यादों के बाद।
हमें नींद आएगी तो इस तरह सो जाएंगे,
कि लोग हमें जगाने को सब रो जाएंगे।
चेहरे पे सुकूँन रख के सारे दर्द छुपाएंगे,
भीतर के सभी आँसू चुपचाप खो जाएंगे।
हँसी की ओट में रखे हैं जो ज़ख़्म गहरे,
तन्हाई के लम्हों में फिर वो खुल जाएंगे।
यादों की हवा जब भी छू लेगी दिल को,
भूले हुए हर किस्से फिर से लौट आएंगे।
वक़्त की रवानी में सब कुछ बह जाएगा,
अहंकार, शिकवे मिट्टी में ही ढल जाएंगे।
थककर ये सारी साँसें जब ठहरने लगेंगी,
रूह के सभी क़दम सुकून में थम जाएंगे।
"प्रसंग" ख़ामोशी में एक दिन रुख़्सत होगा,
लोग उसे याद करके बार-बार रो जाएंगे।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर