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skptech

एक ऐसे इंतजार जो खत्म हो चुकी है
फिर लौट है कोई उसके इंतजार करने


गीत पार्ट 1
वह इंतजार जी

हु। हु हु। हु हु।

प्यार में जो घड़ी-घड़ी होती है
वह इंतजार जी




हु। हु। हु। हु हु हु। 2



आया मेरे बाद। आया मेरे बाद
आया मेरे बाद दीवाना। आया मेरे बाद मेरा दीवाना


आ। या मेरे बाद करने मेरा इंतजार जी

करने मेरे इंतजार। जी




हु।


तन्हा हमने उन्हें छोड़ कहां
तनहा तो हम थे लम्हा लम्हा रहा



आया वक्त वही हालत की
मैंने प्यार किया था
और कमी था उनकी इसी प्यार की


पेमहाल तो हो गई थी मैं
आपा में उसके भी कुछ ना रहा आज



हु हु। हु हु। हु। हु

वह दिन मेरे कल
यह दिन उसका आज
बराबर की लगी है दोनो तरफ आग


हां इसमें फर्क है बरसों की
जज्बातों की और जिंदे आशो की



हु। हु। हु। हु
लेनी आई फिर से मजाक पे गुमान से
तन्हाई जिंदगी मेरे बाद मेरे इंतजार जी




हा आ। हा। आ। हा आ

प्यार में जो घड़ी घड़ी होती है
वह इंतजार जी

हा हा। हा हु। हु। हु।


वे एतबार जी
आया मेरे दीवाने आया मेरे दीवाने
मेरे बाद करने मेरा इंतजार की


खुदा की खैर करूं
या उसके दर्द की दवा दूं

दर्द से भरा हो है खाक में मैं भी हूं



हु। हु। हु। 2
क्या फायदा एसी इंतजार की
जब उमरा वित ही गई तन्हा अकेली



आया सो साल बाद वे करने मुझे ही प्यार जी


आया 100 साल बाद वे




हु। हु। हु। हा आ। हा। आ। हा आ

जीवन वही वादा वही कसम वही खाए हजारों बार जी

होगा तुम्हें भी एक दिन मुझे जानिसार जी
आया मेरे बाद आया मेरे बाद
आया मेरे बाद मेरे दीवाने
आया मेरे बाद मेरा दीवाना करने मुझे से ही प्यार


हु। हु। हु। हु। हु। हु

abhinisha

શુભસંધ્યા
જય શ્રી રાધેકૃષ્ણ🙏🏻

falgunidostgmailcom

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rajukumarchaudhary502010

दिल की इस बेचैनी को सुकून के धागों में पिरो गई,,
आज ये शाम भी जाते जाते कितनी हसींन हो गई।।
❤️

nandiv

હું પૂછુ છુ સતત આ મારા દિલને
જે સુખ હું તને ના આપી શક્યો
એ સુખ તે બીજે થી શોધ્યું
તો એમા ખોટુ શુ છે?
હા જલન તો થાય છે પણ કરુ તોય શુ
જેવુ મેં કર્યું તેવુ જ મેં પણ પામ્યુ
તો એમા ખોટુ શુ છે?

amirali3796

“मैं आज की नारी हूँ  “

न सियासत की जंग मेरी है,  
न बँटवारे की कोई गुहार है।

न मैं सिपाही हूँ,  
न मैं बाग़ी हूँ।

मैं तो बस…  
आज की नारी हूँ।

और दुख इस बात का है,  
कि मैं आज में होकर भी  
आज में नहीं हूँ।

कहते हैं, ज़माना बदल गया है।  
मैं हर बार अपने चारों ओर देखती हूँ।

बदले हैं बस घर के रंग,  
दीवारों की पुताई,  
और सोच पर चढ़ा हुआ सभ्यता का नया पर्दा।

बंदिशें अब भी उतनी ही पुरानी हैं।

आज भी जब एक लड़की ज़रा-सा सिर उठाकर चलती है,  
तो सौ आँखें उसके कदम नहीं, उसकी औक़ात नापने लगती हैं।

उसकी आवाज़ उन्हें ऊँची लगती है,  
मगर उस पर उठते हाथ उन्हें कभी भारी नहीं लगते।

कोई नहीं देखता उसकी हथेलियों के छाले,  
जो रोटियाँ सेंकते हुए बने।

कोई नहीं देखता उसकी पीठ का दर्द,  
जो पूरे घर का बोझ ढोते-ढोते पत्थर हो गया।

हाँ… सबको दिखती है उसके होंठों की लाली।  
किसी को नहीं दिखता उसकी मुस्कान का रोज़-रोज़ मरना।

