मैं और मेरे अह्सास
हार से जीत तक
हार से जीत तक का सफ़र तय करने में वक्त तो लगता हैं ll
बारहा जानों जिगर में हौसलों को भरने में वक्त
तो लगता हैं ll
एक दिन या एक साल की बात तो नहीं है ये
मुकम्मल l
जीतने को मुसलसल आगे की और सरने में वक्त तो लगता हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह