part 1....बस कमी ढाई अक्षर की....
प्रतिदिन सूर्योदय के साथ ही कुछ कहानी, कुछ संघर्ष, कुछ इछाए, कुछ यात्रा सभी कहानीया संपूर्ण नही होती सभी संघर्ष जीते नही जाते सभी इछाए प्राप्त नही होती और कुछ यात्रा रहजाति है अधूरी क्यो?
अब आपमेसे कुछ सोचेंगे प्रयास अधूरा रहा कुछ मानेंगे निश्चय दृढ़ नही था कुछ क्रोध करेंगे तो कुछ इस असफलता का बोझ अपने भाग्य के अन्धो पर दलड़ेंगे परंतु इस सबका कारण है केवल एक तत्व की कमी.... कमी है धाय अक्षर की वो है प्रेम कमी है प्रेम की....
प्रेम जो ना सास्त्र की परिभाषा मे मिलेगा ना ही शस्त्रों के बल मिलेगा ना पाताल की गहराई मे नाही आकाश के तारो मे.... तो ए प्रेम है क्या? कैसे पाया जाता है? क्या है मार्ग प्रेम को पाने का?
पाने कोहि प्रेम कहै जग की है ए रित
प्रेम अर्थ संजायेगी शिवप्रीये की ए प्रीत....
part 2 coming ?