उसे हर मोड़ पर दायरे सिखाए जाते हैं।  
धीरे चलो। धीरे बोलो। धीरे हँसो। धीरे जियो।

इतना धीरे…  
कि एक दिन वह अपने ही सपनों की आवाज़ सुनना भूल जाए।

कहते हैं, “बेटियाँ घर की इज़्ज़त होती हैं।”  
मैं पूछती हूँ, इज़्ज़त होती हैं या इज़्ज़त का बोझ?

जिसे जन्म लेते ही मर्यादा की गठरी बनाकर कंधों पर रख दिया जाता है।  
जिस दिन वह पहली साँस लेती है,  
उसी दिन उसकी आज़ादी की पहली साँस छीन ली जाती है।

फिर पूरी उम्र उसे समझाया जाता है  
कि यह सब उसकी भलाई के लिए है।

किस भलाई की बात करते हो तुम?  
उस भलाई की जिसमें एक लड़की अपनी ही हँसी दबाकर जीती है?  
या उस भलाई की जिसमें वह हर बार अपने आँसू पोंछकर दूसरों की थाली परोसती है?

मुझे मत बताओ कि औरत देवी है।  
देवी बनाकर तुमने उसे इंसान होना ही नहीं दिया।

मुझे मंदिर नहीं चाहिए। मुझे बराबरी चाहिए।  
मुझे पूजा नहीं चाहिए। मुझे सुना जाना चाहिए।

मैं थक चुकी हूँ हर रिश्ते में खुद को साबित करते-करते।  
हर बार अपनी चुप्पी को संस्कार कहते-कहते।

अब अगर मेरी आवाज़ तुम्हें बग़ावत लगती है,  
तो हाँ… मैं बाग़ी हूँ।

अगर अपने हिस्से का आसमान माँगना गुनाह है,  
तो मैं गुनहगार हूँ।

अगर अपने शरीर, अपने सपनों, अपने फ़ैसलों पर अपना अधिकार माँगना तुम्हें ज़िद लगता है,  
तो यह ज़िद अब मेरी पहचान होगी।

याद रखना…  
जिस दिन औरत ने अपने भीतर दबी हुई सदियों की ख़ामोशी को एक साथ आवाज़ दे दी,  
उस दिन तुम्हारे बनाए हुए सारे दायरे मिट्टी की लकीरों की तरह पहली बारिश में बह जाएँगे।

मैं किसी क्रांति का चेहरा नहीं बनना चाहती।  
मैं बस इतना चाहती हूँ…  
कि अगली बार जब कोई बेटी जन्म ले,  
तो उसके कानों में पहला शब्द “रुक ” नहीं, “उड़” हो।

और जिस दिन हर लड़की बिना डर के अपना नाम अपनी आवाज़ में बोल सकेगी,  
उसी दिन समझना…  
मैं सचमुच आज की नारी बन गई हूँ।
 प्राची गुर्जर…..

prachitanwar111

यह एक भावनात्मक, सामाजिक और परिवार-केंद्रित नाटक है, जिसमें "घर-घर की कहानी" का दर्द और अंत में एक बड़ा संदेश है।

# **नाटक: "जीते जी अनदेखी, मरने के बाद देवी"**

### पात्र:

* माँ (सरस्वती)
* बड़ा बेटा
* बहू
* छोटा बेटा
* पड़ोसी
* पुजारी

---

### दृश्य 1: रसोई

(माँ सुबह से खाना बना रही है।)

