Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(2.5m)

मैं और मेरे अह्सास
इशारों से आपकी नजर कुछ कह रही हैं l
इसी नजर से हमारी जिन्दगी बह रही हैं ll

महफिल में एक कोने में बैठे है फ़िर भी l
कब से निगाहों के वार को सह रही हैं ll

कातिलाना हमले पर हमले हो रहे है तो l
शर्मा के चुपके से सब कुछ गह रही हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
शहीदों को नमन
देश के लिए कुर्बानी देनेवाले शहीदों को नमन करता हूँ l
पावन चरणों में शीश झुकाकर उसको आशीष भरता हूँ ll

उनके जीवन के कुछ पल को अपनी कवितामें लिखने l
गाथा पढ़ने को इतिहासों की अमर कहानी में सरता हूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
गमकता
रूह के अंदर गमकता क्या हैं?
चहरे पर ये चमकता क्या हैं?

दिल का दिल से लगाव देख l
मुलाकात से दमकता क्या हैं?

जिद पकड़कर बैठे है तो यूँ l
भीतर पहुंच धड़कता क्या हैं?

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
गणपति बप्पा
गणपति बप्पा कृपा निधान
सुख कर्ता दुःख हर्ता
सदा साथ रहना l

रिद्धि सिद्धि के दाता
खुशियाँ देना अनमोल
गलतियां माफ करना l

बुद्धि के दाता
विद्या कला आपसे मिले
उसे गौरी नंदन कहना l
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
पुरानी यादें
पुरानी यादें भुलाओ तो जानू l
भूत से बाहिर आओ तो जानू ll

यूँ चुपकीदी ना रखा करो जरा l
हाल ए दिल बताओ तो जानू ll

सब भूलकर आगे बढ़ जाने को l
खुद को फ़िर सजाओ तो जानू ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
सजा है माँ का दरबार
सजा है माँ का दरबार आओ भक्ति के रंग में
जाए l
हर्षोल्लास की लहर चारो ओर मन प्रफुल्लित पाए ll

भक्त जन पूर्ण रूप से भक्ति के रंग में रंगीन हो कर l
सजता दरबार बेहद शुभ देवी का सदा रहता साए ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
एक ही नजर
बरसों हुए आप से मुलाकात नहीं हुई l
मन को संतोष देने वाली बात नहीं हुई ll

काश दूर से ही दीदार ए यार हो जाता l
एक ही नजर देख सके सौगात नहीं हुई ll

खुद ही मिलने आ जाते तो अच्छा होता l
कुछ आप की तरफ़ से इनायत नहीं हुई ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
इश्क
इश्क को सरे आम जताया ना कर l
अपने अपनों को यूँ बताया ना कर ll

दुनियावाले कातिल नजरों से देखते हैं l
नजर लगेगी ख़ुद को सजाया ना कर ll

खुद को खुद की नजर लगती है तो l
खुशी से छलक के मुस्कुराया ना कर ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
बदली में चाँद
अंधेरो से उजाला मिट गया हैं ll
बदली में चाँद कहाँ छुप गया हैं?

तारों को अकेले मुस्कुराने दो l
वक्त साथ बिताने लुट गया हैं ll

शरारतों की झिलमिल होगी तो l
आनंद तो पीछे ही छुट गया हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
सावन के गीत
रिमझिम-रिमझिम बूंदों ने मिलकर सावन के गीत सुनाएँ ।
क़ायनात में सभी बारिस प्रेमियो ने मधुर
प्यारे गाएँ ll

भीगी मिट्टी, हरियाली ओ सजा हुआ
वातावरण l
हवाओ की सरगम पंछियों की चहचहाहट
संदेशा लाएँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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