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kalpita

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पन्नों में कैद

मैंने चाहा था उसे पन्नों में कैद करना,
मगर वो तो स्याही बनकर
मेरी हर लकीर में बह गया।

कुछ लफ्ज़ बिखर गए
कुछ अल्फ़ाज़ निखर गए
लहू का रंग बनकर
मेरी नस नस में वो रम गया ।

चाहा था मैंने मोहब्बत जताना उससे,
लबों तक आकर हर बार ठहर गया।
वो इश्क़ न बन सका ज़िंदगी का,
मगर ख़ुदा बनकर इबादत में रह गया।

शने: शने: बदल रही है रफ्तार जिंदगी की
धुंधली सी पड़ रही है यादें मेरे यार की
’कल्पिता’ की बंद आंखों के कोने में
कतरा आंसू बन कर बस गया। ❤️

कल्पिता 🌻

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