**माँ:** बेटा, खाना तैयार है।

**बेटा (मोबाइल देखते हुए):** रोज़-रोज़ वही खाना! कुछ अच्छा नहीं बनता?

**बहू:** मम्मी जी, आपसे अब काम भी ठीक से नहीं होता। रहने दीजिए।

माँ चुपचाप आँसू पोंछकर रसोई में चली जाती है।

---

### दृश्य 2: बीमारी

माँ को तेज़ बुखार है।

**माँ:** बेटा... डॉक्टर के पास ले चलो।

**बेटा:** अभी ऑफिस जाना है।

**बहू:** दवाई रखी है, खा लीजिए।

माँ अकेली चारपाई पर लेटी रहती है।

---

### दृश्य 3: मृत्यु

एक सुबह पड़ोसी दौड़ते हुए आते हैं।

**पड़ोसी:** अरे... सरस्वती दीदी नहीं रहीं...

पूरा घर रोने लगता है।

---

### दृश्य 4: तेरहवीं

बड़ा फोटो, फूलों की माला, पंडित मंत्र पढ़ रहे हैं।

**पुजारी:** माता समान कोई नहीं। इनके नाम पर दान कीजिए।

बेटा फूट-फूटकर रोता है।

**बेटा:** माँ... एक बार वापस आ जाओ। मैं आपकी बहुत सेवा करूँगा।

---

### अंतिम दृश्य (संदेश)

स्टेज पर धीमी रोशनी।

**आवाज़ (Narrator):**

> **"यही हर घर की कहानी है।**
> **जीते जी माँ की बात कोई नहीं सुनता,**
> **और मरने के बाद उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाता है।**
> **माँ को भगवान मत बनाइए...**
> **उन्हें जीते जी सम्मान और प्यार दीजिए।"**

**समाप्त।**

skptech

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#humanity #humanityfirst #helpingothers #helpothers #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

💯✅

monaghelani79gmailco

कहाणी”भांड्या कुंड्यांची !!

पातेली ,सतेली ,तामली,डेचकी ,तपेली,वेड भांडे ,तसराळी,घमेले ,गडू, तांब्या ,टीप,पिपं,घागर ,बादली,हंडा कळशी ,किती तरी अशी नावे भांड्यांची .भांडीकुंडी म्हणजे बाईचा जिव्हाळ्याचा विषय !स्वयपाकात रमणारी बाई भांड्यावर खूप प्रेम करते .
भांड्याना प्रेमाने हाताळते .मला सुद्धा वेगवेगळया प्रकारची भांडी खूप आवडतात .घरात खूप भांडी असली तरी भांड्यांच्या दुकानात गेले की भांड्यांच्या प्रेमात पडायला होतच !
आणि मग खरेदी अटळ!!!
माझ्या आजीला एक वेगळ्या घाटाच घरातल भांड खूप आवडत असे .
ते तिच्या नेहेमी वापरात असे.
ती त्याला प्रेमाने वेडे भांडे म्हणत असे .😃आणि स्वत घासून पुसून ठेवत असे .
.स्वयपाक घर पूर्ण तिच्या ताब्यात असे
तीच सर्व स्वयंपाक करीत असे
स्वयंपाकाची तयारी आणि जेवण झाल्यावरची
घरची सारी खरकटी भांडी तिच्या सुनां घासत असत
मात्र भांडी घासून झाली की ती सुती कापडावर पालथी घालणे व नंतर स्वच्छ पुसून लावून ठेवणे हे काम ती स्वतः करीत असे .
अशा वेळेस ती ज्या प्रेमाने भांड्यांना हाताळत असे ते पाहायला मला खूप आवडे .
आणि मग तिच्या पद्धतीने भांडी आवरून झाली की नेहेमी एक प्रेमळ कटाक्ष फडताळा कडे टाकत असे ..
आजोबांना पाणी नेहेमी तांब्याच्या तांब्या भांड्यात लागे
ते तांब्यां भांडे भरून ठेवल्या खेरीज जेवायला बोलवायचे नाही अशी त्यांची सक्त ताकीत असे .
भात करण्या साठी पूर्वी वरून उभे व खाली खोल असे मोठे भांडे असे .
भातावर छान वाफ आली की ते भांडे झाकून चुली वरील थोड्या निखार्यावर ठेवले जात असे .
हा भात दिवस भर गरम रहात असे .
भातावर ची पेज मीठ आणि तूप घालून प्यायला मला खूप आवडत असे .
ती पेज प्यायची माझी एक खास पसरट ताटली होती .तिला “पितळी “म्हणले जायचे
आईच्या माहेरी म्हणजे माझ्या आजोळी मात्र वेगळा प्रकार होता .
आजीचा सतरा खोल्यांचा वाडा होता पण आर्थिक परिस्थिती खुप गरिबीची होती .
तशात आजोबा कित्येक वर्ष अंथरुणाला खिळून होते त्यामुळे घरचे भागताना नाकी नऊ येत.
आजीला भांड्यांची खुप आवड पण पूर्वीची बरीचशी लहान मोठी भांडीआर्थिक अडचणी मुळे बाजारात विक्रीला गेली ..
त्यामुळेतिला खूप हळहळ वाटे ..
आंघोळीचे पाणी तापवायचा मोठा तांब्याचा हंडा जेव्हा विकावा लागला त्या दिवशी ती जेवली नाही
“बघ ना ग वाड्यात खोल्या सतरा पण घरात मात्र सतरा भांडी पण नाहीत !!
असे ती नेहेमी म्हणत असे ..
मी लहान होते ..अशा वेळी काय बोलावे सुचत नसे मला ..
माझ्या आजीप्रमाणे आईला पण भांडी कुंडी प्रकारात खूप रस होता .वेगवेगळी भांडी ती नेहेमी खरेदी करीत असे .
पण घर दोन खोल्यांचे त्यामुळे तिची थोडी कुचंबणा होत असे .
घरात मध्यम आकाराचे स्टील चे पिप असावे अशी तिची खुप
इच्छा होती .
पण त्याची किंमत तेव्हा बजेट बाहेर होती .
आई तिळाचा काटेरी हलवा खूप उत्तम बनवत असे .
तिला एका दुकानातून हलवा करायची ऑर्डर मिळाली होती
रोज पहाटे उठून दोन तास ती हलवा तयार करीत असे .
नंतर घरचे अवरून नोकरीला जात असे.
हे हलव्याचे काम खरेतर खूप किचकट होते .
पण ते तिने आनंदाने पार पाडले
आणि जवळ जवळ चाळीस किलो हलवा संक्रांति आधी दुकानात करून दिला
आणि आलेल्या पैशातून तिला हवे तसे पाण्याचे स्टील चे पिंप आणले होते
खुप आनंद झाला होता तेंव्हा तिला ..
वडीलांना पण खुप कौतुक वाटले होते तिचे !!
आईचा प्रत्येक भांड्यावर जीव होता .मोलकरणी ला अथवा शेजारणी ला भांड्यातून काही घालून दिले
तरी ते भांडे पुन्हा परत आल्या खेरीज तिला चैन नसे .
आईकडे चार कुकर होते वेगवेगळया आकाराचे आणि प्रकाराचे
माझा मुलगा पुण्यात शिकायला गेला तेव्हा त्याला वरण भात घरी शिजवायला कुकर हवा होता .
तसा कुकर आईकडे होता म्हणून मी थोडे दिवसा साठी मागितला
पण तिचा जीव होता ना त्यात .......!
मग तिने चक्क नकार दिला मला !!!
तुपाचे चांदीचे भांडे घेण्याची आईची इच्छा मात्र शेवट पर्यत अपुरीच राहिली ....
मी तसे भांडे घेतले तेव्हा आईच्या आठवणीने डोळ्यातले पाणी थांबेना
पूर्वी लग्नात मुलीला सासरी पाठवताना तिच्या आवडीची व तिला उपयोगी असणारी भांडी दिली जात .
शिवाय घरचे नातेवाईक पण केळवण करताना तिला काही भांडी हवीत का असे आवर्जून विचारत असत .
या भांड्याना लग्नात “रुखवत* असे संबोधले जात असे
या भांड्यात “लंगडा “बाळकृष्ण व देवी “अन्नपूर्णा “ याना विशेष स्थान असे
लग्नात मांडलेल्या रुखवता वरून मुलीच्या सासरचे तिच्या घरच्या परिस्थितीचा अंदाज घेत .
माझ्या लग्नात आईने आणि इतरांनी बरीच भांडी दिली होती
पण स्वतंत्र संसाराला ती थोडी अपुरी होती ....
मग गुपचूप साठवलेल्या पैशातून मी आणि माझ्या भावी पतींनी काही खास भांड्यांची खरेदी केली होती !!
माझ्या मुलाच्या लग्नात मुलीकडून काहीच घ्यायचे नाही असे आम्ही ठरवले होते
पण सुनेच्या नातेवाईका ना रुखवत मांडायची खूप हौस !!
रुखवत मांडला म्हणजे तो घेतला असे समजले जाते
त्यामुळे तिच्या नातेवाइकांना रुखवत मांडण्यास आम्ही निक्षून नकार दिला
आणि तिला हवी तशी आणि हवी तेवढी भांडी मी स्वतः घेवून दिली .
आणि तिचा संसार "सजवून" दिला !!
सासुबाई आमच्या घरी राहायला आल्या तेव्हा येताना त्यांची काही भांडी घेवून आल्या होत्या .
ज्यांच्या शिवाय त्यांना स्वयंपाक कारणे अशक्य वाटायचे 🙂🙂
त्यांची पळी, गडू, वेलदोडा कुटायचा खलबत्ता ,दोन चार थाळ्या वगैरे भांडी अजून माझ्या कडे आहेतच.
एक छोटा डाव ज्याला एक डाग दिला होता.
तो वापरायला त्याना खूप आवडत असे
अजूनही तो डाव हातात घेतला कि त्यांची आठवण होते
तांदळाची उकड करायचे त्यांचे खास पातेले होते ...मी पण अजून त्याच पातेल्यात उकड करते
आईच्या मृत्यु नंतर तिची सर्व भांडी आम्ही गरीब आणि गरजू लोकांना देवून टाकली
पण काही खास भांडी मात्र मी आणि माझ्या वहिनीने आईची आठवण म्हणून ठेवून घेतली
त्यात आईने शेवटी शेवटी खरेदी केलेला एक कडीचा स्टीलचा डबा मी ठेवून घेतला .
त्यात आम्ही काही वेगळा खाऊ ठेवतो आणि त्याला *आईचा डबा* असेच संबोधतो !
मी माझ्या संसारातील भांड्याचे सेट नेहेमी बदलत असते आणि जुने सेट ओळखीच्या गरजू माणसाना देवून टाकते .
काही दिवसा पूर्वी ओळखीच्या एका मित्राने त्याच्या घरच्या लोकांच्या मनाविरुद्ध लग्न केले
मग त्या जोडीला माझ्या कडे असलेली आणि वेगळी ठेवलेली नवी जुनी भांडी दिली .
जोडी अगदी खुष होवून गेली
आता त्यांच्या संसारात तर बरीच भांडी आलीत
पण तरीही स्वयंपाक करताना तुमची आठवण येते असा मित्राच्या बायकोचा फोन नेहेमी असतो
पूर्वी तांब्या पितळेची भांडी मोडीत घालुन संसारातील “अडचणी “सोडवल्या जात
पितळी आणि तांब्याच्या भांड्यात पाणी साठवल्या मुळे पाण्यातील जंतू मरतात
पितळी भांड्यांना महिना दोन महिन्याने कल्हइ करावी लागत असे .
या कल्हइ तील संयुगा मुळे रोगप्रतिकारक शक्ती वाढते आणि शुक्र जंतूंचा पण संकर होतो

