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Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

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(2.8m)

मैं और मेरे अह्सास

झलक देखी हैं
आंखों में प्यार की झलक देखी हैं l
बातों में प्यार की झलक देखी हैं ll

सुहानी सुबह का इन्तजार करती l
रातों में प्यार की झलक देखी हैं ll

वक़्त बे वक़्त आकर दस्तक देती l
यादों में प्यार की झलक देखी हैं ll
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

आंखों में देखते ही दिवाने हो जाते हैं l
ख़ुदाया काजल लगाके ना निकलो ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

मोहब्बत सिखा रहा हैं l
मोहब्बत सिखा रहा हैं l
दिलों को मिला रहा हैं ll

प्यार का नशीला जाम ll
आंखों से पिला रहा हैं ll

ताउम्र साथ देने का l
भरोसा दिला रहा हैं ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

याद में भला तमीज ही कहा होती हैं l
वक़्त बे वक्त आकर दस्तक दे जाती हैं ll
३०-९-२०२६
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
यादों का एक जाम भरो
मोहब्बत में नशीली यादों का एक जाम भरो l
बुलाने पर आने के वादों का एक जाम भरो ll

एकदूसरे से चाँदनी की साक्षी में लिपटकर l
साथ बिताई मदभरी रातों का एक जाम भरो ll

राह ए इश्क़ में दीवानेपन में रसभरी मीठी l
प्यारसे की हुई सभी बातों का एक जाम भरो ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
कुछ अश्क मेरी आँख के
कुछ अश्क मेरी आँख के उनकी आँखों से बहने लगे l
दिल में छिपे दर्द अश्कों के द्वारा मुझे सब कहने
लगे ll

ना रोकने की कोशिश की ना टोकने की हिम्मत
है l
लगातार खामोशी से आँखों के इशारों को सहने
लगे ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
वक़्त नाजुक है
वक़्त नाजुक है सँभलकर जीना सीख लो l
वक़्त की नजाकत समजकर जीना सीख लो ll

बड़ी तेज रफ़्तार से जिंदगी भागे जा रही l
आंधियों से सरककर जीना सीख लो ll

कोई किसीके लिए नहीं रुकता है जहाँ में l
खुद का वक़्त बदलकर जीना सीख लो ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
बहार के दिन है
बहार के दिन है खुशियाँ दस्तक दे रही हैं l
धडकनों में भी गलियाँ दस्तक दे रही हैं ll

दिन पे दिन गुज़रते जा रहे हैं देखे बिना l
मुलाकात की चिट्ठियां दस्तक दे रही हैं ll

मँजे शायरों की महफिल में नशीली अच्छी l
शेर ओ शायरी में पंक्तियां दस्तक दे रही हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
इन्तजार
इन्तजार में वक्त गुजरता गया l
दिल तो समझा सभलता गया ll

ताल्लुक की ख़ातिर ख्याल कर l
हालत के साथ बदलता गया ll

पास से गुज़रे दो पल के लिए l
थोड़ी खुशी में छलकता गया ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
मातृभूमि
मातृभूमि की बात ही निराली हैं l
मातृभूमि ही पहचान हमारी हैं ll

भारत के जवानों की बात क्या करे l
देश के इश्क़ में कुर्बान जवानी हैं ll

जिसमें राम राम कृष्ण सपूतों उपजे l
ये खूबसूरत जन्मभूमि की कहानी हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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