Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(2.6m)

मैं और मेरे अह्सास
कर्म
कर्म का लेखा जोखा रुकता नहीं है l
कोई भी दान धर्म से भरता नहीं है ll

हर कार्य का पडघा पड़के रहता हैं l
कर्म अपने आप से कहता नहीं है ll

फल की चिंता करना छोड़ ही दो l
ईश्वर का हिसाब दिखता नहीं है ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
अह्सास
शेर को ये अह्सास हैं l
ग़ज़ल में वो खास हैं ll

सौग़ी महेक से लगता l
बारिश आस पास हैं ll

आज ही में जीभर जी ले l
कल की फिक्र बकवास हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
दामिनी
कल तक अनजान थे आज हमसफ़र हो गये l
देखते ही देखते आज दामिनी रहबर हो गये ll

वक़्त भी क्या दिन दिखलाता रहता है अक्सर l
रहते थे सदा अक्कड़ आज मयस्सर हो गये ll

कुदरत की कारीगरी कहो या फिर कृपा कहो l
रेत के सूखे रण पल भर में समंदर हो गये ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
सखी सजाओ आँगन कान्हा घर आया हैं l
साथ अपने सभी दोस्तों को भी लाया हैं ll

जैसे कई दिनों के भूखे हो उसी तरह से l
साथ बैठकर मक्खन मिसरी खाया हैं ll

कब से इंतजार कर रहीं थीं दीदार को l
दिवानी राधा ने चैन ओ सुकून iपाया हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
बदली
बदली में छुप गई है सितारों की बारात l
चांद सितारों के बिना सुनी है ये रात ll

यू तो कहीं कोई आसार नहीं थे बदली के l
लगता है कहीं दूर से किया है आयात ll

बेमान गरज रही है दिनभर पगली हुई सी l
बड़े अजीब दिखते आसमान के हालात ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
सावन

तितलियों के नाम से ख़ुशबु चुराता कौन हैं l
बाग से फूलों को चुपचापी उठाता कौन हैं ll

रोज ही सुनाई देती है सदाएं सखी को l
दूर से आवाज़ दे देकर बुलाता कौन हैं ll

कोई तो है हर जगह मोजूद रहता है सदा l
यूँ सवेरे नीद से जग को उठाता कौन हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
घनघोर
आकाश में घनघोर बादल छाए हुए हैं l
कड़ी धूप में कहां घुम के आए हुए हैं ll

कहां से आए है और कहां होगी बारिश l
साथ अपने घेरा अंधकार लाए हुए हैं ll

कहीं ये सैलाब सबकुछ बहा ना ले l
सब के दिलों में तूफान पाए हुए हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
रिमझिम
रिमझिम बारिश की बूंदें बहका रही हैं l
धीरे धीरे मन का मयूर चहका रही हैं ll

मिट्टी की सौगी खुशबु से चारो ओर l
बहकती फ़िज़ाओं को महका रही हैं ll

झम-झम-झम-झम पानी बरसे ओ l
जल के बादलो को लहका रही हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
आँखों
आँखों के इशारों से दिल का हाल सुना दिया हैं l
आज नीची नजर करके राज को छुपा दिया हैं ll

किसीके जाने से दुनिया नहीं रुकती स्वीकार कर l
दर्दों गम को भुलाकर हौसला दिखा दिया हैं ll

जिंदगी आगे बढने का नाम है बस यहीं सोच l
दिलों दिमाग से नाम पता सबकुछ मिटा दिया हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
बरसात का मौसम
बरसात का मौसम बड़ा सुहाना लगता हैं l
भीगने भिगोने के बाद वो रुहाना लगता हैं ll

तमन्ना और अरमानो को ओर जवान कर l
धीरे धीरे से भी रिमझिम सुनाता लगता हैं ll

आज शर्माते हुए सिमटने और लिपटने को l
खामोशी से गुफ़्तगू करने पुकारा लगता हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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