अशी ही भांडी कुंडी आणि त्याला निगडीत माणसांच्या आठवणी ची साठा उत्तराची कहाणी पाचा उत्तरी सफळ संपूर्ण

jayvrishaligmailcom

🌞उपवास स्पेशल
🌞वरईची (वरी) खीर

🌞साहित्य
अर्धी वाटी वरई
अर्धा लिटर दुध
एक चमचा तूप
काजूआठ दहा
वेलदोडे पुड
साखर अर्धी ते पाऊण वाटी

🌞कृती
प्रथम वरई धुवून भिजत ठेवावी
तासभर भिजल्यावर
एका सुक्या कपड्यावर पसरवून कोरडी करावी
काजूची मिक्सर जाडसर भरड करून घ्यावी
वरई पूर्ण कोरडी झाली की
पॅन मध्ये तूप घालून भाजायला घ्यावी
एकीकडे दूध गरम करायला ठेवावे
वरई मंद आचेवर खरपूस भाजली की
त्यात काजू पावडर टाकून परतावे
त्यानंतर एक वाटीभर पाणी घालून झाकण ठेवावे व वरई शिजवून घ्यावी
(कुकरला शिट्टी करून सुद्धा शिजवता येईल)
नंतर झाकण काढून त्यावर त्यावर गरम दूध घालून आवडीनुसार साखर घालावी
खीर चांगली उकळू द्यावी
गॅस बंद करुन वेलदोडे पावडर घालावी
काजू पावडर घातल्याने खीर घट्ट होते व चांगला स्वाद येतो
आवडीनुसार दूध वाढवून खीरीचा दाटपणा कमीजास्त करता येतो

