"हम रोते क्यों हैं?"
तुम और मैं… जब भी कभी रोए हैं, तो वजह हमेशा एक ही रही है — उम्मीद।
कोई हमें धोखा नहीं देता, हम बस उम्मीद ज़्यादा लगा लेते हैं।
भगवान तक, एक वक्त के बाद, हमारी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते…
क्योंकि हम आदत के कैदी हैं — उम्मीद की आदत के।
यहाँ जो भी हमसे प्यार करता है, वो भी किसी न किसी उम्मीद के साथ करता है।
और जो हमें छोड़कर चले जाते हैं… उनसे भी हमें उनकी उम्मीद के लिए ही तकलीफ़ होती है।
वरना, क्या तुमने कभी किसी को अपने परदादा के लिए रोते देखा है?
हम दरअसल इंसान के जाने पर नहीं,
उसके साथ जुड़ी उम्मीदों और सुखों के खो जाने पर रोते हैं।
हम सब यहाँ… किसी न किसी उम्मीद के रूप में ही मौजूद हैं।
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