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मेरी खिड़की से मेरे नए- से घर के नए - से कमरे की नई - सी दीवार पर खिड़की से रोज़ धूप का एक टुकड़ा मुझसे मिलने चला आता था। बिल्कुल पसंद नहीं था मुझे उसका यूँ बेमतलब, बेवजह मेरी खिड़की से चले आना। खिड़की बंद की, पर वह नहीं माना। पर्दा गिराया, फिर भी नहीं माना। किसी न किसी बहाने वह आ ही जाता था। धीरे-धीरे वह मेरी ज़िंदगी का एक अनचाहा हिस्सा बन गया। फिर मौसम बदला... ठंड ने दस्तक दी, तो वही अनचाहा अपना-सा लगने लगा। मैं कुर्सी डालकर गुलज़ार की किताब पढ़ती, और वह चुपचाप मेरे साथ पढ़ने बैठ जाता। उसकी अदा भाने लगी सूरज से नज़रे चुरा कर आना कभी कभी बादलों से मेरे लिए लड़ कर वापिस खिड़की से फांद आना। अब उसका आना मेरे इंतज़ार में शामिल हो गया था। और उसका धीरे-धीरे लौट जाना मुझे डराने लगा। मोहब्बत-सी 💕 हो गई थी कमरे की उस खिड़की से, और उससे भी ज़्यादा उस धूप के छोटे-से टुकड़े से, जो बिना दस्तक दिए हर रोज़ मिलने चला आता था। ---- मेरी आवाज़ घुटकर रह गई जब खिड़की हटाकर उसकी जगह एक दीवार खड़ी कर दी गई। मैं भागकर बाहर गई उस टुकड़े से मिलने, पर वहाँ सिर्फ़ धूप थी। पता नहीं कहाँ खो गया मेरा वह धूप का टुकड़ा। बहुत ढूँढ़ा, पर वह कहीं नहीं मिला। जहाँ कभी खिड़की हुआ करती थी, उस दीवार से कान लगाकर उसकी आहट सुनती हूँ। शायद वह दस्तक दे... शायद कुछ कहे। मैं कभी बाहर, कभी भीतर उसे पुकारती फिरती हूँ— शायद किसी दिन वह भी मेरा नाम पुकारता मिल जाए। आज भी उसी कमरे में, जहाँ कभी खिड़की थी, मैं उसके इंतज़ार में बैठी हूँ। शायद किसी सुबह कोई दीवार फिर से खिड़की बन जाए... और धूप का मेरा वह टुकड़ा लौट आए। सूरज अब भी हर रोज़ उगता है, बस मेरी खिड़की वाला धूप का टुकड़ा नहीं आता। 😔 अगर किसी की खिड़की से एक उदास, सफ़ेद, कमज़ोर-सा धूप का टुकड़ा दिखाई दे... अगर वह खामोशी से मेरा नाम—'कल्पिता'—पुकारे, तो मुझे बुला लेना। क्योंकि मेरे पुराने-से घर की पुरानी-सी दीवार पर अब कोई खिड़की नहीं है। 💔 कल्पिता 🌻 दिल से दुनिया तक ❤️
दर्द भरा एक एहसास लिए बैठे हैं, न जाने किसका इंतज़ार आँखों में लिए बैठे हैं। दिल की चौखट पर दस्तक देता है कोई... इसी भ्रम की उम्मीद लगाए बैठे है।
मैं एक नदी हूँ… गगन को चूमती पर्वत की चोटी से जन्मी हूँ, बर्फ़ की खामोशियों में पली हूँ… चल पड़ी हूँ एक अनजाने सफर पर, अपनी मंज़िल की तलाश में। पहाड़ों की बाहों में खुद को समेटना चाहा था मैंने, पर उसने धीरे से कहा— "मैं तेरी मंज़िल नहीं… सिर्फ़ तेरा पहला प्रेम हूँ।" मैं मुस्कुराई भी नहीं… बस चुपचाप बह चली। दया, करुणा, समर्पण— सब अपने साथ लिए, बिना सवाल, बिना शिकायत आगे बढ़ती रही। जमीन से पूछा— "क्या तुम मेरी मंज़िल हो?" वो हँस पड़ी— "नहीं… मैं तेरे सफर की साथी हूँ, तुझे अभी बहुत दूर जाना है।" कहीं मुझे पूजा गया, कहीं मुझे इस्तेमाल किया गया, और कहीं… मेरी पवित्रता को ही तार-तार किया गया। मैं फिर भी बहती रही… हर दर्द को अपने भीतर समेटे। मैंने फलक से पूछा— "क्या तुम मेरी मंज़िल हो?" वो मुस्कुराया— "मैं तेरी मंज़िल नहीं… बस तेरा शुभचिंतक हूँ। तेरे सफर के उतार चढ़ाव और तेरे भटकाव को देख कर दर्द में हूं...." उसकी ऊँचाइयों से गिरते आँसुओं को आँचल में समेटे मैं बढ़ती रही… जाने किस ओर… अब थक चुकी थी मैं… हार चुकी थी… बस थोड़ा ठहरना चाहती थी, खुद में ही कहीं बिखरना चाहती थी… तभी दूर… एक असीम विस्तार नजर आया— सागर… उसे देखते ही मेरी रूह मचल उठी… और उसने पुकारा— "आ जा… मैं ही तेरी मंज़िल हूँ… जहाँ तेरा हर दर्द समा जाएगा, जहाँ तेरा हर सफर पूरा हो जाएगा…" मैं मुस्कुराई… और पहली बार— खुद को खो देने के लिए तैयार हो गई। मेरी मंजिल नहीं थी वो मेरे अस्तित्व का अंत थी वो 😔 जब समझ आया तब तक देर हो चुकी थी ।💔 कल्पिता 🌻 दिल से दुनिया तक ❤️
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