jayvrishaligmailcom

“मैं देखना चाहती हूँ…  “

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हारी मुस्कान के बाद तुम्हारी पलकों का धीरे से झुक जाना,  
जैसे किसी ने चाँद को शर्माना सिखा दिया हो।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हारी आँखों को बिना कुछ कहे मुझसे घंटों बातें करते हुए,  
कि शब्दों की उम्र छोटी होती है, नज़रों की नहीं।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हारे माथे पर उभरती वे मासूम-सी लकीरें,  
जो हर बार तुम्हारे कुछ सोचने पर और भी ख़ूबसूरत हो जाती हैं।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हारी उँगलियों को मेरे बालों में उलझते हुए,  
जैसे कोई पुरानी किताब बरसों बाद फिर से खोली गई हो।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हारा मेरा नाम लेना, उस तरह…  
जैसे पुराने ज़माने में लोग मोहब्बत नहीं, इबादत पुकारा करते थे।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हें चलते हुए, ज़रा-सा धीरे, ज़रा-सा ठहरकर,  
ताकि रास्ते भी समझ सकें कि साथ किसे कहते हैं।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हें मुझे देखते हुए, बिना किसी वजह, बिना किसी सवाल,  
सिर्फ़ यूँ… जैसे कोई अपनी सबसे प्यारी चीज़ को यक़ीन से देखता है।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हारी हँसी के बाद तुम्हारी ख़ामोशी,  
क्योंकि मुझे लगता है, तुम्हारी चुप्पी भी मुझसे मोहब्बत करती होगी।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हारे हाथों की लकीरों में अपना कल नहीं, अपना सुकून।  
क्योंकि उम्र तो सबके साथ बीत जाती है, ज़िंदगी बहुत कम लोगों के साथ।

मैं देखना चाहती हूँ…  
कि किसी दिन जब मैं आईने के सामने खड़ी रहूँ,  
तो मेरे चेहरे से पहले तुम्हारी नज़र मेरी थकान पढ़ ले।

मैं देखना चाहती हूँ…  
तुम्हें उसी तरह, जैसे पुराने ज़माने की मोहब्बतें देखती थीं।  
कम कहा जाता था, ज़्यादा निभाया जाता था।

और आख़िर में…  
मैं देखना चाहती हूँ…  
कि एक दिन जब मेरी उम्र मेरे बालों में उतर आए,  
तब भी तुम मुझे उसी पहली मुस्कान की तरह देखो,  
जिस दिन हम पहली बार मिले थे।

प्राची गुर्जर…..

prachitanwar111

“क्या हो अगर…  “

क्या हो अगर…  
किसी रोज़ तुम फिर से मिल जाओ,  
और मेरी आँखें तुम्हें पहचान लें,  
मगर मेरा दिल तुम्हें अपना कहने से इंकार कर दे।

क्या हो अगर…  
तुम बिल्कुल सामने खड़े हो,  
और हमारे बीच बस एक साँस भर की दूरी हो,  
फिर भी सालों जितनी ख़ामोशी खड़ी रहे।

क्या हो अगर…  
मैं तुम्हारा नाम पुकारना चाहूँ,  
और आवाज़ गले तक आकर हर बार लौट जाए।

क्या हो अगर…  
तुम मुस्कुरा दो, वैसे ही जैसे कभी मुस्कुराया करते थे,  
और मैं उस मुस्कान के पीछे छिपा हर झूठ देख लूँ।

क्या हो अगर…  
तुम कहो, “मैंने कभी तुम्हें दुख देना नहीं चाहा।”  
और मेरा दिल धीरे से पूछ बैठे, “फिर ये ज़ख़्म इतने पुराने कैसे हैं?”

क्या हो अगर…  
तुम्हारी आँखें आज भी वैसी ही हों,  
मगर उनमें मेरे लिए एक पल भी न ठहरा हो।

क्या हो अगर…  
मैं तुम्हारे बिल्कुल पास बैठी रहूँ,  
और पहली बार समझूँ, फ़ासले मीलों से नहीं, बदलते दिलों से बनते हैं।

क्या हो अगर…  
तुम्हारे सारे सच बहुत देर से सामने आएँ,  
और मैं सोचती रह जाऊँ, मैंने उम्र किस बात पर यक़ीन करके गुज़ार दी।

क्या हो अगर…  
जिसे मैं मोहब्बत समझती रही,  
वह तुम्हारे लिए बस एक गुज़रता हुआ मौसम था।

