani79gmailco