कितनी खूबसूरत थीं बचपन की वो यादें
न खाने की फिक्र थी ना कही रहता था ठिकाना
बस हमको तो था मम्मी के पास रोते हुए जाना
की सुबह ना उठने का था एक ही बहाना , मम्मा मैने सपने में देखा खिलौने का खजाना
कभी गए कीचड़ में कभी कपड़े हुए है मैले
अबतो याद हीं नहीं आते , जाने कितने खेल थें हमने खेले
काश ऐसा हो कोई फिर ले आए दिन वो पुराने
जब शाम होते ही घुमा करते थे गलियों में बनकर बेगाने
दुनिया अपनी बस्ती थी मम्मा की प्यारी सी गोद में
सुभा होते ही हम निकल पड़ते थे , बस अपने दोस्तों की ही खोज में
वो बारिश में भीगना, कागज़ की नाव चलाना,
वो दोस्तों संग मिलकर, मिट्टी के घर बनाना।
वो छोटी-छोटी बातों पर, रूठना और मनाना,
वो बचपन के दिन, अब बस यादों का खजाना।
वो चाँद सितारों से बातें करना,
वो परियों की कहानियों में खो जाना।
वो सपनों की दुनिया में, उड़ते फिरना,
वो बचपन की मासूमियत, अब बस यादों का गहना।
पर टूट जाता है मन ये मेरा , इस एहसास से हर एक बार
अब जाने कैसे लौटकर आए वो मेरे , बचपन के दिन यादगार
की लौट आए वो मेरे , बचपन के दिन यादगार।