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Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(1.8m)

मैं और मेरे अह्सास
जाने क्यूँ
जाने क्यूँ लोग जाम पिया करते हैं?
फक्त जीने के लिए जिया करते हैं?

चार दिन खुश रह दिल बहलाने l
मोहब्बत का दर्द लिया करते हैं?

नज़दीक जाने में रुस्वाई के डर से l
दूर से ही दीदार किया करते हैं?

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
खास
एसा भी कुछ खास नहीं लिखा हैं l
जानेमन को दास नहीं लिखा हैं ll

खुद को और अपनों के लिए किया l
आम नृत्य को रास नहीं लिखा हैं ll

जी में आया वो कविता में लिखा l
शब्द लिखे एहसास नहीं लिखा हैं ll

आगे कुआँ पीछे खाई है इस लिए l
सत्य को आभास नहीं लिखा हैं ll

उजालों को अपनी ओर लाना है तो l
अंधेरे को आसपास नहीं लिखा हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
माँ
नामाबर को आने में देर हो गई l
चैन ओ सुकून की घड़ी खो गई ll

माँ ने चिट्ठी भेजी बेटा कब आएगा l
फ़िर से सुलगते सवाल को बो गई ll

राह तकती हुई दरवाज़े पर खड़ी l
इंतजार करते करते वही सो गई ll

दीदार की तमन्ना औ आशाभरी l
एक और शाम ही यूहीं लो गई ll

मन बना लिया न मिलने का तो l
बुलाने पर न आया माँ रो गई ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

शराफ़त
निगाहो से वार करना छोड़ दो l
हो सके तो रास्ते सभी मोड़ दो ll

सौप दो खुद को खुले आसमान में l
शराफ़त की सारी ज़ंजीरे तोड़ दो ll

आत्मा को मुक्त कर दो सबसे l
बाहिर के शोर को खोड दो ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
निगाहें
निगाहों से निगाहें मिलाने निकले हैं l
ये क्या गुनाह करने जाने निकले हैं ll

लगता है समझना ही फुजूल है कि l
बेवफा को अपना बनाने निकले हैं ll

अपनेआप को बूत बना दिया है कि l
पत्थर दिल को पिघलाने निकले हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
जीने के हैं चार दिन
जीने के हैं चार दिन, हँसकर खुलकर जी लो l
यार दोस्तों के संग खुशी का जाम पी लो ll

छोड़ो सब चिंताएं क्या रखा है? आओ नाचे l
नशीली फ़िजाओं में जरा सा झूम भी लो ll

कल की किसको ख़बर क्या होने वाला है तो l
आज मस्ती के पल जिगरो जान में सी लो ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
नज़ारा
दिल बहला सके एसा कोई नज़ारा नहीं मिला l
दो लम्हें जी सके खुशी का इशारा नहीं मिला ll

जिंदगी भर दिल में हमेशा से शिकायत रही l
पूरा समंदर घूम लिया कही किनारा नहीं मिला ll

इलाज - ए - दर - ओ - दिल का क्या करे अब l
रातभर ढूँढते रहे आसमाँ में सितारा नहीं मिला ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
तन्हाई
तन्हाई की ये दास्ताँ क्या हैं?
जीस्त क्या है? जाँ क्या हैं?

क्यूँ जुदा हो गये हो कि l
तेरे मेरे दरमियाँ क्या हैं?

सिर्फ़ एक बार फिर से l
मिलन का झरियाँ क्या हैं?

ऐसे ना किया करो के l
पता है, बागयाँ क्या हैं?

गर हौसला बुलन्द हो तो l
उड़ान को आसमाँ क्या हैं?
२५-४-२०२६
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

मतलबी संसार
चाहत का इज़हार करते करते रात हो गई है l
ख्यालों में बात करते नींद से मात हो गई है ll

जहां में हर कोई अपनी खिचड़ी पका रहा है l
अब तो मतलबी संसार से ना'त हो गई है ll

चार लोंगों की निगाहों से बचकर आज तो l
आँखों ही आँखों मे चुपके से बात हो गई है ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

साथी
ताउम्र साथ देनेवाला साथी पल भर भी नहीं मिलता l
शायद किसीसे भी मेरा तो मुकद्दर भी नहीं
मिलता

तमन्ना थी जिन्दगी के सफर में कोई तो मिल
जाए l
दिलवाला तो क्या कोई दिल पत्थर भी नहीं
मिलता ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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