क्या हो अगर…  
तुम्हारे जाने का दुख तुम्हारे झूठ से छोटा निकले।  
क्योंकि बिछड़ने से ज़्यादा यक़ीन का मर जाना इंसान को तोड़ देता है।

क्या हो अगर…  
तुम लौट भी आओ, और मैं तुम्हें माफ़ भी कर दूँ।  
लेकिन… मेरे भीतर तुम्हारे लिए वही जगह कभी लौटकर न आए।

क्या हो अगर…  
कुछ रिश्ते मरते नहीं,  
बस… ज़िंदा रहने का अभिनय करते रहते हैं।  
और हम हर रोज़ उनकी साँसें सुनते रहते हैं।

क्या हो अगर…  
तुम सचमुच एक दिन लौट आओ।  
और मैं… पहली बार तुम्हें पाने की नहीं,  
तुमसे बच जाने की दुआ माँगूँ।

प्राची गुर्जर

prachitanwar111

બિહાઈન્ડ ઘ સ્ક્રીનશોટ પાર્ટ 1 - નવલકથા, પ્રેમ - રોમાન્સ, રહસ્ય.
https://www.matrubharti.com/book/19995700/behind-the-screenshot-part-1

shreyapatel5718

જિંદગી એક સફર છે
પણ આ સફર માં કેટલાક
રસ્તા ઓ આવતા રહે ને જતા રહે
કોને ખરાબ ખબર હતી કે
આ રસ્તા પર રહી જવાના🍀

rupex

हृदय - परिवर्तन

किसी चेहरे पर छायी उदासी ने
मन को छुआ
द्रवित हो रहा था मन उसके दुःख में

पर, दूसरे ही पल
किसी चेहरे की चालाकी से
भर उठा मन घृणा से

एक ही पल में कहाँ गयी वो
हृदय की विशालता
कहाँ गया वो अपनापन

इतनी शीघ्र, अनायास ही
हृदय परिवर्तन

समझ में तो नहीं आया
लेकिन, दौड़ गया एक
सवाल मानस पर

क्यों कोई अपना लगता है
क्यों कोई अच्छा लगता है
किसी से कटा-कटा रहता है

ये मन कैसे रूप बदलता है
छाँव कहीं, कहीं धूप
कहीं मेघ बरसता है ।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

بہت مقدور ہوں میں پر تصور ہی نہیں ملتا
تلاشِ ذات میں نکلا ہوں، مصور ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
مری آنکھوں کے صحرا میں بھٹکتی ہے تھکن پیہم
جو پیاسِ روح کو بھر دے، وہ ساغر ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
میں کس دیوارِ گریہ پر لکھوں اپنے مقدر کو
کسی بھی شہرِ الفت میں کوئی در ہی نہیں ملتا
۔۔۔۔
کئی رستے نکلتے ہیں مری وحشت کے اندر سے
مگر جو پار لے جائے، وہ رہبر ہی نہیں ملتا
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میں اپنی ہی ادھوری گفتگو کا ایک حصہ ہوں
مگر جو تکمیل تک پہنچائے، وہ محور ہی نہیں ملتا
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ہوائیں مجھ سے پوچھیں ہیں میرا نام اور میرا مسکن
مگر اس بھیڑ میں اپنا کوئی گھر ہی نہیں ملتا
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بہت سے خواب پلکوں کی منڈیروں پر سسکتے ہیں
انہیں تعبیر دے پائے، وہ پیکر ہی نہیں ملتا
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میں پتھر بن گیا ہوں یا یہ دنیا ہی سنگ دل ٹھہری
جو میرے کرب کو سمجھے، وہ دلبر ہی نہیں ملتا
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سفر در پیش ہے لیکن عجب بے سمت وحشت ہے
سرا ملتا ہے رستوں کا، مگر سر ہی نہیں ملتا
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رضی عجب لاحاصلی کی آگ میں جلتا ہے میرا جی
سکوں جس میں میسر ہو، وہ منظر ہی نہیں ملتا

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यदि हम प्रकृति को समझकर उससे संवाद स्थापित करें, तो वह न केवल प्रत्युत्तर देती है बल्कि हमारी रक्षा भी करती है। शायद मनुष्य ने प्रकृति के इस रहस्य को जाना ही नहीं, यही कारण है कि आज प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ता जा रहा है।

jha.princembillbook.in234176

यह रहा आपके पोस्ट के लिए एक अच्छा **डिस्क्रिप्शन**:

