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kalpita

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पन्नों में कैद

मैंने चाहा था उसे पन्नों में कैद करना,
मगर वो तो स्याही बनकर
मेरी हर लकीर में बह गया।

कुछ लफ्ज़ बिखर गए
कुछ अल्फ़ाज़ निखर गए
लहू का रंग बनकर
मेरी नस नस में वो रम गया ।

चाहा था मैंने मोहब्बत जताना उससे,
लबों तक आकर हर बार ठहर गया।
वो इश्क़ न बन सका ज़िंदगी का,
मगर ख़ुदा बनकर इबादत में रह गया।

शने: शने: बदल रही है रफ्तार जिंदगी की
धुंधली सी पड़ रही है यादें मेरे यार की
’कल्पिता’ की बंद आंखों के कोने में
कतरा आंसू बन कर बस गया। ❤️

कल्पिता 🌻

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मुझे बसंत से डर लगता है…🍃🪾

पेड़ों से टूटे सूखे पत्ते
टूटे दिल से लगते हैं,
पतझड़ अपना-सा लगता है,
मुझे बसंत से डर लगता है…

सूखे चरमराते हुए पत्ते
विरह-वेदना से तड़पते ..
शजर को पुकारते हैं,
वो ठूँठ नई बहार के इंतज़ार में है…
मुझे बसंत से डर लगता है…

डालियों की नंगी उँगलियाँ
आसमान को टटोलती हैं,
जैसे मेरी तरह कोई बिछड़ा नाम
हवा में ढूँढ़ती है
मुझे बसंत.....

टूटे दिल के टुकड़ों जैसे
पत्तों को कहाँ जगह मिलती है,
न आसमाँ उन्हें रखता है,
न ज़मीं गले लगाती है —
बिल्कुल मेरी-सी हालत लगती है…
मुझे बसंत…



फिर पतझड़ आएगा,
फिर मेरा आईना बन जाएगा,
एक मंजर फिर से आँखों से गुज़र जाएगा।
पेड़ से कभी शिकवा न किया मैंने,
वो फिर नई मोहब्बत पा जाएगा…
और मैं?
मैं फिर वही सूखा पत्ता बन
किसी कोने में चरमराऊँगी,
हवा के साथ उड़ जाऊँगी…
मुझे बसंत से डर लगता है —

डर लगता है मुझे बसंत से..
क्योंकि वो हर बार सिखा जाता है
कि जो नया है वही अपना है,
और जो टूट गया…
वो बस कहानी है।
नई पत्तियों से भर जाता है,
पुरानी कहाँ याद आती हैं,
फूल, फल, पंछी — सब उसके हो जाते हैं,
जिसे त्यागा उसने,
उसे कोई नहीं पुकारता है…
बसंत…

फिर से बसंत आएगा
असमान सज जायेगा रंग बिरंगे फूलों से
फिजाएं सजेगी होली के रंगों से
हवाएं सताएगी बेरंग पत्तो को
कोई उनका करुण रुदन सुन ना पाएगा
दर्द में तड़पते फना हो जायेंगे या
जला दिए जायेगे...
मुझे बसंत से डर लगता है ।

कल्पिता 🌻
दिल से दुनिया तक ❤️

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समय एक सौदागर

बेचने आया है समय एक सौदागर बन कर
अपनी टोकरी में ढेरों से पल रखकर...

चलो समय से एक सौदा कर लें,
ग्राहक बन कुछ लम्हे खरीद लें।

कुछ बचपन की नटखट शरारतें,
कुछ जवानी की मीठी अटखेलियाँ।

पहली मोहब्बत की धुंधली यादें 
थोड़ी सी अपनी मासूमियत भी।

वक्त से अपनी गुस्ताखियां भी खरीद लेंगे
उन्हें दुबारा ठीक करके वापिस रख देंगे

कुछ रिश्ते होंगे उलझे-उलझे,
कुछ अधूरे, कुछ टूटे से—

लेकर उनको परिपक्वता की गिरहों से
हम उन्हें फिर सुलझा लेंगे।

पर सौदागर से मोल-भाव कैसे करें?
हम तो नासमझ ठहरे—
घाटे का सौदा ही करेंगे। 😔

और अगर हमारी हैसियत से
महँगा हुआ यह सौदा,
तो उसकी टोकरी से
चुपके से हम....
बचपन ही चुरा लाएँगे। 😍

कल्पिता 🌻
दिल से दुनिया तक ❤️

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