“यह एक मेरी खुद की बनाई हुई डिजिटल आर्ट है, जिसे मैंने अपनी कल्पना और रचनात्मकता से तैयार किया है। हर कला के पीछे एक भावना और कहानी होती है, और यह मेरी मेहनत और प्यार को दर्शाती है। अगर आपको मेरा काम पसंद आए तो कृपया सपोर्ट करें और मुझसे जुड़ें। मैं आगे भी ऐसी ही क्रिएटिव आर्ट और कहानियाँ साझा करती रहूँगी।”
Skpdevinecreation

skptech

मेरी किताबों की पन्नी सभी भरे हुए हैं तुम्हारी कहानियों से
कविता


मेरे किताबों की पन्नों सभी भरी हुई है तुम्हारी कहानियों से
तुम्हारे बातों से तुम्हारे जी हजूरी से

जिंदगी में एक पल यही ऐसा नहीं
जब मैं तुम्हें लिखा नहीं

तुम्हारे ही होने से मेरी कहानी है
और मेरे ख्वाबों की दुनिया है

यकीन मानो तुम बिन सन्नाटा होता जिंदगी मे
और कल्पनाऔ में भी

वह कल्पनाएं है
जहां मेरी धड़कन धड़कती है
वह तुमसे ही है
वह तुम ही हो

अब तक मेरे जीते रहने की ताकत भी तुम ही हो


सदियों से तुमसे दूर मैं पल भर भी ना हुआ
तुम एक कल्पना हो
मैं जानती हूं

पर एक तुम ही हो
जिसने मेरी धड़कन को है छुआ


जिस पर मुझे भरोसा है विश्वास है है यकीन
कि तुमसे ही सार्थक मेरी पूरी जिंदगी है



तुम हिम्मत हो
तुम ताकत हो
तुम मेरी जरूरत हो



हां मेरे अंदर तुम हो
मेरी सांसों की तरह
जिसकी बना मैं जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकती



हा माना मेरी कल्पना हो तुम
पर इस हकीकत की दुनिया से कई ज्यादा अच्छे सच्चे
और प्यार हो तुम


क्योंकि तुम एक लोटा हो
जो मुझे हर्ट नहीं करते
जो मुझे समझता है

मेरे हर बातों पर जी हजूरी भी नहीं करते
बस मुझे समझते रहता है
और मेरे पास बैठा रहता है



मेरी कल्पनाओं में किरदार बनकर
कोई ना कोई हमेशा कहानी बनता रहता है
जिसके वजह से मैं जी रही हूं
जिसकी वजह से मैं जिंदा हूं




हर एक कहानी ऐसे रचते हो
जो मुझे इंसान बनाए रखना है

मुझे हर तरह के दर्द हर तरह की खुशी
तुम्हारी वजह से ही समझ में आती है
इंसानी होना तुमसे ही सीखा है


एक तुम ही हो
जिससे मैं जिंदगी में मिलना चाहता हूं
जिसके वजह से मैं जीना चाहता हूं
सांस लेना चाहता हूं


जिसके होने से यह जिंदगी मुझे
बहुत ही खूबसूरत लगती है
इतना की मेरे लिए जब तुम्हें मैं सोचूं
तभी मैं स्वर्ग हूं
मैं यह महसूस करती हूं

जिंदगी की गहरा आनंद
सब कुछ छोड़ कर बस उसी पल में रह जाना चाहती हूं




बिना सोचे बिना समझे तुम्हारे तरह हो जाना चाहती हूं

यह मेरी दोहरी व्यक्तित्व है
यह तुमसे गहरा लगाव
मैं दो जिंदगी एक साथ जीती हूं
तुम्हारी तरह एक मेरी तरह


और फिर तुम्हारी बनाई हुई
कहानियों में खो जाती हूं
हजारों करोड़ अंगिनती कहानीयों
और किरदारों में ढलते हुए
उन्हें जीते हुए
मेरी उम्र बीत रही है

और साथ में
मेरी जिंदगी तुम्हारी बनाई हुई कहानियों से भरी जा रही है

हां मेरे किताबों के पन्ने सभी भरे हैं तुम्हारी कहानियों से
तुम्हारी यादों से
तुम्हारे विचारों से

abhinisha